Chopta

चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 4 (Chopta – Tungnath – Chandrashila Trip Part 4)

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चमोली से चोपता (Chamoli to Chopta)

यात्री कृपया ध्यान दें

हाँ, तो हम चमोली में थे। जैसा सोचा था वैसा ही हुआ, बस वाले ने कहा की यह बस यहीं तक है। वहां से उसने गोपेश्वर वाली बस में बैठने को कह दिया। वैसे एक महत्वपूर्ण जानकारी आप नोट कर लें। लगभग सभी बस वाले चमोली से यात्रियों को दूसरी बस में बैठने के लिए कहते हैं। इसके साथ – साथ जो किराया आपने ऋषिकेश में गोपेश्वर तक के लिए दिया था उसमे से कुछ किराया यह कह कर लौटा देते हैं की यह बाकि पैसे दूसरी बस वाले को टिकट के लिए दे देना। लेकिन समस्या यह है की चमोली से गोपेश्वर का किराया उनके लौटाये गए पैसों से अधिक होता है। हमारे साथ ऐसा पहले भी हो चुका है, इसलिए इस बार मै थोड़ा सतर्क था। बस वाले ने 40 रुपये प्रति सवारी ही लौटाये, जबकि किराया था 60 रुपये। इसलिए मैंने कंडक्टर से कह दिया की यह बाकि पैसे हमें ना देकर स्वयं ही दूसरी बस की टिकट का भुगतान कर दे। आप भी ऐसा ही करें। उन्हें कह दें की ‘ भैया आप ही हमें टिकट खरीद कर दे दो।’

यहाँ से गोपेश्वर तक पहुँचने में लगभग 1 घंटा लगता है। यह मार्ग बहुत खूबसूरत और ऊंचाई पर है। अब आप जैसे – जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, ऊंचाई और वातावरण में ठंडक बढ़ती जाती है। शाम के चार बजे होंगे शायद। हम गोपेश्वर पहुँच चुके थे। यहाँ एक बड़ा बाजार है। जो बस वाला हमे लेकर आया था उसी ने टैक्सी वाले से बात करवाई। टैक्सी वाला 1700 रुपये मांग रहा था। वैसे इतना किराया होता नही है, लेकिन लेकिन अब माध्यम बस वाला ही था तो कुछ कमीशन तो उसका भी होगा ही। कुछ मोल-भाव करने के बाद वो 1400 रुपये में माना।

अब यहाँ से हम आखिरी सफ़र पर चल पड़े। शुरुआत में कुछ कस्बे और गाँव थे। कुछ दूर जाने पर मंडल गाँव आता है जहाँ से रुद्रनाथ के लिए पैदल मार्ग जाता है। पास में ही एक विद्यालय था जहाँ से बच्चे अपने घरों की और लौट रहे थे। कुछ दूर जाने पर गरमागर्म जलेबियाँ बन रही थी, शायद उन्ही बच्चों के लिये। कुछ लोग क्रिकेट  खेलते हुए दिखे। मैच भी ऐसा – वैसा नहीं, बाकायदा टेंट लगा कर कमेंट्री भी हो रही थी।
भारतीय रेल के बाद क्रिकेट ही ऐसी दूसरी चीज़ है जो हिन्दुस्तान को एक सूत्र में बांधती है। सुदूर पहाड़ में क्रिकेट खेलते लोग इस बात की पुष्टि करते हैं।

 

रॉन्ग टर्न वाला रोड

यह गांव ख़त्म होते ही घना जंगल शुरू हो जाता है। यह एक बेहद घना जंगल था। अब मार्ग की चौड़ाई भी काफ़ी कम हो चुकी थी। स्वप्निल ने कहा ये तो ‘रॉन्ग टर्न’ मूवी का सीन लग रहा है।’ वाकई यह कुछ – कुछ वैसा ही क्षेत्र था। इस जंगल में बहुत से जानवरों जैसे भालू, तेंदुआ, गुलदार और हिरण आदि का बसेरा है। यदि आप मोटरसाईकिल पर हैं और अकेले हैं तो इस मार्ग से ना जाएँ। यहाँ अक्सर जानवरों के हमले का खतरा बना रहता है। कुछ दूर जाने के बाद घने जंगलों का साया हटा तो सामने था एक बेहद खूबसूरत दृश्य। अब विशाल हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां दिखने लगी थी। गाड़ी लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर थी। ठण्ड भी काफ़ी थी। सूर्यास्त से पहले की लाल धूप गाड़ी के शीशों से छनकर सीधे चेहरे पर आ रही थी। किसी कवि की कल्पना जैसा ही दृश्य था यह।

अब तो चोपता तक पहुंचने का भी सब्र नहीं बचा था। चोपता से लगभग एक किलोमीटर पहले कुछ मजदूर दिखे जो की रोड की मरम्मत कर रहे थे। पास में ही कुछ पुलिस कर्मी और खादी धारी लोग मिले। वो किसी विशेष व्यक्ति को घेर कर खड़े थे। समझ नहीं आ रहा था की कौन है ये। जब पास से देखा तो समझ आया, अरे ये तो सतपाल जी महाराज हैं जो की संत होने के साथ – साथ सांसद भी हैं। शायद गोपेश्वर – चोपता मार्ग के मरम्मत कार्य का जायज़ा ले रहे थे।

बस एक किलोमीटर और….. और ये पहुँच गए चोपता। कुछ ख़ास नहीं बदला था यहाँ। बदलाव नज़र भी कैसे आता ? एक ही साल में तीसरी बार यहाँ आया था।

कुछ कह रहा है चोपता

चोपता के बारे में कुछ जानकारियां साझा करना आवश्यक है। बहुत से लोग सोचते हैं की चोपता कोई छोटा – मोटा शहर या बड़ा गाँव है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। चोपता की पहचान ही बाबा तुंगनाथ से है। तुंगनाथ का मंदिर है तभी चोपता है। यहाँ आबादी के नाम पर गिने – चुने छोटे – छोटे होटल और 2 ढाबे हैं। होटल मालिक और उनके कर्मचारी ही यहाँ की आबादी हैं। यहाँ का नज़दीकी गाँव भी बहुत दूर है। अगर समुद्रतल से ऊंचाई की बात करें तो यह स्थान 2680 मीटर (8793 फुट) की ऊंचाई पर बसा है और केदारनाथ कस्तूरी मृग अभ्यारण्य के क्षेत्र में स्थित है।

कुछ एस.यू.वी. गाड़ियां और कारें खड़ी थी। मेरा इरादा उसी होटल में रुकने का था जिसमे पहली बार रुके थे, वहीं दूसरी ओर स्वप्निल का इरादा मोक्ष कैफे में रुकने का था। उसे लगा की मोक्ष का किराया चोपता में सबसे ज़्यादा है तो वो सबसे अच्छा भी होगा, लेकिन उसे कौन समझाए की केवल महंगा होना ही अच्छे होने की गारंटी नहीं होता। इस बात की तस्दीक़ मयंक पांडेय ने कर दी जो की अभी कुछ ही दिन पहले चोपता से लौटे हैं। वो उसी होटल में रुके थे। उन्होंने बताया वहां तो टॉयलेट तक की व्यवस्था ठीक से नही है।

स्वप्निल का मन रखने के लिए हमने मोक्ष में कमरों के बारे में पता किया तो पता लगा की वहां हाउसफुल है। रंग-बिरंगी दीवारें, चे-ग्वेरा और फिदेल कास्त्रो की बड़ी सी फोटो, पुराना सा गिटार और द्वार पर खड़ी कुछ बुलट मोटरसाइकिल ही मोक्ष की पहचान है।

वैसे जिस होटल में रुकने का मेरा इरादा था, वह भी खाली नहीं था। अब तुंगनाथ यात्रा मार्ग के द्वार से ऊपर जाते ही कुछ होटल आदि बन गये हैं। वहीं हमारा ठिकाना भी मिल गया। दो कमरे, मात्र 1000 रुपये। एक कमरे में रोहित और अनित और दूसरे में हम पांचों। वैसे कमरा भी पांच लोगो के हिसाब से बनाया गया था।

Chopta
पहुँच गये चोपता
चोपता की शाम

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इस यात्रा के अन्य भागों को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें।

चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 1 (तैयारी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 2 (दिल्ली से ऋषिकेश)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 3 (ऋषिकेश से चमोली)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 4 (चमोली से चोपता)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 5 (चोपता से श्री तुंगनाथ मंदिर)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 6 (तुंगनाथ से चंद्रशिला और फिर गुप्तकाशी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 7 (गुप्तकाशी से दिल्ली)

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Anit Kumar
Anit Kumar
May 26, 2018 5:16 am

jitni baar padho, acha hi lagta hian.