चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 1 (Chopta – Tungnath – Chandrashila Trip Part 1)

स्थान: चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला
तिथी: 10 दिसंबर 2017
कुल व्यय: 2865 रुपये

आधी – अधूरी तैयारी

कभी – कभी हमारे सामने ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिनमे हम यह फैसला नहीं कर पाते की सही क्या है और गलत क्या ? सभी से रिश्ता बना रहे, इसके चक्कर में अपने ही दूर हो जाते है। ऐसा शायद आपके साथ भी हुआ हो। इस बार की यात्रा ऐसी ही थी जिसमे बहुत कुछ सीखने को मिला।

अक्सर मेरी यात्राओं की ख़ासीयत होती है की घर वापसी से पहले ही अगले सफ़र की योजना बनने लगती है। क्या करें ? एक घुमक्कड़ होता ही ऐसा है। पहले सोचता था की क्या मेरे साथ ही ऐसा है, लेकिन अब लगता है की शायद इस केटेगरी के सभी प्राणी ऐसे हैं। अभी कुछ ही महीने तो हुए हैं दो – दो यात्रायें निपटाए और फिर तीसरे सफ़र की लहरें मन में उठने लगी थी।

फ़रवरी में चोपता – तुंगनाथ यात्रा, मई में मिर्ज़ापुर, जुलाई में उत्तरकाशी – गंगोत्री, अगस्त में परिवार के साथ हरिद्वार – ऋषिकेश यात्रा और अब फ़िर से एक यात्रा क़तार में खड़ी थी। अक्सर मैं अपनी सभी यात्राओं के बारें में देबासीस से अवश्य बात करता हूँ और प्रयास रहता है की वो जरूर चले। हम अब तक दो यात्राओं पर साथ जा चुके थे। हमारी पिछली चोपता यात्रा की चर्चा ऑफिस में खूब होती थी और आश्चर्य की बात यह थी की ऑफिस में किसी ने भी पहले चोपता का नाम तक नहीं सुना था। उन्ही में से दो मित्र कुशाग्र दीक्षित और स्वप्निल राय ने भी कह दिया था की अगली बार हम भी चलेंगे।

इस बार मेरे साथ जाने वाले थे देबासीस मोहंती, ज्योतिर्मय पांडा, स्वप्निल राय और कुशाग्र दीक्षित। यह तो फाइनल था की दिसंबर में कहीं जाना है, लेकिन कहाँ ? यह तो मुझे भी नहीं पता था। नवम्बर में ही तय हो चुका था की दिसंबर के पहले सप्ताह में यात्रा पर निकलना है। सभी ने जगह आदि फाइनल करने की जिम्मेदारी मुझ पर ही डाल दी थी। लिस्ट में कई नाम थे जैसे मुनस्यारी, सांगला, रीकॉन्ग पीओ आदि। इन सबमे रीकॉन्ग पीओ सबसे ऊपर ट्रेंड कर रहा था। यात्रा की शर्त ही थी की बर्फ़ होनी चाहिए। दिसंबर नज़दीक आते – आते अब तक रीकॉन्ग का नाम लगभग फाइनल हो चुका था। इसी बीच देबासीस ने व्हाट्सअप ग्रुप में चोपता का राग छेड़ दिया और स्वप्निल भी उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगे। औरो ने भी चोपता पर ही सहमति जता दी। शायद ऐसा इसलिए भी था की वो चोपता के बारे में मुझसे सुन – सुन कर पहले से प्रभावित थे। अब जब सभी ने चोपता पर ही मुहर लगा दी थी तो मै कौन होता हूँ मना करने वाला।

यात्रा में शायद 8 – 10 दिन बाकि रह गये थे। एक और मित्र रोहित ने भी चलने की इच्छा जताई। मैंने कुछ देर सोचने के बाद हाँ कर दी।

यही था इस पूरी यात्रा में ख़ास मोड़।

यात्रा का दिन 8 दिसंबर तय था। ठीक दो दिन पहले रोहित ने अपने मित्र अनित को भी शामिल करने की इच्छा जताई और मैने देबासीस से बात करने के हाँ भी कर दी। अब केवल एक ही दिन रह गया था। सोचा कि ग्रुप के बाकि सदस्यों को भी रोहित और उसके दोस्त के बारे में पहले से ही बता देना उचित रहेगा। ऐसा ही किया। इस पर स्वप्निल और कुशाग्र ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया और उन्होंने यह भी कह दिया की यदि रोहित और उसका दोस्त जायेगा तो हम नहीं जायेंगे।

अब मेरे सामने बड़ा धर्म संकट खड़ा हो गया था। दोनों तरफ अपने ही थे। किसी को नाराज़ नहीं करना चाहता था। मैंने सभी से कह दिया की रोहित और अनित केवल हमारे साथ चलेंगे लेकिन उनका हिसाब – किताब अलग रहेगा लेकिन स्वप्निल और कुशाग्र को अभी भी ऐतराज़ था। ऐसा होना स्वाभाविक ही था। अक्सर बहुत से लोग बड़े ग्रुप में यात्रा करना पसंद नहीं करते। मैंने रोहित को समझाने का प्रयास किया को वो अनित की साथ कहीं और चला जाये या कुछ दिन बाद जाये लेकिन उसने ऐसा करने इंकार कर दिया। उसे यह अपना अपमान लगा। गलत तो वह भी नहीं था। ऐसी स्थिति में कोई भी हो, ऐसा ही करेगा। अनित और रोहित की यात्रा का उद्देश्य ही मेरे साथ जाना था।

गलती मेरी ही थी। मैंने देबासीस के अतिरिक्त किसी को भी इस बारे में स्पष्ट रूप से बताया ही नहीं था। मुझे लगा की सभी मान जायेंगे। मैंने रोहित को बहुत समझाने का प्रयास किया लेकिन वो बहुत गुस्से में था। रात एक बजे से व्हाट्सअप पर शुरू हुआ मेसेजेस का दौर सुबह चार बजे तक चला। अब मैने यात्रा को रद्द करने का फैसला कर लिया था और वो कैसे रद्द की जाएगी उसकी रूप – रेखा भी बना ली थी। इस बीच देबासीस को भी कई मेसेजेस और कॉल किये लेकिन वो भी अपने दोस्त के पास हस्पताल में थे और शायद इस लिए उन्हें पता ही नहीं चला। कभी – कभी हम कितने विवश हो जाते हैं यह आज पता चला। सुबह होने वाली थी और अगले दिन ऑफिस भी जाना था, लेकिन नींद दूर – दूर तक नहीं थी। जैसे – तैसे सुबह पांच बजे नींद आयी।

सुबह के नौ बजे होंगे ! तकिये के नीचे रखे मोबाइल में वाईब्रेशन हुआ, किसी का मैसेज था। घर वालों को भी बोल दिया था की मै कहीं नहीं जा रहा हूँ। व्हाट्सअप चेक किया तो देबासीस कई मेसेजेस थे। उन्होंने कहा ‘सभी चलेंगे, कुछ नहीं होगा, सफ़र में सब मान जायेंगे।’ इस बीच उन्होंने स्वप्निल और कुशाग्र को भी समझाने का प्रयास किया। ज्योतिर्मय ने भी कई प्रयास किये। अंततः मैने भी सोच लिया की सब जायेंगे, जो होगा देखा जायेगा। यात्रा आरम्भ होने से पहले ही रद्द न हो जाये इस लिए मैंने कुशाग्र और स्वप्निल से झूठ बोल दिया की रोहित और अनित नहीं जायेंगे। इस बारे में मैने रोहित को भी बता दिया की मैंने उन दोनों से झूठ बोला है की आप दोनों नहीं जायेंगे। वैसे भी रोहित और अनित तो हमारे साथ होते हुए भी हमारे साथ नहीं थे।

बहुत हो गयी बातें, अब आते हैं यात्रा पर। हम सभी अपने – अपने बैग लेकर ऑफिस पहुँच चुके थे। वहीं से यात्रा पर निकलने की तैयारी थी। ऑफिस में चोपता की ही चर्चाओं का बाज़ार गर्म था।

अगले भाग के लिये यहाँ क्लिक करें।

इस यात्रा के अन्य भागों को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें।

चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 1 (तैयारी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 2 (दिल्ली से ऋषिकेश)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 3 (ऋषिकेश से चमोली)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 4 (चमोली से चोपता)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 5 (चोपता से श्री तुंगनाथ मंदिर)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 6 (तुंगनाथ से चंद्रशिला और फिर गुप्तकाशी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 7 (गुप्तकाशी से दिल्ली)

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