Tungnath temple Chopta

चोपता – तुंगनाथ यात्रा (भाग दो) (Journey to Chopta – Tungnath Part – 2)

तीसरा दिन :

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सोचा था की पिछली बार की तरह सुबह 5:30 बजे यात्रा शुरू कर देंगे, लेकिन 6:30 बज चुके थे पर रजाई छोड़ने को दिल नहीं कर रहा था। जैसे – तैसे मैं उठा और गरम पानी लेने के लिए ढाबे की ओर गया वो सो रहा था। ऊपर से ढाबे के बाहर ही बारहसिंघा खड़ा था। इसलिए पास जाने की हिम्मत नहीं हुई।

ठंडे पानी से ही नित्य कर्म निपटा कर तैयार हुए। रास्ते में ज्यादा बर्फ होने की सम्भावना थी लेकिन जूते इस लायक नहीं थे, इसलिए 150 रुपये प्रति जोड़ी किराये के हिसाब से तीन जोड़ी जूते ले लिए और वहीँ बैठ कर चाय पी। चूल्हे में जो मोटी लकड़ी लगी हुई थी उसी पर एक बिल्ली बैठी हुई गर्माहट पाने की कोशिश कर रही थी।

जूते पहने और निकल पड़े अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने। ॐ नमः शिवाय बोल कर यात्रा शुरू की। शुरुआत से ही रास्ता कठिन प्रतीत होने लगता है। दोनों ओर थोड़ी – थोड़ी बर्फ पड़ी थी। थोड़ा आगे बढ़ने पर रास्ते पर भी बर्फ मिलनी शुरू हो गयी। अब बर्फ बढ़ती ही जा रही थी।
रास्ते में कहीं भी ढलान नहीं थी ! होगी भी कैसे, चोपता समुद्रतल से 2600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और तुंगनाथ 3600 मीटर की ऊंचाई पर और बीच दूरी लगभग 3.5 किलोमीटर। 980 मीटर की ऊंचाई 3.5 किलोमीटर में पूरी करनी थी तो ऊंचाई बढ़ना स्वाभाविक है। देवदार आदि के जंगलो से घिरे रास्ते पर हम बढ़ते जा रहे थे। बायीं ओर हिमालय की श्रृंखलाएं इसकी भव्यता का अनुभव कराती हैं।

रास्ते पूरी तरह बर्फ से ढके हुए और अब हमारे पैर बर्फ में धसने लगे थे। अब जूतों की अहमियत पता लग रही थी। थोड़ा आगे बढे तो शार्ट कट मारने की सोची। मेरे दोनों साथी शार्ट काट के लिए आगे बढ़ गए। मैं भी पीछे पीछे चल पड़ा। यही गलती कर दी। यह शार्ट कट काफी लंबा था और ऊंचाई तीखी थी। थोड़ा आगे बढ़ने पर मेरे पैर घुटनो के ऊपर तक धंस गए। दोनों साथी तो ऊपर पहुँच गए, बस मैं ही फंसा हुआ था। जैसे – तैसे ऊपर पहुंचा और एक हठ योगी की तरह ठान लिया की अब शार्ट कट नहीं मारूँगा। थोड़ी देर बाद हम एक बड़े से बुग्याल में थे। ऊँचे पहाड़ो पर खुले मैदानों को बुग्याल कहा जाता है। अब सामने था बर्फीला रेगिस्तान और उस पर बने भालू के पंजो के निशान। डर तो था की अगर भालू जी ने स्वागत किया तो क्या होगा ? खैर, हो भी क्या सकता था, जो करना था भालू जी को ही करना था।

ज्योतिर्मय पांडा
देबासीस

बुग्याल

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर बर्फ से आधा दबा हुआ एक शोध केंद्र दिखा। यह हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय का शोध केंद्र है जहाँ विद्यार्थी उच्च हिमालयी क्षेत्रो में पायी जाने वाली वनस्पतियों पर शोध करते हैं। अभी यह बंद था। अब मंदिर का शिखर दिखाई देने लगा था। मंदिर तक पहुँचने के यह अंतिम चढ़ाई थी।

मंदिर के द्वार के समीप पहुँचने पर पीछे मुड़ कर देखा तो दो युवक आते दिखे। उनके चलने की रफ़्तार काफी तेज़ थी। अब हम पांच लोग थे। उनमे से एक का नाम कमल बिष्ट और दुसरे का नाम अजय प्रताप सिंह था। दोनों नोएडा स्थित एक बी.पी.ओ. में कार्यरत हैं। कमल जी नैनीताल के रहने वाले हैं और अजय तो मेरे ही गृहनगर वाराणसी के हैं। यह जान कर अच्छा लगा। उनके साथ – साथ एक पहाड़ी कुत्ता भी था।

मंदिर के आँगन में दाखिल हुए और थोड़ी देर बैठ कर आराम किया। मंदिर के गर्भ गृह के सामने जाकर फोटो खींचे के लिए जूते उतारना जरुरी था और ऐसा ही किया। बर्फ से ढके आँगन पर नंगे पैर चलना काफी मुश्किल था। भोले नाथ को बाहर से ही प्रणाम किया और फोटो सेशन शुरू किया। यहाँ से हिमालय की कई चोटियां स्पष्ट दिख रही थी, जिनमे प्रमुख थी चौखम्बा, केदारनाथ, बन्दर पूँछ, मेरु-सुमेरु और, नंदा देवी।

कथा बाबा तुंगनाथ की

तुंगनाथ की कथा इस प्रकार है। महाभारत युद्ध के बाद भाई बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवो और द्रौपदी ने हिमालय प्रयाण किया, अथार्त हिमालय को चले गए। मार्ग में उन्हें भगवान् शिव दिखे। शिव जी ने सोचा की कहीं पांडव मोक्ष न मांग लें, इसलिए उन्होंने ने भैंसे का रूप धारण किया और भागने लगे, किन्तु भीम ने उन्हें पहचान लिया था। भीम उनके मार्ग में दो चट्टानों पर पैर फैला कर खड़े हो गए। यह देख कर भैंसे रुपी भगवान् शिव धरती में समा गए। उनके शरीर के अंग हिमालय में पांच अलग अलग स्थानों पर प्रकट हुए।
इन्ही पांच स्थानों को पंच केदार कहा जाता है। केदारनाथ में पृष्ट भाग, तुंगनाथ में भुजा, मध्यमहेश्वर में नाभि, चेहरा रुद्रनाथ में, और जटाएं कल्पेश्वर में। यह पांचो केदार उत्तराखंड में स्थित हैं।

Tungnath temple Chopta
जय बाबा तुंगनाथ

चलो चंद्रशिला

हमारी योजना चंद्रशिला जो की 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, तक जाने की थी। तुंगनाथ 3600 मीटर की ऊंचाई पर हम और चंद्रशिला 4000 मीटर की ऊंचाई पर और बीच की दूरी लगभग 1.5 किलोमीटर। इसका अर्थ था की चढ़ाई बहुत मुश्किल होने जा रही थी। वैसे तो चंद्रशिला जाने का कोई मार्ग है भी नहीं और जो छोटी सी पगडण्डी बची थी, ज्यादा बर्फ़बारी के कारण वह नज़र नहीं आ रही थी। लग नहीं रहा था की पहुँच पाएंगे।

मंदिर के पीछे वाले रस्ते से चंद्रशिला की ओर हम चल पड़े। पैर एक फुट से ज्यादा बर्फ में धंस रहे थे। लगभाग 200 मीटर जाने के बाद लगा की हम ग़लत रास्ते पर आ गए हैं, क्योकि सामने वाला रास्ता तेज़ी से नीचे की ओर जा रहा था। मैं समझ गया की ये गोपेश्वर जाने वाला रास्ता है। किसी समय में तुंगनाथ से बद्रीनाथ जाने वाले यात्री इसी मार्ग से जाते थे। अब लग रहा था की वापस जाना पड़ेगा, तभी देबाशीष ने आवाज़ दी। उन्हें चंद्रशिला वाला रास्ता मिल गया था। हम उस ओर बढ़ चले। मुझे छोड़ कर बाकी सभी तेज़ी से चल रहे थे। रास्ता बेहद खतरनाक है। एक गलत कदम भोलेनाथ से साक्षात्कार करवा सकता था। कुछ दूर चलने पर एक चट्टान दिखी। कोई नया यात्री इसे देख कर यही समझेगा की यही चंद्रशिला है, पर यह एक अहम मोड़ था।

चट्टान पर चढ़ कर देखा तो सिवाय बर्फ के रेगिस्तान के कुछ नहीं दिख रहा था। दूर – दूर तक सिर्फ बर्फ और दूर छोटी पर चंद्रशिला। अब तो किसी अन्य जानवर के पैरो के भी निशान नहीं दिख रहे थे और न ही कोई पक्षी। चारो ओर इतनी शांति की हम अपने दिल की धड़कने भी सुन सकते थे। अब पैर काफी ज्यादा धंस रहे थे। धुप ज्यादा होने के कारन आँखों में चुभ रही थी। अब तक अजय और कमल काफी आगे निकल चुके थे। अब चंद्रशिला की चोटी साफ – साफ दिखने लगी थी किन्तु वहां पहुँचने के लिए लगभग 200 मीटर की बेहद खतरनाक चढ़ाई चढ़नी थी। अब यह असंभव सी लग रही थी। अगर हम किसी तरह ऊपर पहुँच भी जाते तो नीचे उतरते समय फिसल कर गिर सकते थे। देबाशीष ने आवाज़ दी की आगे जाना जान को खतरे में डालने के बराबर है। इसलिए यहीं से वापस लौटना उचित समझा। इतना आसान नहीं था यह फैसला लेना , क्योंकि हम अपनी मंज़िल से बस 200 मीटर दूर थे।

जैसे – तैसे मन को मनाया और हम नीचे की ओर बढ़ चले। कुछ देर चलने के बाद पीछे मुड़ कर देखा तो अजय और कमल को चंद्रशिला पर तिरंगा लहराते पाया। काफी सुकून भरा लम्हा होता है जब आप 4000 मीटर की ऊंचाई पर अपने देश का तिरंगा थामे खड़े हों। हमने भी लहराया था पिछली बार। यह तो कुछ ज्यादा ही इमोशनल हो गया।

way to chandrashila
चंद्रशिला की ओर जाता मार्ग

way to gopeshwar from chandrashila
गोपेश्वर की ओर जाता रास्ता
Way to chandrashila
चंद्रशिला मार्ग (कहीं दिख रहा है ?)
Chandrashila peak
दूर दिख रही छोटी चंद्रशिला है

Chandrashila
चंद्रशिला मंदिर (सौजन्य: अजय प्रताप सिंह)ज्यादा इमोशनल न होते हुए आगे बढ़ते हैं। मंदिर के पीछे वाले मोड़ के पास कुछ युवाओं का समूह दिखा। उनमे से एक लड़की न मुझसे पूछा ‘भैया चंद्रशिला कितनी दूर है?’ ‘1.5 किलोमीटर‘ मैंने कहा। जब उसके पैरों की ओर नज़र गयी तो देखा उसने स्टाइलिश चप्पल पहन राखी थी। इतनी ऊपर और सिर्फ चप्पल में ये आयी कैसे ? फैशन जो न करवा दे।

मंदिर पहुंचा तो देखा की देबाशीष कुछ लड़कियों के साथ गुफ़्तगू में मशगूल थे। हम तीनो नीचे बढ़ने लगे। भूख लग चुकी थी, एक जगह रुक कर बिस्किट और कुरकुरे खाने लगे और कौओ को भी खिलाया। तभी पीछे से आवाज़ आयी ‘कुछ खाने को होगा ? हमारे पास कुछ नहीं है और भूख लगी पड़ी है‘, यह उसी मंदिर वाली लड़की की आवाज़ थी। उनके समूह में कुछ लड़कियां और लड़के थे। मैंने बिस्किट का पैकेट दे दिया, लेकिंन देबाशीष तो ज्यादा ही दिलेर निकले और पानी लेकर उनके साथ – साथ चले गए। वो तेज़ी से आगे निकल गए और पीछे रह गए मैं और ज्योतिर्मय। कुछ देर बाद हमे भी प्यास लगी, पर पानी तो था नहीं। इसलिए बर्फ ही खानी पड़ी। हाँ, वही पहाड़ो पर पड़ी बर्फ खानी पड़ी।

लगभग 2 बजे तक हम नीचे पहुँच चुके थे। खाना खाकर चलने की तयारी की ही थी, तब तक अजय और कमल भी आ गए। गेस्ट हाउस का हिसाब बराबर करके एक टैक्सी बुक की और चल पड़े उखीमठ की ओर। देबाशीष यहाँ एक रात और रुकना चाहते थे, पर अब कुछ बचा भी नहीं था देखने को। इसलिए हम उखीमठ की और चल पड़े।

बनियाकुंड, दुगलबिट्टा, मक्कू बैंड आदि होते हमारी गाड़ी उखीमठ स्थित भारत सेवा संघ आश्रम के सामने वाले अनुश्री लॉज के सामने रुकी। कमरा 400 रुपये में तय हुआ।

हमारी इच्छा श्री ओम्कारेश्वर मंदिर जाने की थी। इसलिए लॉज मालिक से मंदिर का रास्ता पूछा तो उसने बता दिया और साथ – साथ कह दिया की शाम को खाना खाना है तो बता दो। हमारी इच्छा बाजार में किसी ढाबे पर खाने की थी, इसलिए उसे मना कर दिया और चल पड़े मन्दिर की और। लॉज के पास से ही रास्ता दो भागो में बटा हुआ है। सामने वाला सीधा रास्ता कुंड होते हुए रुद्रप्रयाग की ओर जाता है और दायीं दिशा वाला रास्ता रांसी गांव होते हुए मध्यमहेश्वर की ओर।

मंदिर पहुँचते – पहुँचते अँधेरा हो चुका था। सामने वाले पहाड़ पर बसा गुप्तकाशी शहर तो उजाले से जगमग था। मानो लाखो जुगनू उड़ रहे हों। हैरानी की बात यह थी अब तक सभी दुकाने बंद हो चुकी थी और खाने के लिए कुछ नहीं मिला।

मन्दिर का वर्तमान स्वरुप 11वीं शताब्दी का माना जाता है। यह स्थान कई हिन्दू देवी देवताओं के लिए समर्पित है। भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर के बेटी ऊषा का विवाह इसी मंदिर में संपन्न हुआ था। शीत काल में पंच केदार में से दो केदार, श्री केदार नाथ और श्री मध्यमहेश्वर की डोली यहीं राखी जाती है और पूजा होती है। राजा मान्धाता की तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ शिवलिंग रूप में यहाँ स्थापित हुए थे। अभी फ़रवरी का महीना था तो श्री केदारनाथ और श्री मध्यमहेश्वर के दर्शन संभव थे। मंदिर परिसर में कई छोटे – छोटे मंदिर बने हैं। हम अंतिम भक्त थे। मंदिर बंद होने वाला था। पंडित जी ने सभी मंदिरों के दर्शन कराये और उनका महत्व बताया। हमे बाबा केदारनाथ जी के दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

दर्शन कर के बाहर निकले। अब तक भूख काफी लग चुकी थी, पर सभी दुकाने बंद थी। आखिर लॉज को फ़ोन करके खाना बनाने के लिए बोलना पड़ा। 8 बजे तक लॉज पहुँच गए और खाना खाकर सोने चले गए। हमें बताया गया था की सुबह 5:30 बजे लॉज के सामने से हरिद्वार की बस मिलती है और मात्र दो बसें ही आती हैं। इसलिए सुबह जल्दी उठना जरुरी था।

Bharat Seva ashram sangh ukhimath
भारत सेवा आश्रम संघ उखीमठ

चौथा दिन :

मेरी नींद सुबह 4 बजे ही खुल गयी। तैयार होकर हम सभी मध्यमहेश्वर वाले मोड़ के सामने आकर बस का इंतज़ार करने लगे। ठण्ड बहुत ज्यादा थी। थोड़ी ही देर में बस आ गयी। कुंड, तिलवाड़ा, अगत्स्यमुनि आदि होते हुए हम सुबह 8 बजे तक रुद्रप्रयाग पहुँच चुके थे। बहुत से नौकरी पेशा लोग इस बीच बस में चढ़े और उतरे। कोई नौकरी पर जा रहा था और कोई मंडी। रुद्रप्रयाग में मंडी से लायी गयी सब्जियां ट्रक से उतारी जा रही थी। रविवार का दिन होने के कारण स्कूल तो बंद ही थे पर बच्चे स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे। वापस आने का मन तो नहीं था पर नौकरी की भी मजबूरी थी और अगर नौकरी ही न रही तो अगली बार कैसे आएंगे ?

रुद्रप्रयाग से श्री नगर, कीर्ति नगर और देव प्रयाग होते हुए बस तीन धारा पहुंची। यहाँ गरमा गर्म आलू के परांठे और छोले का नाश्ता किया और वो भी सिर्फ 30 रुपये में। चुनावी माहौल था, इसलिए सभी दलो की गाड़ियां सड़को पर दौड़ रही थी। टी.वी. पर भी न्यूज़ में यही चल रहा था रहा था। दिल्ली की तरह यहाँ भी राजनितिक बहस में लोग व्यस्त थे। तभी ब्रेकिंग न्यूज़ आयी ‘आज पहाड़ो उत्तरकाशी, केदारनाथ, चोपता आदि में बर्फ पड़ने की सम्भावना है‘। एक बार तो सोचा की वापस चलते हैं। तभी बस का हॉर्न सुनाई दिया और हम बस में जाकर बैठ गए। ब्यासी, शिवपुरी आदि होते हुए हम ऋषिकेश पहुँच गए। यहाँ से अजय और कमल को देहरादून जाना था, इसलिए वे उतर गए। दिल्ली आने पर पता लगा की वे मसूरी और, धनोल्टी भी गए थे।

बस चीला डैम वाले मार्ग से होते हुए हरिद्वार की ओर चल पड़ी। जंगलो के बीच से जाता हुआ यह एक बेहद खूबसूरत रास्ता है। दो बजे तक हम हरिद्वार पहुँच चुके थे। हरिद्वार में भोजन, स्नान (मैंने नहीं किया) और कुछ खरीदारी करने के बाद हम चल पड़े बस अड्डे की ओर। लगभग रात 10 बजे तक हम दिल्ली पहुँच चुके थे। एक बात और की इस यात्रा में प्रति व्यक्ति सिर्फ 2900 रुपये खर्च आया।

तो यह थी हमारी तुंगनाथ यात्रा। उम्मीद करता हूँ की आपको पसंद आयी होगी।

Har ki paudi
हर की पौड़ी

धन्यवाद।

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Rajinder Singh
Rajinder Singh
April 19, 2018 7:15 am

अति महत्वपूर्ण जानकारी। यदि गूगल नक्शा भी डाल तो सोने पे सुहागा।

Rajinder Singh
Rajinder Singh
April 19, 2018 7:16 am

Please put google map alsi

Ravindra Singh
December 17, 2018 7:18 am

Etni acchi post ke liye apko dhaniyabad deta hu……..
I love uttrakhand

Ravindra Singh
December 17, 2018 7:19 am

Etni acchi post ke liye apko dhaniyabad karta hu…………

जितेंद्र कुमार पांडेय, वाराणसी
जितेंद्र कुमार पांडेय, वाराणसी
December 21, 2018 6:59 am

बहुत अच्छा लेख. मैंने भी ऐसी ही कुछ यात्राएं हिमाचल प्रदेश में स्पीति घाटी और किन्नौर के सैर में किया है लेकिन अकेले ही. मुझे अपनी यात्राओं की याद दिला दी.
एक सुझाव,यात्रा का दिनांक और यात्रा-नक्शा (room-map) भी डालें तो अच्छा.
धन्यवाद.

Kailash Bahuguna
Kailash Bahuguna
May 28, 2019 11:56 am

चोपटा में रुकने के लिए जगहे बताइए या कोई फोन नंबर कम बजट में चार लोगो की फॅमिली के लिए जून 15 के आसपास

लिखमाराम ज्याणी
लिखमाराम ज्याणी
June 5, 2019 10:32 am

उखीमठ की फोटो में सामने वाले पहाङ पर गुप्तकाशी ही नजर आ रहा है क्या जी।

Likhmaram Jyani
June 5, 2019 10:36 am

उखीमठ फोटो में सामने पहाङ पर गुप्तकाशी ही नजर आ रहा है जी या कोई दूसरा गाँव है।

Subhashdeolal
Subhashdeolal
June 30, 2019 2:46 pm

Wonderful.
What a fantastic description.I thought I am travelling ,thanks.