गंगोत्री यात्रा – दिल्ली से उत्तरकाशी (Trip to Gangotri – Delhi to Uttarkashi)

इस यात्रा का पहला भाग और गंगोत्री धाम से जुडी महत्वपूर्ण जानकारियाँ जैसे की कैसे पहुंचे, कहाँ रुके आदि पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

तमाम अफ़वाहों को दरकिनार करते हुए जुलाई 2017 में उत्तरकाशी और गंगोत्री की यात्रा की थी। उस सफ़र का अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य देख कर ही सोच लिया था की एक बार तो घर वालों को भी यहाँ तक लेकर आना ही है ! फ़िर समय बीतता गया और इसी के साथ – साथ ख़ुद के साथ किया गया वादा भी कहीं खो सा गया। इस बीच कयी यात्रायें हुई जैसे की दिसंबर 2017 में चोपता यात्रा, मार्च 2018 में गोवर्धन परिक्रमा और अप्रैल 2018 में सांकरी यात्रा जो की केदारकांठा बेस कैंप तक ही हो पायी।

सांकरी से अप्रैल अंत में जैसे ही चार धाम यात्रा शुरू होने के समाचार सुनायी दिये एक बार फ़िर से ख़ुद से किया वादा याद आया लेकिन अब तक विचार बदल चुके थे और अब मैं अपने परिवार जिसमें माता – पिता, पत्नी और मेरा ढाई साल का बेटा शामिल है, को बद्रीनाथ लेकर जाना चाहता था। सितंबर में बद्रीनाथ जाने की योजना बन गयी। यह बात मैंने मयंक पाण्डेय को बतायी तो उन्होंने कहा की जाने से पहले एक बार बता देना, शायद वो भी जा सकते हैं।

अब तक जून का महीना आ चुका था और बद्रीनाथ को भी लेकर मन में संशय की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। कयी कारण थे इसके, जैसे की परिवार सहित यह पहला इतना लंबा पहाड़ी सफ़र होने वाला था, वैष्णों देवी तीर्थ तो वे बहुत बार जा चुके हैं लेकिन बद्रीनाथ की बात अलग थी। बद्रीनाथ और वैष्णों देवी तीर्थ की प्राकृतिक स्थिति बहुत भिन्न है। दूसरा कारण मेरा बद्रीनाथ जाने का पूर्वानुभव न होना था। मैं स्वयं बद्रीनाथ कभी नहीं गया था। ऐसी स्थिती में मानसून के मौसम में पूरे परिवार को लेकर वहां जाना मुझे ठीक नहीं लग रहा था।

अंततः घड़ी के कांटे गंगोत्री पर ही आकर टिके, या ऐसा कह लीजिये की गंगा मैया ने एक वर्ष पूर्व किया वादा याद दिला दिया। 30 जुलाई को मेरे बेटे का तीसरा जन्मदिन होने वाला था। इसलिये इस बार जन्मदिन गंगोत्री में ही मनाने का सोचा और उत्तरांचल एक्सप्रेस की 28 जुलाई की टिकट बुक करवा दी।

नोट: गंगोत्री धाम के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियों से सम्बंधित पोस्ट मैं लिख चुका हैं और उसे आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। गंगोत्री कैसे पहुंचना है, कहाँ रुकना है, मानसून में क्या सावधानियाँ बरतें, अनुमानित व्यय आदि सभी जानकारियाँ आप उस पोस्ट में पढ़ सकते हैं।

जैसे – जैसे दिन नज़दीक आ रहे थे, क्रांतिकारी मीडिया चैनलों पर बाढ़, तूफ़ान और बादल फटने की भयावह ख़बरें बढ़ती जा रही थी। ऐसी स्थिती में गंगोत्री जैसे स्थान पर जाने से डरना स्वाभाविक था। पिता जी ने कयी बार वहां न चलने के बारे में समझाया और कहीं और चलने की सलाह देने लगे, लेकिन मुझे पता था की जितना मीडिया दिखता है वास्तविकता उसकी आधी होती है। इसलिये मैं स्वयं तो आश्वस्त था ही और किसी तरह उन्हें भी आश्वस्त किया।

28 जुलाई का दिन आ गया। उत्तरांचल एक्सप्रेस गुजरात के ओखा से देहरादून के बीच चलती है और दिल्ली सुबह 10 बजकर 40 मिनट पर दिल्ली पहुँचती है, दिल्ली से इसके चलने का समय सुबह 11 बजे का है। इसलिये पूरी ‘भारतीय जनता पार्टी’ सहित सुबह सवा दस बजे तक नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन मैं पहुँच चुका था। तभी एक एक सुरीली सी आवाज़ कानों में पड़ी ‘ओखा से चलकर नयी दिल्ली के रास्ते देहरादून को जाने वाली गाड़ी संख्या एक नौ पांच छः पांच उत्तरांचल एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 2 घंटे की देरी से चल रही है, आपको हुई असुविधा के लिये हमें खेद है।’

New Delhi Railway station
नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन

रेलवे के नये – नवेले यात्रियों को ऐसी स्थित में गुस्सा आना स्वाभाविक था। कुछ तो ट्विटर पर ट्वीटिया भी देते, लेकिन हम ठहरे मुग़लसराय (यूपी) वाले, अरे वही नया वाला दीन दयाल उपध्याय जंक्शन। हमें तो आदत है ऐसे सफ़र करने की, इसलिये कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ा। वैसे भी फ्रेट कॉरिडोर बनाने के लिये आज – कल जगह – जगह रेलवे लाइनों का विस्तार किया जा रहा है, तो ऐसा तो होना ही था।

लगे समय बिताने प्लेटफार्म पर ही। सफ़र के लिये लाया गया खाना प्लेटफार्म नंबर 9 पर ही समाप्त कर दिया। रेलवे का मुसाफ़िर मैं बचपन से ही रहा हूँ और इस नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर तो हमेशा से ही आना – जाना लगा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बदला – बदला सा नज़र आने लगा है रेलवे का रंग – रूप। नयी दिल्ली स्टेशन पर सुविधायें और स्वच्छता अब स्पष्ट रूप से दिखायी दे रही हैं। बस इसकी लेट – लतीफ़ी में थोड़ा सा सुधार हो जाये तो समझो गंगा नहा लिये।

आखिर 10 बजकर 40 मिनट पर आने वाली रेल 1 बजकर 30 मिनट पर आ ही गयी और कुछ इस तरह हमारी यात्रा का आरंभ हो गया .

वैसे एक बात गनीमत की थी, रेल को जितना लेट होना था हो चुकी थी और अब तेज़ गति से चलते हुए अपने सभी स्टेशन पार करती जा रही थी। इंद्र देवता ने भी अब अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया था और बारिश होने लगी थी। तेज़ ही होती जा रही थी ये बारिश। एक बार तो डर भी लगा, लेकिन ओखली में सर दे ही दिया तो मूसल से क्या डरना। जो होगा, देखा जायेगा।

सावन का पहला दिन होने के कारण रेल में कांवड़ियों की संख्या अच्छी – ख़ासी थी लेकिन अक्सर जैसा हम उनके बारे में सुनते आये हैं की वे उपद्रवी होते हैं, मार – पीट करते हैं, स्थिती इसके विपरीत थी। भारी संख्या में कावड़िया होने के उपरांत भी किसी तरह का उपद्रव नहीं। किसी ने किसी को परेशान नहीं किया। सभी उम्र के कावड़िये मौज़ूद थे और इन्हीं कांवड़ियों में मौज़ूद था सबसे छोटा भोला भक्त जिसकी उम्र 5 वर्ष से अधिक नहीं थी। वह भी कांवड़ लेने जा रहा था। उसके पिता ने बताया की ये अभी ट्रेनिंग पर जा रहा है। गज़ब का हौसला होता है इन लोगों में।

शाम 7 बजे तक रेल हरिद्वार पहुँच चुकी थी, वो बात अलग है की यह उसके देहरादून पहुँचने का समय था। लगभग 90 प्रतिशत जनता हरिद्वार में ही उतर गयी और अब रेल लगभग पूर्ण रूप से खाली ही थी। यहाँ 20 मिनट रुकने के बाद राजा जी राष्ट्रिय अभ्यारण्य से होते रेल चल पड़ी देहरादून की ओर। कुछ ही देर में मुझे नींद आ गयी। रात 10 बजकर 30 मिनट पर रेल एक स्टेशन पर रुकी। अँधेरे में बाहर कुछ दिख ही नहीं रहा था। पहले तो यह कोई साधारण सा स्टेशन ही लगा लेकिन फ़िर सवारियों की बढ़ती हलचल देख कर पूछा तो पता लगा की हम देहरादून पहुँच चुके हैं।

वैसे इतनी रात में यदि आप किसी अनजान शहर में स्टेशन पर उतरें तो आपकी सबसे पहली चिंता होती है की रात कहाँ बितायी जाये। लेकिन यहाँ ऐसी कोई बात नहीं थी। रेलवे का रिटायरिंग रूम पहले से ही बुक कर रखा था। देहरादून रेलवे स्टेशन पर तीन तरह के रिटायरिंग रूम हैं – पहला है डोरमेट्री जिसमें लगभग 40 बेड हैं, दूसरा है नॉन ऐ.सी. फैमिली रूम जिसमें चार बेड हैं और तीसरा है ऐ.सी. फैमिली रूम। मेरा नॉन ऐ.सी. फैमिली रूम था। वैसी मात्र 760 रुपये में ऐसा कमरा मिलेगा, उम्मीद नहीं थी। ब्रिटिश शैली में बना यह बेहद पुराना कमरा है, लेकिन बहुत सलीके से संजोया गया है इसे। वाई – फाई से लैस ऐसा कमरा यदि किसी होटल में होता तो इसका किराया कम से कम 2000 रुपये तो होता ही।

मेरी योजना देहरादून से पहले दिन उत्तरकाशी और उसके अगले दिन गंगोत्री पहुँचने की थी लेकिन यहाँ पहुँच कर एक समस्या सामने आयी। यहाँ पता लगा की देहरादून से उत्तरकाशी के लिये सरकारी बस केवल एक ही है और प्राइवेट बस भी एक ही है। सरकारी बस रेलवे स्टेशन के बगल वाले पर्वतीय बस अड्डे से सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर चलती है और प्राइवेट बस सुबह 7 बजकर 30 मिनट पर परेड ग्राउंड से चलती है। अकेला होता तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन परिवार साथ हो तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है। एक ही बस होने के कारण सुबह धक्का – मुक्की होने की भी संभावना थी और ऐसी स्थिति में पिता जी तो पूरी यात्रा ही रद्द कर देते। इसलिये मध्य रात्रि में अपने विशेष मित्र अनित कुमार जिनको ट्रांसपोर्ट मित्र भी कहा जा सकता है, एक उम्मीद के रूप में नज़र आये। इनकी विशेषता यह है की आप केवल इनके सामने किसी स्थान का नाम ले लीजिये, मात्र 15 मिनट में ये उस स्थान की पूरी कुण्डली आपके सामने खोल कर रख देते हैं।

इनसे बात हुई और इन्होने उत्तराखण्ड परिवहन निगम की बसों की ऑनलाइन बुकिंग का लिंक दे दिया। वैसे मुझे लगा नहीं था की उत्तराखंड परिवहन उत्तरकाशी जैसे सुदूर स्थानों के लिये भी ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा देता है। लिंक के जरिये टिकट बुक कर लिया और सुबह की भाग – दौड़ से मुक्ति मिली। अब तक रात के एक बज चुके थे। नींद तो आ रही थी लेकिन अभी सोने का मतलब था की सुबह नींद नहीं खुल पायेगी और बस छूट जायेगी। इसलिये रात भर जगा ही रह गया।

सुबह 5 बजते ही हम लोग बस अड्डे पहुँच गये और अपनी सीट घेर ली। आशा के विपरीत यहाँ किसी प्रकार की भीड़ नहीं थी और बस भी बिना पूरी तरह से भरे ही चल पड़ी। बाहर हो रही हलकी बारिश ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था। देहरादून शहर एक बहुत ही सुंदर शहर है। पहाड़ियों से घिरा होने का पूरा लाभ मिला है इसकी सुंदरता को। पहाड़ियों से घिरा शहर, बंगले, छोटे – बड़े मकान, रोज़गार, सभी सरकारी सुविधायें …. और क्या चाहिये किसी को। रहने के लिये एक परफेक्ट शहर है यह।

हाँ तो हम देहरादून शहर की गोल – गोल सड़कों पर गोल – गोल चक्कर लगाते हुए पहाड़ों की ओर बढ़ चले थे। थोड़ी ही देर में बस पहाड़ों पर थी और शहर हमारे नीचे। अभी तो बस मसूरी की ओर जा रही थी। जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूँ की मसूरी रिज पर बसा हुआ है, मतलब पहाड़ों में काफ़ी ऊँचायी पर बसा हुआ है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 2006 मीटर है तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं की कितनी ऊंचाई पर होगा यह। बस तेज़ी से ऊपर की ओर बढ़ती जा रही थी और शहर अब पीछे छूट चुका था। उमड़ते – घुमड़ते बादलों से ढकी दून घाटी किसी परी लोक से कम नहीं लग रही थी। यहाँ का मौसम दिल्ली के बिलकुल विपरीत था। अथार्त दिल्ली में जितनी गर्मी, यहाँ उतनी ही सर्दी।

डेढ़ घंटे में हम मसूरी शहर के बाहरी हिस्से में पहुँच चुके थे और अब बस नीचे की ओर चल पड़ी थी। इस बस को सुवाखोली होते हुए जाना था। अब तक बस लगभग आधी खाली हो चुकी थी। आगे वाली सीट पर दिल्ली यूनिवर्सिटी के चार छात्र बैठे थे। उनकी मज़िल हमारी मंज़िल से कहीं आगे केदारताल तक थी। अभी थोड़ा आगे ही बढ़े थे की एक भयावह नज़ारा दिखाई दिया। भूस्खलन के कारण आधा रोड धंस गया था और नीचे गहरी खायीं थी। जैसे – तैसे बस ड्राइवर ने बस को यहाँ से आगे बढ़ाया था। आगे बढ़ते ही रोड शानदार हो गया था। जैसे – जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, पहाड़ों पर बादल बढ़ते जा रहे थे और यही बादल किसी स्वर्ग की अनुभूति करा रहे थे। ऐसे ही नहीं उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है।

सर्पीले रास्तों का सफ़र तय करते हुए हम पहुँच गये अपने पहले पड़ाव पर जो था सुवाखोली। यहाँ एक रेस्टोरेंट पर नाश्ता करने के बाद बस आगे बढ़ चली। पर्वतों की ख़ूबसूरती आँखों के सामने छायी हुई थी की तभी एक जानी – पहचानी समस्या से सामना हुआ। अरे वही, पहाड़ों में उल्टी की समस्या। पहाड़ों में माँ का यह पहला इतना लम्बा सफ़र था, इसलिये यह तो होना ही था।

Restaurant in Suvakholi
रेस्टोरेंट सुवाखोली
ऐसे नज़ारे मिलना आम बात है यहाँ

कुछ ही देर में भागीरथी अथार्त गंगा दिखायी देने लगी। बरसात का मौसम होने के कारण पानी गंदा हो गया था। टिहरी झील का क्षेत्र भी इसी स्थान से आरंभ होता है, इसलिये भी पानी में ठहराव होने के कारण पानी कुछ गंदा हो गया था। कुछ ही देर में हम इस क्षेत्र के एक बड़े शहर चिन्यालीसौड़ पहुँच चुके थे। चिन्यालीसौड़ यहाँ का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र है। इसके बाद अगला पड़ाव था धरासू बैंड। यहीं से एक मार्ग यमुनोत्री की ओर जाता है। धरासू बैंड, डुंडा, नकुरी और मतली होते हुए हम दोपहर 12 बजे तक उत्तरकाशी पहुँच चुके थे।

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Hiten Bhatt
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Hiten Bhatt

aapka likha vrutant achchha lagta hai. last year maine bhi Harsil aur Gangotri ki yatra ki hai iss liye achchha lag raha hai. apne jo online booking ki lnik di hai vaha chek kiya to ordinari ya koi bhi bus ke samne destination place me utarkashi ka nam nahi ata hai. age ke vivran ka intjar rahega…Hiten Bhatt – Ahmedabad

kavita
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kavita

बहुत अच्छा लिखा है आप ने पढ़ कर अच्छा लगा वैसे तो लोग कहते है इस महीने नहीं जाना चाहिए पर आप ने जैसे बताया है उस से तो लगता है यही महीना सबसे अच्छा है बहुत अछि तरह से वख्या की है आप ने गंगोत्री की और बहुत अच्छा लगा पढ़ के. आप की फोटो ग्राफी भी बहुत अमेजिंग है बहुत सूंदर फोटो है मन खुश हो गया देख कर.