Chopta Trip

Trip to snowy Chopta बर्फीले चोपता की यात्रा

वैसे तो मैं चोपता बहुत बार जा चुका हूँ और हर बार यही तय करता हूँ की अब चोपता और नहीं… इस बार कहीं और… शायद हिमाचल, शायद दक्षिण… पूर्वोत्तर ! लेकिन जैसे ही बर्फ़ से ढके पहाड़ दिखते हैं गाड़ी उत्तराखण्ड की ओर मुड़ जाती है। खैर.. इस बार कुछ भी अकस्मात् नहीं हुआ, चोपता ही जाना था।

चोपता की योजना कैसे बनी ? हम चोपता कैसे पहुंचे ? क्या – क्या समस्याएं आयी ? इन सबका यात्रा वृत्तांत अथार्त मेरा अनुभव अगली पोस्ट में, फिरहाल इस पोस्ट में हम बतायेंगे कुछ बाते चोपता के बारे में की चोपता कहाँ है ? वहां चोपता पहुंचना है आदि ?

On the way to Chopta
On the way to Chopta

चोपता

अब हम यह तो कह नहीं सकते की चोपता की खोज हुई, क्योंकि मेरा मानना है की किसी भी स्थान की खोज नहीं होती बल्कि जो व्यक्ति दावा करता है की उसने उक्त स्थान की खोज की, वह एक ऐसा व्यक्ति होता है जो स्वयं उस स्थान से अंजान होता है और जब वह किसी अनदेखे स्थान पर पहुँचता है तो दावा करने लगता है उसने उस स्थान की खोज की।

हमे पढ़ाया गया की अमेरिका की खोज कोलंबस ने की, भारत की खोज वास्को-द-गामा ने की। कितना हास्यास्पद है न यह, क्या इनकी तथाकथित खोजों से पहले अमेरिका और भारत नहीं थे ? हाँ, यह अवश्य है की इन यूरोपीय लुटेरों को लूट के लिये एक नया देश चाहिये था और इन्हें भारत का रास्ता मिल गया।

खैर.. बात कहाँ से चली थी और कहाँ आ गयी… हरे – भरे बुग्यालों (घास के मैदान) से भरा और उच्च हिमालयी श्रृंखलाओं से घिरा चोपता उत्तरखण्ड की केदारनाथ वन्यजीव अभ्यारण्य में स्थित है। इसे पंच केदारों में से एक श्री तुंगनाथ की यात्रा के बेस कैंप रूप में भी जाना जाता है।

चोपता समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ से 3.5 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री तुंगनाथ मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। श्री तुंगनाथ से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है चंद्रशिला चोटी (4100 मीटर)।

चोपता जाने वाले सभी यात्री तुंगनाथ मंदिर तक तो जाते ही हैं और यदि उनमें पैदल चलने की थोड़ी क्षमता और बची रहती है तो चंद्रशिला तक भी जाते हैं।

चोपता ऐसा स्थान है जो की अभी भी ज़्यादातर पर्यटकों की दृष्टि से दूर ही है और यहाँ तक की बहुत से लोग तो इसका नाम भी नहीं जानते। जब वे यहाँ की खूबसूरत तस्वीरें देखते हैं तो उन्हें यकीन ही नहीं होता की इतना खूबसूरत स्थान भारत में है।

चोपता के प्राकृतिक नज़ारों से बहुत अधिक छेड़ – छाड़ नहीं हुई है। यहाँ फैली अपार सुंदरता के कारण ही कुछ लोग इसकी तुलना स्विट्ज़रलैंड से कर बैठते हैं। हालाँकि तुलना करना उचित नहीं है क्योंकि जब हम ऐसा कर रहे होते हैं तो अपने ही देश को कहीं न कहीं कमतर आंक रहे होते हैं।

चोपता से विशाल हिमालय की बहुत चोटियों के दर्शन सुलभ हो जाते हैं। यहाँ से आप केदारनाथ, मेरु – सुमेरु, गंगोत्री आदि चोटियों को देख सकते हैं। यहाँ से 1 किलोमीटर ऊपर जाते ही हिमालय के वृद्ध पुरुष चौखम्बा पर्वत दिखने लगता है और यदि आप चंद्रशिला तक पहुँच जायें तो अनगिनत चोटियों के दर्शन होते हैं जिनमे से प्रमुख हैं गंगोत्री, केदारनाथ, मेरु, सुमेरु, चौखम्बा, नीलकंठ, त्रिशूल और नंदा देवी।

चोपता केवल ऊँची चोटियों के नज़ारों के लिये ही नहीं जाना जाता, और भी बहुत सी विशेषतायें हैं। उत्तरखण्ड राज्य में केवल चोपता ही ऐसा स्थान है जो जहाँ से आप मात्र 5 किलोमीटर की ट्रेकिंग कर के 4000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर पहुँच सकते हैं।

यहाँ सर्दियों में मध्य दिसंबर से लेकर मध्य मार्च तक भयंकर बर्फ़बारी होती है और कई बार तो स्थिति ऐसी हो जाती है की रास्तों पर कई फ़ीट मोटी बर्फ़ जम जाती है, रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं और आपको चोपता से 8-9 किलोमीटर पहले ही गाड़ी रोकनी पड़ जाती है।

चोपता के बारे में यह भी कहा जाता है की यह पहले एक गाँव था और आज यहाँ जो 3-4 ढाबे बने पड़े हैं, वे पहले उन गांव वालों के घर थे जो रोजगार की तलाश में पलायन कर गए।

 

चोपता का आध्यात्मिक संबंध

यह सही है की आज चोपता एक पर्यटक स्थल बन चुका है और यहाँ बहुत से लोग बर्फ़ का आनंद उठाने और ट्रेकिंग करने आते हैं लेकिन चोपता की प्रथम पहचान श्री तुंगनाथ मंदिर से ही है। यदि तुंगनाथ मंदिर नहीं होता तो शायद हम आज भी चोपता को नहीं जानते होते।

महाभारत युद्ध में के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। कई वर्षों तक सफ़लतापूर्व शाशन करने के बाद पांडवों और द्रौपदी ने सन्यास के लिए हिमालय प्रयाण किया। हिमालय क्षेत्र में एक स्थान पर खड़े भगवान शिव नें पांडवों को देख लिया। वे जानते थे की यदि पांडवों ने कोई वर मांग लिया तो वे मना नही कर सकते, इसलिए उन्होंने भैंसे का रूप बना कर भागना शुरू कर दिया किन्तु भीम ने उन्हें देख लिया था।

शिव जी का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए एक स्थान पर भीम दो चट्टानों पर पैर फैला कर खड़े हो गए। भैंसे रुपी शिव जी ऐसा देख कर धरती में समा गये। कुछ समय बाद उनके शरीर के विभिन्न अंग हिमालय में अलग – अलग स्थानों पर प्रकट हुए। उन स्थानों को पञ्च केदारों के नाम से जाना गया। इस प्रकार भगवान की पूजा रुद्रनाथ में मुख, केदारनाथ में पृष्ठ भाग, मध्य महेश्वर में उदर, कल्पेशर में जटायें और तुंगनाथ में भुजा के रूप में होती हैं।

सभी केदारों के कपाट अक्षय तृतीया (अप्रैल/ मई) पर या उसके आस – पास खुलते हैं और दीवाली के बाद भैया दूज पर बंद हो जाते हैं। इसके पश्चात् बाबा की डोलियों को नज़दीकी गांवों में ले जाया जाता है जहाँ शीत काल में उनकी पूजा होती है। इस प्रकार भगवान तुंगनाथ की पूजा शीतकाल में मक्कूमठ नामक गांव में होती है।

कहाँ है चोपता ?

चोपता, उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केदारनाथ हाईवे और बद्रीनाथ हाईवे को जोड़ने वाले ऊखीमठ – गोपेश्वर मार्ग पर स्थित चोपता ऋषिकेश से 208 किलोमीटर और दिल्ली से 450 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

एक बात और, उत्तराखण्ड में दो चोपता हैं। सामान्यत जब आप गूगल मैप पर चोपता सर्च करते हैं तो वो रुद्रप्रयाग के पास वाला चोपता दिखाने लगता है जो की दूसरा चोपता है। इसलिए यदि आप गूगल मैप पर चोपता सर्च कर रहे हैं तो ‘Chopta Hill Station’ या ‘Tungnath’ टाइप करें। यहाँ ऋषिकेश से चोपता तक के रास्ते के गूगल मैप के लिए यहाँ क्लिक करें।

 

कैसे पहुंचे चोपता ?

सड़क और रेल मार्ग

सड़क द्वारा दो तरीकों से चोपता पहुंचा जा सकता है – पहला तरीका तो यह है की आपके पास अपनी गाड़ी हो और दूसरा तरीका है सार्वजानिक परिवहन। पहले चर्चा करते हैं अपनी गाड़ी वाले रास्ते की।

सबसे पहले आपको हरिद्वार पहुंचना होगा और वहां से ऋषिकेश।

हरिद्वार से ऋषिकेश जाने के दो रास्ते हैं – पहला रास्ता है दिल्ली – हरिद्वार – ऋषिकेश हाईवे और दूसरा रास्ता है हरिद्वार से चीला बैराज होते हुए ऋषिकेश। पहले रास्ते पर अपेक्षाकृत भयंकर ट्रैफिक होता है। दूसरा रास्ता हमेशा खाली ही होता है किन्तु ध्यान रहे की यह रास्ता राजा जी नेशनल पार्क के बीच से निकलता है और बीच में नदी भी आती है।

वैसे तो इस नदी में पानी बहुत कम होता है और आप आराम से नदी पार कर लेंगे लेकिन बरसात के दिनों में यहाँ बहुत ज़्यादा पानी आ जाता है इसलिए आपको मुख्य हाईवे से ही जाना पड़ेगा। शाम पांच बजे के बाद चीला बैराज वाला रास्ता बंद भी हो जाता है।

ऋषिकेश पहुँचने के बाद आपको ऋषिकेश – बद्रीनाथ हाईवे पर रुद्रप्रयाग (142 किलोमीटर) तक सीधे ही जाना है। इस बीच आप शिवपुरी, ब्यासी, कौड़ियाला, देव प्रयाग, कीर्ति नगर, श्री नगर और, कालियासौड़ से गुजरेंगे। रुद्रप्रयाग के मुख्य शहर से पहले ही मार्ग दो भागों में बट जाता है।

ऊपर की ओर सीधा जाने वाला रास्ता बद्रीनाथ चला जाता है और नीचे बायें की ओर जाने वाला मन्दाकिनी घाटी से होते हुए केदारनाथ। आपको केदारनाथ वाले रास्ते पर ही जाना है जो की रुद्रप्रयाग बाईपास के रूप में भी जाना जाता है।

रुद्रप्रयाग – केदारनाथ हाईवे पर रुद्रप्रयाग से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है कुंड। कुंड से मार्ग दो भागों में विभक्त हो जाता है। दायें वाला मार्ग मन्दाकिनी पार करके केदारनाथ की ओर चला जाता है और सीधा मार्ग ऊखीमठ होते हुए चोपता की ओर। कुंड से चोपता की दूरी 34 किलोमीटर है।

कुंड – चोपता रोड बेहद शानदार है और इस पर गाड़ी चलाने का अलग ही आनंद है। इस मार्ग पार आप मक्कू बैंड, दुगलभिट्टा और बनियाकुण्ड होते हुए चोपता पहुंचेंगे। इस मार्ग से एक रास्ता सारी गांव की ओर मुड़ता है जो की देवरिया ताल का बेस कैंप है।

(ध्यान दें की रुद्रप्रयाग और कुंड के बीच भीरी नामक स्थान पर भी आपको एक बोर्ड लगा हुआ मिल सकता है ‘Shortcut to Chopta’, इस रास्ते पर बिलकुल न जायें। यह बोर्ड एक रिसोर्ट वाले ने लगाया है जो की भीरी – पलद्वाड़ी मार्ग पर है। यह रास्ता आपको पलद्वाड़ी, मक्कू गांव से होते हुए मक्कू बैंड पर ले जाकर छोड़ेगा और इस प्रकार आपका रास्ता 20 किलोमीटर और लम्बा हो जायेगा)

रुद्रप्रयाग से आप बद्रीनाथ हाईवे से हुए भी चोपता पहुँच सकते हैं। यह रास्ता 40 किलोमीटर अधिक लम्बा है। इस रास्ते पर आपको चमोली से गोपेश्वर होते हुए चोपता पहुंचना होगा। यदि आप पुरे सर्किट का आनद लेना चाहते हैं तो आप वापसी में चोपता – गोपेश्वर – चमोली – कर्णप्रयाग से होते हुए रुद्रप्रयाग पहुँच सकते हैं।

यह तो हुई अपनी गाड़ी से पहुँचने की बात। अब आते हैं सार्वजानिक परिवहन पर।

इसके लिये हरिद्वार/ऋषिकेश को अपना आधार बना कर आप यात्रा शुरू कर सकते हैं। हरिद्वार के लिये देश के सभी स्थानों से ट्रेनें उपलब्ध हैं।

हरिद्वार और ऋषिकेश दोनों ही स्थानों से आपको गुप्तकाशी/गौरीकुंड की बस मिल सकती है। आपको गुप्तकाशी / गौरीकुंड की बस में बैठना है और कुंड पर उतर जाना है। कुंड से ऊखीमठ के लिये शेयर्ड टैक्सी मिलती हैं जो की लगभग 10 रुपये लेते हैं। उखीमठ पहुँच कर आपको चोपता के लिए टैक्सी बुक करनी पड़ेगी। वैसे ऊखीमठ से चोपता के लिये एक बस भी है लेकिन वह चार धाम यात्रा मौसम में ही चलती है और सुबह के समय ही मिलती है, इसलिए उसके भरोसे न रहें।

ध्यान दें की उत्तराखण्ड में दूरस्थ स्थानों के लिये बसें सुबह ही चलती हैं। गुप्तकाशी / गौरीकुंड के लिये भी अंतिम बस सुबह 6:30 तक ही है। इसलिये अपना कार्यक्रम इसी अनुसार बनायें।

वायु मार्ग

देहरादून सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है जहाँ के लिये देश के सभी प्रमुख शहरों से फ्लाइट मिल जाती है। देहरादून से आगे का सफर आपको ऊपर दिये रास्ते से ही करना होगा।

हरिद्वार – चोपता मार्ग में आने वाले प्रमुख स्थान

हरिद्वार

इस शहर को को उत्तराखण्ड का प्रवेश द्वार माना जाता है। यहभारत के सात प्रमुख पवित्र धार्मिक नगरों में से एक हैं। इसे मायापुरी के नाम से भी जाना जाता है। हर की पौड़ी, भारत माता मंदिर, मनसा देवी मंदिर, चंडी देवी मंदिर, शांति कुञ्ज, कनखल आदि यहाँ के प्रमुख तीर्थ हैं।

ऋषिकेश

ऋषिकेश से ही पहाड़ों के दरवाज़े खुलते हैं। इस नगरी को भगवान विष्णु ने ऋषियों के तप-धयान आदि के लिए बसाया था। एक समय था जब ऋषिकेश में साधु – संतो का वास था, मंदिर थे। तीर्थ यात्री आदि तीर्थ के उद्देश्य से ही जाते थे और योगी योग के लिए। आज भी विदेशियों के लिए यह शहर योग की राजधानी है I

शिव पुरी

शिवपुरी को राफ्टिंग कैपिटल कहना ही सही रहेगा। ऋषिकेश में होने वाली राफ्टिंग की शुरुआत शिव पुरी से होती है।

देव प्रयाग

देवप्रयाग ही वह स्थान है जहाँ भागीरथी को गंगा के नाम से जाना गया। यहाँ गोमुख से आने वाली भागीरथी और बद्रीनाथ के आगे सतोपंथ से आने वाली अलखनंदा नदियों का संगम है। इन्ही दोनों नदियों के संगम से बनने वाली नदी को आगे गंगा के नाम से जाना जाता है। समुद्रतल से 830 मीटर की ऊँचायी पर बसा यह स्थान टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में है।

देखने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं है यहाँ। संगम पर बैठे – बैठे कब शाम हो जायेगी, शायद आपको पता भी न चले। संगम स्थल से थोड़ी ऊपर जाने पर रघुनाथ मंदिर है। एक बात और, हिंदी फिल्म किसना का गाना ‘हम हैं इस पल यहाँ’ यहीं फ़िल्माया गया था।

श्री नगर

यह कश्मीर वाला श्री नगर नहीं है। उत्तराखंड में भी है एक श्री नगर और यह गढ़वाल का सबसे बड़ा शहर है। ब्रिटिश सरकार ने इसे गढ़वाल की राजधानी भी बनाया था। एक आम शहर की तरह यहाँ सभी सुविधाएँ मौजूद हैं जैसे की हेमवती नंदन बहुगुणा विश्ववविद्यालय, पॉलिटेक्निक, बड़े हस्पताल आदि।

यहाँ अलकनंदा एक बड़ी घाटी बना कर बहती है। शहर के बाहर धारी देवी का मंदिर स्थित है जो की नदी के बीच में बना है। कहा जाता है की मंदिर की स्थापना श्री आदि शंकराचार्य ने की थी।

रूद्रप्रयाग

रुद्रप्रयाग में केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी और अलकनंदा का संगम होने के साथ – साथ रूद्रप्रयाग जिले का मुख्यालय भी है। बस स्टैंड के पास ही एक छोटा सा आर्मी का डीपो है जिसमे सेना की कुछ पुरानी गाड़ियाँ खड़ी है।

यहाँ से मार्ग दो भागों में बट जाता है। सीधा मार्ग अलखनंदा के साथ – साथ बद्रीनाथ से होते हुए माणा पास तक जाता है और दूसरा मार्ग मंदाकिनी घाटी से होते हुए गौरी कुंड तक जाता है। चोपता जाने के लिए दोनों मार्गों का उपयोग किया जा सकता है।

अगत्स्यमुनि

अगत्स्यमुनि इस मार्ग पर छोटा सा शहर है जहाँ अगत्स्यमुनि का मंदिर है।

ऊखीमठ

ऊखीमठ शहर को ओम्कारेश्वर मंदिर के लिये जाना जाता है। मन्दिर का वर्तमान स्वरुप 11वीं शताब्दी का माना जाता है। यह स्थान कई हिन्दू देवी देवताओं के लिए समर्पित है। भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर के बेटी ऊषा का विवाह इसी मंदिर में संपन्न हुआ था।

शीत काल में पंच केदार में से दो केदार, श्री केदार नाथ और श्री मध्यमहेश्वर की डोली यहीं राखी जाती है और पूजा होती है। राजा मान्धाता की तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ, शिवलिंग रूप में यहाँ स्थापित हुए थे।

सारी

सारी गांव को देवरिया ताल के बेस कैंप के रूप में जाना जाता है।

मक्कू बैंड

चोपता से 12 किलोमीटर पहले इस स्थान से मक्कू गांव के लिये रास्ता अलग हो जाता है। मक्कू गांव में ही बाबा तुंगनाथ की शीतकालीन पूजा होती है। सर्दियों में भयंकर बर्फ़बारी के कारण कई बार गाड़ियों को यहीं रोकना पड़ जाता है।

Baniyakund
Baniyakund

कब जायें ?

श्री तुंगनाथ मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया (अप्रैल अंत/ मई आरम्भ) को खुलते हैं और दीपावली के बाद भैया दूज के दिन बंद हो जाते हैं। इसलिये यदि आप भगवान तुंगनाथ के दर्शन करना चाहते हैं इस बीच ही जायें।

किन्तु ध्यान दें की इन महीनों में बर्फ़ देखने को नहीं मिलेगी। बर्फ़बारी दिसंबर मध्य से मार्च मध्य तक होती है। इसलिये आपको बर्फ़बारी और भगवान तुंगनाथ के दर्शनों में से किसी एक का मोह त्यागना होगा। सर्दियों में यहाँ बर्फ़बारी बहुत भयंकर रूप से होती है इसलिये तैयारियों के साथ ही जायें।

एक बात और, यदि आप पहाड़ों की चरम सुंदरता देखना चाहते हैं लेकिन बर्फ़ देखने का मोह नहीं है तो जुलाई और अगस्त से बेहतर कुछ नहीं। आप भी सोच रहे होंगे की मैं कैसी बचकानी बातें कर रहा हूँ।

अक्सर जब आप गूगल पर हिमाचल और उत्तराखण्ड के पहाड़ों की तस्वीरें सर्च करते हैं तो जो हरे – भरे और बादलों से ढके पहाड़ों की तस्वीरें आपके मोबाइल स्क्रीन पर दिखायी देती हैं, वे मानसून की ही होती हैं। मानसून में भयंकर बारिश, बाढ़ और बादल फ़टने के समाचार न्यूज़ चैनलों पर देख – देख कर आधे से अधिक पर्यटक पहाड़ों में जाते ही नहीं जिसका लाभ आप उठा सकते हैं। स्वर्ग समान बादलों से ढके पहाड़ों को देखने का लुत्फ़ और भगवान तुंगनाथ के दर्शन आपकी यात्रा को बेहतरीन बना देंगे। हाँ, कुछ सावधानियाँ बरतनी आवश्यक हैं और वे क्या हैं आप इस लेख में पढ़ेंगे।

 

यात्रा पूर्व तैयारी और यात्रा के दौरान सावधानियाँ

  • पहाड़ों में AMS (Acute Mountain Sickness) की समस्या होना आम बात है। इसके लक्षण हैं बुखार, तेज़ बदन दर्द, खांसी, सर दर्द, उल्टी आदि। इसके लिये यात्रा आरंभ करने से कुछ दिन पहले शारीरिक गतिविधियों को बढ़ा दें जैसे की सुबह की सैर और कुछ व्यायाम और योग आदि।
  • यदि आप दिल्ली से जा रहें हैं तो इस यात्रा में कुल 4 दिन लगते हैं। इसलिये अपने शहर से दूरी के हिसाब छुट्टियां निर्धारित करें और यदि संभव हो तो एक – दो दिन अतिरिक्त लेकर चलें।
  • प्राइवेट मीडिया चैनल की भड़काऊ न्यूज़ पर अधिक विश्वास न करें। डीडी न्यूज़ विश्वशनीय समाचारों के लिए एक अच्छा विकल्प है।
    यदि पहाड़ों से अच्छी ख़बरें नहीं आ रही हैं तो यात्रा पर निकलने से पहले सम्बंधित लोकल बॉडी, सरकारी एजेंसी या वहां के किसी होटल आदि से संपर्क कर के स्थिति के बारे में जानकारी ले लेना सही रहेगा। आज कल सभी सरकारी एजेंसियों और होटल आदि के संपर्क सूत्र गूगल पर उपलब्ध हैं।
  • यात्रा के दौरान अपना पहचान पत्र और पर्याप्त मात्रा में कैश रखें। हमेशा कैशलेस ट्रांसेक्शन और ए.टी.एम. के भरोसे रहना सही नहीं रहता। मोबाइल चार्ज करने के लिए पॉवर बैंक, और मोबाइल में पर्याप्त बैलेंस भी रखें। साथ ही आवश्यक कांटेक्ट नंबर्स किसी डायरी में लिख कर रखें।
  • यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों के संपर्क में रहें और आगे की स्थिती की जानकारी लेते रहें। किसी भी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा की स्थिती में पुलिस का आदेश माने।
  • पानी और हल्का – फुल्का खाने का सामान जैसे की बिस्किट, चिप्स, नमकीन आदि अपने पास अवश्य रखें।
  • 8 वर्ष से छोटे बच्चों को न ले जायें।
  • यात्रा में तबियत बिगड़ना स्वाभाविक है। इसलिये कुछ आवश्यक दवायें अवश्य साथ रखें। जिन लोगों को बस में उलटी की समस्या है उनके लिये Avomine बहुत अच्छी टेबलेट है लेकिन विशेष बीमारी की स्थिति में पहले अपने डॉक्टर से सलाह कर लें।
  • छाता/ रेनकोट, टॉर्च को अपने बैग में अवश्य स्थान दें।
  • चोपता में रुकने की कोई समस्या नहीं है। यहाँ होटल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। यदि आप यात्रा मौसम में जा रहे हैं और मंदिर के पास ही रुकना चाहते हैं तो वह भी संभव है। तुंगनाथ मंदिर के पास भी होटल उपलब्ध हैं।
  • चोपता से तुंगनाथ और तुंगनाथ से चंद्रशिला की यात्रा बहुत कठिन है। ट्रेकिंग के दौरान धीरे ही चलें और अपनी शारीरिक क्षमताओं का ध्यान रखें। किसी की देखा – देखी आपको नुकसान पहुंचा सकती है।
  • सर्दियों में स्नो बूट की आवश्यकता पड़ेगी। यहाँ किराये पर उपलब्ध हैं।
  • सर्दियों में यहाँ बहुत अधिक बर्फ़ होती है। मुख्य रास्ते से ही चलें, किसी शोर्टकट पर न जायें अन्यथा बर्फ़ में धंस भी सकते हैं।
  • तुंगनाथ मंदिर से चंद्रशिला की ओर जाते समय एक स्थान पर रास्ता दो भागो में विभक्त हो जाता है। सीधा रास्ता घने जंगलों से होते हुए गोपेश्वर और बायें वाला चट्टान पर चढ़ कर चंद्रशिला की ओर जाता है। यद्धपि यहाँ एक छोटा सा बोर्ड लगा हुआ है किन्तु यह ऐसा टूटा – फूटा बोर्ड है की शायद आपका इस पर ध्यान न जाये लेकिन आपको इस पर ध्यान देना है अन्यथा रास्ते से भटकना तय है।
  • ट्रेकिंग से पहले और ट्रेकिंग के दौरान शराब और बियर आदि का सेवन न करें।
  • पहाड़ों में कहीं भी आने – जाने के लिये गाड़ी सुबह ही मिलती है। इसलिये रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें।
  • उत्तराखण्ड में पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लग चुका है। यद्धपि दुकान वाले रीसाइकल्ड थैलियां देते हैं किंतु उसके भरोसे अधिक न रहें
  • इस क्षेत्र के लोग सीधे – सादे होते हैं, किसी तरह की बदतमीज़ी बिलकुल न करें। इनके सीधे पन का एक उदाहरण आपको मेरे यात्रा वृत्तांत में पढ़ने को मिलेगा।

इस लेख में चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा से जुड़ी लगभग सभी जानकारियां देने का प्रयास किया गया है। यदि आपके मन में कोई प्रश्न है तो कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें या हमारे सोशल मीडिया पेज पर मैसेज कर सकते हैं। इसके अतरिक्त आप हमारे फेसबुक ग्रुप का भी हिस्सा बन सकते हैं।

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यात्रा वृत्तांत में ऋषिकेश से मक्कू बैंड तक का सफ़र पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।
मक्कू बैंड से चोपता तक का यात्रा वृत्तांत पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

पिछली दो चोपता यात्राओं के वृत्तांत पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।

फ़रवरी 2017 की चोपता यात्रा
दिसंबर 2017 की चोपता यात्रा


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