Dalhousie and Khajjiar Trip Part 2

डलहौज़ी और खज्जियार की यात्रा Trip to Dalhousie and Khajjiar को आरम्भ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। बनीखेत से डलहौज़ी आते समय रास्ते में ही हमें ड्राइवर ने बता दिया था की बर्फ़बारी के कारण खज्जियार Khajjiar वाला मुख्य मार्ग बंद हो गया है और अब चम्बा होते हुए ही पहुंचा जा सकता है। चम्बा होते हुए खज्जियार जाने का अर्थ था, 24 किलोमीटर की यात्रा का 70 किलोमीटर में बदल जाना क्योंकि डलहौज़ी से चम्बा की ही दूरी 47 किलोमीटर है और चम्बा से खज्जियार की दूरी 23 किलोमीटर।

डलहौज़ी Dalhousie पहुँचते ही सबसे पहले नाश्ता करना था और फिर होटल की खोज… उसके बाद आगे का सोचा जायेगा। चाय पीते हुए ढाबे वाले ने भी वही बताया जो ड्राइवर ने बताया था की खज्जियार तो चम्बा होकर ही पहुंचा जा सकता है। यहाँ डलहौज़ी में अच्छी खासी बर्फ़ पड़ी हुई थी। चौक पर ही टैक्सी यूनियन का ऑफिस है।

Dalhousie Bus Stand
Dalhousie Bus Stand

डलहौज़ी में बहुत अधिक नहीं है घूमने के लिये और ऊपर से डलहौज़ी आये और खज्जियार न गये तो वो भी अच्छा नहीं लगता। टैक्सी ऑफिस में बात करने पर तय हुआ की आल्टो द्वारा हमें खज्जियार ले जाया जायेगा और रास्ते में पड़ने वाले सभी पॉइंट्स कवर किये जायेंगे… दिन भर आल्टो हमारे साथ ही रहेगी। यह सब तय हुआ 2500 रुपये में। थोड़ा महंगा तो था लेकिन चूँकि हम तीन लोग थे तो इतना खर्च तो उठाया भी जा सकता था।

Hotel street Dalhousie
Hotel street Dalhousie
Behind Dalhousie Bus Stand
Behind Dalhousie Bus Stand

(केदारनाथ यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

आगे बढ़ने से पहले कुछ बातें डलहौज़ी के बारे में हो जाये।

2036 मीटर की ऊंचाई पर डलहौजी धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित एक बहुत की खूबसूरत पर्यटक स्थल है। पांच पहाड़ों (कठलौंग, पोट्रेन, तेहरा, बकरोटा और बलुन) पर स्थित यह पर्वतीय स्थल हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का भाग है। अंग्रेजों ने 1854 में इसे बसाया और विकसित किया और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डलहौजी के नाम पर इस जगह का नाम डलहौजी रखा गया। ब्रिटिश सैनिक और नौकरशाह यहां अपनी गर्मी की छुट्टियां बिताने आते थे।

मनमोहक वादियों और पहाड़ों के अलावा यहां के अन्य आकर्षण प्राचीन मंदिर, चंबा और पांगी घाटी हैं।

डलहौज़ी के प्रमुख आकर्षण हैं Attractions of Dalhousie :-

सेंट पैट्रिक चर्च Saint Patrick Church

यह चर्च मुख्य बस स्टैंड से 2 किलोमीटर पहले डलहौजी कैंट की मिलिटरी हॉस्पिटल रोड पर है। यह डलहौजी का सबसे बड़ा चर्च है। यहां के मुख्य हॉल में 300 लोग एक साथ बैठ सकते हैं। इस चर्च का निर्माण 1909 में किया गया था। यह चर्च ब्रिटिश सेना के अफसरों के सहयोग से बनाया गया था। चर्च के चारों ओर प्रकृति का सौंदर्य बिखरा हुआ है। यह उत्तर भारत के खूबसूरत चर्चों में से एक है। पत्थर से बनी हुई बिल्डिंग भी कुछ अलग तरह की है।

सुभाष चौक Subhash Chowk

डलहौज़ी से एक रास्ता ऊपर की ओर जाता है। उस रास्ते पर एक किलोमीटर चलने के बाद सुभाष चौक आता है। सुभाष चौक पर आज़ाद हिन्द फौज के सेनानायक और महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित है। कुछ बेंच भी लगी हुई हैं। सर्दियों में धुप सेकते हुए यहाँ चाय पीने का अलग ही आनंद है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर Lakshminarayan Temple

लक्ष्मीनारायण मंदिर सुभाष चौक से 200 मी. दूर सदर बाजार में है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। 150 साल पुराने इस मंदिर में भगवान विष्णु की बहुत की सुंदर प्रतिमा देखी जा सकती है। इस मंदिर में स्थानीय लोग नियमित रूप से दर्शन करने आते रहते हैं। इसी मंदिर से अगस्त/सितंबर के महीने में मणि महेश यात्रा की शुरुआत होती है।

सेंट फ्रांसिस चर्च Saint Francis Church

सुभाष चौक पर स्थित सेंट फ्रांसिस चर्च का निर्माण सन 1875 में हुआ था। यह डलहौज़ी के प्रमुख और बड़े चर्चों में से एक होने के साथ – साथ सबसे पुराना चर्च भी है।

गाँधी चौक Gandhi Chowk

सुभाष चौक से एक किलोमीटर आगे है गाँधी चौक जहाँ गाँधी जी प्रतिमा स्थापित है। यहाँ टैक्सी स्टैंड भी है। यहीं से दो रास्ते अलग – अलग दिशाओं में जाते हैं – ऊपर वाला खजियार की ओर, जो की फिरहाल बंद था और नीचे वाला पंचपुला Punchpulla की ओर। इसके साथ – साथ यहाँ से विशाल हिमालयी पर्वत शृंखलाओं का शानदार दृश्य दिखाई पड़ता है।

पंचपुला Punchpulla

गाँधी चौक से नीचे की ओर जाने वाले रास्ते पर 2.5 किलोमीटर आगे बढ़ने पर आता है पंचपुला। पंचपुला में कई झरने हैं जो की फिरहाल जमे हुए थे। यह रास्ता लगभग सुनसान ही है लेकिन दोस्तों के साथ इस रास्ते पर पैदल घूमना अलग ही अनुभव देता है। पंचपुला में बच्चों के मनोरंजन का ध्यान रखते हुए झूले भी लगाए गए हैं और कुछ दुकाने हैं। स्वतंत्रता सेनानी और शहीद भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह की मृत्यु भारत की आजादी के दिन हुई थी। उनकी समाधि पंचपुला में बनाई गई है। इस खूबसूरत जगह पर एक प्राकृतिक कुंड और छोटे-छोटे पुल हैं जिनके नाम पर इस जगह का नाम रखा गया है। पंचपुला के रास्ते में ही सातधारा है जहाँ से डलहौजी और बहलून को पानी की आपूर्ति होती है।

कालाटोप वन्यजीव अभयारण्य Kalatop Wildlife Sanctuary

समुद्र तल से 2440 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह जंगल बहुत ही घना है। विभिन्न प्रकार के पक्षियों को देखने के लिए यह जगह बिल्कुल उपयुक्त है। यहां की खूबसूरती भी देखते ही बनती है। जो पर्यटक यहां रात भर रुकना चाहते हैं उनके लिए एक रेस्ट हाउस भी है। यहां ठहरने के लिए डलहौजी में आरक्षण कराना होता है। इस जंगल के पास ही लक्कड़ मंडी है।

डलहौज़ी के मुख्य स्टैंड से एक रास्ता यह कहें की गली नीचे की ओर जाती है जिसमें बहुत सारे होटल बने हुए हैं। ऐसा भी कह सकते हैं की डलहौज़ी में अधिकतर होटल इसी रास्ते पर हैं। इसी रास्ते पर ‘फारेस्ट हाउस’ Forest House नाम के होटल में हमें एक कमरा 700 रुपये में मिल गया। यहाँ मैं एक सलाह देना चाहूंगा की डलहौज़ी यात्रा के लिये ऑनलाइन होटल न ही बुक करें तो अच्छा क्योंकि रियल टाइम बुकिंग सस्ती पड़ती है।

(चार धाम यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

वैसे तो हम रात भर यात्रा करके थके हुए थे लेकिन अभी आराम नहीं किया जा सकता था क्योंकि आज ही खजियार भी पहुंचना था। दैनिक दिनचर्या निपटा कर हम वापस ढाबे पर। मेरा खाने का मन नहीं था तो मैं अपने दोनों साथियों को ढाबे पर छोड़कर आस – पास ही चहलकदमी करने चला गया। ढाबे के पीछे ऊंचाई पर जाने वाले रास्ते पर ‘डलहौज़ी क्लब’ हाउस Dalhousie Club House है जिसका निर्माण सन 1895 में हुआ था। ब्रिटिश शैली में बना हुआ यह क्लब हाउस आलिशान है। वैसे यहाँ भी रुकने के लिये बुकिंग करवाई जा सकती है, लेकिन कैसे ? यह मैं नहीं जानता। डलहौज़ी क्लब वाली गली में ही एस.डी.एम. हाउस है।

डलहौज़ी क्लब Dalhousie Club वाली गली से विशाल हिमालयी श्रृंखलाओं के दर्शन होते हैं और यदि मौसम साफ हो तो मणि महेश पर्वत Mani Mahesh Kailsah के भी दर्शन हो जाते हैं। आज अच्छी धुप खिली हुई थी जिसके कारण मणि महेश पर्वत के दर्शन कर पाया। थोड़ा – बहुत घूमने के मैं वापस आ गया और अब तक टैक्सी भी आ चुकी थी।

Dalhousie Club
Dalhousie Club House
View of Dhauladhar from Dalhousie
View of Dhauladhar from Dalhousie

लगभग सुबह नौ बजे हम निकल पड़े खजियार की ओर।

रात भर की लम्बी यात्रा और फिर बिना रुके खज्जियार की ओर निकल पड़ने के कारण टैक्सी में बैठते ही नींद आने लगी…. लेकिन ख़बरदार जो सोये तो…. आख़िरकार 2500 रुपये भी तो वसूल करने थे।

(बद्रीनाथ यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

चूँकि खज्जियार हमें चम्बा होते हुए जाना था, इसलिये बनीखेत वापस आना पड़ा और फिर बनीखेत से चम्बा। बनीखेत से चम्बा की ओर आगे बढ़ते ही विशाल धौलाधार के दर्शन होने लगते हैं और फिर यह खज्जियार तक साथ नहीं छोड़ते।

हिमाचल और उत्तराखण्ड दोनों ही पहाड़ी राज्य हैं लेकिन हिमाचल विकसित है और उत्तराखण्ड विकासशील। कृपया उत्तराखण्ड वाले बुरा न माने, यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। यद्यपि उत्तराखण्ड में धार्मिक और साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं किंतु अभी शायद सरकार की नज़रों से दूर हैं।

सर्दियों की धूप का आनंद लेते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे की ‘देवीदेहरा’ नामक स्थान पर टैक्सी रुकी ! ‘यहाँ रॉक गार्डन है और यह बगल में जालपा माता का मंदिर है’ – ड्राइवर ने कहा। यह स्थान डलहौज़ी से 18 किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर में जाने की इच्छा लिये टैक्सी से बाहर निकला। यह अच्छी – खासी आबादी वाला क्षेत्र था। एक तरफ़ से कोई झरना ऊपर से आता हुआ नीचे बह रही रावी नदी में मिल रहा था।

जालपा माता मंदिर के इतिहास के बारे में न तो अधिक जानकारी मिल पायी और न ही मैंने किसी से पूछा। चारो ओर पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर बहुत सुन्दर है। मंदिर के प्रांगण में लंगर भवन भी बना हुआ है। एक ओर दूर्वा घास के मैदान में हनुमान जी की मूर्ति बनी हुई है और पास घास चरती गाय खूबसूरत दृश्य प्रस्तुत कर रही थी। पहाड़ी शैली में लकड़ी से निर्मित इस मंदिर में फिरहाल तो कोई नहीं था, या फिर मैं ही गलत समय पर आया था।

Jalpa Mata Temple Devi Dehra Chamba
Jalpa Mata Temple Devi Dehra Chamba
Jalpa Mata Temple Chamba
Jalpa Mata Temple Chamba

यहाँ कुछ देर बिताने के बाद हम आगे बढ़ चले। बथिरी, जोकना, बड़ोली होते हुए हम चमेरा झील के पास पहुंचे। चमेरा झील तक पहुँचने के लिये हमें नीचे की ओर जाना पड़ता और इतना समय हमारे पास था नहीं। चमेरा झील Chamera Lake, रावी नदी पर बने बाँध के कारण बनी हुई है। यहाँ राफ्टिंग जैसे विभिन्न प्रकार की साहसिक गतिविधियों का भी आयोजन किया जाता है।

Chamera Lake Himachal Pradesh
Chamera Lake Himachal Pradesh

यहाँ न रुकते हुए हम आगे की ओर बढ़ चले। बैठे – बैठे कब आँख लग गयी, पता ही नहीं चला। एक स्थान पर टैक्सी रुकी, शायद ‘बनी’ था। यहाँ से विशाल धौलाधार थोड़ा और विशाल दिख रहा था और सबसे बड़ी बात तो यह की यहाँ से ‘मणि महेश कैलाश’ Mani Mahesh Kailash पर्वत के स्पष्ट दर्शन हो रहे थे। अब भोले बाबा के यहाँ जाना तो पता नहीं कब संभव हो पायेगा, इसलिये यहीं से बाबा को प्रणाम किया। हर ओर पहाड़ों पर यहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ थी और आबादी का नामो – निशान नहीं।

पास ही कुछ लड़के भागे – भागे आये, पैराग्लाइडिंग करवाने वाले थे। वैसे इच्छा तो नहीं थी पैराग्लाइडिंग करने की लेकिन रेट पूछने में क्या जाता है ? 2200 रुपये प्रति व्यक्ति का शुल्क था। जो थोड़ी – बहुत पैराग्लाइडिंग की इच्छा थी, शुल्क सुन कर वो भी मर गयी। ऊपर से कुछ दिन पहले पैराग्लाइडिंग वाला जो वीडियो वायरल हुआ था, वो भी याद आ गया… मुझे वायरल नहीं होना था 😀

Dhauladhar and Manimahesh Kailash View Point
Dhauladhar and Manimahesh Kailash View Point
Manimahesh Kailash
Manimahesh Kailash (Top peak in center)

यहाँ से आगे निकलते ही खज्जियार की वाइब्स आने लगी थी….और कुछ ही देर में हम खजियार में थे।

जैसा सोचा था वैसा ही पाया खज्जियार…. किसी फ़िल्मी दृश्य जैसा या फिर ऐसा कहें की प्राकृतिक दृश्यों वाला पोस्टर। दो तरफ रास्ते और बीच में विशाल मैदान जिस पर पड़ी थी स्वर्ग सामान बर्फ़। किसी अन्य पर्यटक स्थल की भांति ही यहाँ भी खच्चर वाले और अन्य गतिविधियों वाले यात्रियों की बुला रहे थे। वैसे हमारे पास बर्फ़ लायक जूते तो थे लेकिन यहाँ बर्फ़ कुछ ज़्यादा ही थी और जूतों में घुस सकती थी। इसलिये किराये पर जूते लेने पड़े।

कुछ लोग ट्यूब राइड (शायद ट्यूब राइड ही कहते हों) कर रहे थे। ट्रक वाले टायर की ट्यूब पर लोगों को बैठा कर ऊंचाई से छोड़ दिया जाता और वे फिसलते हुए नीचे पहुँच जाते थे। अपने वजन को देखते हुए मेरी हिम्मत तो नहीं थी लेकिन फिर 50 रूपये में तीनों को राइड करवाने का ऑफर मुझे रोक नहीं सका। एक – एक करके हम तीनो तेज़ी से नीचे फिसलते हुए पहुँच गये। अब तक दोपहर हो चुकी थी और धूप भी तेज़ थी। वैसे भी बर्फ़ पर धूप तेज़ लगती ही है।

वैसे बहुत से लोगों से सुना है धरती पर दूसरा स्वर्ग कहीं है (पहला वाला तो अपना कश्मीर है) तो वह है स्विट्जरलैंड में। ‘खज्जियार’ दुनिया के 160 मिनी स्विट्जरलैंड में से एक माना जाता है। किसी युरोपीय देश से कम नहीं है खज्जियार की सुंदरता। यहां का मौसम, चीड़ देवदार के ऊंचे-लंबे हरे-भरे पेड़, बर्फ़ से ढके मैदान और पहाड़ और वादियां स्वर्ग का अनुभव कराती है।

यहाँ मैदान के बीचों बीच एक तश्तरीनुमा झील है। इसी झील किनारे पहाड़ी शैली में बना खज्जी नाग का मंदिर भी है। मान्यता है की खज्जी नाग इसी झील में वास करते हैं। झील के बीच में एक छोटी सी झोपड़ी बनी हुई है जो की माहौल को रोमांटिक बनाने के लिये काफी है। कुछ लोग यहीं प्री-वेडिंग शूट भी करवाते हैं। यहाँ ठहरने के लिये कई डाक बंगले व रेस्ट हाउस हैं। यह पर्यटक स्थल छोटा भले ही है लेकिन लोकप्रियता में बड़े-बड़े हिल स्टेशनों को मात देने के लिये पर्याप्त है।

वैसे इस हिल स्टेशन को ऐसे ही मिनी स्विट्ज़रलैंड नहीं कहा जाता, यहाँ बाकायदा स्विस नेशनल टूरिस्ट ऑफिस द्वारा जारी किया गये सर्टिफिकेट को भी एक बड़े बोर्ड पर लगाया गया है जो यह दर्शाता को स्विस प्रशाशन भी इसे मिनी स्विट्ज़रलैंड मानता है। इसके साथ – साथ जिस दिशा में असली स्विट्ज़रलैंड है उस दिशा की ओर इंगित करते हुए एक चिन्ह भी लगा है जिस पर यहाँ से स्विट्ज़रलैंड की दूरी (6194 किलोमीटर) लिखी हुई है।

एक लड़के के कंधे पर टंगी टोकरी में बैठे खरगोश को देख कर थोड़ी हैरानी हुई, पूछने पर पता चला की वह फोटो खिचवाने के लिये खरगोश किराये पर देता है। कालाटोप वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की गोद में बसे हुए खज्जियार में घूमते हुए काफी देर हो गयी थी और अब भूख भी लग गयी थी। यहीं एक ढाबे पर पराठों का भोग लगाया। यहाँ बन्दर तो बहुत थे लेकिन अन्य पर्यटक स्थलों की भाँती खाने वाली चीजों पर झपट नहीं रहे थे… जबकि यहाँ लोगों का भोजन खुले में ही चल रहा था। भोजन से याद आया, यहाँ शराब भी खुले आम जारी थी।

पराठे निपटा कर उठे ही थे की खच्चर वालों ने घेर लिया। 2500 प्रति सवारी मांग रहे थे….. बड़ी मुश्किल से उनसे पीछा छुड़ाया (वैसे वे 1500 रुपये तक भी आ चुके थे)। दोपहर 3 बजे तक हमने वहां वापसी कर ली। चम्बा से होते हुए हम तेज़ी से डलहौज़ी की ओर बढ़ते जा रहे थे।

Gauri and Debasis
Gauri and Debasis
Dainkund Peak
Dainkund Peak
Khajjiar
Khajjiar
Debasis
Debasis
Hut at Khajjiar Lake
Hut at Khajjiar Lake
Khajjiar
Khajjiar
Khajjiar
Mini Switzerland Signboard Khajjiar
Mini Switzerland Signboard Khajjiar
Khajjiar Cottages
Khajjiar Cottages
Tourists at Khajjiar
Tourists at Khajjiar

चम्बा भी बहुत खूबसूरत है। दोनों ओर ऊँचे पहाड़, घाटी, घाटी में बहती रावी की पतली धारा और दोनों ओर बसे हुए रंग – बिरंगे घर। ‘ताल’ फिल्म की शूटिंग भी यहीं हुई थी। कभी फुर्सत में सिर्फ़ चम्बा में घूमा जायेगा।

शाम 6 बजे तक हम डलहौज़ी पहुँच चुके थे। कमरे में पहुँचते ही नींद ने घेर लिया। वैसे होटल वाले कहा था की रात 9 बजे से पहले जब भी खाना हो, बता देना मैं बना दूंगा लेकिन नींद के आगे कौन खाने को पूछता है ?

Chamba
Chamba

शेष अगले भाग में…..

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Manish p
Manish p
March 3, 2020 9:10 am

Bhout sajeev vernan hai yatra ka
Dhanyavaad .

Manish p
Manish p
March 3, 2020 9:10 am

Bhout sajeev vernan hai yatra ka
Dhanyavaad .