बद्रीनाथ यात्रा बद्रीनाथ मंदिर, माणा गांव, वसुधारा और वापसी (Trip to Badrinath Temple, Mana village and return)

बद्रीनाथ यात्रा से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।
इस यात्रा वृत्तांत को आरम्भ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

दिल्ली से बद्रीनाथ तक की यात्रा में अब तक आपने पढ़ा की किस प्रकार हम ट्रैफिक में फंसते हुए बहुत देरी से ऋषिकेश पहुंचे और फिर वहां से भीड़ भरी बस में जैसे – तैसे बद्रीनाथ तक का सफ़र तय किया। अब हम बढ़ते हैं आगे।

आज हमारी यात्रा का महत्त्व पूर्ण दिन था क्योंकि आज हमें भगवान बद्रीनाथ के दर्शन होने वाले थे। वैसे पिछली रात भी हम सोने से पहले मंदिर के बाहर से दर्शन कर आये थे। होटल वाले से कहा था की वह गर्म पानी का प्रबंध कर के रखे, लेकिन उसने असमर्थता जताते हुए कहा की वह केवल प्रयास ही कर सकता है। सुबह पांच बजे तक हम सभी उठ गये थे और सबसे पहला काम था नहाना लेकिन जब रिसेप्शन पर गये तो पाया की महोदय अभी भी रजाई तान कर सोये हुए हैं। रजाई में से ही आवाज़ आयी – ”सॉरी भैया, गर्म पानी का का इंतज़ाम नहीं हो पायेगा, आप कुण्ड में ही नहा लो।” अब किया भी क्या जा सकता था, वैसे जो हुआ अच्छा ही हुआ। अब आप सोच रहे होंगे की कैसे ? यह आपको बाद में बताऊंगा।

होटल से बाहर जैसे ही कदम रखे, सामने का दृश्य बिलकुल विस्मित कर देने वाला था। सामने था अथाह ऊंचाई लिये रजत वर्णीय हिम आच्छादित नीलकंठ पर्वत। पांच मिनट तक तो मेरी नज़रें वहां से हटी ही नहीं। मानों भगवान नीलकंठ महादेव साक्षात् दर्शन दे रहे हों। मैंने सभी को बाहर बुलाया, ताकी सभी इस दृश्य के साक्षी बन सकें।

Neelkanth mountain
नीलकंठ के पहले दर्शन

 

हम सभी मंदिर की ओर चल पड़े। रात के अँधेरे में जो सुंदरता हम नहीं देख पाये थे वो अब हर ओर दिखायी दे रही थी। माहौल में भयंकर सर्दी थी और तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस। बद्रीनाथ बस अड्डा और हमारा होटल मुख्य हाईवे पर हैं, कुछ ही दुरी पर एक रास्ता बायीं दिशा में नीचे की ओर अलकनंदा के तट तक जाता है जहाँ से आप पुल पार करके मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। मुख्य सड़क लगभग एक किलोमीटर आगे जाकर दो भागो में बट जाती है। एक रास्ता दायीं दिशा में ऊपर की ओर घस्तोली से होते हुए तिब्बत सीमा तक चला जाता है और दूसरा माणा गांव तक। अलकनंदा पुल पूरी तरह धुंए में घिरा हुआ था और यह धुआं केवल पुल ही नहीं अपितु नदी पर भी छाया हुआ था। एक बार तो सोचा की मौसम तो साफ़ है फिर यह धुआं कैसा ? वैसे ज़्यादा दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं, यह तप्त कुण्ड के पानी की भाप थी।

वैसे बाकि तीर्थों की अपेक्षा यहाँ प्रशाद, फूल – माला वाले आपके पीछे नहीं पड़ते हैं, आपको घेरते नहीं हैं। जोशी जी से प्रशाद खरीदा और साथ में मिला एक गिफ़्ट और कुछ ऐड – ऑन सर्विसेज। ये गिफ्ट था बाल्टी – मग्गा और ऐड – ऑन सर्विसेज थी बैग – जूते रखने के लिये रैक। यहाँ तप्त कुण्ड के अतिरिक्त भी उसी गर्म जल की लगभग 15 – 16 धारायें थी। यह जल देखने में इतना गर्म होता है की शायद पहली बार तो आपकी हिम्मत ही न हो नहाने की लेकिन एक लोटा जल शरीर पर डालने के बाद शरीर इसके अनुकूल हो जाता है। यहाँ नहाने का जो आनंद होता है वो किसी बंद बाथरूम में कहाँ 🙂 स्नानादि करने के बाद प्रशाद लेकर बढ़ चले मंदिर की ओर।

पीक सीजन न होने के कारण भीड़ बिलकुल भी नहीं थी, मात्र कुछ ही लोग थे पंक्ति में। जैसे – जैसे गर्भ गृह के समीप हम जा रहे थे, मन में भक्ति – भाव बढ़ता ही जा रहा था। जिस क्षण की प्रतीक्षा लोग सालों – साल करते हैं और बहुत से लोग तो उसके बाद भी खाली हाँथ रह जाते हैं, आज हम उसी क्षण के साक्षी बनने जा रहे थे। कुछ देर में हम भगवान बद्रीनाथ के समक्ष थे। भगवान का विग्रह इतना दिव्य की मानों स्वयं भगवान नारायण मुस्कुरा रहे हों। आज मुझे स्वयं पर गर्व अनुभव हो रहा था की मैं उन चुने हुए लोगों में से हूँ जिन्हे भगवान ने बुलाया है। गर्भगृह के में रुकने के लिये अधिक समय नहीं मिलता, इसलिये पुजारी जी के हांथों से प्रशाद लेकर हम मंदिर प्रांगण में चले गये। मंदिर प्रांगण अधिक बड़ा तो नहीं है, लेकिन बहुत अच्छा बना हुआ है। यहां गलियारों में दरियां बिछी हुई हैं और भजन – सत्संग आदि चलते रहते हैं। आप जितना चाहे – उतना समय यहाँ बिता सकते हैं। मंदिर के बारे में अधिक जानकारी आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। इन्हीं गलियारों में हमने लगभग आधा घंटा बिताया और फिर भगवान से अल्प – विदाई लेकर पहले होटल में सामान रखा और फिर माणा गांव की ओर चल पड़े। यहाँ अल्प विदाई इसलिए लिखा गया है, क्योंकि उस दिन हमने मंदिर में कई बार दर्शन किये।

First view of Badrinath temple
बद्रीनाथ मंदिर के पहले दर्शन

अब हम फिर से मुख्य हाईवे पर थे। यहाँ से माणा गांव तीन किलोमीटर दूर स्थित है। अब तक धुप निकल आयी थी और धुप में नहायी हुई चोटियां तो ऐसे लग रही थी मानो स्वर्ण से मंडित हों। यह रास्ता अक्सर खाली ही रहता है, या फिर सुबह का समय होने के कारण खाली था। मेरी अब तक की सभी यात्राओं में यह पहली ऐसी यात्रा थी जहाँ हम पर्वतों को भूमि से उठते हुए देख रहे थे, अथार्त एक पेड़ की तरह। जैसे की पेड़ को हम जड़ से सिरे तक देख सकते हैं यह बिलकुल ठीक वैसे ही था। नर और नारायण पर्वतों की तलहटी में और नीलकंठ पर्वत की छाँव में बसा यह धाम किसी स्वर्ग से कम नहीं। अभी कुछ आगे हम बढे थे की हमारी भेंट हुई भारत – तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के एक जवान से। उन्होंने इस क्षेत्र के बारे में बहुत सी जानकारियाँ दी। यह क्षेत्र तिब्बत सीमा के समीप स्थित होने के कारण सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। इसलिये अधिक जानकारियाँ इस मंच पर साझा करना उचित नहीं। उन्होंने ही सलाह दी की यदि हम माणा गांव जा ही रहे हैं तो हमें वसुधारा झरने तक जाना ही चाहिये। वसुधारा की दुरी माणा से 5 किलोमीटर है। अथार्त बद्रीनाथ से 8 किलोमीटर पैदल जाना और 8 किलोमीटर पैदल आना। आईडिया तो अच्छा था लेकिन चलना भी बहुत था और वो भी हिमालयी क्षेत्र में। खैर.. प्रकृति देखने का असली आनंद पैदल सफ़र में ही आता है।

(बायें से) देबासीस और रोहित

 

बद्रीनाथ घाटी की ख़ूबसूरती

 

इस क्षेत्र में वनस्पति बहुत कम है और माणा से आगे बिलकुल नहीं। कहीं – कहीं तो यह क्षेत्र कारगिल जैसा ही लगता है। माणा से कुछ पहले कुछ पहले एक छोटा सा झरना है। अब खाली रास्ता, पहाड़ी झरना, हर ओर फैली ख़ूबसूरती, तो यह एक सेल्फी पॉइंट बनता ही है न। यहाँ फोटो आदि लेने के बाद हम पहुँच गये माणा। गांव के प्रवेश पर एक छोटा सा द्वार बना हुआ है। यह गांव मुख्य रूप से भोटिया लोगों का है और भारत – तिब्बत सीमा से पहले यह अंतिम रिहाइश है। इसके आगे कोई गांव या कस्बा नहीं है। गांव के पुरुषों का मुख्य काम टैक्सी आदि चलाना और महिलाओं का काम गर्म कपड़े, शॉल आदि बनाना है। कई घरों में हथकरघा लगा हुआ है। ज़्यादातर महिलायें काले रंग के वस्त्र धारण करती हैं। गाँव की गलियों से होते हुए हम आगे जा रहे थे की एक तिराहे पर बोर्ड देखा जिसमें गणेश गुफा और व्यास गुफा को दायीं ओर दर्शाया गया था और सरस्वती नदी, भीम पुल को बायीं ओर। हमें तो दोनों ओर जाना था। पहले दायीं चल पड़े। कुछ ऊपर गये की दायीं ओर एक छोटे से टेंट में दो याक बंधे हुए थे और उनका मालिक उन्हें बद्रीनाथ जी की सवारी बता कर चारा खिलाने के लिये दान मांग रहा था। अरे भाई, दान तक तो ठीक है लेकिन बद्रीनाथ जी की सवारी गरुण (गिद्ध) है, याक नहीं। याक को चारा खिलाने के बाद पहले गणेश गुफा पहुंचे। जब महाभारत ग्रंथ की रचना की जानी थी तो महर्षि वेद व्यास को एक ऐसे लेखक की आवश्यकता थी जो बिना रुके लिख सके। ऐसे में गणेश जी ने इस कार्य को पूरा किया। यहीं वो स्थान है जहाँ महाभारत की रचना हुई। थोड़ा और ऊपर जाने पर व्यास गुफ़ा है जहाँ महर्षि वेद व्यास ने 18 पुराणों की रचना की। यह गुफा एक बड़ी से चट्टान के नीचे है। यह चट्टान देखने में किसी ग्रन्थ के पन्नों जैसे लगती है, इसलिये इसे व्यास पोथी भी कहा जाता है। व्यास गुफा में महर्षि वेद व्यास और आदि शंकराचार्य जी की मूर्ति है।

माणा गांव का प्रवेश द्वार और मेरे तीनो साथी
माणा गांव
गणेश गुफा का रास्ता

व्यास गुफा

गुफा के बाहर एक चाय की दुकान है और उस पर लिखा है – ”भारत की अंतिम चाय की दुकान” ! खैर ऐसे बोर्ड वाली यहाँ 4-5 दुकाने हैं। अब तक लगातार चलने के कारण बहुत भूख लग चुकी थी। यहीं नाश्ता किया। सर्दियों के मौसम में धूप में नाश्ता, बहुत सुखद अनुभव था। नाश्ता करने के बाद हमारी अगली मंज़िल थी भीम पुल और सरस्वती नदी। भीम पुल ठीक पहले एक गुफा में एक अघोरी बाबा ने अपने डेरा जमा रखा है। बाबा जी का नाम याद नहीं आ रहा, आपको फ़ोटो दिखा दूंगा, शायद आप लोग पहचान जायें। बाबा वैसे बड़े ही मनमौजी हैं। फोटो खिचवाने से मना नहीं करते। उनके डम – डम करते डमरू कीआवाज़ दूर से ही सुनी जा सकती है। यहां देबासीस और अन्य साथियों ने बाबा जी के साथ सेल्फी ली।

भीम पुल के नीचे बहती सरस्वती नदी बहुत ही विकराल लगती है। यदि कोई गलती से गिर जाये तो उसका बचना असंभव। सरस्वती नदी प्रत्यक्ष रूप में केवल इसी स्थान पर दिखाई देती है। कहा जाता है की यहाँ से यह भूमिगत होकर बहती है और प्रयागराज में गंगा में मिल जाती है। कहा जाता है की प्राचीन काल में यह हरियाणा के यमुना नगर और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों से होते हुए प्रयाग तक जाती थी, लेकिन समय के साथ – साथ यह नदी भूमिगत हो गयी या सूख गयी। यहाँ नदी को समर्पित एक मंदिर भी है। सेल्फी की दीवानगी कुछ लोगों पर ऐसी छायी थी की मंदिर के साथ सेल्फी लेने के लिये वे जूते तक उतारना भूल गये लेकिन मंदिर के पुजारी जी इनको नहीं भूले और तुरंत लताड़ लगायी। रोहित की इच्छा यहाँ से आगे जाने की नहीं थी लेकिन देबासीस ने कहा की थोड़ा और आगे चलते हैं। उनका इशारा वसुधारा जाते रास्ते की ओर था। हमने कहा ठीक है लेकिन कुछ ही दूरी तक। चल पड़े पहाड़ों के पीछे की ओर वाले रास्ते पर।

यही बाबा जी हैं
सरस्वती नदी और भीम पुल
इस तस्वीर को आप ज़ूम कर के देखें तो एक रास्ता बहुत ऊंचाई पर दिखाई देता है। यही माणा पास मार्ग है।

पहाड़ों के पीछे की यह दुनिया बहुत खूबसूरत थी। कुछ ही दूरी पर माता त्रिपुर बाला सुंदरी का मंदिर है। अनित ने वहां दर्शन किये और हम लोग आगे बढ़ चले। यह रास्ता कुछ दूर तक कच्चा है और फिर छोटे – बड़े पत्थरों से भरा हुआ। एक ओर गहराई में बहती हुई अलकनंदा नदी, उसके पीछे शान से खड़ा नीलकंठ पर्वत, दूसरी ओर वनस्पति विहीन पहाड़। पीछे की ओर एक और पर्वत जिसके शिखर पर बहुत ज़्यादा बर्फ़ जमी हुई थी। देखने में यह किसी दर्रे जैसा प्रतीत हो रहा था। मैंने अनुमान लगाया की शायद इन्हीं पहाड़ों के पीछे फूलों की घाटी है। जब दिल्ली आकर गूगल मैप पर चेक किया तो अपना अनुमान सही पाया। यदि उन पहाड़ों पर जाने का कोई रास्ता होगा तो उस दर्रे को पार करके वहां से फूलों की घाटी पहुंचा जा सकता है। मैं जब भी ऐसे पहाड़ों को देखता हूँ तो ऐसे ही अनुमान लगाने लगता हूँ की इन पहाड़ों के पीछे क्या होगा ? हमारे सामने विशाल हिमालय की श्रृंखलायें थी किंतु बार – बार उन पहाड़ों को मुड़ कर देखने को दिल करता था। ऐसा लग रहा था की मानों हम किसी वालपेपर में सैर कर रहे हों।

खैर… आगे भी बढ़ना था। मैं अक्सर धीरे – धीरे ही चलता हूँ लेकिन सफ़र पूरा करने में विश्वास करता हूँ। मेरे साथी देबासीस और रोहित सबसे आगे चल रहे थे और अब तक बहुत दूर निकल चुके थे, उनके कुछ पीछे अनित (कुश) चल रहे थे।

अलकनंदा की दूसरी ओर वाला रास्ता सतोपंथ की ओर जाता है और उस पर भी कुछ लोग आते – जाते दिख रहे थे। ठीक वैसे ही वसुधारा वाले रास्ते पर गिने चुने लोग थे। जैसे – जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, दृश्य और ख़ूबसूरत होता जा रहा था। हमारी मंज़िल तो वसुधारा ही थी लेकिन दूसरी ओर सतोपंथ वाला रास्ता आगे जाकर बलाकू से दो भागों में बट जाता है। एक रास्ता जाहनुकूट की ओर जाता है और दूसरा रास्ता सतोपंथ की ओर, जो कि आगे चौखम्बा की तलहटी से होते हुए एक तिराहे पर जाता है जहाँ से सीधा रास्ता शिवलिंग पर्वत और गोमुख तक चला जाता है और दूसरा रास्ता केदारनाथ की ओर। कालिंदी पास ट्रेक करने वाले इसी रास्ते से जाते हैं।

अब तक काफी धूप निकल चुकी थी लेकिन उसका असर नहीं बराबर था। सर्दी धूप के असर को बेअसर कर दे रही थी। एक सिख लोगों का ग्रुप भी वसुधारा जा रहा था, बातचीत करने पर पता चल की ये लोग दिल्ली के तिलक नगर के हैं। कुछ दूर आगे बढ़ा था की एक विदेशी यात्री भी दिखा, वह पहले तो तेज़ी से आगे बढ़ गया और फिर पीछे आया, फिर आगे गया…. समझ नहीं आ रहा थी की क्या भूला हुआ है ? आगे बढ़ते जा रहे थे की एक पहाड़ी नाला दिखाई दिया, अभी तो इसमें पानी कम ही था लेकिन ऐसे नालों में अक्सर दोपहर के बाद पानी तेज़ी से बढ़ता है और इन्हे पार करना बहुत मुश्किल हो जाता है। अब हमें इस बात का भी ध्यान रखना था की दोपहर तक कैसे भी वापसी हो जाये। नाला पार करने एक बाद एक चट्टान को पार किया। यहाँ से हिमालय अत्यंत ख़ूबसूरत दिखायी दे रहा था। अब बर्फ़ीली चोटियां और नज़दीक दिखायी दे रही थी। हम एक खुली घाटी में थे। अब वसुधारा समीप ही था। आगे बढ़ता जा रहा था की तभी कुश, रोहित और देबासीस वापस आते दिखायी दिये। उन्होंने कहा की वसुधारा अभी और आगे है और सभी अब इन बोल्डर भरे रास्तों पर चल कर बुरी तरह थक चुके हैं। यह हमारी यात्रा का मुख्य बिंदु था ! अथार्त अब हमें वापस लौटना था।

यहाँ कुछ देर बैठ कर सुस्ताने और सेब खाने के बाद यहाँ से वापसी कर ली और एक बार फ़िर से में पहले की तरह सबसे पीछे चल रहा था। आते समय जिन पीछे वाले पहाड़ों को मैं पीछे – पीछे मुड़ कर देख रहा था अब वे मेरे सामने की ओर थे। एक स्थान पर छोटे से मैदान में घास चरता गायों का झुण्ड और उनके पीछे पहाड़ों…. ऐसा लग रहा था की मानों किसी चित्रकार ने अपने हांथों से यह पेंटिंग बनायी हो। मेरे साथी चलते – चलते काफी आगे निकल चुके थे। अब मुझे भी बहुत थकान अनुभव होने लगी थी। कुछ किलोमीटर चलने के बाद अब माता त्रिपुर बाला सुंदरी का मंदिर दिखने लगा था, अथार्त अब भीम पुल समीप ही था। मेरे साथी अब तक भीम पुल पहुँच चुके थे, जब मैं काफ़ी देर तक नहीं पहुंचा तो देबासीस मेरा पता लगाने वापस वसुधारा की ओर चल पड़े। त्रिपुर मंदिर के समीप देबासीस को आता देखा। बहुत अच्छा लगा यह ग्रुप के सभी सदस्यों के मन में एक दूसरे के लीये ऐसा भाव देख कर। यहाँ देबासीस हम दोनों के लिये पहले ही सरस्वती नदी का जल लेकर आ गये थे। अब यहाँ से पैदल चलने की हिम्मत किसी में नहीं बची थी। इसलिये माणा गांव से निकलते ही टैक्सी बुक कर ली।

वसुधारा की ओर जाता रास्ता

इन्ही पर्वतों के ऊपर जो बर्फ़ जमी हुई है उसी के पीछे है कहीं फूलों की घाटी

बद्रीनाथ से हरिद्वार/ऋषिकेश के लिये बस सुबह 4 बजे चलती है। सरकारी बस एक ही है और निजी बसें मात्र 4-5 की संख्या में, इसलिए सुबह होने वाली भाग दौड़ बचने के लिये बेहतर यही है की एक दिन पहले शाम को ही टिकट बुक कर लिया जाये। इसलिये हम सभी बस अड्डे पहुँच गये, लेकिन वहां पता चला की टिकट बुकिंग शाम 5 बजे से शुरू होगी, इसलिये हम सभी वापस होटल आ गये और जब कुछ देर आराम फ़रमाया। एक बार फिर से हम बद्रीनाथ मंदिर पहुँच गये और फिर से उनके दर्शनों का सौभाग्य मिला। यह बात यहाँ की बहुत अच्छी लगी की आप एक दिन में कितनी भी बार भगवान के दर्शन कर सकते हैं। यहाँ दर्शन करने और बैठने के बाद हम जब बस अड्डे पहुंचे तो वहां पहले से ही लम्बी लाइन लग चुकी थी। मेरा नंबर आने से पहले सभी निजी बसें बुक हो चुकी थी और अब एक मात्रा सहारा थी सरकारी बस लेकिन उसमें भी एक समस्या थी। उसके कंडक्टर ने बताया की अभी टिकट ऑनलाइन ही बुक हो रही हैं और जब रात 2 बजे तक ऑनलाइन बुकिंग का फाइनल स्टेटस कन्फर्म हो जायेगा तब ऑफलाइन बुकिंग शुरू होगी। यहाँ बद्रीनाथ में इंटरनेट चलता तो है लेकिन उसकी स्पीड इतनी कम उत्तराखण्ड परिवहन निगम (UTC) की वेबसाइट खुल ही नहीं रही थी। अब हमारे सामने विकराल स्थिती थी की अब क्या करें। ऐसे में एक मयंक पाण्डेय संकट मोचक एक रूप नज़र आये। वे उस समय नॉएडा में थे। उन्हें कॉल किया और कहा की हमारे लिए ऑनलाइन टिकट बुक कर दे और उन्होंने वही किया। बहुत बड़ी समस्या उन्होंने ख़त्म कर दी थी। अब हम अपनी वापसी को लेकर आश्वस्त थे।

अब बद्रीनाथ जैसे स्थान पर कोई इतनी दूर से आये और खरीदारी न करे, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। चल पड़े बाजार की ओर। एक दुकान पर मामूली मोल – भाव के बाद खरीदारी पूरी की। वैसे जितना मोल – भाव हमने किया महिलायें तो उसे कुछ भी न समझें। बद्रीनाथ में होने वाली संध्या आरती को देखने की हमारी बड़ी इच्छा थी लेकिन जब तक वहां पहुंचे तब तक आरती पूरी हो चली थी। बद्रीनाथ क्षेत्र में भयंकर सर्दी पड़ती है और अब तो शाम हो गयी थी। यहाँ बाजार में एक बेंच पर बैठे – बैठे आस – पास देखना अच्छा लग रहा था। मन कर रहा की यहीं पर एक छोटी सी दुकान खोल ली जाये और यहीं बस जायें लेकिन तभी ध्यान आया की बद्रीनाथ यात्रा तो केवल 6 महीने ही चलती है, उसके बाद क्या खायेंगे ???

होटल के पास बने एक ढाबे में भोजन करने के बाद हम अपने होटल पहुँच चुके थे। अगले दिन हमारी घर वापसी होनी थी और इसलिये जल्दी सोना भी आवश्यक था लेकिन ऐसा होता कहाँ है ? वहां रात में अक्सर इंटरनेट स्पीड अच्छी हो जाती है, इसलिये जैसे इंटरनेट का एक्सेस मिलता फोटो अपडेट करना और व्हाट्सप्प आदि चेक करना शुरू हो जाता था। रात 11 बजे तक सभी सो चुके थे सिवाय मेरे।

सुबह के तीन बज चुके थे और आज यह हमारी यात्रा का अंतिम दिन था। चार बजे बस के निकलने का समय था, इसलिये फटाफट तैयार होकर हम लोग बस में सवार हो चुके थे। बस अपने नियत समय से चल पड़ी और एक बार फिर से अँधेरा होने के कारण में बद्रीनाथ – जोशीमठ के रास्ते में पड़ने वाले दृश्यों का आनंद नहीं ले पाया। जोशीमठ के नाम पर केवल एक बस स्टैंड ही दिखा था। सुबह सात बजे तक हम पीपलकोटी पहुँच चुके थे। यहाँ कुछ देर नाश्ते आदि के लिये रुकने के बाद बस चल पड़ी अपने सफ़र पर। वैसे ऐसे यात्राओं से लौटना किसे अच्छा लगता है, इसी बोरियत कोई ख़त्म करने के लिये नींद का सहारा लेना ही ठीक समझा। बर्फीले पहाड़ों को बार – बार पीछे की ओर मुड़ कर देखते हुए अच्छा लग रहा था और यूँही देखते – देखते कब नींद आ गयी पता ही नहीं लगा।

चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, देवप्रयाग आदि होते हुए दोपहर बस तीन धारा पहुँच चुकी थी। कुछ देर यहाँ रुकने के बाद बस एक बार फ़िर चल पड़ी ऋषिकेश की ओर और पहुंची शाम चार बजे तक। यहाँ पहले से ही उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की दिल्ली वाली बस खड़ी थी। एक बार फ़िर पीछे मुड़ कर पहाड़ों की ओर देखा और आदतन दिमाग में ये ख़याल आ गया – इन्हीं पहाड़ों के पीछे छुपी है वो अनोखी – अनदेखी सी दुनिया जिससे मिल कर हम लौट रहें थे अपनी जिजीविषा की ओर।

अब आते हैं इस यात्रा में हुए व्यय पर। इस यात्रा में हम कुल चार लोग थे और होटल और कुछ अन्य व्यय साझे में किया गया था। यहाँ मैं केवल व्यक्तिगत व्यय का विवरण दे रहा हूँ।

किराया रुपये
ऑफिस से मेट्रो स्टेशन (ऑटो) 17
एम.जी. रोड मेट्रो स्टेशन से कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन (मेट्रो) 40
कश्मीरी गेट से ऋषिकेश (जनरथ बस) 456
ऋषिकेश से बद्रीनाथ (साधारण बस) 425
माणा से बद्रीनाथ बस स्टैंड (टैक्सी) 50
बद्रीनाथ से ऋषिकेश (UTC साधारण बस) 542
ऋषिकेश से दिल्ली (साधारण बस) 282
दिल्ली मेट्रो द्वारा 45
होटल
बद्रीनाथ में होटल किराया (एक दिन, दो रात) 300
भोजन और अन्य व्यय 493
कुल व्यय 2650

2
Leave a Reply

avatar
1 Comment threads
1 Thread replies
0 Followers
 
Most reacted comment
Hottest comment thread
2 Comment authors
adminSanjay Recent comment authors
  Subscribe  
newest oldest most voted
Notify of
Sanjay
Guest
Sanjay

Bhi jab vasudhara pahuch hi gaye they to dekh kar aate vech raste se hi kyo wapus aa gaye