Badrinath temple in night

बद्रीनाथ यात्रा देवप्रयाग से बद्रीनाथ (Trip to Badrinath Devprayag to Badrinath)

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दिल्ली से बद्रीनाथ की यात्रा में अब तक आपने पढ़ा की कैसे हम भयंकर ट्रैफिक में फंसते हुए एक घंटा और तीस मिनट की देरी से ऋषिकेश पहुंचे और फिर वहां से एक भरी हुई बस में जैसे – तैसे स्वयं को एडजस्ट करते हुए देवप्रयाग तक पहुंचे। अब बढ़ते हैं आगे।

मैं हमेशा से आशावादी रहा हूँ। चाहे ऋषिकेश से हमे भीड़ – भाड़ में स्वयं को एडजस्ट करना पड़ा हो लेकिन मुझे आशा थी की देवप्रयाग पहुँचते – पहुँचते तो बस में कुछ सीटें तो खाली हो ही जायेंगी लेकिन बाद में मुझे पता लगा की इस बस में सभी बद्रीनाथ के ही भक्त हैं और बद्रीनाथ जी से पहले सीटें खाली नहीं होने वाली और अब पुरे रास्ते ऐसे ही समय बिताना था। देवप्रयाग वाला पुल पार करके हम बढ़ चले श्रीनगर की ओर।

Devimand
देवीमांडा

मुझसे अक्सर कुछ लोग पूछते रहते हैं मैं हमेशा पहाड़ों की ओर ही क्यों जाता हूँ और वो भी केवल उत्तराखण्ड की ओर ? खैर.. ये प्रश्न तो मैं स्वयं से भी पूछता हूँ, जब उत्तर मिल जायेगा तो बता दूंगा। हमेशा से दिल्ली में ही रहा हूँ। यह शहर मुझे पहले कभी इतना बुरा नहीं लगा जितना की अब लगता है। अभी 15 – 20 वर्ष पहले तक दिल्ली ऐसी नहीं थी। यहाँ लोग जानते थे की सुबह कब होती है और शाम कब। सुबह का अर्थ होता था माहौल में शांति, ताज़गी, मंद – मंद चलने वाली हलकी ठंडी हवा। शाम अथार्त गलियों – मोहल्लों में खेलते बच्चे, मंदिर से आती संध्या आरती की आवाज़, हाथों में दूध के डब्बे लिए लौटती उम्र दराज़ महिलायें और सैर करते बुज़ुर्ग। हाँ, कमाई कुछ कम अवश्य थी लेकिन जीवन की बुनियादी आवश्यकतायें तो पूरी हो जी जाती थी। माना की तब हम अपने बच्चों को चॉकलेट के नाम पर केवल कुछ टॉफियां ही दे पाते थे और वो भी हफ्ते में एक बार लेकिन वो सस्ती वाली टॉफियां पाकर बच्चों के चेहरे पर जो मुस्कान आती थी, वो पुरे दिन की थकान मिटा देती थी।

Old Delhi Railway Station
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन

न जाने कहाँ खो गया ये सब ? अब यह शहर 24 घंटे चलता है। हाँ, कुछ लोगों ने इसे मेट्रोपोलिटन सिटी की नाईट लाइफ का नाम दे दिया है और इसे पसंद भी करते हैं, लेकिन हासिल क्या हुआ ? शाम का जो समय हम कभी अपने घर के बुज़ुर्गों के साथ और बच्चों के बीच खेलते हुए बिताते थे, अब या तो नाईट शिफ्ट के लिये दिल्ली एनसीआर के किसी एमएनसी ऑफिस में बिताते हैं या फ़िर शनिवार की शाम किसी बार में। हम पहले से ज़्यादा कमाते हैं, क्रय क्षमता भी बहुत अच्छी हो गयी है, अब बच्चों के लिये रोज़ महँगी वाली चॉकलेट भी खरीदते हैं लेकिन अपनों का साथ कहीं खो सा गया है। गलियों में खेलने वाले बच्चे टैबलेट में व्यस्त हो गये हैं। मंदिरों की संध्या आरती में अब वो बात नहीं रही। पता ही नहीं लगता की कब सुबह हुई और कब रात ? हवा इतनी प्रदूषित हो चुकी है की अब मास्क का सहारा ले रहे हैं। हमने कमाने से ज़्यादा गंवाया है। शायद अब तरक्की की परिभाषा बदल चुकी है।

खैर.. उत्तराखण्ड आज भी काफ़ी हद तक नहीं बदला है। यहाँ आज भी वहीं 20 साल पहले वाला जीवन है। यहाँ लोगों में ईमानदारी है, सादगी है। अन्य पहाड़ी राज्यों की तुलना में आज भी यहाँ दिखावटी रिसॉर्ट कम है और पारम्परिक धर्मशालायें ज़्यादा। ग्रामीण जीवन जीने की लिये यहाँ आपको किसी चौकी धानी में कैंपिंग करने की आवश्यकता नहीं हैं ! आप किसी भी उत्तराखण्डी गांव में आश्रय मांग लीजिये, लोग आपको मना नहीं करेंगे। ऐसे गाँवों की तुलना उन बनावटी गांवों से नहीं की जा सकती। शायद इन्हीं सब बातों में उत्तर छुपा है की मैं इन पहाड़ों में बार – बार क्यों आता हूँ।

देवप्रयाग से श्रीनगर की ओर बस तेज़ी से बढ़ती जा रही थी। वैसे पहाड़ों में 25 किलोमीटर प्रति घंटा की गति को ही बहुत तेज़ समझा जाता है। रास्ते के दायीं ओर, नदी के उस पार ऊँचे पहाड़ों पर बसे देवप्रयाग शहर को देखते – देखते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला। कुछ घंटो बाद हलकी सी नींद खुली तो देखा की जाम लगा हुआ है। जे.सी.बी. मशीन लगी हुई थी बोल्डर हटाने में… यहाँ ऑल वेदर रोड का काम चल रहा था। हम रुद्रप्रयाग शहर पहुँचने वाले ही थे। अब तक कीर्ति नगर और श्रीनगर जैसे बड़े शहर पीछे छूट चुके थे और साथ – साथ ही पीछे छूट गया था धारी देवी का मंदिर। खैर.. जीवन में बहुत कुछ पीछे छूट जाया करता है लेकिन हम आगे बढ़ते हैं।

श्रीनगर जो की कभी ब्रिटिश गढ़वाल की राजधानी भी रह चुका है, उत्तराखण्ड के सबसे बड़े शहरों में से एक है। हेमवतीनंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय और सरकारी पॉलिटेक्निक आदि यहाँ स्थित हैं। प्रसिद्ध धारी देवी का मंदिर यहीं अलकनंदा नदी के बीच स्थित है। कहा जाता है की वर्ष 2013 की प्राकृतिक आपदा का कारण माँ धारी का ही प्रकोप था क्योंकि अलकनंदा नदी पर बन रही जल विद्युत् परियोजना के लिये माता की मूर्ति को उनके स्थान से हटा दिया गया था। कारण जो भी रहे हों, उस आपदा का दंश आज भी बहुत से परिवार भुगत रहे हैं।

इधर – उधर देखते हुए फिर से आँख लग गयी। अब ऐसी भीड़ भरी बस में जिस तरह हम लोग बैठे थे उसमे नींद का भी कोई फायदा तो था नहीं, दो बार मोबाइल हाँथ से गिरा। कुछ ही देर में रुद्रप्रयाग पहुँच चुके थे। यहाँ से केदारनाथ जाने का मार्ग अलग हो जाता है। अतः अगत्स्यमुनि, तिलवाड़ा, गुप्तकाशी सोनप्रयाग होते हुए गौरीकुण्ड तक जाने वाले यात्रियों को यहाँ से अलग राह पकड़नी पड़ती है। रुद्रप्रयाग ऋषिकेश से 141 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है और यह केदारनाथ और बद्रीनाथ जाने वाले यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान भी। समुद्रतल से रुद्रप्रयाग की ऊंचाई 895 मीटर है। केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी और सतोपंथ से आने वाली अलखनंदा का संगम स्थल भी है यह। धार्मिक और भौगोलिक रूप से यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यह शहर रुद्रप्रयाग जिले का मुख्यालय भी है। इसी जिले के अंतगर्त केदारनाथ और पञ्च प्रयाग भी आते हैं। ये पञ्च प्रयाग हैं – केदारनाथ, मध्यमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर। इनके अतिरिक्त अगत्स्यमुनि, गुप्तकाशी, सोनप्रयाग और उखीमठ जैसे महत्वपूर्ण शहर भी इसी जिले का हिस्सा है। इस आधार पर हम कह सकते हैं की चाहे यह उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा जिला नहीं है किंतु है सबसे महत्वपूर्ण।

रुद्रप्रयाग शहर से हमारी बस सीधी ओर चल पड़ी। अगला शहर था गौचर जहाँ सेना की छावनी भी है। अलकनंदा नंदी के साथ – साथ होते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। अलकनंदा घाटी की ख़ूबसूरती अब बढ़ती जा रही थी। एक ओर टूटते – दरकते पहाड़ और दूसरी ओर घाटी में बहती हरापन लिये हुए नीले पानी वाली नदी, दूसरे किनारे पर सफ़ेद रेत। वैसे यह स्थान किसी समुद्री बीच से कम नहीं। इन किनारों को भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है लेकिन बरसात के महीनों में नदी का प्रकोप सब बहा ले जाता है, इसलिये सरकार शायद ऐसा नहीं करती।

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए कुछ दूरी पर नदी के दोनों ओर एक बड़ा सा शहर दिखायी दे रहा था। यह कर्णप्रयाग था और ऐसा समझते हुए मुझे देर नहीं लगी। कर्णप्रयाग पहुँचने का अर्थ था की अब यहाँ से उच्च हिमालयी सफ़र की शुरुआत हो चुकी है। यहाँ दो नदियों का संगम होता है – अलकनंदा और पिंडारी ग्लेशियर से आने वाली पिण्डर नदी। बहुत से लोग पिंडारी ग्लेशियर का भी ट्रेक करते हैं। अन्य प्रयागों की तरह यह प्रयाग भी धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ माता सती जो की महादेव की पहली पत्नी थी, उनका मंदिर यहाँ उमा मंदिर के नाम से जाना जाता है। महान संत और दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने यहाँ 18 दिनों तक कठोर तपस्या की थी। सप्त बद्रियों में से एक आदि बद्री का मंदिर कर्णप्रयाग में ही स्थित है। प्रस्तावित ऋषिकेश – कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का अंतिम स्टेशन भी यही शहर है।

यहाँ से निकलते ही कुछ दुरी पर एक और प्रयाग है – नंदप्रयाग जहाँ अलकनंदा और नंदाकिनी का संगम है। वैसे मुझे आशा थी दोपहर के भोजन के लिए बस रुद्रप्रयाग या कर्णप्रयाग में अवश्य रुकेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब मुझे लगने लगा था की शायद जोशीमठ में ही रुके लेकिन नंदप्रयाग में एक छोटा सा होटल (ढाबा) देख कर बस रुक गयी। यहाँ इस ढाबे के अतिरिक्त और कोई दुकान नहीं थी। सुबह से सभी लोग एक – एक पराठा खाकर ही चले थे तो भूख तो बहुत जोरों की लगी हुई थी लेकिन जितने लोग थे और जितनी भूख थी उस हिसाब से यहाँ ढाबे पर न ही नौकर थे और न ही बर्तन। दाल – चावल को उदरस्थ कराकर हम लोग बाहर आ गये और कुछ फोटो लिये यहाँ।

बस की घरघराहट सुन कर ध्यान आया की बस अब आगे बढ़ने का इशारा कर रही है। सभी यात्री वापस अपने – अपने स्थानों पर पुनर्स्थापित हुए। मेरे साथ एक समस्या थी की मेरी सीट कुछ ऐसी जगह थी की मुझे स्वयं के बैठने से पहले बाकि के पांच लोगों के बैठने का इंतज़ार करना पड़ता था और फिर अंत में मैं अपने अगल – बगल वालों को एक ओर धकेलते हुए बैठ जाता था 🙂 । कुछ ही देर में हम बढ़ चले चमोली की ओर। नंदप्रयाग से चमोली का सफ़र कुछ खास नहीं है। इसलिये अब सीधा चमोली पहुँच कर ही बाते होंगी।

हरे – भरे पहाड़ों में आगे बढ़ते जा रहे थे। लगभग डेढ़ घंटे बाद नदी की दूसरी ओर पहाड़ों की ऊंचाई पर एक बड़ा शहर अब दिखने लगा था और उस शहर के पीछे बहुत सी ऊँची चोटियां बादलों में ढकी हुई दिखाई देने लगी थी। यह मेरे लिये कोई अनजान शहर नहीं था। यह था गोपेश्वर। चोपता जाने का रास्ता इसी शहर से होकर जाता है। यहाँ से चोपता लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है। (वैसे चोपता जाने के लिये आप उखीमठ वाला रास्ता भी अपना सकते हैं।) नदीं की दूसरी ओर गोपेश्वर है तो इस ओर चमोली शहर। चमोली जिला उत्तराखण्ड राज्य का सबसे बड़ा जिला है। बद्रीनाथ मंदिर, हेमकुण्ड गुरुद्वारा, सतोपंथ – स्वर्गारोहिणी, जोशीमठ और गोपेश्वर शहर इसी जिले का भाग हैं। इस राज्य की अंतर्राष्ट्रीय सीमा उत्तर में तिब्बत से लगती है और राज्य में यह पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, गढ़वाल (पौड़ी), रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों से जुड़ा हुआ है। वैसे चमोली इस जिले का मुख्यालय है लेकिन सभी सरकारी कार्यालय और प्रतिष्ठान गोपेश्वर में ही हैं।

Nandprayag
नंदप्रयाग

चोपता जाने वाले यात्री चमोली से ही अलकनंदा पर करके गोपेश्वर से होते हुए आगे निकल जाते हैं। आज तक सीधी दिशा में इस रास्ते पर नहीं गया था। अब पहली बार इस ओर आगे जा रहा था, तो रोमांच तो बढ़ना ही था लेकिन इस रोमांच को शाम का बढ़ता अंधेरा फीका कर रहा था। यहाँ से पहाड़ों की ऊँची चोटिया दिखाई देने लगी थी और अब बस ऊंचाई पर बढ़ती जा रही थी। यहाँ से जोशीमठ 60 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिये लगभग 2 घंटे लगने थे। कुछ दूरी पर स्थित था पीपलकोटी। यहाँ भी कोई जल विद्युत् परियोजना थी। पीपलकोटी में वैसे देखने के लिये कुछ विशेष तो नहीं है लेकिन यदि आप अपने वाहन से हैं तो यहाँ कुछ समय बिता सकते हैं। मेरे साथी अपने मोबाइलों में व्यस्त थे, शायद नेटवर्क पाने का असफल प्रयास कर रहे होंगे।

यहाँ से कुछ दुरी पर एक स्थान है द्विंग, वैसे तो कोई बसावट थी नहीं लेकिन गूगल मैप ऑन करने पता चला इस स्थान का नाम। एक सहयात्री ने बताया की इन्हीं पहाड़ों के ऊपर पीछे की ओर उसका गाँव है और वहां गुग्गल धूप बनाने की सामग्री बहुतायत में पैदा होती है। उन्होंने बताया की वहां से उत्तराखण्ड हिमालय की सभी प्रमुख चोटियां दिखायी देती हैं। वे रहते देहरादून में हैं। इतने खूबसूरत गाँव को छोड़कर जाना किसी की मजबूरी ही हो सकती है, शौक नहीं। अब जोशीमठ की दूरी यहाँ से अधिक नहीं थी। अब थोड़ा सुकून था का की सफ़र अधिक नहीं बचा है। वैसे इतने ख़ूबसूरत सफर का अंत होना मुझे या किसी को भी पसंद नहीं होगा लेकिन सीट भी तो मायने रखती है न। अब जिस तरह फंस कर मैं इतनी देर से बैठा हुआ था, तो ऐसी सोच दिमाग में आनी थी।

थोड़ी ही देर में छोटे – छोटे दीयों जैसी रौशनी से ढका जोशीमठ शहर दिखने लगा था और 10 मिनट में हम शहर में थे। वैसे मेरी बहुत इच्छा थी इस शहर को दिन के उजाले में देखने की लेकिन अब अंधेरा हो चुका था तो खिड़कियों सी बाहर झाँकने की कोशिश व्यर्थ थी। जोशीमठ, बद्रीनाथ मार्ग और चमोली जिले का एक बहुत महत्वपूर्ण शहर है। आदि शंकराचार्य की तपोभूमि रहा यह शहर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्द है। यहाँ आदि शंकराचार्य ने ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी जिसे कालांतर में जोशीमठ कहा जाने लगा। समुद्र तल से 1890 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस शहर और इसके आस – पास सप्त बद्रियों में से कई मंदिर स्थित हैं। भविष्य बद्री जहाँ की भविष्य में बद्रीनाथ जी पूजा की जायेगी, का रास्ता यहीं से होकर जाता है। ट्रैकिंग के शौकीनों के लिये मलारी पास के ट्रैक तक यहीं से होकर पहुंचा जा सकता है। इसके अतिरिक्त मलारी और नीति गांवों का रास्ता यहीं से होकर जाता है। इतने सारे घुमक्कड़ी के स्थानों में हम औली को कैसे भूल सकते हैं। औली तक यहाँ से रोपवे द्वारा पहुंचा जा सकता है। अब औली किसलिये प्रसिद्ध है यह हम सभी जानते हैं।

जोशीमठ से बद्रीनाथ का सफर मात्र 45 किलोमीटर अथार्त 2 घंटो का रह जाता है और यह इस यात्रा का अंतिम खण्ड है। हमेशा से मेरी इच्छा रही है जोशीमठ – बद्रीनाथ के रास्ते को देखने की लेकिन अँधेरे ने इस पर पानी फेर दिया। यहाँ से बस ऊँचे रास्तों पर धीरे – धीरे बढ़ने लगी थी। इस मार्ग की चौड़ाई बेहद कम है और यहाँ अलकनंदा एक बहुत गहरी घाटी में हो कर बहती है। कुछ लोगों ने बस में बद्रीनाथ के जयकारे लगाने शुरू कर दिये थे। माहौल में गर्मी थी लेकिन मौसम में ठंडक थी। लोगों की जैकेट्स अब तक उनके बैगों से निकल चुकी थी। अंधेरे में बाहर कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता था की हम कितनी ज़्यादा ऊंचाई पर यात्रा कर रहे हैं।

एक ब्रेक के साथ बस रुकी। बाहर एक छोटा सा गुरुद्वारा दिखायी दे रहा था। अथार्त हम गोविंद घाट पहुँच चुके थे। गोविंद घाट से एक रास्ता पवित्र सिख तीर्थ हेमकुण्ड साहिब गुरूद्वारे और विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी की ओर जाता है। बस में बैठे हुए 4-5 सिख यात्री यहीं उतर गये। कुछ दूर आगे बढे थे की हर ओर जगमग दिखने लग गयी थी। मुझे लगा की हम पहुँच चुके हैं बद्रीनाथ तक लेकिन फिर किसी ने कहा की बद्रीनाथ अभी थोड़ी और दूर है। हर ओर जगमगाती लाइट्स देख कर मैं आश्चर्यचकित था की इस निर्जन इलाके में इतनी रौशनी ? तभी धयान आया की यह तो विष्णु प्रयाग है और यहाँ जेपी ग्रुप की बहुत विशाल जल विद्युत परियोजना है। यह परियोजना अलकनंदा और धौली गंगा के संगम पर बनी है। यह परियोजना इतनी विशाल है की इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की कई किलोमीटर में केवल जेपी के ही बड़े – बड़े होर्डिंग और परियोजना के गेट बने हुए हैं। विष्णुप्रयाग से बद्रीनाथ का रास्ता चाहे संकरा हो लेकिन बहुत अच्छा बना हुआ है। कहीं भी गड्ढे नहीं है। यह भी संभव है की इसे जेपी ने ही बनवाया हो।

परियोजना से पार हुए तो एक छोटा सा मंदिर नज़र आया। साथ बैठी महिला जिनकी बद्रीनाथ में दुकान है, ने बताया यह हनुमान चट्टी यही और अब हम सीधा बद्रीनाथ धाम ही पहुंचेंगे। यहाँ से अब लगातार भगवान बद्रीनाथ के जयकारे लगने शुरू हो चुके थे। माहौल भक्तिमय हो चुका था। हम चारों की उत्सुकता अब बहुत बढ़ चुकी थी यह सोच कर जिस स्थान को भू-वैकुण्ठ कहा जाता है उस स्थान से अब हम अधिक दूर नहीं। अभी मन बद्रीनाथ जी के विचारों में कहीं खोया ही था की बस ईमारत के नीचे से गुजरी। यह बद्रीनाथ बस अड्डे की ईमारत थी और इसका अर्थ था अब हम बद्रीनाथ शहर में पहुँच चुके हैं।

‘बोल बद्री विशाल की… जय’ इसी जयकारे के साथ हम लोग बस से उतरे। मौसम बहुत ठंडा था। मोबाइल में चेक किया तो पाया  -1 डिग्री सेल्सियस। अब हमारा पहला काम था रात का ठिकाना ढूंढना जो की आसानी से मिल गया। रास्ते के दाहिनी ओर छोटे – बड़े होटल थे और बायीं ओर गर्म कपड़े और कम्बल आदि बेचने वाले। अपेक्षा के विपरीत काफी बड़ा क़स्बा पाया इसे। कुछ होटलों से मोल – भाव करने के बाद आखिर हमारा ठिकाना मिल गया। हमने होटल वाले से कहा की सुबह गरम पानी का प्रबंध कर दे लेकिन उसने कहा यहाँ सभी यात्री मंदिर के तप्त कुण्ड में ही नहाते हैं। हमारे फिर से आग्रह करने पर उसने कहा की वह कोशिश करेगा। खाना आदि खाने के बाद अपने मोबाइलों को भी अगले दिन की तैयारी पर लगा कर रजाई में आश्रय लेना ही सही समझा।

आज की यात्रा यहीं तक। शीघ्र ही मिलते हैं आगे के सफर पर।

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