बद्रीनाथ यात्रा दिल्ली से देवप्रयाग (Trip to Badrinath Delhi to Devprayag)

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सर्दियाँ अब लगभग आ चुकी हैं… लोगों के कूलर और ए.सी. बंद हो चुके हैं और बहुत ने तो पंखे भी बंद कर दिये हैं। अब ऐसे मौसम में बिजली चली भी जाये तो मुझे तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। आज भी वो दूरदर्शन वाले ज़माने के दिन याद आते हैं जब दिल्ली में बिजली सरकारी थी और उसका ढर्रा भी पड़ोसी मुल्क की सरकार जैसा ही था – मतलब वही की कभी भी आ जाती थी… कभी भी चली जाती थी ! अक्सर जाती ही थी। ऐसे में सर्दियों की शाम में जब बिजली चली जाये तो रजाई में बैठ कर मूंगफली – गज्जक खाना और अंताक्षरी खेलना भला कौन भूल सकता है ?

अब उस ज़माने में इंटरनेट तो था नहीं की सर्दियों में घुमक्कड़ी की नयी – नयी योजनायें बने। मुझ जैसे तो यही समझते थे की शिमला और मसूरी आस – पास ही हैं और कुल्लू – मनाली एक ही हैं। बहुत हुआ तो वैष्णों देवी चले गये। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो जैसे ही सर्दियाँ आती हैं लोग तुरंत गूगल ओपन करते हैं और टाइप करते हैं – ‘Best snow fall locations in north India’ या फिर ‘snowfall in manali’.. बहुत हुआ तो चोपता भी सर्च कर लिया।

मैं इस बार स्पीति की योजना बना कर बैठा हुआ था लेकिन होना तो कुछ और ही था। इस बार भगवान बद्रीनाथ का बुलावा था। हमारी मित्र मण्डली में एक नया – नया घुमक्कड़ जीव है जिसे हम कुश कहते हैं, वैसे वास्तविक नाम अनित है। इन महाशय के सामने किसी भी नये स्थान का नाम लेने भर की देर है और ये पण्डित जी की भांति उस स्थान का पूरा पोथी – पंचांग – कुण्डली गूगल पर खंगाल मारते हैं। जिस प्रकार महाबली खली दिन में पांच लीटर दूध पीते हैं, वैसे ही ये दिन में पांच बार यात्रा वृतांत का पाठ करते हैं। इन्होने ने बद्रीनाथ जी की यात्रा का आईडिया सुझाया था जिसे हम सभी ने मान लिया। अब इन सभी में कौन – कौन थे ये भी देख लीजिये –
मैं : मुझे तो आप जानते ही हैं)।
देबासीस : दोस्ती के मामले में हमारी तुलना दुर्योधन और कर्ण की दोस्ती से हो सकती है (कर्म इतने भी अच्छे नहीं हैं की कृष्ण – सुदामा से तुलना करें)।
रोहित : अनित के मित्र और किंतु – परंतु के शाही विशेषज्ञ।
स्वयं अनित : अब और तारीफ़ नहीं कर सकता।
मयंक : पेशे से वेब डेवलपर और दिमाग में घुमक्कड़ी के जीवाणु। महाशय साइकिल पर मध्य प्रदेश की लम्बाई और चौड़ाई नापा करते थे। इनके घुमक्क्ड़ी ब्लॉग  में 60% शेयर मध्य प्रदेश का है। पता नहीं क्यों शिवराज जी ने इन्हे पर्यटन मंत्री नहीं बनाया ?

सब सही चल रहा था। रोजाना बद्रीनाथ के ख़याली पुलाव पकते रहते थे। मयंक भाई थोड़ी असमंजस की स्थिति में थे। ऐसा नहीं था की घूमने का प्लान कैंसिल कर रहे थे लेकिन अब उनकी बाइक गढ़वाल छोड़ कर कुमाऊ ज़िंदाबाद के नारे लगाने लगी थी। आखिर उन्होंने बद्रीनाथ न जाकर अल्मोड़ा – जागेश्वर की ओर जाने का निर्णय कर लिया। सितम्बर के अंत में ये निकल पड़े पत्नी सहित जागेश्वर की ओर बाइक पर। अब रह गये हम चार।

कुश अपनी आदत अनुसार लगातार UTC (उत्तराखण्ड परिवहन निगम) की अपडेट पढ़ते रहते थे। दिल्ली से ऋषिकेश का जनरथ बस का टिकट तो हमने ऑनलाइन करवा ही लिया था। कुश की राय थी की हमें ऋषिकेश से बद्रीनाथ का टिकट भी ऑनलाइन करवा लेना चाहिये। ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिए सरकारी बस एक ही है और वो सुबह 5:30 बजे चलती है। ऐसे में रोहित का कहना था की यदि हम ऋषिकेश पहुँचने में लेट हो गये तो बस भी छूट जायेगी और सबके मिलाकर 2100 रुपयों का नुक्सान भी होगा। मैं तो दोनों की राय से ही सहमत था। आखिर हमने ऋषिकेश से बद्रीनाथ का टिकट रियल टाइम बुकिंग पर ही छोड़ दिया।

मुझे और देबासीस को तो जैसे तैसे छुट्टियां मिल गयी थी लेकिन अनित को अपने ऑफिस में विद्रोह का बिगुल बजाना पड़ा तब जाकर छुट्टियां मिली। रोहित भाई अपने किंतु – परंतु के साथ अंतिम दिन तक के.बी.सी. खेल रहे थे। 5 अक्टूबर 2018 को शाम के समय हमें ऑफिस से ही निकलना था। जब मैं और देबासीस बैग लेकर नीचे पहुंचे तो रोहित को बैग लिये खड़े पाया। आखिर यात्रा शुरू हो गयी।

गुरुग्राम के एम.जी.रोड मेट्रो स्टेशन से कश्मीरी गेट बस अड्डे रात सवा नौ बजे तक पहुँच चुके थे। कुश भी वहीं मिले। हाईवे के ढाबों की लूट से हम भली भली – भांति परिचित हैं इसलिये यहीं कश्मीरी गेट एक – एक पराठा निपटा कर बस में पहुँच गये और बस भी अपने समय से चल दी।

बस अड्डे से निकलते है जाम की स्थिति थी…. तो…. किंतु उतनी भी नहीं जितनी की पहले होती थी। दो – तीन साल से कश्मीरी गेट से मंडी हाउस तक मेट्रो का निर्माण कार्य चल रहा था जिसके कारण बस अड्डे के आस – पास ही करीब 30 मिनट लग जाते थी। अब चूँकि मेट्रो चल पड़ी है तो ऐसा नहीं हैं। हम आश्वस्त थे की चलो समय से ऋषिकेश पहुँच कर वहां से बद्रीनाथ की बस में सवार हो जायेंगे किंतु तुलसीदास जी तो बहुत पहले ही लिख गये थे :-
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

दिल्ली – मेरठ एक्सप्रेस वे निर्माण के कारण जगह – जगह भयंकर जाम की स्थिति थी। गाड़ियां उसी गति से आगे बढ़ रही थी जिस गति से बिल्डर फ़्लैट मालिकों को फ़्लैट सौंपते हैं। धीरे – धीरे आधी रात हो गयी। अब तक बस की लगभग सभी सवारियाँ सो गयी थी। कुछ मेरे जैसे जगे भी हुए थे। ‘बर्बादियों का सोग मनाना फ़िज़ूल था… बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया…’ पीछे वाली सीट से आती इस गाने की धीमी – धीमी आवाज़ ने माहौल को बीती यादों में पहुंचा दिया था।

रात दो बजे बस पहुंची खतौली स्थित सागर रत्ना रेस्टोरेंट। ये रेस्टोरेंट कम है और 4 स्टार होटल ज़्यादा। समझ नहीं आता की एक साधारण जनरथ बस को इतने महंगे रेस्टोरेंट के सामने रोकने का क्या तुक है ? जिसको चाय पीनी थी चाय पी और जिसको सिगरेट पीनी थी सिगरेट पी। लोग इतना ही कर सकते थे ऐसी जगह पर तो। आधा घंटा ऐसे रेस्टोरेंट पर बेकार करने के बाद आखिर बस चल पड़ी। पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी और अब इतना तय था की हमारी ऋषिकेश से बद्रीनाथ वाली बस छूट जायेगी।

Sagar Ratna Khatauli
पहला पड़ाव – सागर रत्ना

थोड़ी ही देर में नींद आ गयी। सुबह 4 बजे नींद खुली तो ऐसा लगा की हरिद्वार आ गया, एक उम्मीद जगी की शायद ऋषिकेश समय से पहुँच जायें लेकिन फ़िर पता लगा की अभी तो रुड़की पहुंचे हैं। सुबह पांच बजे हरिद्वार पहुंचे। वैसे हरिद्वार से भी बद्रीनाथ की एक बस जाती है लेकिन वो सुबह चार बजे ही निकल चुकी थी। अथार्त ये भी गयी। थोड़ी ही देर में हरिद्वार से बस चल पड़ी और आखिर सुबह छः बजे तक हम ऋषिकेश पहुंच चुके थे।

अब तक सरकारी बस तो निकल ही चुकी थी और प्राइवेट बस भी एक ही थी जिसमे की मात्र चार सीटें खाली थी और वो भी दो सबसे पीछे की ओर बाकि दो आगे की ओर और वो भी अलग – अलग। सबसे पीछे वाली सीट पर मात्र पांच लोगों के बैठने की जगह थी लेकिन प्राइवेट बस वालों को तो आप जानते ही हैं, वो वहां कुल छः लोगों को बैठा रहा था। भारी भीड़ को देख कर रोहित ने कहा किसी और बस में चलते हैं। लेकिन वास्तविकता तो मैं जानता ही था की यह अंतिम बस है और इसके बाद फ़िर कोई बस नहीं है। मैंने उन्हें जैसे – तैसे समझा कर इसी बस में चलने को राज़ी कर लिया। जैसे – तैसे हम लोगों ने स्वयं को बस में एडजस्ट किया और बस चल पड़ी। ऋषिकेश गुरूद्वारे के पास से कुछ और सवारियां चढ़ी, ये वही सवारियां थी जिन्होंने रात में ही निजी बस अड्डे से टिकट बुक करवा ली थी। आप भी ऐसा कर सकते है।

हमारे साथ एक महिला गोपेश्वर की बैठी थी, उनकी बद्रीनाथ में दुकान है और वो वहीं जा रही थी। कुछ लोगों ने भजन गाने शुरू कर दिये। मै और कुश जैसी तैसे पीछे की ओर फंसे हुए बैठे थे और इसी तरह हमें 12-13 घंटे बिताने थे। अब तक धुप निकल आयी थी और हर बस ऋषिकेश और लक्ष्मण झूला आदि क्षेत्र को पीछे छोड़ पहाड़ों पर बढ़ चली थी। वर्तमान में उत्तराखण्ड में चार धामों को जोड़ने वाले सभी मार्गों को डबल करने वाली आल वेदर रोड परियोजना पर काम चल रहा है। इस कारण जगह – जगह पहाड़ों को तोड़ कर मार्ग चौड़े किये जा रहे हैं। वैसे जिस गति से कार्य चल रहा है, ऐसा लगता है की शीघ्र ही यह पूरा हो जायेगा। हाँ, ये अवश्य है की पहाड़ों के टूटने के कारण पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। खैर, वो तो वैसे भी पड़ रहा है। पहाड़ों में जगह – जगह निर्माण कार्यों के लिये वैसे भी टूट – फूट होती ही रहती है, लेकिन अब जो हो रहा है वह उत्तराखण्ड वासियों और पर्यटन के लिये अच्छा ही है। वैसे योजना तो चारो धामों को रेल मार्ग से जोड़ने की भी है और ऋषिकेश – कर्णप्रयाग खण्ड पर कार्य चल भी रहा है। देखते हैं की कब तक पूरा होता है।

ब्यासी, शिवपुरी और कौडियाला से होते हुए हम लोग पहुंचे तीन धारा। जो भी यात्री केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि गये होंगे उन्हें इस स्थान के बारे में भली – भांति पता होगा। तीन धारा को ब्रेक फ़ास्ट पॉइंट भी कहा जाता है। केदारनाथ और बद्रीनाथ की ओर जाने वाली बसें यहाँ अवश्य रूकती हैं। यहाँ कुछ नाश्ता आदि किया। अब तक मौसम में अच्छी – खासी गर्मी बढ़ चुकी थी। वैसे भी ऋषिकेश से देवप्रयाग तक का मौसम लगभग दिल्ली जैसा ही है। 30 मिनट रुकने के बाद यहाँ हम चल पड़े।

Teen dhara
तीन धारा

यहाँ से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है इस यात्रा का पहला महत्वपूर्ण स्थान देवप्रयाग जहाँ भागीरथी और अलकनंदा नदियां संगम करके गंगा बनती हैं। इन्ही दोनों नदियों के संगम से बनने वाली नदी को आगे गंगा के नाम से जाना जाता है। समुद्रतल से 830 मीटर की ऊँचायी पर बसा यह स्थान टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में है। देखने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं है यहाँ। संगम पर बैठे – बैठे कब शाम हो जायेगी, शायद आपको पता भी न चले। संगम स्थल से थोड़ी ऊपर जाने पर रघुनाथ मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने करवाया था। देवप्रयाग से सीधा जाने वाला रास्ता गाज़ा और खाड़ी की ओर चला जाता है और दाहिनी ओर पुल पार करके जाने वाला रास्ता हमारी मंज़िल की ओर। सुबह 9 बजे तक हम लोग देवप्रयाग पहुँच चुके थे।

शेष अगले भाग में।

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Vijay kumar
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Yaade taza ho gaye bhai waiting for next part thanks