Ram Jhula, Rishikesh

Trip to Chopta – Return चोपता यात्रा – वापसी

दिल्ली से चोपता तक की यात्रा का यह अंतिम भाग है। यदि आप पिछले भाग नहीं पढ़ पायें हैं तो नीचे दिये गये लिंक्स पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

चोपता के बारे में जानकारी, मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थान, चोपता कैसे पहुंचे, उपयुक्त मौसम, महत्वपूर्ण सावधानियों आदि से सम्बंधित जानकारियां)।
दिल्ली से ऋषिकेश तक की यात्रा का वृत्तांत।
ऋषिकेश से मक्कू बैंड तक की यात्रा का वृत्तांत।

आज हमें सुबह 5 बजे ही दिल्ली के लिये निकलना था और इसलिये सारी पैकिंग रात में ही कर ली थी। रूद्रप्रयाग से मक्कू बैंड आते समय ही रास्ते में कहीं टायर पंक्चर हो गया था लेकिन ट्यूबलैस होने के कारण तब तो पता नहीं लगा। कल सुबह जब टायर बैठा हुआ देखा तो स्टपनी कल ही बदल ली थी। वैसे इतनी सर्दी में सुबह – सुबह स्टपनी बदलना भी कम बहादुरी का काम नहीं है।

क्या इतने ईमानदार और सीधे लोग आज भी हैं ?

रात में सभी थके हुए थे इसलिये जल्दी ही सो गये। मैंने भी यही सोचा की होटल वाले सारा भुगतान सुबह ही कर दूंगा। आज सुबह जब हम सभी तैयार होकर सुभाष जी ढाबे पर पहुंचे तो उसे बंद पाया। बगल वाले ढाबे में एक बाबा सोये हुए थे, उन्होंने बताया की सुभाष जी रात में ही अपने गाँव चले जाते हैं और सुबह 7 बजे तक आते हैं। अब पेमेंट किसे करें, यह सोचने लगे।

आखिर बाबा ने ही बोल दिया की आप अपना मोबाइल नंबर दे जाइये, वो आपको कॉल कर लेगा। हमने सुभाष जी का नंबर मांगा लेकिन बाबा ने कहा की वो फ़ोन नहीं उठाता।

मैं और सभी साथी हैरान थे यह देख कर। आम तौर पर सभी होटल वाले कुछ पेमेंट एडवांस में ही ले लेते हैं, पहचान पत्र की कॉपी रखवा लेते हैं और तमाम जानकारियां लेते हैं लेकिन यहाँ ऐसा कुछ नहीं था। सुभाष जी तो हमारा नाम तक नहीं जानते थे। केवल विश्वास पर ही कमरा दे दिया और बिना कोई एडवांस पेमेंट लिये नाश्ता, खाना आदि भिजवाते गये…. और जब पैसे लेने की बारी आयी स्वयं ही मौजूद नहीं।

हम शहर वालों के लिये ऐसी ईमानदारी हैरान करने वाली बात हो सकती है लेकिन यहाँ उत्तराखण्ड के पहाड़ों में यह आम बात है। बाकी पहाड़ी राज्यों के बारे में तो मैं अधिक नहीं जानता लेकिन उत्तराखण्ड के ज़्यादातर पहाड़ी लोग ऐसे ही हैं। इनका सीधापन, ईमानदारी, सांस्कृतिक समृद्धता ही मुझे बार – बार यहाँ खींच लाती है।

हम चाहते तो पैसे नहीं भी दे सकते थे लेकिन यह एक विश्वासघात होता और शायद फिर वे कभी भी शहरी लोगों पर विश्वास नहीं करते। वैसे भी दिल्ली – एनसीआर के लोगों के व्यवहार का रिकॉर्ड पहाड़ों में कुछ बहुत अच्छा नहीं है। आखिर बाबा को अपना मोबाइल नंबर सौंप कर हमने वहां से विदा ली

सुबह 5 बजे का समय होने के कारण अभी केवल अंधेरा था। पहले सोचा था की वापसी में ऊखीमठ में ओम्कारेश्वर मंदिर के भी दर्शन करते चलेंगे लेकिन यहाँ से बिना नहाये ही निकले थे इसलिये दर्शन का विचार त्याग दिया। अंधेरे को चीरते हुए गाड़ी बढ़ती जा रही थी और अब हम तेज़ी से नीचे की ओर जा रहे थे। रास्ता तो वैसे अच्छा बना हुआ था लेकिन एक डर था की कार में कोई अतिरिक्त स्टपनी नहीं थी और यदि कोई भी टायर पंक्चर होता है तो फिर भगवान ही मालिक है। .

कुछ ही देर में रांसी गांव (मध्यमहेश्वर का बेस कैंप) की ओर जाता रास्ता दिखा। ऊखीमठ आ चुका था और ऊखीमठ को पीछे छोड़ते हुए हम आगे बढ़ चले। मक्कू बैंड से कुंड तक का रास्ता अच्छा बना हुआ है लेकिन कुंड से आगे का रास्ता केदारनाथ हाईवे होने की वजह से अभी क्षतिग्रस्त है। वैसे रास्ता तो चौड़ा जो चुका है लेकिन जगह – जगह कीचड़ है।

अब उजाला हो चुका था और हम रुद्रप्रयाग की ओर बढ़ते जा रहे थे। सुबह का समय होने के कारण रास्ता खाली ही था। चलते – चलते हम पहुंच गये अगत्स्यमुनि और वहां चाय पी, कुछ आगे जाकर पंक्चर ठीक करवाया। सुबह जल्दी उठने की आदत हममे से किसी को नहीं थी, केवल कृष्णा जी को छोड़ कर… इसलिये बाकियो का तो पता नहीं लेकिन मैं सो गया।

Agatsyamuni
Agatsyamuni

जब आँखे खुली तो पाया की हम श्री नगर पहुँच चुके थे। श्री नगर वैसे तो बहुत खूबसूरत शहर है लेकिन आजकल चार धाम हाईवे निर्माण के कारण धूल से भरा रहता है। यहाँ एक खाली से होटल पर कार रोकी और पराठों का आर्डर किया। पराठों के बनने में अभी समय था, तभी होटल की एक बड़ी सी खिड़की से पीछे की वादी पर नज़र गयी।

यह दृश्य देख कर नज़रे ठहर गयी। अद्भुत दृश्य था। दूर – दूर तक फैले ऊंचे – ऊंचे नीले पहाड़… सरसो से लहलहाते पीले खेत… हरे – भरे खेत… उनके पीछे बहती नीली अलकनंदा, छोटे – बड़े पेड़ और उन्ही खेतों के किनारे पर एक दो मंज़िला छोटा सा घर। 15 – 20 वर्ष पहले तक हम दिवाली के मौके पर प्राकृतिक दृश्यों के वॉलपेपर लाकर घर सजाते थे। यह दृश्य उस वॉलपेपर में बसे किसी गांव जैसा था। आँखें ठहर गयी थी।

कुछ ही देर में पराठे प्लेट में थे लेकिन उनका स्वाद सामने वाले दृश्य के सामने बिलकुल फीका था (वैसे भी पराठे बेकार ही थे)। कुछ ही देर में हम आगे की ओर निकल पड़े थे। अब धूल और गड्ढे भरे रास्तों की शुरुआत हो चुकी थी।

गाड़ी के घुमते पहिये अब तक श्री नगर मुख्य शहर में पहुँच चुके थे। आज सोमवार होने के कारण चहल – पहल थोड़ी अधिक थी। छात्रों की भीड़ देख कर लगा की शायद कोई परीक्षा थी। यहाँ से एक रास्ता बायीं ओर ऊपर की ओर जाता दिखा। यही रास्ता लैंसडौन से होते हुए कोटद्वार के रास्ते दिल्ली जाता है। श्री नगर से सामने दायी ओर दूर – बहुत दूर एक पहाड़ी की चोटी पर एक मंदिर दिख रहा था, एक पल को लगा की शायद वही चन्द्रबदनी माता का मंदिर हो।

अधिक सोचा नहीं और एक बार फिर से नज़रें पहाड़ों में खो सी गयी और इन खोयी हुई नज़रों में कब देव प्रयाग की चहल – पहल आ गयी पता ही नहीं चला। यहाँ वसंत पंचमी का मेला लगा हुआ था और सभी लोग उधर ही भागे जा रहे थे। एक दुकान पर गर्मा – गर्म जलेबी बनती देख मंगवा ली।

मेला… यह शब्द ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। आज जब हम दिल्ली जैसे शहरों में मेले का नाम सुनते हैं तो उसका सीधा सा अर्थ किसी मॉल में लगने वाली सेल से होता है। यही होता है न ? क्या करें, बाज़ारवाद की संस्कृति ने माहौल ही ऐसा बना दिया है। छोटे शहरों में आज भी मेला वही है जो पहले था… अथार्त छोटी – बड़ी दुकाने, झूले, जादू का खेल दिखाने वाले, मदारी, सर्कस, खिलौने वाले, गर्मा – गर्म बनती जलेबी, मिठाइयां, समोसे आदि। देव प्रयाग का मेला ऐसा ही होता है। वापस लौटने की जल्दी में हम मेले का आनंद नहीं ले पाये।

कौड़ियाला, शिवपुरी, ब्यासी आदि होते हुए हम तीन बजे तक ऋषिकेश पहुंच चुके थे। आते समय तो ऋषिकेश नहीं जा पाये थे लेकिन अब इच्छा थी जाने की। गाड़ी को पार्किंग में लगाया और मैं, प्रणव और कृष्णा जी निकल पड़े रामझूला की ओर पैदल ही।

सबसे आगे प्रणव, उनके पीछे मैं और मेरे पीछे कृष्णा जी राम झूला पर धीरे – धीरे फोटो लेते हुए आगे बढ़ रहे थे। एक स्थान पर मै कृष्णा जी को आवाज लगा रहा था की तभी मेरे बाल किसी ने खींचे। बाल इतनी तेज़ खींचे गये थे की सर ही घूम गया और गुस्सा भी आया की कौन है लेकिन जब ऊपर देखा तो दाँत दिखाता बंदर मिला और इसी के साथ मैंने अपना मोबाइल जेब में रख लिया। मुझे पता था की सबसे पहले ये मेरा मोबाइल ही छीन कर गंगा जी में फेंक देगा। मैं उसकी जगह पर खड़ा था, इसलिए उसे गुस्सा आया।

कुछ देर में हम परमार्थ निकेतन पहुँच चुके थे। वैसे नहाने की इच्छा तो इसी घाट पर थी लेकिन यहाँ संध्या आरती की तैयारी हो रही थी इसलिये थोड़ा आगे गीता भवन के घाट पर चले गए। यहाँ घाट खाली था और गंगा जी भी कुछ शांत थी। यहाँ स्नान करके परमार्थ निकेतन के अंदर कुछ सैर की और वापस आ कर गाड़ी में बैठ गये और निकल पड़े हरिद्वार की ओर।

यहाँ हरिद्वार में कनखल की रबड़ी बड़ी तारीफ की थी दीपक जी ने इसलिये यहाँ की रबड़ी तो चखना बनता था। कनखल की एक गली के पास गाड़ी रोकी। सरदार जी की दुकान की रबड़ी का स्वाद ही बेहतरीन था। मन तो था की एक कटोरा रबड़ी खा लें लेकिन जेब भी तो देखनी थी।

Swarg Ashram
Swarg Ashram
Ram Jhula, Rishikesh
Ram Jhula, Rishikesh
Parmarth Niketan Ghat
Parmarth Niketan Ghat

Geeta Bhawan Ghat Rishikesh
Geeta Bhawan Ghat Rishikesh

Geeta Bhawan Rishikesh
Geeta Bhawan Rishikesh
Inside Parmarth Niketan Rishikesh
Inside Parmarth Niketan Rishikesh
Life Cycle Rishikesh
Life Cycle Rishikesh
Inside Parmarth Niketan
Inside Parmarth Niketan

Inside Parmarth Niketan
Inside Parmarth Niketan

खैर… कनखल तक ही था हम सबका साथ। यहाँ से हरिद्वार हाईवे पर हर की पौड़ी घाट के पास आकर कृष्णा जी से विदा ली। उनकी रात 11 बजे की ट्रेन थी लखनऊ की। उन्हें विदा करके हम निकल पड़े दिल्ली की और।

सफ़र अब बेशक समाप्त होने की ओर था लेकिन ऐसा लग रहा था की फिर से हम एक नयी शुरुआत की ओर बढ़ रहे हैं…

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ritesh gupta
March 2, 2019 8:36 am

चोपता से वापिसी और ऋषिकेश की यात्रा अच्छी लगी… ऋषिकेश के सारे फोटो अच्छे लगे… धन्यवाद

सुमन
सुमन
March 2, 2019 9:08 am

बहुत अच्छा लिखा है,और आप ने बहुत अछि खिचे है 👍

Kavita
Kavita
March 8, 2019 2:28 pm

Nice post

अनित
अनित
March 8, 2019 5:30 pm

बहुत सुंदर समापन