Trip to Chopta Rishikesh to Makku Band चोपता यात्रा ऋषिकेश से मक्कू बैंड

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चीला बैराज के रास्ते से होते हुए हम कब ऋषिकेश की गलियों में दाखिल हो गये पता ही नहीं चला। दिल्ली में देश का मुख्य, सबसे बड़ा और सबसे पुराना एम्स है लेकिन अब अन्य शहरों में भी एम्स शुरू हो गये हैं और ऋषिकेश एम्स भी उनमे से एक है। यदि आप चीला वाले रास्ते से आयें तो यह आपको दिखेगा। एम्स वाले रोड से होते हुए आगे जाने पर एक तिराहा (T Point) आता है जहाँ दिल्ली – ऋषिकेश हाईवे मिल जाता है। यहीं से दायें मुड़ने पर ऋषिकेश आ जाता है।

चंद्रभागा नदी जो की देहरादून को टिहरी गढ़वाल जिले से अलग करती है, उसको पार करके हम बढ़ चले पहाड़ों की ओर। वैसे इच्छा तो थी ऋषिकेश के घाटों पर भी कुछ समय बिताने की लेकिन समय पहले ही बहुत निकल चुका था।

चल गंगा के साथ

ऋषिकेश से ही पहाड़ों के दरवाज़े खुलते हैं। इस नगरी को भगवान विष्णु ने ऋषियों के तप-धयान आदि के लिए बसाया था। एक समय था जब ऋषिकेश में साधु – संतो का वास था, मंदिर थे। तीर्थ यात्री आदि तीर्थ के उद्देश्य से ही जाते थे और योगी योग के लिए। आज भी विदेशियों के लिए यह शहर योग की राजधानी है I

वैसे चाहे केदारनाथ रूट पर जाना हो या बद्रीनाथ बद्रीनाथ रूट पर, मुख्य रास्ता ऋषिकेश – देव प्रयाग – श्री नगर और रूद्र प्रयाग हो कर ही जाता है लेकिन वर्तमान में पुरे राज्य में चार धामों (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ) को जोड़ने वाले मार्गों को चौड़ा करने का कार्य चल रहा है। इतना ही नहीं उत्तराखण्ड के प्रमुख मार्गों को भी चौड़ा किया जा रहा है।

इस कारण पहाड़ों को काटे जाने से ज़्यादातर मार्ग टूटे – फूटे पड़े हैं और इन पर भयंकर ट्रैफिक जाम लगता है। ऋषिकेश – रुद्रप्रयाग मार्ग भी ऐसा ही है। ऋषिकेश के कुछ आगे तक तो रोड बन चुका है और वह बहुत अच्छा बना है लेकिन उसके आगे श्री नगर तक गड्ढे ही गड्ढे हैं और इस कारण दीपक जी गाड़ी बिजनौर – कोटद्वार – लैंसडौन वाले मार्ग से श्री नगर तक लाना चाहते थे लेकिन चूंकि कृष्णा जी भी सफ़र में साथी थे इसलिये परंपरागत रास्ता ही चुना। वैसे कई जगह रास्ता पूरी तरह बन चुका है और जो बना है वह किसी एक्सप्रेसवे से कम नहीं। आशा है की आने वाले एक – दो सालों में उत्तराखण्ड में रास्तों की समस्या समाप्त हो जायेगी।

”वो जो गंगा पार गुलाबी पत्थरों वाला मदिरों जैसा आश्रम दिख रहा है न, वही परमार्थ निकेतन है… ऋषिकेश का सबसे बड़ा आश्रम… 1000 कमरे, य्ये भव्य आश्रम… वहां घाट पर होने वाली संध्या आरती भी गजब होती है। अरे कभी ऋषिकेश परिवार सहित आओ न, तो वहीं रुकना” – ये सब कहते – कहते राम झूला पीछे छूट गया और कुछ ही मिनट में लक्ष्मण झूला भी।

अब हम शिवालिक की पहाड़ियों में थे। सुबह का समय और सर्दियों का मौसम होने के कारण बहुत अच्छा लग रहा था। पहली बार मैं गाड़ी की फ्रंट सीट पर बैठने का आनंद ले रहा था और मोबाइल की बैटरी की भी कोई समस्या नहीं थी। लक्ष्मण झूला से कुछ आगे तक तो रास्ता बहुत ही अच्छा बन गया है। बड़ी ख़ुशी हुई ये देख कर।

देर होने लगी

लेकिन यह प्रसन्नता कुछ ही देर में पता नहीं कहाँ चली गयी ? छोटे – बड़े गड्ढे, पहाड़ों के नये – नये कटान के कारण उड़ती धुल, रोड पर बिखरी हुई गिट्टियां और इसी के साथ पहला पंक्चर। स्टपनी का नट जाम होने के कारण वह टेढ़ा हो गया था लेकिन किसी तरह खुल गया और हम स्टपनी बदलने में कामयाब रहे। अब चिंता थी पंक्चर हुए टायर को ठीक करवाने की क्योंकि यदि नया वाला टायर भी पंक्चर हो जाता है तो हमारे पास सुनसान धूल भरे रास्ते पर खड़े होने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता। एक दुकान से वह पंक्चर तो ठीक करवा लिया लेकिन जो नट टेढ़ा हुआ था उसे ठीक भी करवाना जरुरी था।

जगह – जगह पत्थरों को काटने का काम चल रहा है इसलिये यातायात को कुछ समय के लिये रोकना पड़ जाता है।
बायें से – प्रणव और कृष्णा

भटकते – भटकते आखिर तीन धारा पहुँच ही गये। इस स्थान का नाम ही तीन धारा है, आज तक धारा तो एक भी नहीं दिखी। केदारनाथ हो या बद्रीनाथ, सभी यात्री यहाँ के ढाबों में पेट पूजा करके ही आगे बढ़ते हैं। भीड़ भरे ढाबों से इतर सबसे अंतिम वाले एक खाली से ढाबे में स्वादिष्ट भोजन किया। अब तक 12:30 बज चुके थे, अथार्त हम बहुत ही लेट हो चुके थे।

भोजन करके देव प्रयाग की तरफ बढ़े। मार्ग में एक रिपेयर शॉप से नट बदलवा कर फिर आगे बढ़ चले। नट बदलने के दौरान दूर – बहुत दूर कहीं पहाड़ों पर बर्फ जमी हुई दिख रही थी और देखने से लग रहा था की वाकई कोई ऊँची चोटी है। बहुत अनुमान लगाने की कोशिश की लेकिन पहचान नहीं पाया उन चोटियों को। नीचे फोटो दे रहा हूँ… शायद आप पहचान जायें।

ध्यान से देखिये – दूर बादलों के पीछे कुछ बर्फ से ढकी चोटियां हैं। क्या आप पहचान सकते हैं ?

वैसे जितना समय अब तक लग चुका था, उस हिसाब से हमें सीधा चोपता की ओर फर्राटा भरना चाहिये था लेकिन मन में एक इच्छा थी देव प्रयाग के संगम को समीप से देखने की। इसलिये देव प्रयाग पहुंच कर गाड़ी रुकवाई और एक संगम की ओर जाते रास्ते पर चल पड़े।

देव प्रयाग की गलियां

पतली गलियों में लगे बाज़ार से हो कर गुजरना बहुत अच्छा लग रहा था। ऐसा लगा की मानों अपने ही गांव के छोटे से बाज़ार के बीच से गुज़र रहे हों। पतली गलियों से निकलते हुए हम पहुँच गये देव प्रयाग के हैंगिंग ब्रिज पर। ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला जैसा तारों पर झूलता यह पुल बहुत खूबसूरत है।

गोमुख से आती हुई भागीरथी जब बद्रीनाथ से आती हुई अलकनंदा से यहाँ संगम करती है तो अद्भुत दृश्य उत्पन्न होता है। अलकनंदा का जल शांत गति से बहता है लेकिन उसमें गहराई है, भागीरथी का बहाव बहुत तेज़ है। दोनों नदियों का रंग भी अलग है। भागीरथी की धारा श्वेत रूप में अलकनंदा हरे रंग में है। देवप्रयाग ही वह स्थान है जहाँ भागीरथी को गंगा के नाम से जाना गया। समुद्रतल से 830 मीटर की ऊँचायी पर बसा यह स्थान टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में है।

गूगल इमेज पर इस स्थान पर दोनों के संगम की तस्वीरों को वास्तविक रूप में देखने के लिये यहाँ पर्यटकों का हुजूम उमड़ता है।

हैंगिंग ब्रिज पर फोटो हमेशा ही अच्छे आते हैं और इसी कारण पहली बार आने वाले यात्री 15 मिनट से पहले इस ब्रिज से हटते नहीं। पुल पार करके संगम तट पहुंचे। ‘चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर, तुलसीदास चन्दन देत तिलक करें रघुबीर’ – कुछ ऐसा ही दृश्य था। अंतर केवल यही था की तुलसीदास थे यहाँ के ब्राह्मण और उनके रघुबीर थे यहाँ आने वाले भक्त।

अलकनंदा की दूसरी ओर धुआं उठता देख हम समझ गये की वहां से किसी की प्रभु के घर लिए अंतिम विदाई हो रही है।

देखने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं है यहाँ। संगम पर बैठे – बैठे कब शाम हो जायेगी, शायद आपको पता भी न चले। संगम स्थल से थोड़ी ऊपर जाने पर रघुनाथ मंदिर है। समयभाव के कारण वहां नहीं जा पाये। देव प्रयाग से निकलते हुए हमें दोपहर के 2 बज चुके थे और अब किसी भी तरह की देरी करना गलत था।

Devprayag bridge
Devprayag bridge

देव प्रयाग का संगम

यहाँ से निकलते ही मुझे और शायद प्रणव और कृष्णा जी को भी नींद आ गयी। जब नींद खुली तो श्री नगर शहर निकल चुका था और इसी के साथ धारी देवी के दर्शनों की इच्छा भी नींद की भेंट चढ़ गयी थी। हम कलियासौड़ के पास थे। यहाँ जल विद्युत परियोजना के कारण अलकन्दा घाटी का फैलाव ज़्यादा है और पानी भी ठहरा हुआ है। यहाँ पानी में बनती पहाड़ों की छवि बहुत खूसूरत लगती है। जल में बनती छवि इतनी साफ दिखती है की मानो HD टीवी।

ब्लॉगर मयंक पाण्डेय इस स्थान से बहुत प्रभावित रहते हैं, उन्होंने तो यही फोटो लेने में एक घंटा बिता दिया था। वैसे अब तक रास्तों की हालत बहुत बेहतर हो गयी थी और माहौल में ठंडक भी बढ़ गयी थी। यहाँ पांच मिनट रुकने के बाद रूद्र प्रयाग की ओर बढ़ चले।

Kaliyasaud before Rudraprayag

Kaliyasaud

रुद्रप्रयाग से रास्ता दो भागों में बट जाता है। एक रास्ता केदारनाथ की ओर और दूसरा बद्रीनाथ की ओर। पहले मुख्य बाजार से हो कर ही जाना पड़ता था और जाम में फंसना पड़ता था लेकिन अब मुख्य शहर से पहले एक बाई पास (जवाणी बाई पास) बन चुका है जो की रुद्रप्रयाग के ट्रैफिक से बचाता है।

अब रुद्रप्रयाग शहर से पहले ही एक रास्ता ऊपर की ओर सीधा बद्रीनाथ की ओर जाता है और दूसरा रास्ता बायीं ओर नीचे की तरफ वाला बाई पास से होते हुए केदारनाथ की ओर। हमारी गाड़ी दूसरे रास्ते पर ही जा रही थी। रुद्रप्रयाग में केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी और अलकनंदा का संगम होने के साथ – साथ रूद्रप्रयाग जिले का मुख्यालय भी है।

अब तक शाम हो चली थी और सूर्य भी ढलने लगा था। हम तो अभी तक रुद्रप्रयाग ही पहुंचे थे… इसलिये चिंता बढ़ना स्वाभाविक था। रुद्रप्रयाग से निकल कर कुंड की ओर हम बढ़ते जा रहे थे। अगत्स्यमुनि तक पहुँचते – पहुँचते अब अंधेरा होने लगा था। यहाँ रुक कर चाय पी और फिर आगे के सफ़र पर चल पड़े।

चार धाम मार्ग को चौड़ा करने के कारण जगह – जगह पहाड़ काटने से यातायात को कुछ समय के लिये रोकना पड़ जाता है लेकिन एक बात तो है की सभी गाड़ियां पंक्ति में ही खड़ी रहती हैं और आधा रास्ता खाली रहता है। यह दृश्य देख कर सिक्किम की एक फोटो याद आ गयी जहाँ कोई भी समस्या होने पर सभी गाड़ियां एक तरफ पंक्ति में ही खड़ी हो जाती हैं। इस तरह का अनुशाशन उत्तर भारत में पहली बार देखने को मिल रहा था।

अगत्स्यमुनि से आगे का रास्ता बेहद ख़राब और कीचड़ भरा हो गया था। जैसे – तैसे धीरे – धीरे हम आगे बढ़ रहे थे। अब तक पूरा अंधेरा हो चुका था लेकिन मैं सतर्क था कुंड से ऊखीमठ की ओर जाने वाले रास्ते को लेकर।

अगत्स्यमुनि के आस पास

एक गलत रास्ते का सफर

भीरी से थोड़ी ही आगे बढ़े थे की बायीं ओर जाते एक रास्ते पर बोर्ड लगा था ‘Shortcut to Chopta only 20 kilometer’। यहाँ कुछ संदेह सा हुआ की यह स्थान कुंड तो नहीं हो सकता… मेरे साथी और ड्राइवर भी कहने लगे की चोपता का रास्ता तो यही दिखा रहा है। अंततः मैंने भी मान लिया की यही रास्ता होगा, शायद अंधेरे में सही दिख नहीं रहा इसलिये कुछ अजीब सा लग रहा है।

हम उस ही रास्ते पर बढ़ चले। वह रास्ता तेज़ी से जंगलों से होते हुए ऊंचाई की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन रास्ता बना बहुत ही शानदार था। मुझे उम्मीद थी की कुंड – चोपता मार्ग होने के कारण ऊखीमठ शहर अवश्य आयेगा, लेकिन यह तो रास्ता ही अलग था। यहाँ केवल घने और भयानक जंगल थे। यह मार्ग था भीरी – पलद्वाड़ी – मक्कू बैंड मार्ग।

यदि आप कुंड से ऊखीमठ होते हुए चोपता की ओर जायें तो चोपता से 12 किलोमीटर पहले मक्कू बैंड आता है, जहाँ से एक रास्ता मक्कू गांव की ओर मुड़ जाता है। मक्कू गांव में ही बाबा तुंगनाथ की शीतकाल में पूजा होती है। जिस रास्ते पर हम गलती आ गये थे, वह रास्ता पलद्वाड़ी और मक्कू गांवों से होते हुए मक्कू बैंड पर जाकर कुंड – चोपता मार्ग में मिल जाता है। यह रास्ता 20 किलोमीटर लंबा न होकर 45-50 किलोमीटर लम्बा साबित होने वाला था।

इस रास्ते पर एक बड़ा रिसोर्ट है और उसी रिसोर्ट वाले ने ही भीरी के पास ‘Shortcut to Chopta only 20 kilometer’ का बोर्ड लगाया हुआ है ताकि लोग उसके रिसोर्ट तक आयें। इस रास्ते पर हम बढ़ते जा रहे थे और वो भी गूगल मैप के अनुसार। यहाँ गूगल मैप भी धोखा दे रहा था। एक स्थान पर तो हम फिर से रास्ता भटक गये और हमारी कार एक ऐसे डेड एंड पर आ गयी जहाँ से रास्ता कहीं नहीं जाता था।

किसी तरह गाड़ी को वापस मोड़ा और फिर से चल पड़े उन्हीं गुमनाम रास्तों पर। कुछ ही देर में वही रिसोर्ट दिखाई दिया जिसने भीरी में शॉर्टकट टू चोपता का बोर्ड का बोर्ड लगाया हुआ था। मक्कू गांव से बाहर निकलते ही रास्ते के दोनो ओर बर्फ दिखने लगी थी। अब हमें सतर्क हो जाना था।

घना जंगल, अँधेरा, दोनों ओर बर्फ और ऊपर से रास्ते पर जमी ब्लैक आइस। ब्लैक आइस सफ़ेद बर्फ से भी अधिक ख़तरनाक होती है। इस पर कब गाड़ी फिसल कर खायीं में गिर जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता। पहाड़ों में होने वाली बहुत सी दुर्घटनाओं का कारण यही ब्लैक आइस होती है।

आखिर एक गाड़ी आगे से आती हुई दिखी। पहले निकलने को लेकर उससे कुछ नोक – झोंक हुई… उसने बताया की आगे बर्फ़ बहुत ज़्यादा है। खैर… आगे बढ़ चले एक बार फिर। घुप्प अँधेरे से गुज़रते हुए आख़िर हम पहुँच ही गये मक्कू बैंड।

यहां दो ढाबे बने हुए हैं और उन्हीं ढाबे वालों के दो होटल हैं। होटल मालिक सुभाष बिष्ट ने बताया की आगे की स्थित बहुत खतरनाक है और रात में आगे जाना खतरे से खाली नहीं। यहां तक की उन्होंने के कह दिया की हम आगे जा ही नहीं पायेंगे। बर्फ़ बहुत ज़्यादा है।

एक बार तो ऐसा लगा की शायद यह अपने फायदे के चलते ऐसा कह रहा हो… लेकिन एक बात है की यहाँ के लोग अपने फायदे के लिये झूठ नहीं बोलते। यही सोचते हुए यहीं शरण लेना उचित समझा। कार यहीं खड़ी करके होटल के कमरे में चले गये। नेशनल पार्क का क्षेत्र होने के कारण यहाँ बिजली कनेक्शन उपलब्ध नहीं है और सौर ऊर्जा ही एकमात्र सहारा है।

सुभाष जी ने सौर ऊर्जा की एक लाइट कमरे में ला कर टांग दी। उसका उजाला भी इतना ही था की वह अपनी ही शक्ल देख रही थी। सुभाष जी बता रहे थे की आप तुंगनाथ किसी भी हालत में नहीं पहुंच सकते, सभी रास्ते ब्लॉक हो चुके हैं। उनकी बातों को हम सुन भी रहे थे और स्वयं पर विश्वास भी था की तुंगनाथ जी तक तो पहुचेंगे ही… फिर चाहे जो भी हो।

एक बात और, यहाँ कभी भी पहले से खाना बना कर नहीं रखा जाता। जब कोई मेहमान आता है तब खाना बनता है। इसलिये खाना आते – आते एक घंटा हो गया। भोजन करके सोने का प्रयास किया लेकिन सर्दी अधिक थी। खैर … जैसे – तैसे नींद आयी इस उम्मीद के साथ की अगले दिन शायद हम चोपता पहुँच पायें।

इस भाग में इतना ही। हम तुंगनाथ जी तक पहुँच पाये या नहीं पहुँच पाये या फिर होटल से भी आगे नहीं बढ़ पाये ? यह सब जानने के लिये मक्कू बैंड से चोपता तक की यात्रा पढ़ें।

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