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उत्तरकाशी और गंगोत्री की यात्रा (भाग 2) Uttarkashi and Gangotri journey in Hindi (Part 2)

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अब तक काफी समय बेकार हो चुका था, इसलिए बद्रीनाथ तो जाना संभव था नही। लेकिन कहाँ जाया जाये? कश्मीरी गेट पहुंचने के बाद भी नही पता था की कहाँ जाना है? सामने शिमला की बस खड़ी थी। ‘इस बार हिमाचल ट्राई किया जाए… हाँ यह ठीक रहेगा।’ शिमला की टिकट लेकर बस में बैठ गया। ड्राइवर ने बताया की रात में 9 बजे बस शिमला पहुंचेगी।

वैसे एक बात बता दूँ की पता नही क्यों मुझे हिमाचल कुछ ज्यादा पसंद नहीं है। मैं किसी स्थान की खूबसूरती के साथ – साथ वहां के माहौल को भी अपनी पसंद – नापसंद की सूची में शामिल करता हूँ। हिमाचल बहुत खूबसूरत है और वहां के लोग भी बहुत अच्छे हैं, लेकिन उत्तराखंड बेहतरीन है। इसका कारण है वहां के सीधे – सादे लोग और यात्रा पर होने वाला कम खर्च। बस चलने में अभी समय शेष था। मैंने टिकट किसी और यात्री को बेच दी और बस से उतर गया। पास ही देहरादून की बस खड़ी थी, मैं जाकर बैठ गया। तभी अचानक से विचार आया की उत्तरकाशी जाना है। ‘हाँ यह ठीक रहेगा।’ थोड़ी ही देर में बस चल पड़ी।

कांवड़ यात्रा के कारण सावन महीने में दिल्ली – हरिद्वार राजमार्ग शिवरात्री तक बंद रहता है, जिसके कारण सभी वाहन वैकल्पिक मार्ग से जाते हैं। यह बस भी शास्त्री पार्क, पुश्ता आदि होते हुए बागपत की ओर चल पड़ी। वैसे सरकारी बसें देखने में भले ही अच्छी ना हो लेकिन यदि आप कम खर्च में अधिक यात्रा करना चाहते हैं इन बसों का कोई विकल्प नहीं। ये समय से पहले अपने गंतव्य तक पहुंचा देती हैं और सीट भी ठीक ही होती हैं।

कुछ ही देर में हम बागपत में थे। बागपत एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। एक से बढ़ कर भव्य मस्जिदे बनी हुई हैं यहाँ। ट्रैफिक भी एक बड़ी समस्या है यहाँ। योगी आदित्यनाथ जी के फोटो वाले बड़े – बड़े होर्डिंग इस बात की गवाही दे रहे थे की सूबे में नयी सरकार आ चुकी है। कभी हमारे यू.पी. में समाजवादी पार्टी के पोस्टरों की भरमार थी। यह क्षेत्र मेरे लिए अधिक जाना – पहचाना नहीं था। इसलिए नहीं पता लग पा रहा था की बस किन रास्तों से जा रही है। कुछ ही देर में हरे – भरे खेत शुरू हो गए। गड्ढे युक्त रास्तों से होते हुए शाम 6 बजे बस सहारनपुर पहुंची। अब लगा की देहरादून अधिक दूर नहीं है।

सहारनपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा शहर है। लकड़ी के खिलौनो के लिए मशहूर इस शहर में स्थित स्टार पेपर मिल एशिया का सबसे बड़ा कागज़ निर्माण कारखाना है। यहाँ स्थित जामा मस्जिद इतनी बड़ी है की उसमे एक हजार लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं। इसके साथ – साथ इस शहर की एक खासियत यहाँ मेरे मित्र प्रशांत वालिया का घर है। इतना सब होते हुए भी पता नहीं क्या हो गया है आज -कल। अब तो यह शहर दंगो के लिए जाना जा रहा है। नेताओं की राजनीति में पूरा शहर जल रहा है।

अब अँधेरा होने लगा था। थोड़ी ही देर में नींद आ गयी। जब आँख खुली तो देखा बस पहाड़ी मार्ग से गुज़र रही थी। कुछ ही देर में पहाड़ों को पीछे छोड़ते हुए हम पहुँच गए देहरादून। रात के 8:30 बज रहे थे। पास ही एक ढाबे पर खाना खाया और बस अड्डे पर जा कर उत्तरकाशी वाली बस के बारे में पूछताछ शुरू कर दी। वैसे मैं यह जानता था की उत्तराखंड में रात में बस नही चलती और ठीक ऐसा ही जवाब पूछताछ केंद्र पर मिला। पहले सोचा की डोरमेट्री में रात गुज़ार ली जाए, लेकिन इससे काफी समय बेकार हो जाता।

उत्तराखंड राज्य के गठन के समय चमोली स्थित गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग थी और यह मांग आज भी जारी है। किन्तु देहरादून को अंतरिम राजधानी बनाया गया। इसका कारण था मैदानी क्षेत्र और मौजूद सुविधाएँ। वैसे गैरसैण में भी विधानसभा भवन और अन्य सरकारी भवन बन कर तैयार हैं और ऐसी उम्मीद है की भविष्य में राजधानी गैरसैण ही होगी। गैरसैण की स्थिति इसे राजधानी के लिए उपयुक्त बनती है। गैरसैण उत्तराखंड के मध्य में स्थित पहाड़ी शहर है। इसके विपरीत देहरादून उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र में स्थित है जो की बाकि जिलों से बहुत दूर है।

अब आतें हैं अपनी यात्रा पर। चाय वाले ने बताया की यहाँ से 5 किलोमीटर दूर पटेल नगर में दैनिक जागरण की प्रेस है। वहां से प्रेस की गाड़ियां रात में अख़बार लेकर उत्तरकाशी जाती हैं ! वो ले जाएंगे। मै भी वहीं पहुँच गया। प्रेस की गाडी वाले ने धीरे से पूछा की कहाँ जाना हैं। ‘उत्तरकाशी’ मैंने कहा। उसने कहा बैठ जाओ। किराया बताया 250 रुपये। रात 10 बजे गाडी चल पड़ी। गाडी में अख़बार भी नहीं थे। मै हैरान था की खाली गाड़ी कैसे जा सकती है। थोड़ी ही देर में गाड़ी अमर उजाला और दैनिक जागरण की दूसरी प्रेस पर पहुंची। वहां और सवारियां प्रतीक्षा कर रही थी। सवारियां और अखबार दोनों ही गाड़ी में भर दिए गए। अब तक रात के 12 बज चुके थे। अब हम चल पड़े उत्तरकाशी की ओर।

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फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट देहरादून

मसूरी में पानी वाला चौक पर कुछ देर रुकने के पश्चात आगे बढ़ चले। चारो और पहाड़ों का अँधेरा। गाडी आगे बढ़ती जा रही थी। गाड़ी में बज रहा कुमाउँनी गाना ‘बेड़ू पाको बारा मासा…’ गाना इस शांति को चीरने प्रयास कर रहा था। किसी ने कहा ‘उत्तरकाशी जा ही रहे हो तो गंगोत्री भी क्यों नहीं चले जाते, कुछ ही दूर तो है वहां से।’ वैसी राय बुरी नही थी, या यूँ कहें की अच्छी ही थी। मैंने कहा की उत्तरकाशी पहुँच कर सोचा जायेगा। गाडी में मेरे अतरिक्त 9 सवारियां और थी। कुछ बाते इधर की हुई, कुछ बातें उधर की हुई! कुछ ईरान की हुई और कुछ बातें तुरान की हुई। गोपी ने बताया की पहाड़ों में पर्यटन को नुकसान पहुँचाने में सबसे अधिक योगदान मीडिया का ही है। जितना समाचारों में बताया जाता है वह पूरा सत्य नहीं होता। थोड़ी सी बारिश और भूस्खलन को बादल फटना बताया जाता है। जिसका परिणाम यह होता है की लोग यहाँ आने से डरने लगते हैं और जो भी कुछ महीनों के यात्रा मौसम में कमाई होने के आसार होते हैं, वे भी समाप्त हो जाते हैं। समझ नहीं आता की लोग अपने फायदे के लिए कितना गिर सकते हैं? खैर…. बातचीत करते – करते कब नींद आ गयी, पता ही नहीं लगा।

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