उत्तरकाशी से गंगोत्री (Uttarkashi to Gangotri)

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बारिश रुक चुकी थी अब तक। कुछ देर पहले ही यहाँ तेज़ बारिश हुई होगी, जिसके निशान रोड किनारे कीचड़ के रूप में बाकि थे। यहाँ पहुँच कर सबसे पहला काम था रुकने का ठिकाना ढूंढना। वैसे तो यहाँ रुकने के लिए होटल आदि की कोई कमीं नहीं लेकिन यदि आप कम से कम ख़र्च में एक अच्छा ठिकाना चाहते हैं तो काली कमली धर्मशाला से अच्छा कुछ नहीं।

काली कमली पंचायत क्षेत्र द्वारा संचालित यह धर्मशाला रुकने के लिये एक आदर्श स्थान है। यहाँ दो डबल बेड और सभी सुविधाओं से सुसज्जित कमरा हमें मात्र 400 रुपये में मिल गया। यह मणिकर्णिका घाट के पास ही स्थित है। यदि आप भी यहाँ रुकना चाहते हैं तो एक बात ध्यान रखें की आपके पास अपना ताला होना चाहिये। यहाँ सभी सुविधायें मिलती है लेकिन ताला आपको अपना ही लगाना होता है, ऐसा आपकी अपनी सुरक्षा के लिये है।

Kali kamli dharmshala uttarkashi
काली कमली धर्मशाला उत्तरकाशी
काली कमली धर्मशाला उत्तरकाशी

देहरादून से उत्तरकाशी के सफ़र के दौरान माँ की तबियत ख़राब हो चुकी थी और अभी तो गंगोत्री का सफ़र बाकि ही था। इसलिये यहाँ एक्लीमेटाइज़ करना बहुत आवश्यक था। आराम और भोजन आदि करने के पश्चात् निकल पड़े पैदल ही शहर की सैर पर।

उत्तरकाशी शहर, उत्तरकाशी जिले का जिला मुख्यालय है। उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड राज्य का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। इसकी सीमायें उत्तराखण्ड राज्य में देहरादून, रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल और चमोली जिलों से लगी हैं। इसके अतिरिक्त इसकी सीमायें हिमाचल प्रदेश राज्य और तिब्बत से लगी हुई हैं। बहुत से प्रसिद्ध तीर्थ जैसे की गंगोत्री और यमुनोत्री इसी जिले के अंतगर्त आते हैं। यदि हम केवल उत्तरकाशी शहर की ही बात करें तो यहाँ बहुत से तीर्थ और पर्यटक स्थल हैं – मणिकर्णिका घाट और श्री काशी विश्वनाथ मंदिर बस अड्डे के समीप ही स्थित हैं। प्रसिद्ध दयारा बुग्याल भी उत्तरकाशी शहर से कुछ दूरी पर स्थित बरसु (भटवारी) के समीप ही स्थित है। यहाँ होने वाली गंगा आरती हरिद्वार और ऋषिकेश जितनी भव्य तो नहीं होती लेकिन आरती में शामिल होकर एक बार तो ऐसा ही लगता है की मानों अपने गाँव की नदी के किनारे होने वाली संध्या आरती हो रही है, मुझे भी ऐसा ही लगा।

सबसे पहले हम पहुंचे श्री काशी विश्वनाथ मंदिर। शहर के मध्य स्थित इस प्राचीन मंदिर की वास्तु कला बहुत आकर्षक है। मंदिर का इतिहास त्रेता युग से सम्बंधित है। कहा जाता है की ऋषि परशुराम ने स्वयं मंदिर का निर्माण करवाया था। वर्ष 1857 में मंदिर का जीर्णोद्धार टिहरी नरेश श्री सुदर्शन शाह की पत्नी महारानी खनेती देवी ने करवाया। वर्तमान में भारत में दो काशी शहर हैं – पहला है उत्तर प्रदेश स्थित काशी जिसे वाराणसी अथवा बनारस के नाम से भी जाना जाता है और दूसरा है उत्तराखण्ड स्थित उत्तरकाशी। दोनों ही शहरों में श्री काशी विश्वनाथ जी का मंदिर है। मान्यता है की कलयुग में जब उत्तर प्रदेश स्थित काशी जलमग्न हो जायेगी तब महादेव उत्तरकाशी स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में लौट आयेंगे। मंदिर परिसर में शिव और शक्ति दोनों के ही मंदिर हैं। शिवलिंग और अन्य प्राचीन विग्रह होने के साथ – साथ यहाँ एक 6 मीटर ऊँचा त्रिशूल स्थित है। यह 1500 वर्ष पुराना है। त्रिशूल के विशेषता है की आप अपना सम्पूर्ण शारीरिक बल लगा कर भी इसे हिला नहीं सकते लेकिन मात्र एक ऊँगली से त्रिशूल पर दबाव बनाने पर इसमें कंपन होता है।

मंदिर में दर्शन और कुछ देर समय बिताने के बाद चल दिये मणिकर्णिका घाट स्थित पुल की ओर। लक्ष्मण झूला जैसा ही सस्पेंशन ब्रिज यहाँ भी है, लेकिन लक्ष्मण झूला जैसी भीड़ यहाँ नहीं है। आप आराम से पुल पर खड़े आती – जाती लहरों को निहार सकते हैं और शहर की चहल – पहल को देख सकते हैं। पुल के पास ही भुट्टा सिक रहा था। अब हर ओर बारिश हुई हो, हलकी धुप निकली हो, कहीं – कहीं धुंआ उठ रहा हो और गंगा का किनारा हो तो कोई ख़ुद को भुट्टा खाने कैसे रोक सकता है ? ज़्यादा सेकने के चक्कर में भुट्टे कुछ जल से गये थे लेकिन ठीक – ठाक ही थे। मणिकर्णिका के घाट पर पैरों से लहरे टकराने का एहसास अतुलनीय था। कुछ ही देर में घाट पर आरती के लिये भीड़ जुटनी शुरू हो गयी।

अधिक तो नहीं, यही कोई 40 – 50 लोग रहे होंगे घाट पर आरती के लिये। पण्डित जी ने पूजा – अर्चना करनी शुरू की और उनके युवा बेटे ने मंत्रोच्चार के बाद आरती शुरू कर दी। हर ओर मंदिरों से आती घंटियों की आवाज़ के बीच, शहर की भाग – दौड़ से दूर यहाँ गंगा आरती शामिल होना अच्छा लग रहा था। मन को सुकून से भर देने वाला अनुभव था यह। आप जब भी यहाँ आयें तो गंगा आरती में अवश्य शामिल हों।

Kashi vishwanath mandir entrance
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर प्रवेश द्वार
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
Kashi vishwanath temple uttarkashi
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर गर्भ गृह

मणिकर्णिका घाट के पास स्थित पुल
Uttarkashi city
उत्तरकाशी शहर

शुभ रात्रि उत्तरकाशी

एक बात तो आपको बतायी ही नहीं। उत्तरकाशी पहुँचते ही एक बुरे समाचार से सामना हुआ था। पता लगा की भूस्खलन के कारण गंगोत्री मार्ग बंद हो गया है और कब खुलेगा, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। पिछले तीन दिन से लगातार हो रही बारिश के कारण ऐसा हुआ था। वैसे आज तो धुप निकल आयी थी, इसलिये कुछ उम्मीद बंधी। बस अड्डे वालों ने कहाँ की शाम को पता कर लेना। आरती संपन्न होते ही बस अड्डे पहुंचा तो उन्होंने वही जवाब दिया की अभी ऊपर से (गंगोत्री मार्ग) कोई ख़बर नहीं आयी, सुबह आकर पता कर लेना। अब चिंता बढ़ने लगी थी, लेकिन साथ – साथ मेरे घुमक्कड़ दिमाग ने भी दौड़ना शुरू कर दिया। सोच लिया था की प्रयास तो पूरा ही किया जायेगा गंगोत्री पहुँचने का लेकिन यदि विफल रहा तो कहीं और या फ़िर ऋषिकेश लौट जायेंगे। वहां परमार्थ निकेतन में एक दिन बितायेंगे और मंदिरों के दर्शन करेंगे ! लेकिन मन में यात्रा पूरी न होने पाने का दुःख तो रह ही जाता। इसी उहा – पोह में कब नींद आ गयी, पता ही नहीं चला।

आज इस 30 जुलाई थी और यह दिन मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण था। इसी दिन मेरे बेटे का जन्मदिन था और आज ही हमें गंगोत्री में गंगा मैया के दर्शन करने थे, लेकिन अभी तक कुछ भी निश्चित नहीं था। सुबह होते ही तैयार होकर मैं बस अड्डे की ओर भागा और गंगोत्री के बारे में पूछा लेकिन अभी भी वही रटा – रटाया जवाब – “अभी कोई अपडेट नहीं है” ! बाहर एक सफ़ाई कर्मी ने सलाह दी की आप टैक्सी स्टैंड चले जाओ। टैक्सी स्टैंड जो की यहाँ से आधा किलोमीटर दूर था, वहां पहुँच कर पता चला की गंगोत्री मार्ग तो शाम को ही दुरुस्त कर लिया गया था और टैक्सी जा सकती है। मैं ख़ुशी – ख़ुशी जब धर्मशाला की ओर वापस लौटा तो बस अड्डे पर ही एक बस वाले को गंगोत्री – गंगोत्री चिल्लाते पाया। बसें अब जाने लगी थी। मैं तुरंत ही सबको लेकर बस में पहुँच गया।

‘बोल गंगा मैया की…. जै’ – इसी जयकारे के साथ ड्राइवर ने बस गंगोत्री की ओर बढ़ा दी। अब सब ठीक था। बस में हमारे अतिरिक्त 8 तमिल साधु जिसमें 2 साध्वियां भी शामिल थी, केदारताल वाले वही चार छात्र और कुछ स्थानीय नौकरी पेशा लोग थे। उन साधुओं में से किसी को भी हिंदी नहीं आती थी लेकिन वृद्ध साध्वी से मेरे बेटे की अच्छी जम रही थी। भिन्न भाषा होने के बाद भी शायद उनकी ममता ही थी जो उन दोनों के बीच संवाद का माध्यम बनी।

हरे – भरे और ऊँचे पहाड़ों से होती हुई हमारी बस बढ़ती जा रही थी ऊपर की ओर। कुछ ही देर बाद मनेरी डैम आया। मनेरी बांध से ही उत्तरकाशी शहर में बिजली की आपूर्ति होती है। मार्ग में जगह – जगह झरने गिर रहे थे। कयी बार तो झरनों का पानी बस के अंदर भी आ गया। एक अलग ही दुनिया में थे हम। देहरादून – उत्तरकाशी मार्ग की अपेक्षा यहाँ बादल कम ही थे लेकिन पहाड़ों की चोटियां बादलों में ही समायी हुई थी। जैसे – जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, गंगा और ज़्यादा गहरी खायीं में बहती जा रही थी। कहीं – कहीं तो गंगा की चौड़ाई 10 फीट ही रह गयी थी। विश्वास नहीं हो रहा था की क्या यह वही गंगा नदी है जो बनारस में इतनी चौड़ी हो जाती है की उस पर कयी किलोमीटर लम्बा पुल बनाना पड़ जाता है ? जगह – जगह भूस्खलन के निशान देख कर प्राण सूख जाते थे। भटवारी से होते हुए हम अपने पड़ाव गंगनानी पहुंचे।

उत्तरकाशी शहर से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थान गर्म पानी की धाराओं के लिये प्रसिद्ध है। प्राकृतिक रूप से गर्म इस पानी में बहुत से लोग स्नान करते हैं। बहुत से चर्म रोग यहाँ नहाने से ठीक होते हैं। यहाँ के ढाबे में हमने मैगी वाला नाश्ता किया। आधे घंटे रुकने के बाद बस यहाँ से चल पड़ी।

Gangnani
गंगनानी

अभी कुछ ही आगे बढ़े थे की आगे डाक कावंड़ वालों का टैम्पो ख़राब होने के कारण मार्ग अवरुद्ध मिला। पता लगा की टायर पंक्चर हो गया है। चलो अच्छा ही था। यहाँ बाहर निकल कर फोटो खींचने का मौका मिल गया। थोड़ी देर में यहाँ से बढ़ चले। जैसे – जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे मार्ग और ख़तरनाक होता जा रहा था। यहाँ के हालात देख कर लगा की मानसून में लोगों का पहाड़ों में आने से डरना अकारण नहीं है। रास्तों की हालत बहुत बुरी थी, जगह – जगह बड़े – बड़े पत्थर गिर कर रोड पर आ गये थे । कुछ दूर पहले तक जो देवदार के जंगल दिख रहे थे अब वो भी कम होने लगे। हिमालय में अधिक ऊंचायी पर पेड़ वैसे भी कम होते चले जाते हैं। ऐसे सफ़र से होते हुए हम पहुंचे हर्षिल।

इस फोटो में सबसे आगे वही डाक कांवड़ वाला टैम्पो दिखायी दे रहा है
हमारी बस 🙂
तमिल साधु

जिस भूस्खलन के कारण एक दिन पहले मार्ग अवरुद्ध हुआ था, वह यहीं हुआ था। भूस्खलन के साथ – साथ पहाड़ी झरनों का पानी मार्ग पर एक बाढ़ के रूप में रहा था। SDRF और BRO कर्मी मार्ग को साफ़ करने में लगे हुए थे। यहाँ बेशक आपदा आयी हुई थी लेकिन हर्षिल की सुंदरता में तनिक भी कमीं नहीं आयी थी। जब आप पहली बार हर्षिल देखेंगे तो आपके दिमाग में जो पहला शब्द आयेगा वह है ‘आश्चर्यजनक’। विश्व की सबसे सुन्दर घाटियों में से एक हर्षिल किसी स्वर्ग से कम नहीं। यह गंगोत्री से 20 किलोमीटर पहले स्थित है। इसकी सुंदरता की एक झलक ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म में ‘गंगा’ के गाँव के रूप में दिखाई देती है। यह हिमाचल प्रदेश के बस्पा घाटी के ऊपर स्थित एक बड़े पर्वत की छाया में और भागीरथी नदी के किनारे एक घाटी में स्थित है। बस्पा घाटी से हर्षिल लमखागा दर्रे जैसे कई रास्तों से जुड़ा है। यह गाँव अपने प्राकृतिक सौंदर्य एवं मीठे सेब के लिये मशहूर है। हर्षिल के आकर्षण छाया युक्त सड़क, लंबे कगार, ऊंचे पर्वत, कोलाहली भागीरथी, सेबों के बागान, झरनें, सुनहले तथा हरे चारागाह आदि शामिल हैं। मुखबा भी हर्षिल के पास ही स्थित है। इसी गाँव के पुजारी गंगोत्री में पंडा हैं और शीतकाल में यहीं गंगा माँ की पूजा की जाती है।

किन्तु ध्यान रहे की हर्षिल और मुखबा घूमने के लिये आपका टैक्सी बुक करना आवश्यक है। गंगोत्री जाने वाली बस यहीं से होकर जाती है लेकिन वापसी में आपको परेशानी हो सकती है। इसलिये टैक्सी बुक कर लेना अच्छा रहता है।

हर्षिल, मुखबा और बगोरी जैसे गांवों से होते हम पहुंचे भैरो घाटी। तिब्बत से आ रही जढ़ गंगा यहाँ भागीरथी में मिल जाती है। यहाँ बना पुल दुनिया के सबसे ऊँचे पुलों में शुमार है। यहाँ से एक रास्ता नेलांग घाटी की ओर चला जाता है। नेलांग घाटी को उत्तराखण्ड का लद्दाख भी कहा जाता है। नेलांग जाने के लिये परमिट की आवश्यकता होती है जो की उत्तरकाशी स्थित SDM कार्यालय से बन जाता है। वर्ष 1962 से पहले इस घाटी के रास्ते तिब्बत से व्यापार होता था। फिर, 1962 में जो हुआ उसने व्यापार तो क्या नेलांग के रवासियों को भी उजाड़ कर रख दिया। अब वही भोटिया लोग बगोरी गांव में रहते हैं। 1962 में आम जन के लिये बंद हुई इस घाटी को 2015 में फ़िर से खोल दिया गया।

Gangotri

भैरोघाटी से गंगोत्री तक रोड बहुत अच्छा बना है। इस मार्ग पर सेब के बहुत सारे पेड़ देखे जा सकते हैं। इस वर्ष यहाँ सेब की अच्छी पैदावार हुई है। सेब से लदे हुए पेड़ पुरे लाल दिखायी दे रहे थे। सेब के पेड़ों से घिरे हुए मार्ग से होते हुए आखिर हम पहुँच ही गये गंगोत्री। अब तक दोपहर के 12 बज चुके थे। ड्राइवर ने बताया की वही हमे वापस भी लेकर जायेगा। वापसी का समय दोपहर 2 बजे का था। अथार्त हमें जो करना था, दो घंटे में ही करना था।

गंगोत्री घाट पर पहुँच कर स्नान किया और पूजा – पाठ आरंभ किया। पूजा संपन्न करने के बाद मंदिर में दर्शन किये और आस – पास घूमें। तब तक दो बज चुके थे और सहचालक (कंडक्टर) हमें बुलाने मंदिर तक आ गया। वैसे एक बात है की यहाँ, बस स्टाफ भी किसी पड़ोसी जैसा ही व्यवहार करता है। लगता ही नहीं की कोई अजनबी हो। यहाँ तक जिन तमिल साधुओं को हिंदी न आने के कारण किसी भी दुकान वाले से बात करने में समस्या आ रही थी, उनकी भी सहायता वह कंडक्टर ही कर रहा था। हाँ, यह संभव था की उसका कुछ कमिशन हो, लेकिन व्यवहार तो अच्छा था ही।

वैसे गंगा मैया की पूजा गंगोत्री में होती है किंतु गंगा का उद्गम स्थल गोमुख है जिसकी दूरी गंगोत्री से 18 किलोमीटर है। हमेशा से ऐसा नहीं था, पहले गोमुख गंगोत्री धाम के पास ही था लेकिन पर्यावरण में बदलाव के कारण गोमुख खिसकते हुए 18 किलोमीटर पीछे चला गया और आज भी इसका खिसकना जारी है।

गंगोत्री मंदिर का इतिहास वैसे तो लगभग 700 वर्ष पुराना है किन्तु वर्तमान मंदिर का निर्माण गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं सदी में करवाया और 20 सदी में जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने इसका जीर्णोंद्वार करवाया। अमर सिंह थापा ने ही यहाँ मुखबा गाँव के पुजारियों को पंडों के रूप में यहाँ नियुक्त किया। इससे पूर्व टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे।

वर्ष 1980 तक मोटर न होने के कारण तीर्थ यात्री उत्तरकाशी से ही 100 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके गंगोत्री तक पहुँचते थे। 1980 में मोटर मार्ग का निर्माण होते ही गंगोत्री और उसके आस – पासके क्षेत्रों में आबादी का विकास तेज़ी से हुआ।

गंगोत्री धाम का पौराणिक महात्मय और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां आप मेरी पिछली पोस्ट में यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

Gangotri bus stand
गंगोत्री बस स्टैंड
gangotri market
गंगोत्री बाज़ार प्रवेश द्वार

 

gangotri temple
गंगोत्री मंदिर

हमारा परिवार और पंडित जी

अगला भाग शीघ्र।

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Hitesh Sharma
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Hitesh Sharma

वाकई शानदार मज़ा आ गया पढ़कर

kavita
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kavita

उमेश जी आप ने देहरादून से उत्तरकाशी के सफ़र के बारे मैं बहुत अच्छा लिखा है और जैसे मैने पहले भी कहा था की आप के फोटो ग्राफी बहुत अच्छी है काफी अमेजिंग मौसम था

Himanshu
Guest
Himanshu

उमेश जी आप बहुत अच्छा लिखते है काफी अच्छा लगता है पढ़ कर कोई तो है जो हिंदी को बढ़ावा देता है काफी अच्छी हिंदी है और पिचिर भी बहुत अच्छी है आप का देख का अच्छा लगा