Chopta

चोपता – तुंगनाथ यात्रा (भाग एक) (Journey to Chopta – Tungnath Part – 1)

यात्रा मोड

पांडेय जी कहीं चलने का प्लान बनाओ, जहाँ बर्फ पड़ती हो! मैं तीन साल से कहीं नहीं गया। ‘ रोहित ने कहा। मैंने कहा ‘साइबेरिया चले जाओं।’

यह दिसम्बर के अंतिम दिन थे। बहुत दिन हो गए थे कोई यात्रा किये। वही सोमवार से शुक्रवार का ऑफिस और छुट्टी के दो दिन तो बस इधर उधर के कामो में निकल जाते थे। मैं अक्सर यात्राओं पर जाता रहता हूँ, पर रोहित पिछले तीन सालों से कही नहीं गया था। इसलिए रोहित ने किसी बर्फीले स्थान की यात्रा के बारे में योजना बनाने के लिए मुझसे कहा। मैं भी मना नहीं कर पाया।

योजना बानी चोपता जाने की और यह लगभग अंतिम रूप ले चुकी थी लेकिन तभी ब्रह्माण्ड की जानी – पहचानी समस्या सामने आ गयी। कौन सी समस्या ? अरे वही अवकाश न मिलने की समस्या। रोहित की छुट्टियां रद्द कर दी गयी थी और उस बेचारे के तीन सालों में एक साल और जुड़ गया। राहत की बात यह थी की मेरी और देबाशीष की छुट्टियों को सहमति मिल गयी थी।

यात्रा का समय निर्धारित हुआ 2 फ़रवरी से 5 फ़रवरी। यात्रा से दो दिन पहले एक और साथी ज्योतिर्मय पांडा जुड़ गए। अब हम तीन लोग थे।

 

पहला दिन :

1 फ़रवरी को रात की शिफ्ट में काम कर के सुबह घर पंहुचा। नींद तो बहुत आ रही थी पर घर के काम निपटाते हुए शाम हो गयी। रात 9 बजे तक मैं महाराणा प्रताप अंतराजीय बस अड्डा कश्मीरी गेट पहुँच गया था। थोड़ी ही देर में देबाशीष और ज्योतिर्मय भी पहुँच गए। फटाफट आलू के पराठे खा कर प्रतीक्षालय में जा कर बैठ गए और बस का इंतज़ार करने लगे। कश्मीरी गेट बस अड्डा अब बदल चुका है। किसी एयरपोर्ट जैसा लगता है।

बस ऑनलाइन ही बुक कर रखी थी। 10 बजकर 40 मिनट पर उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की वातानुकूलित जनरथ बस आ गयी। थोड़ी ही देर में हमारी यात्रा शुरू हो गयी। पहले नाईट शिफ्ट और फिर दिन भर जगे रहने के कारण नींद ने जल्द ही आगोश में ले लिया।

Kashmiri gate ISBT
कश्मीरी गेट बस अड्डा

 

दूसरा दिन :

सुबह 4:30 बजे नींद खुली तो खुद को हरिद्वार के नज़दीक पाया। मैंने अपने साथियों को भी उठा दिया। थोड़ी ही देर में बस हर की पौड़ी क्षेत्र के सामने से गुज़री। वहीं से गंगा मैया को प्रणाम किया। लगभग 5:30 बजे तक हम ऋषिकेश बस अड्डे पर पहुँच चुके थे। ऋषिकेश ऐसा स्थान है जहाँ पहुँच कर मैं सारी दुनिया को भूल जाता हूँ और बस पहाड़ो में बस जाने को दिल करता है। यहाँ से चारो धामो यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ और अन्य स्थानों के लिए बस मिल जाती है।

ऋषिकेश को उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह जिला देहरादून के अंतगर्त आता है। अधिकांश लोग रामझूला और लक्ष्मण झूला क्षेत्र को ऋषिकेश समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। ऋषिकेश की सीमा ऋषिकेश बस अड्डे के पीछे बहने वाली चंद्रभागा तक ही है। चंद्रभागा पार करते ही टिहरी गढ़वाल जिले की सीमा शुरू हो जाती है। गंगा पार पौड़ी गढ़वाल है। परमार्थ निकेतन और स्वर्ग आश्रम अदि पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में है, जबकि लक्ष्मण झूला टिहरी गढ़वाल में।

ऋषिकेश को स्वयं भगवान विष्णु ने ऋषियों के लिए बसाया था, ताकि यहाँ के सुरम्य वातावरण में वे तप आदि कर सके।

यहाँ आने वाले हर इंसान के लिए यहाँ आने का कारण अलग अलग होता है। कोई मन के शांति के लिए आता है, कोई पूजा पाठ के लिए। युवा नौकायन (रिवर राफ्टिंग) के लिए भी आते हैं।

अब वापस आते हैं अपनी यात्रा पर। नित्यकर्म पुरे करके बस की तलाश में निकल पड़े। चोपता जाने के दो मार्ग हैं। एक मार्ग देवप्रयाग, श्री नगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, गोपेश्वर और मंडल होकर चोपता जाता है। दूसरा मार्ग रुद्रप्रयाग से अलग होकर अगत्स्यमुनि, कुंड, उखीमठ, मक्कू बैंड होकर जाता है।

हम दूसरे मार्ग से जाना चाहते थे। एक बस पर बोर्ड लगा था जोशीमठ का। यह निश्चित था की यह कुंड नहीं जाएगी, किन्तु बस वाले ने कहा की कुंड जायेंगे। उसकी बातो पर विश्वास करते हुए सीटों पर कब्ज़ा कर लिया।

लगभग 6:15 बजे बस चल पड़ी। ऋषिकेश की अलसायी सुबह को चीरते हुए हम पहाड़ो पर बढ़ चले। सुबह का समय था, कुछ लोग चाय पी रहे थे, कुछ दुकानो के शटर उठ रहे थे। दूर ऊंचे पहाड़ो से आती रौशनी देख कर लग रहा था वहां भी कोई बस्ती या गांव है। किसी आम पहाड़ी शहर जैसा ही तो है यह, पर एक बात जो इसे खास बनाती है वो है दिव्यता की चादर ओढ़े माँ गंगा और हर ओर फैली शांति।

मेरी पीछे वाली सीट पर देबाशीष और ज्योतिर्मय बैठे थी और मेरे साथ एक साधु महाराज। उन्होंने बताया की वो देवप्रयाग के रहने वाले हैं और गुरुग्राम पास ही किसी मंदिर में पंडिताई करते हैं। उन्होंने ही बताया की उत्तराखंड बनने के बाद राज्य को हुई क्या लाभ हुए हैं। जितने भी शानदार रोड और बिजली परियोजनाएं हैं उनमे से ज्यादातर अलग राज्य  बनने के बाद ही शुरू हुईं हैं। इससे पहले तो लखनऊ में बैठी सरकार यहाँ से लकड़ियां निर्यात करने के सिवाय कुछ नहीं करती थी।

अब तक शहर काफी पीछे छूट चुका था। शिवपुरी और ब्यासी पर करते हुए हम तीन धारा पहुचे। तीन धारा देवप्रयाग से लगभग 10 किलोमीटर पहले है। यहाँ कुछ ढाबे हैं। इसलिए केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि जाने वाली बसें यहाँ जरूर रूकती हैं। खाने का मन था नहीं, सिर्फ एक कोक ले ली। आधा घंटे रुकने के बाद बस चल पड़ी। थोड़ी ही देर में देवप्रयाग के दर्शन हुए। यहाँ बस रुकी तो नहीं, पर स्थान है ही इतना खूबसूरत की बस की खिड़की से देखना तो बनता ही है।

देवप्रयाग

समुद्रतल से 2727 फुट की ऊंचाई पर बसा देवप्रयाग टिहरी गढ़वाल जिले का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। गोमुख से आने वाली भागीरथी और सतोपंथ से आने वाली अलखनंदा का संगम स्थल होने के कारण इसे प्रयाग कहा जाता है। यहीं से भागीरथी और अलखनंदा मिलकर गंगा का रूप धारण करती हैं। 7वीं शताब्दी में देवप्रयाग को ब्रह्मा पुरी, ब्रह्मा तीर्थ और श्री खंड आदि नामो से जाना जाता था। कहा जाता है की भगवान् राम के पिता  दशरथ ने यहाँ  तपस्या की थी। यहाँ के प्रमुख आकर्षण अलकनन्दा और भागीरथी का संगम, रघुनाथ मंदिर, और दशरथ शिला हैं। कुछ आगे जाने पर चन्द्रबदनी माता के दर्शन भी किये जा सकते हैं। यहाँ मैं पहले भी कई बार आ चुका हूँ। संगम के किनारे घंटो बैठे रहना अद्भुत शांति देता है।

बहुत हो गयी देवप्रयाग की बातें। अब थोड़ा बढ़ते हैं। कीर्ति नगर से होते हुए हम श्री नगर पहुंचे। देवप्रयाग से श्री नगर की दूरी 38 किलोमीटर है। श्री नगर उत्तराखंड का एक बड़ा शहर है। ब्रिटिश कल में यह गढ़वाल क्षेत्र की राजधानी भी रह चुका है। उत्तराखंड का एक प्रमुख तीर्थ धारी देवी मंदिर भी यहीं स्थित है।

अलखनंदा नदी पर बन रही जल विधुत परियोजना के कारण मंदिर को अपने मूल स्थान से विस्थापित किया जाना था। स्थानीय लोगो ने काफी विरोध किया, इसका कारण था की माता क्रोधित हो सकती हैं। स्थानीय लोगो को विरोध को खारिज़ करते हुए सरकार ने मंदिर को अपने मूल स्थान से कुछ ऊपर स्थापित कर दिया। स्थानीय लोगो की मान्यता है की जून 2013 में आयी जल प्रलय का मुख्य कारण माता का क्रोध था। लेकिन एक ऐसा कैसे संभव है। इस परियोजना से बिजली तो जन मानस को ही मिलनी थी और भला भी सबका होना था। माँ किसी का बुरा क्यों चाहेगी ?

आम दिनों की तुलना में आज श्री नगर में यातायात सामान्य ही था। ड्राइवर ने कहा की बस 10 मिनट के लिए रुकी है। अब तक भूख बढ़ चुकी थी। देबाशीष सामने वाले ढाबे से आलू के पराठे ले आये। पराठे खा कर आनंद भी आया और थोड़ी जान भी। श्री नगर एक बढ़ी घाटी में बसा हुआ शहर है। बस इसी घाटी होते हुए आगे बढ़ती जा रही थी। हमारी बायीं और सरसो के लहलहाते खेत और उनके पीछे बहती अलखनंदा। किसी फ़िल्मी गांव जैसा ही था यह। इन्ही सुन्दर वादियों से होते हुए हम रुद्रप्रयाग पहुंचे।

यहाँ मेंरा अनुमान सही साबित हुआ। बस कंडक्टर ने हमे आगे वाली बस में बैठने को कहा क्योंकि इसे जोशीमठ जाना था जो की बद्रीनाथ मार्ग पर है। खैर बस में सवार हो कर हम निकल पड़े कुंड की ओर।

रुद्रप्रयाग ऋषिकेश से 141 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है और यह केदारनाथ और बद्रीनाथ जाने वाले यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान भी। ऋषिकेश से आने वाला मार्ग सीधा बद्रीनाथ होते हुए माना पास तक चला जाता है। दूसरा मार्ग रुद्रप्रयाग से अलग होकर मन्दाकिनी घाटी से  हुए केदारनाथ की ओर जाता है। समुद्रतल से रुद्रप्रयाग की ऊंचाई 895 मीटर है। केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी और सतोपंथ से आने वाली अलखनंदा का संगम स्थल भी है यह। पहले यहाँ अक्सर ट्रैफिक बहुत ज्यादा हो जाता था। अब बाई पास रोड बनने के करण यह समस्या हल हो गयी है।

मैंने यात्रा पर निकलने से पहले ही गेस्ट हाउस मालिक से बात कर ली थी। किसी समस्या से बचने के लिए ऐसा जरुरी था। उनका नाम है सूजन राणा। उन्होंने ने हमे उखीमठ में मिलने को कहा था।

मन्दाकिनी जिस घाटी से होकर गुज़रती है वह बहुत सी शानदार है। ज्यादातर जगहों पर चौड़ाई कम ही है। अब तक दोपहर हो चुकी थी। नदी को निहारते हुए कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। अगत्स्यमुनि, स्यालसौर, चंद्रापुरी और, भीरी होते हुए हम कुंड पहुँच गए। इस बस को गुप्तकाशी जाना था।

कुंड में कुछ खास तो नहीं है पर इसके स्थिति इसे विशेष बनाती है। यहाँ से सीधा मार्ग उखीमठ की और जाता है। गुप्तकाशी और केदारनाथ जाने वालो को मन्दाकिनी पार करनी पड़ती है। किसी जल विधुत परियोजना का काम चल रहा था। यहाँ से केदारनाथ पर्वत का एक विशाल दृश्य दिखाई देता है। इस यात्रा में पहली बार बर्फ के दर्शन हुए थे। पूरी तरह बर्फ से ढका हुआ था केदारनाथ।

थोड़ी ही देर में एक शेयर्ड टाटा सूमो आ गयी। हम चल दिए उखीमठ की ओर। अब गाड़ी तेजी से ऊंचाई की ओर जा रही थी। सामने वाले पहाड़ पर गुप्तकाशी शहर दिख रहा था। पिछली बार चोपता से वापसी में मैं गुप्तकाशी में ही रुका था। थोड़ी ही देर में हम उखीमठ में थे। राणा जी हमे वही मिल गए। ऊखीमठ एक पवित्र स्थान है। पवित्र ओम्कारेश्वर मंदिर यहाँ की विशेषता है। यह शहर समुद्र तल से 1311 मीटर की ऊंचाई पर है।

Mandakini River near Kund
कुंड में मंदाकिनी
Bridge connecting Guptkashi and Kund
कुंड को गुप्तकाशी से जोड़ने वाला पुल
Way to Ukhimath
कुंड से उखीमठ की ओर जाता रास्ता

यहाँ से निकलते ही चंद्रशिला की चोटी दिखने लगी थी। साफ – साफ नज़र आ रहा थी की चंद्रशिला पर बहुत बर्फ पड़ी है। यह देख कर हमारी उत्सुकता अफ्रीका के तापमान की तरह बढ़ती जा रही थी। मस्तूरा की वादियों से होते हुए अब हम बढ़ते जा रहे थे। ऊखीमठ  से चोपता की दुरी लगभग 30 किलोमीटर है। ड्राइवर ने दाहिनी ओर सामने वाले पहाड़ पर बसे हुए गांव की ओर इशारा करते हुए कहा की वह मक्कूमठ है। वही उसका गांव है। मक्कूमठ ही वह गांव है जहाँ शीत काल में श्री तुंगनाथ और रुद्रनाथ जी की पूजा होती है। मक्कूमठ जाने के लिए इसी ऊखीमठ – चोपता मार्ग पर स्थित मक्कू बैंड से रास्ता जाता है।

दुगलबिट्टा से आगे बढ़ते ही रास्ते के दोनों ओर बर्फ दिखने लगी थी। तीन दिन पहले ही भारी बर्फ बारी हुई थी यहाँ। बनियाकुंड से पहले एक मशहूर कैंप है मैगी पाई। अगर इसे वी. आई. पी. रिसोर्ट कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। लगभग तीन बजे तक हम चोपता पहुँच चुके थे।

 

चोपता

चोपता रुद्रप्रयाग जिले में 2600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है तथा ऋषिकेश से दूरी 254 किलोमीटर है। पंच केदार में तृतीय केदार श्री तुंगनाथ चोपता से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

चोपता के तारीफ जितनी की जाये उतनी कम है। अगर आप गूगल पर सर्च करें तो चोपता की तुलना स्विट्ज़रलैंड से की जाती है। प्रकृति की सुंदरता से कोई हेरा फेरी नहीं की गयी है यहाँ। जो जैसा है बस वैसा ही है। होटल के नाम पर 7-8 गेस्ट हाउस हैं और वो भी सिर्फ 2 कमरो वाले, और 3  ढाबे हैं। बिजली का एक मात्रा स्त्रोत सौर ऊर्जा है और मोबाइल के सिग्नल कभी आते हैं और कभी नहीं। कुछ गेस्टहाउस तो लकड़ी के ही बने हैं। शायद इसी सादगी के कारण मुझ जैसे घुमक्कड़ इस ओर खींचे चले आते हैं। सबसे बड़े घुमक्कड़ स्वयं भोले नाथ भी यहाँ बसने से खुद को रोक नहीं सके और इसी लिए तुंगनाथ में शिवलिंग रूप में स्थापित हो गए।

एक अलग ही दुनिया है यह। कुछ लोग बैठ कर ताश  खेल रहे थे। चारो ओर बर्फ की सफ़ेद चादर बिछी पड़ी थी। धुप तो निकली थी पर बस नाम की ही थी। मौसम में ठंडक काफी थी। सामने विशाल हिमालय खड़ा था। यात्राओं का मौसम न होने के कारण चोपता लगभग खाली ही था।

हम अपने निश्चित गेस्ट हाउस पहुँच गए। दाल – चावल बनाने का आर्डर देकर हम निकल पड़े अपनी घुमक्कड़ी पर। बर्फ की चादर पर पड़ रही धूप माहौल को खुशनुमा बना रही थी। हम थोड़ा ऊपर की और चले गए। कुछ फोटो खींचे। हम तीनो ने ही पहली बार बर्फ महसूस की थी। कुछ देर बर्फ पर दौड़ – भाग भी की।

एक पेड़ पर कुछ लाल पीले कपडे और चुन्नियाँ बंधी हुई थी। स्थानीय लोगो की श्रद्धा का केंद्र है यह पेड़। गूगल पर चोपता को भारत के स्विट्ज़रलैंड की उपमा दी गयी है। स्विट्ज़रलैंड तो मैंने देखा नहीं पर इतना मैं विश्वास से कह सकता हूँ की स्विटजरलैंड में भी प्रकृति का यह रूप नहीं होगा।

कुछ देर इधर उधर घूमने के बाद हम लोग ढाबे पर पहुँच गए। पहाड़ी मसलो से बनी आलू गोभी की सब्ज़ी और दाल चावल तैयार थी। शहरो में ऐसा कहना कहाँ मिलता है। लगभग 17 घंटो की लगातार यात्रा और 2 घंटो तक इधर उधर घूमने के कारण अब थकान काफी हो गयी थी।

ढाबे वाले को बोल दिया की रात का खाना बन जाये तो उठा दे। ऐसा बोल कर हम सोने चले गए। कमरा पूरी तरह लकड़ी का बना हुआ था इसलिए बाहर से ठंडी हवा आ रही थी। रात 8 बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई। ‘खाना बन चुका है, आ जाओ’, ढाबे वाले ने कहा। खाना बन चुका था। वैसे उठने का मन तो नहीं था पर अगर अभी नहीं खाते तो अगले दिन यात्रा भूखे पेट ही शुरू करनी पड़ती और दोपहर 2 बजे से पहले खाना नहीं नसीब होता। इसलिए माँ अन्नपूर्णा को नाराज़ करना उचित नहीं था।

जैसे ही कमरे के बाहर कदम रखे, ऐसा लगा मानो उत्तरी ध्रुव पर पहुँच गए हों। इतनी ज्यादा ठण्ड। दांत बज रहे थे। आने वाली 10 फ़रवरी को पूर्णिमा होने के कारण चाँद की रौशनी पहाड़ो पर पड़ी बर्फ की खूबसूरती को और निखार रही थी। इस खूबसूरती को शब्दो में नहीं समेत जा सकता। कांपते हुए, जैकेट में हाँथ घुसाए हम तीनो ढाबे पर पहुंचे। फटाफट खाना खाकर अपने कमरे की चल पड़े और जाते जाते बोल दिया की सुबह जल्दी निकलना है इसलिए नाश्ता  बना दे। कमरा लकड़ी का होने के कारण रात भर कमरे में हवा आती रही। रात भर रजाई और ठण्ड में जंग चलती रही।

A tree in Chopta
आस्था
Police post in chopta
चोपता की पुलिस चौकी

Chopta

Chopta in winter

View of Himalaya from Chopta
हिमालय दर्शन
Hotel in chopta
चोपता में हमारा ठिकाना

Chopta

यात्रा जारी है…

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Hiten BhattadminSubham Chauhan Recent comment authors
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Subham Chauhan
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बहुत खूब लिखा है चोपता वाकई में ही धरती पर स्वर्ग से कम नहीं है. स्विट्जरलैंड कभी जा पाए या ना, लेकिन एक बार उत्तराखंड का ये स्विट्जरलैंड जरूर घूम लेना.

Subham Chauhan
Guest

बहुत खूब !
चोपता वाकई में धरती पर किसी स्वर्ग से कम नहीं.

Hiten Bhatt
Guest
Hiten Bhatt

Choptame bahot salo pahele Garwal Nigam ka rest house bhi tha. Me jab 1997 me gaya tab bandh ho chuka tha. kisi R. K. Dhawan nam ke IAS Officer ko care taker se anban ho gai. Dhawan prayvarn ke nam par court me gaya….aur court ne stay de diya. Chpta ane se pahele shayad 200 mtrs pahele left side me ata tha. uske samne bahot achchha maidan bhi tha…