Badrinath

श्री बद्रीनाथ यात्रा (Trip to Shree Badrinath)

यदि मैं यात्राओं के तौर पर नज़र डालूं तो वर्ष 2018 कुछ अधिक यात्रायें नहीं हुई लेकिन जो भी हुई, अच्छी रही और बहुत से अनुभव मिले सीखने के लिये। जैसे की पहले अक्सर मैं पहाड़ों में ही घूमा करता था (अभी भी वही करता हूँ :)), लेकिन मार्च में गोवेर्धन परिक्रमा का सौभाग्य मिला और इसी बहाने बृज की संस्कृति से जुड़ने का अवसर भी। अप्रैल में लगभग 10 दिन की छुट्टियां मिली थी, बहुत योजनायें बनायी की यहाँ जाऊंगा – वहां जाऊंगा ! पहाड़ों से हट कर कहीं और जाऊंगा लेकिन अंत में फ़िर से मेरी घुमक्कड़ी की गाड़ी घूम – फ़िर कर सांकरी पहुँच गयी। जुलाई के अंत में परिवार के साथ गंगोत्री यात्रा का अवसर मिला। उस यात्रा के दौरान परिवार के चेहरे पर ख़ुशी देख जो संतुष्टि का भाव प्राप्त हुआ वैसा आज तक नहीं हुआ था। सब कुछ ठीक चल रहा था की सितम्बर आते – आते एक बार फ़िर से घुमक्कड़ी की मोटर ने घरघराना शुरू कर दिया था।

Nandprayag
नंदप्रयाग

वैसे इस बार शुरुआत मैंने नहीं, अपितु एक मित्र अनित कुमार जिन्हें हम कुश भी कहते हैं, उन्होंने की थी। ये एक ऐसे इंसान हैं जिनका घुमक्कड़ी से 1000 नॉटिकल माइल दूर तक का भी नाता नहीं था, लेकिन आज प्रतिदिन कम से कम 5 घुमक्कड़ी ब्लॉग्स पढ़ते भी हैं और सभी पर कमेंट भी करते हैं ! दिन भर कहीं न कहीं की वर्चुअल सैर करते रहते हैं। शुरुआत में श्री बद्रीनाथ जाने के लिये हम कुल 5 लोग तैयार हुए जिसमें थे मैं, देबासीस, अनित, रोहित, मयंक। छुट्टियों पर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। इसी बीच मयंक की बाइक बद्रीनाथ ट्रेक से हट कर जागेश्वर की दिशा में घूम गयी और हम चार ही रह गये। छुट्टियों की उहा – पोह से गुजरते हुए अंततः हमारी यात्रा 5 अक्टूबर से आरम्भ होनी तय हुई। इन छुट्टियों के लिये कैसे – कैसे बहाने बनाने पड़े ये एक प्राइवेट नौकरी करने वाला व्यक्ति अच्छे से समझ सकता है।

खैर यात्रा कैसे शुरू हुई ? हम श्री बद्रीनाथ धाम तक कैसे पहुंचे आदि की चर्चा मैं अगली पोस्ट में करूँगा। यह इस यात्रा की पहली पोस्ट है और इसमें आपके काम की जानकारी पहले दी जायेगी। इसमें आप पढ़ेंगे श्री बद्रीनाथ धाम से जुडी महत्वपूर्ण जानकारियाँ जैसे की बद्रीनाथ धाम का महात्मय क्या है ? बद्रीनाथ धाम कैसे पहुंचे ? वहां जाने की लिये आपकी क्या – क्या तैयारियाँ होनी चाहिये ? कहाँ रुकना चाहिये आदि ? यात्रा की प्रस्तावना आदि में अधिक शब्द बेकार न करते हुए बढ़ते हैं यात्रा की ओर।

श्री बद्रीनाथ धाम का महात्मय और इतिहास

श्री बद्रीनाथ धाम जिसे भू-वैकुण्ठ भी कहा जाता है, उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले में समुद्र तल से 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्री बद्रीनाथ जी के कुल 7 मन्दिर उत्तराखण्ड राज्य में स्थित जिसमें श्री बद्रीनाथ जी प्रमुख हैं और इन्हें बद्री विशाल भी कहा जाता है। वैसे तो भगवान का स्नेह सभी मनुष्यों पर हमेशा ही बना रहता है लेकिन भौतिक रूप से श्री बद्रीनाथ धाम वर्ष में केवल छः महीनें (अप्रैल अंत से नवंबर) तक ही खुला रहता है। सनातन धर्म में इसे सर्वोच्च धाम का दर्जा भी प्राप्त है। भारत के चार प्रमुख धामों में यह धाम प्रथम है।

मंदिर परिसर में कुल 15 प्रतिमायें हैं जिनमें प्रमुख है भगवान् बद्रीनाथ जी की शालिग्राम प्रतिमा। इस प्रतिमा को आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा नारद कुण्ड से निकाल कर स्थापित किया गया था। मन्दिर के पुजारी केरल के नम्बूदरी संप्रदाय के ब्राह्मण ही होते हैं और इन्हें रावल कहा जाता है। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा नामित एक सत्रह सदस्यीय समिति वर्तमान में श्री बद्रीनाथ और श्री केदारनाथ धाम की देख – रेख करती है। विष्णु पुराण, जय संहिता (महाभारत) और स्कन्द पुराण जैसे कई प्राचीन ग्रन्थों में इस मन्दिर का उल्लेख मिलता है।

श्री बदरीनाथ की मूर्ति शालिग्राम शिला से बनी हुई है और ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारद कुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि ही इसके पुजारी थे। जब बौद्धों के हाँथ में सत्ता आयी तो उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत की ओर भागते हुए प्रतिमा को नारद कुण्ड में फेंक गए। आदि शंकराचार्य ने नारद कुण्ड से पुन: बाहर निकालकर इसकी स्थापना की।

श्री बद्रीनाथ क्षेत्र अलग – अलग कालों में अलग नामों से प्रचलित रहा है। स्कन्द पुराण में इस क्षेत्र को “मुक्तिप्रदा” के नाम से उल्लेखित किया गया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सत युग में यही इस क्षेत्र का नाम था। त्रेता युग में इस क्षेत्र को “योग सिद्ध”, और फिर द्वापर युग में इसे “मणिभद्र आश्रम” और “विशाला तीर्थ” कहा गया है। कलियुग में इस धाम को “बद्रिकाश्रम” अथवा “बद्रीनाथ” के नाम से जाना जाता है। इस स्थान का यह नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले बद्री (बेर) के वृक्षों के कारण पड़ा था। एडविन टी. एटकिंसन ने अपनी पुस्तक, “द हिमालयन गजेटियर” में इस बात का उल्लेख किया है कि इस स्थान पर पहले बद्री के घने वन पाए जाते थे, हालाँकि अब उनका कोई निशान तक नहीं बचा है।

श्री बद्रीनाथ नाम की उत्पत्ति पर एक कथा प्रचलित है, जो इस प्रकार है – जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह दब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का परेशान हो उठी और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मी जी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि “हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ – बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा।”

इसके अतिरिक्त श्री बद्रीनाथ धाम से सम्बंधित अन्य कथायें भी हैं जो अलग – अलग युगों में घटी।

सत युग
कहा जाता है की यहाँ नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान् विष्णु ने बाल रूप में अवतार लिया। यह स्थान पहले भगवान शिव का था और इसे केदार भूमि भी कहा जाता था। भगवान विष्णु ध्यान योग के लिए स्थान की खोज में थे और उन्हें यह स्थान भा गया। वे वर्तमान चरण पादुका स्थल पर शिशु रूप में अवतरित हुए और रोने लगे। उनका रोना सुन कर माता पार्वती और भगवान शिव आ गये । जब माता ने उनसे रोने का कारण पूछा तो शिशु रुपी नारायण ने ध्यान योग के लिये यह स्थान मांग लिया।

त्रेता युग
मान्यता के अनुसार नर और नारायण नाम के ऋषियों ने यहाँ कई वर्षों तक तपस्या की थी। उनकी तपस्या से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर सदा के लिये बद्रीनाथ धाम में स्थान दे दिया।

द्वापर युग
इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा का शांति के लिए पिंडदान करते हैं। महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत ग्रन्थ की रचना भी इसी क्षेत्र में की थी।

इतिहास

इतिहास के अनुसार आदि शंकराचार्य ने परमार शासक राजा कनक पाल की सहायता से इस क्षेत्र से सभी बौद्धों को निष्कासित कर दिया था। इसके बाद कनकपाल और उनके उत्तराधिकारियों ने ही इस मन्दिर की प्रबन्ध व्यवस्था संभाली। गढ़वाल के राजाओं ने मन्दिर प्रबन्धन के खर्चों को पूरा करने के लिए ग्रामों के एक समूह की स्थापना की। इसके अतिरिक्त मन्दिर की ओर आने वाले रास्ते पर भी कई ग्राम बसाये गए, जिनसे हुई आय का उपयोग तीर्थ यात्रियों के खाने और ठहरने की व्यवस्था करने के लिए किया जाता था। सोलहवीं शताब्दी में गढ़वाल नरेश ने मंदिर का पुनः निर्माण करवाया और इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने यहां स्वर्ण कलश चढ़ाया ।

प्राकृतिक आपदाओं के कारण मंदिर का नवीनीकरण बहुत बार हुआ है। सत्रहवीं शताब्दी में गढ़वाल के राजाओं द्वारा मन्दिर का विस्तार करवाया गया था। वर्ष 1803 में आये एक भूकम्प ने मन्दिर को भारी क्षति पहुंचाई थी, जिसके बाद यह मन्दिर जयपुर के राजा द्वारा पुनर्निर्मित करवाया गया था। वर्ष 2006 में राज्य सरकार ने अवैध अतिक्रमण पर रोक लगाने के लिए बद्रीनाथ के आसपास के क्षेत्र को नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित कर दिया।

बद्रीनाथ मंदिर की भौगोलिक स्थिती और स्थापत्य

बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 3133 मीटर है। मंदिर के ठीक सामने नर पर्वत और जबकि नीलकण्ठ शिखर के पीछे नारायण पर्वत स्थित है। मंदिर के समीप ही तप्त कुण्ड नामक गर्म पानी का कुण्ड है। अधिकतर तीर्थयात्री मंदिर में जाने से पहले इस कुण्ड में स्नान करते हैं। मंदिर क्षेत्र में पानी के दो तालाब भी हैं, जिन्हें नारद कुंड और सूर्य कुंड कहा जाता है।

बद्रीनाथ मन्दिर प्रवेश द्वार अलकनंदा नदी की ओर है। मंदिर में तीन मुख्य संरचनाएं हैं – गर्भगृह, दर्शन मंडप, और सभा मंडप। सीढ़ियों के माध्यम से मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंचा जा सकता है, जिसे सिंह द्वार कहा जाता है। इस द्वार के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश लगे हुए हैं। अंदर प्रवेश करते ही मंडप है। इस मंडप में बैठ कर श्रद्धालु पूजा तथा आरती आदि करते हैं। सभा मंडप में ही मंदिर के धर्माधिकारी, रावल एवं वेदपाठी विद्वानों के बैठने का स्थान है।

गर्भगृह में भगवान बद्रीनारायण की 1 मीटर ऊँची शालीग्राम की चतुर्भुज मूर्ति है । एक हाँथ में शंख, और दूसरे में चक्र है, जबकि अन्य दो हाथ योगमुद्रा (पद्मासन की मुद्रा) में हैं। भगवान के ललाट पर हीरा भी जड़ा हुआ है। गर्भगृह में कुबेर, देवर्षि नारद, उद्धव, नर और नारायण की मूर्तियां भी हैं। मंदिर के चारों ओर पंद्रह और प्रतिमायें स्थापित हैं। इनमें लक्ष्मी जी, गरुड़, और नवदुर्गा की मूर्तियां शामिल हैं। इनके अतिरिक्त गर्भगृह के बाहर लक्ष्मी, नृसिंह, आदि शंकराचार्य, नर और नारायण, वेदान्त देशिक, रामानुजाचार्य और लोकदेवता घण्टाकर्ण की मूर्तियां भी हैं।

कब जायें ?

श्री बद्रीनाथ धाम के कपाट अक्षय तृतिया (अप्रैल अंत / मई आरंभ) को खुलते हैं और दिवाली के बाद भैया दूज के आस – पास बंद हो जाते हैं। अत्यधिक बर्फ़बारी के कारण मंदिर शीत काल में बंद रहता है। वैसे कपाट मई में खुल तो जाते हैं लेकिन मई और जून में स्कूल आदि बंद होने के कारण धाम में अत्यधिक भीड़ बढ़ जाती है जिसका परिणाम होता है – दर्शन के लिये लम्बी पंक्ति, धक्का – मुक्की, महंगे होटल और धर्मशालायें आदि। इसलिये यदि आप भीड़ – भाड़ और धक्का – मुक्की से बचना चाहते हैं तो सितम्बर से दिवाली के बीच जायें।

कैसे पहुंचें ?

श्री बद्रीनाथ धाम तक तीन मार्गों होकर पहुंचा जा सकता है। कृपया ध्यान दें की यहाँ हम आरम्भ बिंदु दिल्ली को ही मान कर चल रहे हैं।

पहला मार्ग : दिल्ली – मुज़फ्फर नगर – हरिद्वार – ऋषिकेश – देवप्रयाग – श्रीनगर – रुद्रप्रयाग – कर्णप्रयाग – चमोली – पीपलकोटी – जोशीमठ – गोविंदघाट – विष्णु प्रयाग – श्री बद्रीनाथ।

दूसरा मार्ग : दिल्ली – काठगोदाम – हल्द्वानी – भीमताल – रानीखेत – द्वारहाट – चौखुटिया – कर्णप्रयाग – चमोली – पीपलकोटी – जोशीमठ – गोविंदघाट – विष्णु प्रयाग – श्री बद्रीनाथ।

तीसरा मार्ग : दिल्ली – कोटद्वार – लैंसडौन – पौड़ी – श्रीनगर – रुद्रप्रयाग – कर्णप्रयाग – चमोली – पीपलकोटी – जोशीमठ – गोविंदघाट – विष्णु प्रयाग – श्री बद्रीनाथ।

वैसे तो श्री बद्रीनाथ इन तीनों मार्गों से पहुंचा जा सकता है लेकिन सर्वाधिक प्रचलित मार्ग पहला वाला ही है अथार्त वाया ऋषिकेश, बाकि दो मार्गों का इस्तेमाल या तो स्थानीय लोग करते हैं या फिर निजी साधन वाले।

हम पहले मार्ग की ही चर्चा करेंगे।

दिल्ली से बद्रीनाथ के रास्ते में चमोली एक अहम् पड़ाव है। दिल्ली से गोपेश्वर के लिये डायरेक्ट बस है जो की चमोली से होते हुए जाती है लेकिन यह एक लम्बी यात्रा है इसलिये हमारा सुझाव है की आप पहले दिल्ली से हरिद्वार या ऋषिकेश पहुंचे और फ़िर वहां से बद्रीनाथ। दिल्ली से हरिद्वार पहुँचने में छः घंटे लगते हैं और ऋषिकेश पहुँचने में एक घंटा और। ऋषिकेश से बद्रीनाथ का सफर बारह घंटों का है। वापसी की यात्रा भी ऐसे ही होगी।

 

यात्रा पूर्व तैयारी और यात्रा के दौरान सावधानियाँ

  1. उत्तराखण्ड में होने वाली सभी चार धाम यात्राओं में बद्रीनाथ धाम की यात्रा सबसे लम्बी यात्रा है और ऐसी लम्बी यात्राओं में जो सबसे पहली और बड़ी समस्या सामने आती है, वो है यातायात के साधनों की। दिल्ली से हरिद्वार और ऋषिकेश के लिये पर्याप्त मात्रा में बसें उपलब्ध हैं। रेल यात्री रेल द्वारा हरिद्वार पहुँच सकते हैं।
  2. हरिद्वार और ऋषिकेश दोनों ही शहरों से श्री बद्रीनाथ धाम के लिये सुबह बसें चलती हैं। चूँकि यह सफर लगभग 13 घंटों का है और यहाँ रात में यातायात नहीं चलता, इसलिये यहाँ बस सेवायें सीमित मात्रा में ही हैं। मई – जून को छोड़ कर हरिद्वार और ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिये उत्तराखण्ड परिवहन की एक – एक बस ही है। निजी बसें भी सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। इसलिये बेहतर होगा की आप हरिद्वार / ऋषिकेश से बद्रीनाथ और वहां से वापसी की टिकट पहले ही ऑनलाइन करवा लें। ध्यान दें की बद्रीनाथ में इंटरनेट की विशेष समस्या है और वापसी में बस अड्डे पर बहुत भीड़ हो जाती है। इसलिये वापसी की पहले ही ऑनलाइन करवा ही लें। टिकट बुक करवाने के लिये लिंक है https://utconline.uk.gov.in/
  3. यदि आप अपने वाहन से जा रहे हैं तो तो पहाड़ी मार्गों पर विशेष ध्यान रखें और यदि आप पहाड़ी मार्गों पर गाड़ी चलाने के अभ्यस्त नहीं तो बेहतर होगा की एक किसी स्थानीय ड्राइवर को किराये पर ले लें।
  4. यदि आपके साथ बुज़ुर्ग भी हैं तो बेहतर रहेगा की एक दिन पहले ही हरिद्वार / ऋषिकेश पहुँच कर आराम करें और अगले दिन यात्रा आरम्भ करें। हरिद्वार और ऋषिकेश में पर्याप्त मात्रा में होटल और धर्मशालायें उपलब्ध हैं। एक विकल्प रेलवे स्टेशन स्थित रिटायरिंग रूम भी है। रिटायरिंग रूम बुकिंग के लिये लिंक है https://www.rr.irctctourism.com/#/accommodation/in/ACBooklogin
  5. दिल्ली से बद्रीनाथ जाने – आने में 4 से 5 दिन लग जाते हैं। इसलिये अपने ऑफिस में छुट्टियों के लिये अप्लाई इसी अनुसार करें।
  6. पहाड़ों में AMS (Acute Mountain Sickness) की समस्या होना आम बात है। इसके लक्षण हैं बुखार, तेज़ बदन दर्द, खांसी, सर दर्द, उल्टी आदि। इसके लिये यात्रा आरंभ करने से कुछ दिन पहले शारीरिक गतिविधियों को बढ़ा दें जैसे की सुबह की सैर और कुछ व्यायाम और योग आदि।
  7. यदि पहाड़ों से अच्छी ख़बरें नहीं आ रही हैं तो यात्रा पर निकलने से पहले सम्बंधित लोकल बॉडी, सरकारी एजेंसी या वहां के किसी होटल आदि से संपर्क कर के स्थिति के बारे में जानकारी ले लेना सही रहेगा। आज कल सभी सरकारी एजेंसियों और होटल आदि के संपर्क सूत्र गूगल पर उपलब्ध हैं।
  8. यात्रा के दौरान अपना पहचान पत्र और पर्याप्त मात्रा में कैश रखें। हमेशा कैशलेस ट्रांसेक्शन और ए.टी.एम. के भरोसे रहना सही नहीं रहता। मोबाइल चार्ज करने के लिए पॉवर बैंक, और मोबाइल में पर्याप्त बैलेंस भी रखें। साथ ही आवश्यक कांटेक्ट नंबर्स किसी डायरी में लिख कर रखें।
  9. यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों के संपर्क में रहें और आगे की स्थिती की जानकारी लेते रहें। किसी भी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा की स्थिती में पुलिस का आदेश माने।
  10. पानी और हल्का – फुल्का खाने का सामान जैसे की बिस्किट, चिप्स, नमकीन आदि अपने पास अवश्य रखें। यात्रा में यदि छोटे बच्चें साथ हों तो दूध की समस्या होना स्वभाविक है। ऐसी स्थित में यदि किसी दुकान पर दूध मिल जाये तो बहुत अच्छा अन्यथा फ़्लेवर्ड मिल्क (अमूल, आनंदा आदि) भी सहायक है। इसे बच्चे पी भी लेते हैं, स्वाथ्य के लिये भी ठीक – ठाक हैं और यह लगभग सभी दुकानों पर उपलब्ध भी है। बेहतर होगा की आप 4 वर्ष से छोटे बच्चों को न ले जायें।
  11. यात्रा में तबियत बिगड़ना स्वाभाविक है। इसलिये कुछ आवश्यक दवायें अवश्य साथ रखें। छाता/ रेनकोट, टॉर्च को अपने बैग में अवश्य स्थान दें।
  12. यदि आप मई / जून के अतिरिक्त किसी और महीनें में जा रहें हैं तो होटल ऑनलाइन न बुक करें। ऑनलाइन की अपेक्षा रियल टाइम बुकिंग सबसे बेहतरीन विकल्प है और यह सस्ता भी पड़ता है। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। ( रेलवे का रिटायरिंग रूम पहले ही बुक करना पड़ता है और यह केवल रेल से हरिद्वार आने वालों को ही मिलता है। )
  13. पहली बार जाने यात्रियों में से कुछ की इच्छा जाते समय एक दिन जोशीमठ में रुकने की होती है। यह विचार भी अच्छा है। जोशीमठ से बद्रीनाथ की दूरी 45 किलोमीटर है। यहाँ से बद्रीनाथ के लिये बसें और टैक्सियां आदि उपलब्ध हैं।
  14. अन्य तीन धामों की अपेक्षा बद्रीनाथ धाम किसी छोटे शहर जितना बड़ा है और यहाँ सभी सुविधायें जैसे की छोटे – बड़े होटल, हस्पताल, पुलिस थाना और एक बड़ा बाजार आदि उपलब्ध है। इसलिये इंटरनेट को छोड़ कर आपको कोई समस्या नहीं होगी।
  15. श्री बद्रीनाथ धाम में गरम पानी का तप्त कुण्ड है और इसके साथ ही गरम पानी के मुहाने भी बने हुए हैं। इसलिये बेहतर होगा की स्नान होटल की अपेक्षा तप्त कुण्ड में ही करें। इसका धार्मिक महत्त्व होने के साथ – साथ ही इस पानी में औषधीय गुण भी हैं।
  16. मंदिर के गर्भ गृह में रुकने के लिये आपको अधिक समय नहीं मिलेगा, इसलिये जितना भी समय मिले आप अपना ध्यान भगवान के विग्रह पर केंद्रित करें। मंदिर के प्रांगण में सभा मंडप है और यह मंडप भगवान की शरण में कुछ समय बिताने के लिये सर्वश्रेष्ठ स्थान है। एक बात और, वैसे तो मंदिर में आपको कैमरा और मोबाइल ले जाने से कोई मना नहीं करेगा लेकिन मंदिर में फ़ोन और कैमरा का इस्तेमाल न कर मंदिर की गरिमा बनाये रखें।
  17. श्री बद्रीनाथ धाम और उसके आस – पास बहुत से तीर्थ और दर्शनीय स्थान हैं। इसलिये बद्रीनाथ क्षेत्र में कम से कम एक दिन तो रुकने का कार्यक्रम बना कर जायें। यहाँ आने वाले माणा गांव अवश्य जाते हैं। यदि आप भी माणा जा रहे हैं और कोई शारीरिक समस्या नहीं है तो माणा से वसुधारा झरने तक अवश्य जायें।
  18. पहाड़ों में कहीं भी आने – जाने के लिये गाड़ी सुबह ही मिलती है। इसलिये रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें।
  19. उत्तराखण्ड में पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लग चुका है। यद्धपि दुकान वाले रीसाइकल्ड थैलियां देते हैं किंतु उसके भरोसे अधिक न रहें।

अनुमानित व्यय

हर किसी का खर्च करने का तरीका अलग होता है इसलिये हम यह तो नहीं कह सकते की आपका कितना खर्चा हो सकता है किंतु अगली पोस्ट में स्वयं द्वारा किये गये व्यय का विवरण लिखूंगा जिससे की आप कुछ अंदाज़ लगा सकें।

माणा गांव की ओर जाता रास्ता
माणा गांव की ओर जाता रास्ता

श्री बद्रीनाथ क्षेत्र और उसके आस – पास दर्शनीय स्थल

वैसे तो बद्रीनाथ और उसके आस – पास तीर्थों और दर्शनीय स्थलों की भरमार है जैसे की माणा गांव, सतोपंथ – स्वर्गारोहिणी, मुचकुन्द गुफ़ा, जोशीमठ, औली आदि, किंतु यहां हम उन्ही स्थलों के बारे बता रहे हैं जिन्हें 4-5 दिन की यात्रा में कवर किया जा सकता है।

अलकनंदा के तट पर स्थित तप्त-कुंड

बद्रीनाथ जी दर्शन से पूर्व तप्त कुण्ड में स्नान करने का विशेष महत्त्व है। यह भी एक आश्चर्य की बात है की तप्त कुण्ड और अलकनंदा अगल – बगल ही हैं किंतु अलकनंदा का जल बर्फ जितना ठंडा और तप्त कुण्ड का जल बेहद गर्म है।

ब्रह्म कपाल

ब्रह्म कपाल पर पिण्ड दान के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। एक बार भगवान शिव ने रुष्ट हो कर ब्रह्म देव का पांचवा शीश काट दिया था। ब्रह्म कपाल में उन्हें इस पाप से मुक्ति मिली थी।

चरणपादुका

यह स्थान बद्रीनाथ मंदिर से एक किलोमीटर ऊपर की ओर है। कहा जाता है कि यहाँ भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं। (यहीं भगवान विष्णु ने बालरूप में अवतरण किया था।)

माता मूर्ति मन्दिर

यहाँ माता मूर्ति को श्री बद्रीनाथ भगवान की माता के रूप में पूजा जाता है। वर्ष में एक बार बद्रीनाथ जी को यहाँ लाया जाता है। कहा जाता है भगवान अपनी माता के घर भोजन करने जा रहे हैं। इस अवसर पर यहाँ मेला लगता है।

मणिभद्रपुरम अथवा माणा गाँव

बद्रीनाथ मंदिर से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गाँव को भारत का अंतिम गाँव कहा जाता है। यहाँ भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं। आम नागरिकों के लिये यहाँ सीधी दिशा में आगे जाने पर प्रतिबंध है। आप इस गाँव तक पैदल या टैक्सी द्वारा पहुंच सकते हैं।

वेद व्यास गुफा एवं गणेश गुफा

18 पुराणों और जय संहिता (महाभारत) की रचना महर्षि वेद व्यास ने यहीं की थी। यह दोनों ही गुफायें माणा गाँव में ही स्थित हैं।

सरस्वती नदी

पूरे भारत में केवल माणा गाँव में ही यह नदी प्रकट रूप में है।

भीम पुल

महाभारत काल में पांडवों की हिमालय यात्रा के समय भीम ने ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था। जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है। माणा गाँव से बाहर निकलते ही यह पुल है।

वसुधारा झरना

यहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। ये स्थान माणा से 7 किलोमीटर दूर है। मान्यता है कि जिसके ऊपर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वो पापी नहीं होता है। किंतु एक मान्यता यह भी है की बूंदे उसी पर पड़ती हैं जिसने कोई पाप न किया हो। भीम पुल को पार करके 7 किलोमीटर की कठिन यात्रा करके यहाँ पहुंचा जा सकता है। ह्रदय और श्वास रोग से पीड़ित यात्री न जायें तो अच्छा है।

श्री त्रिपुर बाला सुंदरी माता मंदिर

वसुधारा के रास्ते में ही यह मंदिर स्थित है। यहाँ भी आप दर्शन कर सकते हैं।

सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी)

सतोपंथ की दूरी बद्रीनाथ से लगभग 26 किलोमीटर है और यात्रा बहुत कठिन है। इसलिये यहाँ 4-5 दिन की यात्रा में नहीं पहुंचा जा सकता। सतोपंथ के बारे में एक लेख अलग से लिखा जायेगा। कहा जाता है कि इसी स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सशरीर स्वर्ग को प्रस्थान किया था।

यह तो थी मुख्य स्थानों की जानकारियाँ। बाकी आप स्वयं एक्स्प्लोर करें ज़्यादा अच्छा है।

इस लेख में श्री बद्रीनाथ धाम से जुडी सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ देने का प्रयास किया गया है। यदि आपके मन में कोई भी प्रश्न या सुझाव है तो कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें या सोशल मीडिया पेज पर मैसेज कर सकते हैं । इसके अतिरिक्त आप हमारे फेसबुक ग्रुप का भी हिस्सा बन सकते हैं।

मेरी श्री बद्रीनाथ यात्रा का वृतांत आप अगले लेख में पढ़ सकते हैं जो की शीघ्र ही प्रकाशित किया जायेगा।

फिरहाल इस लेख का समापन हम श्री बद्रीनाथ जी की आरती से करते हैं।

इस यात्रा का वृतांत पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

आरती श्री बद्रीनाथ जी की

पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ।।

शेष सुमिरन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वरम् ।
शक्ति गौरी गणेश शारद नारद मुनि उच्चारणम् ।।

जोग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ।
इंद्र चंद्र कुबेर धुनि कर धूप दीप प्रकाशितम् ।।

सिद्ध मुनिजन करत जै जै बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ।
यक्ष किन्नर करत कौतुक ज्ञान गंधर्व प्रकाशितम् ।।

श्री लक्ष्मी कमला चंवरडोल श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ।
कैलाश में एक देव निरंजन शैल शिखर महेश्वरम् ।।

राजयुधिष्ठिर करत स्तुति श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ।
श्री बद्रजी के पंच रत्न पढ्त पाप विनाशनम् ।
कोटि तीर्थ भवेत पुण्य प्राप्यते फलदायकम् ‍।।

जय बद्रीविशाल।

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