कौन थी गौरा देवी ?

भारत के प्राकृतिक रक्षा के इतिहास में 26 मार्च का विशेष महत्व है।  इसी दिन पेड़ों को बचाने के लिए महिलायें उनसे चिपककर खड़ी हो गई थीं और ठेकेदारों को ललकारा था कि पेड़ों से पहले हमें काटना होगा। इस आंदोलन को चिपको आंदोलन के नाम से जाना गया। चिपको आंदोलन का प्रभाव देश के बाकी हिस्सों पर भी पड़ा। इस आंदोलन की जनक थी गौरा देवी नाम की वीरांगना। 

 गौरा देवी

Gaura Devi, Image source: Google Image
Gaura Devi, Image source: Google Image

गौरा देवी का जन्म 1925 में चमोली जिला के लाटा नाम के गांव में हुआ था। उन्होंने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। केवल 11 वर्ष की उम्र में उनकी शादी रैंणी गांव के मेहरबान सिंह नाम के व्यक्ति से हुई। रैंणी भोटिया लोगों का आवासीय गांव था। ये लोग अपनी गुजर-बसर के लिये पशुपालन, ऊनी कारोबार और खेती-बाड़ी किया करते थे।

चिपको आंदोलन

26 मार्च, 1974 को जब उत्तराखण्ड चमोली जिले के के रैंणी गांव के जंगल के लगभग ढाई हजार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई, तो गौरा देवी ने अन्य महिलाओं के साथ इस नीलामी का विरोध किया। सरकार और ठेकेदार अपने फैसले पर अड़े रहे। जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे, तो गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की। जब उन्होंने पेड़ काटने की जिद की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना। इस तरह यहीं से ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई।

चमोली में मुख्य सड़क का निर्माण हुआ था। प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि 26 मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिए सभी पुरुषों को चमोली शहर आना था।

इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिए ठेकेदारों को निर्देश दिया था कि 26 मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को बातचीत के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जाएगा तो आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो।

इसी योजना पर अमल करते हुए मज़दूर रैंणी के देवदार के जंगलों को काटने के लिए चल पड़े। इस गतिविधि को एक लड़की ने देख लिया और उसने तुरंत इसके बारे में गौरा देवी को बताया। गांव में मौजूद 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ीं। इनमें बती देवी, महादेवी, भूसी देवी, नृत्यी देवी, लीलामती, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, पासा देवी, रुक्का देवी, रुपसा देवी, तिलाड़ी देवी, इन्द्रा देवी शामिल थीं।

उन्होंने पेड़ काटने आए मजदूरों से कहा ‘भाइयो, यह जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, फल-सब्जी और लकड़ी मिलती है, जंगल काटोगे तो बाढ़ आएगी, हमारे घर बह जाएंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द आ जाएंगे तो फैसला होगा।’ इस पर ठेकेदार और वन विभाग के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे, उन्हें सरकारी काम में बाधा डालने में गिरफ्तार करने की भी धमकी दी, लेकिन महिलाएं नहीं डरी।

ठेकेदार ने बंदूक निकालकर जब धमकाना चाहा तो गौरा देवी ने अपनी गरजते हुए कहा, ‘मारो गोली और काट लो हमारा मायका।’ इसपर मजदूर सहम गए।
इस मौके पर गौरा देवी ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिखाया, उससे बाकी महिलायें भी प्रभावित हुई। उनके अंदर भी पेड़ों के लिये लड़ने का जज़्बा पैदा हो गया। महिलायें पेड़ो से चिपक गयी और कहा कि हमें भी काट दो। उन पर पत्थर फेंके गये, डंडों से पीटा गया, उन पर थूका गया। गांव के पुरुष चमोली शहर और दिल्ली गये हुए थे, इसलिये महिलाओं ने ही मोर्चा संभाल लिया। चमोली जिले की कड़कती ठंड में भी रात भर वे पेड़ से चिपकी रहती थी। उन्हें बहुत तरीकों से डराया गया लेकिन वे दिन रात डटी रही।

ठेकेदारों और नेताओं ने सोचा भी नही था कि महिलायें इस कदर अड़ जायेंगी । अंत में उन लोगों ने हार मान ली और पेड़ काटे बगैर चले गये । दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार भी बुरी तरह हिल गयी और उसे हिमालयी क्षेत्रों में पेड़ो की कटाई पर 15 साल तक रोक लगाने के लिये बाध्य होना पड़ा ।

आज हम गौरा देवी और उनके जैसी ही इस आंदोलन में खड़ी होने वाली अन्य महिलाओं को सलाम करते हैं ।

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