Suspension bridge Uttarkashi

उत्तरकाशी और गंगोत्री की यात्रा (भाग 4) Uttarkashi and Gangotri journey in Hindi (Part 4)

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सपनो का शहर – उत्तरकाशी

शाम के 6 बज चुके थे और हम उत्तरकाशी पहुँच चुके थे। बस स्टैंड के पास ही स्थित प्रतीक्षा होटल में मात्र 250 रुपये में सभी सुविधाओं से युक्त कमरा मिल गया। वैसे इतना सस्ता कमरा मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उत्तराखंड में घूमना – फिरना बहुत सस्ता है। शायद यह भी एक कारण है की उत्तराखंड मेरी लिस्ट में सबसे ऊपर रहता है। फटाफट कमरे में सामान पटका और निकल पड़ा इस छोटे से शहर की सैर पर।

जिस गली में होटल है, वही गली मणिकर्णिका घाट पर जाती है। मणिकर्णिका…??? जो लोग बनारस गए होंगे उन्हें पता होगा की मणिकर्णिका घाट तो बनारस में है। बनारस स्थित मणिकर्णिका घाट को विश्व के सबसे बड़े शमशान के रूप में भी जाना जाता है। कई नामचीन हस्तियों का अंतिम संस्कार हुआ है बनारस के मणिकर्णिका घाट पर। बनारस का प्राचीन नाम काशी है और उत्तराखंड स्थित उत्तरकाशी को उत्तर की काशी के रूप में जाना जाता है। जिस प्रकार बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर है, वैसे ही उत्तरकाशी में भी काशी विश्वनाथ मंदिर है और मणिकर्णिका घाट भी है।

तो हम जा रहे थे उत्तरकाशी वाले मणिकर्णिका घाट पर। होटलों और धर्मशालाओं वाली गलियों से होते हुए मैं आ पहुंचा मणिकर्णिका पर। 7 बजे होने वाली आरती के लिए तैयारियां हो रही थी। यहाँ जो गंगा का रूप है, वैसा रूप कहीं नहीं देखा। गंगा का फैलाव यहाँ बहुत बड़ा है। नदी की दूसरी ओर जाने के लिए सस्पेंशन ब्रिज (झूला पुल) है। सोचा की उस पार जा कर कुछ खा लिया जाये और थोड़ी सी फोटोग्राफी भी हो जायेगी। हवा तेज़ होने के कारण पुल हिल रहा था। दूसरी ओर आज सब्जी मंडी लगी हुई थी। यहाँ भी दिल्ली की तरह साप्ताहिक सब्जी मंडी लगती है। अभी पुल पार हुआ भी नहीं था की बूंदा-बांदी शुरू हो गयी। वैसे पहाड़ों की बारिश कब देखते ही देखते तेज़ हो जाये पता नहीं लगता। एक दुकान में जाकर छोले भठूरे और बालूशाही का भोग लगाया और वहां से निकल पड़ा। इस ओर आते – आते बारिश तेज़ हो चुकी थी। जिसको जहाँ ठिकाना मिला वहीं रुक गया। छोटे – छोटे मंदिरों से शाम की आरती की आवाज आने लगी थी। मणिकर्णिका पर भी आरती शुरू हो चुकी थी। दिल्ली जैसे शहरों की भाग – दौड़ से कुछ दिनों की मुक्ति पानी है तो उत्तरकाशी आइये। ऐसा मन लगेगा की आप भूल जाएंगे की आप कभी दिल्ली वाले थे। आधुनिता के पहाड़ों को थोड़ा दरकने दीजिये और आ जाइये प्रकृति की गोद में।

वार्णाव्रत पर्वत की गोद में बसा यह शहर वैसे तो बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन सभी छोटी बड़ी सुविधाएँ मौजूद हैं। यहाँ स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान विश्व प्रसिद्ध है। अगर आप गोमुख या उससे आगे जाना चाहते हैं, या नेलांग घाटी आदि जाना चाहते हैं तो आपको यहाँ स्थित डी.एम. ऑफिस से परमिट लेना होगा। गंगा के अतिरिक्त यमुना और अस्सी गंगा भी उत्तरकाशी से ही बहती हैं। कुछ देर इधर – उधर घूमा, बैग फट गया था तो मोची से सिलवाया …. हाँ मोची से। कमरे में आकर टी.वी. पर न्यूज़ चैनल लगाया। फिर वही खबर की उत्तराखंड में भारी बारिश, लैंडस्लाइड हुआ और पता नहीं क्या – क्या। हसीं आ रही थी ये न्यूज़ देख – देख कर की कितना झूठ बोलते हैं ये लोग। अगली सुबह ऋषिकेश के लिए निकलना था इस लिए जल्दी ही सो गया।

Suspension bridge Uttarkashi
उत्तरकाशी स्थित झूला पुल
Uttarkashi
उत्तरकाशी

तीसरा दिन

अगली सुबह चाय पीकर बस स्टैंड पर पहुंचा तो बस खड़ी थी ऋषिकेश के लिए। बादलों से घिरी सुन्दर घाटियों को देखते 11 बजे तक चम्बा पहुँच चुका था। इस बीच कई छोटे – छोटे शहर जैसे चिन्यालीसौड़ आदि आये। चम्बा में नाश्ता, कुछ देर की खरीदारी और फिर निकल पड़े ऋषिकेश की ओर। दोपहर के डेढ़ बज चुके थे जब ऋषिकेश पहुंचा। वैसे ऋषिकेश पहले भी बहुत बार आ चुका हूँ इसलिए यहाँ घूमने की कोई इच्छा नहीं थी। यहाँ पहुँचते ही दिल्ली की बस मिल गयी। इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी। चल पड़े दिल्ली की ओर। कांवड़ यात्रा की वजह से दिल्ली – हरिद्वार राजमार्ग बंद होने के कारण बस एक अलग ही मार्ग से जा रही थी। देहरादून – पांवटा साहिब (सिरमौर, हिमाचल प्रदेश), यमुना नगर, करनाल, पानीपत और सोनीपत आदि होते हुए रात 10 बजे तक दिल्ली पहुँच चुका था।
Uttarkashi
उत्तरकाशी की सुबह
है न खूबसूरत ?
चिन्यालीसौड़


धान की खेती

Dharasu band
धरासू बैंड – यहाँ से गंगोत्री और यमुनोत्री के रास्ते अलग हो जाते हैं


बकरियां भाग गयी

बिना किसी पूर्व योजना की इस यात्रा को मैं अब तक की मेरी सभी यात्राओं में सबसे अच्छी यात्रा मानता हूँ।
हाँ…. थोड़ा समय और होता तो अच्छा होता और यदि दोस्त भी होते तो बात ही क्या थी।

हम शहरों में रहते हुए सुविधाओं के आदी हो जाते हैं, जिसके कारण हम में से ज्यादातर लोगो की यात्रा दिल्ली और गुरुग्राम के मॉल और होटलों तक ही सीमित रह जाती है। अगर एक बार खुल कर जीना चाहते हैं तो तोड़ दीजिये अपने चारो ओर बने हुए सुविधाओं के चक्रव्यूह को और निकल पड़िये किसी ऐसे ही सफ़र पर।

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कपिल कुमार शर्मा
कपिल कुमार शर्मा
May 9, 2018 6:52 am

आपके इस उत्तरकाशी-गंगोत्री यात्रा वृतान्त पढ़कर बहुत अच्छा लगा, और पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे मैं भी इस यात्रा में सम्मिलित हूँ…. बहुत बढ़िया प्रस्तुति और शानदार चित्र ……. सबसे बड़ी बात आप अकेले ही निकल पड़े…. कोई नहीं मिला तो ……. बहुत सुन्दर……. कपिल..
please send your Mobile no…. so that I can contact you….

Hiten Bhatt
Hiten Bhatt
May 14, 2018 7:20 am

Bahot detailsme apne bataya….tasviron ke sath….isse bhi achchha apne antme jo kharch aya tha uske byora diya vo bahot pasand aya. bas hotel ke kamreki tasveer dikhai hoti to achchha hota. bahot sundar likhai