चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 3 (Chopta – Tungnath – Chandrashila Trip Part 3)

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ऋषिकेश से चमोली (Rishikesh to Chamoli)

ऋषिकेश से ही पहाड़ों के दरवाज़े खुलते हैं। इस नगरी को भगवान विष्णु ने ऋषियों के तप-धयान आदि के लिए बसाया था। एक समय था जब ऋषिकेश में साधु – संतो का वास था, मंदिर थे। तीर्थ यात्री आदि तीर्थ के उद्देश्य से ही जाते थे और योगी योग के लिए। आज भी विदेशियों के लिए यह शहर योग की राजधानी है I

फिर समय बदला और जाने वालों की संख्या बढ़ गयी। जैसे – जैसे सुविधायें बढ़ी, वैसे – वैसे समस्यायें भी बढ़ी। लोग पिकनिक मनाने जाने लगे। सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए रिवर राफ्टिंग, बंजी जम्पिंग आदि एडवेंचरस गेम्स आरम्भ किये तो सैलानियों का अंबार लग गया। फिर जो हुआ वो आप के सामने है। चोरी – छुपे खुलते जुआ घर, ड्रग्स का कारोबार, शराब पीकर उलटी करते लोग, गंगा किनारे फैला कचरा आदि ही अब ऋषिकेश की पहचान बनते जा रहे हैं। जो ऋषिकेश कभी अध्यात्म की नगरी होता था, आज वही नशे के अड्डे के रूप में तब्दील होता जा रहा है। एडवेंचर्स खेलों की आड़ में कैम्प्स में क्या होता है वो किसी से छुपा नहीं है।

 

चलो पर्वतों की ओर

वापस आते हैं यात्रा पर। ऋषिकेश से निकलते – निकलते उजाला हो चुका था। वातावरण में ठंडक थी लेकिन ज़्यादा नहीं। ऋषिकेश शहर से निकल कर हम चल पड़े अपने पहाड़ी सफ़र पर। मै, देबासीस और ज्योतिर्मय तो यहाँ पहले भी आ चुके थे, लेकिन बाकी लोगों की यह पहली यात्रा थी। सुबह की अलसायी धुंध के पीछे छुपे पहाड़ किसी परी लोक से कम नही लग रहे थे। माँ गंगा की धारा इस सफर में साथ ही थी। वैसे एक बात तो है की उत्तराखंड के इस क्षेत्र में रोड बहुत अच्छे बने हैं। बस में बैठते समय मैंने बैग से दो किताबें (हमसफ़र एवरेस्ट और इनरलाइन पास) निकाल ली थी, यह सोच कर की सफ़र के दौरान पढूंगा, लेकिन पूरे रास्ते किताबें खोल कर भी नहीं देखी। जब आँखों के सामने इतनी ख़ूबसूरती पसरी हो तो किताबों को कौन देखेगा ?

लगभग 9:30 बजे हम देवप्रयाग पहुँच चुके थे। वैसे भूख कुछ ज़्यादा नहीं थी। इसलिये लगभग सभी ने कुछ नहीं खाया या आप इसे ऐसा भी समझ सकते हैं की सफ़र लम्बा होने के कारण किसी ने कुछ नहीं खाया।

Devprayag
देवप्रयाग में ठहराव
देवप्रयाग ही वह स्थान है जहाँ भागीरथी को गंगा के नाम से जाना गया। यहाँ गोमुख से आने वाली भागीरथी और बद्रीनाथ के आगे सतोपंथ से आने वाली अलखनंदा नदियों का संगम है। इन्ही दोनों नदियों के संगम से बनने वाली नदी को आगे गंगा के नाम से जाना जाता है। समुद्रतल से 830 मीटर की ऊँचायी पर बसा यह स्थान टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में है। देखने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं है यहाँ। संगम पर बैठे – बैठे कब शाम हो जायेगी, शायद आपको पता भी न चले। संगम स्थल से थोड़ी ऊपर जाने पर रघुनाथ मंदिर है। एक बात और, हिंदी फिल्म किसना का गाना ‘हम हैं इस पल यहाँ’ यहीं फ़िल्माया गया था।
Devprayag
देवप्रयाग
Bridge on Bhagirathi river in Devprayag
देवप्रयाग में भागीरथी पर बना पुल

देवप्रयाग से सीधा जाने वाला रास्ता गाज़ा और खाड़ी की ओर चला जाता है और दाहिनी ओर पुल पार करके जाने वाला रास्ता हमारी मंज़िल की ओर। इधर – उधर देखते हुए कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। इस बीच कीर्ति नगर से होते हुए बस श्री नगर पहुँच गयी।

श्री नगर ?
नहीं – नहीं, यह कश्मीर वाला श्री नगर नहीं है। उत्तराखंड में भी है एक श्री नगर और यह गढ़वाल का सबसे बड़ा शहर है। ब्रिटिश सरकार ने इसे गढ़वाल की राजधानी भी बनाया था। एक आम शहर की तरह यहाँ सभी सुविधाएँ मौजूद हैं जैसे की हेमवती नंदन बहुगुणा विश्ववविद्यालय, पॉलिटेक्निक, बड़े हस्पताल आदि। यहाँ अलखनंदा एक बड़ी घाटी बना कर बहती है। पहाड़ी शहरों में अब तक मुझे दो ही शहर सबसे अधिक पसंद आयें हैं, पहला है उत्तरकाशी और दूसरा श्री नगर।

शहर के बाहर धारी देवी का मंदिर स्थित है जो की नदी के बीच में बना है। कहा जाता है की मंदिर की स्थापना श्री आदि शंकराचार्य ने की थी। अलखनंदा नदी पर बन रही जल विद्द्युत परियोजना के कारण सरकार ने मंदिर को स्थानांतरित करने का आदेश दिया था, जिसका स्थानीय निवासियों ने कड़ा विरोध किया। इस कारण पिलरों के सहारे मंदिर को थोड़ा ऊपर उठा दिया गया। स्थानीय निवासियों की मान्यता है की 2013 की आपदा माता की मूर्ति को अपने स्थान से हटाने के कारण ही आयी थी, लेकिन ऐसा क्यों होगा ? माता ऐसा क्यों करेंगी ?

Statue of Hemwati Nandan Bahuguna in Srinagar
श्री नगर में श्री हेमवती नंदन बहुगुणा जी की प्रतिमा
Sri Nagar, Uttrakhand
श्री नगर
Devimand
देवीमांडा

आप जैसे – जैसे इस सफर में बढ़ते जाते हैं घाटी की ख़ूबसूरती बढ़ती जाती है। अलखनंदा नदी का गहरा नीला रंग इस स्वर्ग के समान बनाता है। श्री नगर से लगभग 35 किलोमीटर की यात्रा करके 12 बजे तक हम रूद्रप्रयाग पहुंच चुके थे। रुद्रप्रयाग में केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी और अलखनंदा का संगम है। बस स्टैंड के पास ही एक छोटा सा आर्मी का डीपो है जिसमे सेना की कुछ पुरानी गाड़ियाँ खड़ी है।

यहाँ से मार्ग दो भागों में बट जाता है। सीधा मार्ग अलखनंदा के साथ – साथ बद्रीनाथ से होते हुए माणा पास तक जाता है और दूसरा मार्ग मंदाकिनी घाटी से होते हुए गौरी कुंड तक जाता है। चोपता जाने के लिए दोनों मार्गों का उपयोग किया जा सकता है। अगर आप बद्रीनाथ वाले मार्ग से जाते हैं तो गोपेश्वर से आपको चोपता के लिए टैक्सी लेनी होगी। यदि आप मंदाकिनी घाटी से जाना चाहते हैं तो कुंड नामक स्थान पर बस से उतर कर उखीमठ के लिए शेयर्ड टैक्सी ले लें। उखीमठ से चोपता के लिए टैक्सियां मिल जाती हैं। मंदाकिनी घाटी वाला मार्ग अपेक्षाकृत छोटा है। इस मार्ग से एक घंटा समय कम लगता है। हमें बद्रीनाथ वाले मार्ग से जाना था और वापसी मंदाकिनी घाटी से करनी थी।

कुछ ही देर में हम रुद्रप्रयाग से निकल पड़े। अलखनंदा की घाटी मंदाकिनी की अपेक्षा चौड़ी है। नदी के किनारे पसरी हुई रेत किसी समुद्री बीच जैसा एहसास देती है। सभी के मोबाइल कैमरे अब तक बस की खिड़कियों पर चिपक चुके थे। गोचर, कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग से होते हुए हम 2 बजे तक चमोली पहुँच चुके थे। गोचर में सेना का कैम्प है, कर्णप्रयाग में अलखनंदा और पिंडर का संगम और नन्दप्रयाग में अलखनंदा और नन्दाकिनी का संगम है। उत्तराखंड में सबसे अधिक प्रयाग अथार्त संगम अलखनंदा नदी पर ही हैं।

Alaknanda towards Karnprayag
अलखनंदा – कर्णप्रयाग की ओर

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इस यात्रा के अन्य भागों को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें।

चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 1 (तैयारी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 2 (दिल्ली से ऋषिकेश)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 3 (ऋषिकेश से चमोली)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 4 (चमोली से चोपता)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 5 (चोपता से श्री तुंगनाथ मंदिर)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 6 (तुंगनाथ से चंद्रशिला और फिर गुप्तकाशी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 7 (गुप्तकाशी से दिल्ली)

 

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