Final road to Chopta

Trip to Chopta Makku Band to Chopta चोपता यात्रा मक्कू बैंड से चोपता

चोपता यात्रा के तीन भाग आ चुके हैं और आशा है की आपको पिछले दो भाग पसंद आये होंगे। किसी कारणवश यदि आप उन्हें पढ़ने से चूक गये हैं तो नीचे दिये गये लिंक्स पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

चोपता के बारे में जानकारी, मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थान, चोपता कैसे पहुंचे, उपयुक्त मौसम, महत्वपूर्ण सावधानियों आदि से सम्बंधित जानकारियां)।
दिल्ली से ऋषिकेश तक की यात्रा का वृत्तांत।
ऋषिकेश से मक्कू बैंड तक की यात्रा का वृत्तांत।

अब बढ़ते हैं आगे।

पिछली रात होटल मालिक सुभाष जी ने पहले ही बता दिया था की आगे बर्फ अधिक होने के कारण आपकी कार नहीं जा पायेगी और साथ ही उन्होंने ने यह भी बताया था की सुबह 9 – 10 बजे एक बोलेरो आती है… उससे जहाँ तक बन पड़ेगा वो छोड़ देगा।

आज चोपता पहुंचना है 

आज सुबह 5 बजे ही नींद खुल गयी थी। यदि स्थिती सामान्य होती तो हमें इसी समय उठ कर यात्रा शुरू कर देनी चाहिये थी लेकिन फिर सुभाष जी की कही बात याद आ गयी और ऊपर से बाहर पड़ रही सर्दी के कारण कम्बल से निकलने की हिम्मत ही नहीं हुई। हम चारो जाग चुके थे लेकिन सभी पहले आप – पहले आप वाली रस्म निभाते हुए बिस्तर में पड़े हुए थे।

इस बीच आखिर कृष्णा जी ने हिम्मत दिखाई निकल पड़े बाहर के सैर – सपाटे पर। 2 घंटे में सभी एक – एक करके उठे और तैयार हुए। बाहर थोड़ी – थोड़ी धूप निकल आयी थी। रात में तो कुछ सही से दिखा ही नहीं था लेकिन अब दिख रहा था की बर्फ़ कितनी अधिक पड़ी है।

बर्फ़बारी वास्तव में बहुत अधिक हुई थी, रास्ते के दोनों किनारों पर, रास्ते पर और पहाड़ों पर… हर ओर केवल सफ़ेद चादर ही थी। पिछले 10 दिनों से पानी की आपूर्ति बाधित होने के कारण सुभाष जी पहाड़ों पर पड़ी बर्फ़ पिघला कर ही पानी बनाने में लगे हुए थे।

Morning view of Makku Band
Morning view of Makku Band
Makku Band
Makku Band
Camping in Makku Band
Camping in Makku Band
Road going towards Makku Village
Road going towards Makku Village

 

थोड़ी ही देर में ऊखीमठ से आने वाली बोलेरो आ चुकी थी। हमने सुभाष जी को कह दिया की जल्दी से नाश्ते के लिये और रास्ते के लिये पराठे तैयार कर दे। कुछ ही देर में हम सभी नाश्ता करके बोलेरो में बैठ चुके थे।

रात 11 बजे चंडीगढ़ से एक आल्टो में एक युवक और उसके साथ तीन लड़कियां आये थे। शायद उन्होंने ने मक्कू बैंड के ढाबों की ओर ध्यान नहीं दिया और अंधेरे में ही चोपता की ओर जाने लगे। परिणाम वही हुआ जो होना था… उनकी कार बर्फ में फिसल कर खायीं में गिरते – गिरते बची और जब उन्होंने वापस मोड़ने का प्रयास किया तो कार वहीं बर्फ़ में फस गयी। रात भर उन लोगों ने कार में ही बितायी।

उन लोगों ने भी वही गलती की थी जो बहुत से लोग करते हैं। उन्होंने चंडीगढ़ से निकलते समय गूगल पर चोपता सर्च किया और उन्हें सबसे पहले रुद्रप्रयाग वाला चोपता दिख गया और वे वहीं पहुंच गये। वहां पहुंच कर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। इस कारण उन्हें मक्कू बैंड तक पहुँचने में रात के 11 बज गये थे। इस भाग दौड़ में वे लोग इतना थक चुके थे की यहीं से वापस चले गये।

हाँ तो हम बोलेरो में थे… बोलेरो कुछ ही देर में चल पड़ी। हर ओर केवल बर्फ़ और वो भी कई फ़ीट मोटी। रास्तों पर भी बर्फ़ पड़ी हुई थी। अब लग रहा था की कार को मक्कू बैंड में खड़ा करना ही सही था।

बर्फ़ीले रास्ते पर चलते हुए 15 मिनट में ही गाड़ी 4 किलोमीटर का सफ़र तय करके दुगलभिट्टा पहुँच गयी। यहाँ कुछ ढाबे हैं और एक सरकारी निरिक्षण केंद्र। गाड़ी वाले ने कहा की वो आगे नहीं जा पायेगा और हमें आगे चोपता तक 8 किलोमीटर का सफ़र पैदल ही तय करना होगा।

यहाँ फिसलन बहुत ज़्यादा थी। रात में पाला पड़ा था और वह भी रोड पर जम गया था। यहाँ घूमता एक भोटिया पिल्ला सबके आकर्षण का केंद्र बना हुआ था। ढाबे वाले से स्नो बूट के बारे में पूछा तो उसने कहा की 1 किलोमीटर ऊपर जूते मिल जायेंगे। मेरे जूते इस लायक नहीं थे की 2 कदम भी चल पाऊं और हुआ भी वही जिसकी आशा थी। पहला कदम बढ़ाते ही पैर फिसला और मैं धड़ाम… इसी के साथ दायें पैर में मोच। अभी तो बहुत चलना था और ऐसे मुड़े हुए पैर के साथ चलना मेरे लिये मुश्किल हो रहा था लेकिन चलना तो था ही।

Dugalbhitta
Dugalbhitta

मैंने एक डंडा लिया और चल पड़े हम सभी चोपता सफ़ारी पर। यहाँ बहुत ज़्यादा बर्फ थी। स्नो कटर JCB यहाँ से गुज़री थी और उसके पहियों के निशान बन गये थे। उन निशानों पर चलना थोड़ा सरल था। इसलिये मैं उन्हीं पर चल रहा था। सबसे आगे प्रणव भाई, उनके साथ दीपक, उनके पीछे कृष्णा जी और सबसे पीछे मैं… खैर यह मेरे लिये कोई नयी बात नहीं थी ! मैं हमेशा पीछे ही चलता हूँ, हाँ इस बार थोड़ी ख़ुशी 🙂 थी की कभी – कभी कृष्णा जी पीछे रह जाते थे फोटो लेने के लालच में।

जैसे – जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे बर्फ़ बढ़ती जा रही थी। पेड़ों पर भी बर्फ लदी हुई थी। चलते – चलते एक झोपड़ी दिखाई थी। वहीं अपने जूते रखे और किराये के जूते पहन कर आगे चल पड़े। पैर में मोच थी लेकिन सुविधाजनक जूतों के होने के कारण चलना कुछ आसान हो गया था। प्रणव के हांथों में DSLR पुरे मोड पर आ चुका था और जम कर फोटोग्राफ़ी जारी थी… कृष्णा जी भी डिजिटल कैमरे से लगे हुए थे बर्फ़ और पहाड़ों को कैद करने में। वैसे डिजिटल कैमरा मेरे पास भी था लेकिन उससे फोटो लेना थोड़ा झंझट का काम लगता है। इसलिये मेरा मोबाइल ही पर्याप्त था।

Around Dugalbhitta
Around Dugalbhitta
Around Dugalbhitta
Around Dugalbhitta

चलते – चलते हिमालयन रिसॉर्ट दिखाई दिया। यह रिसॉर्ट यहाँ के VIP रिसॉर्ट में गिना जाता है। आम दिनों में यहाँ बहुत चहल – पहल रहती है और महंगी गाड़ियों का जमावड़ा लगा रहता है लेकिन अब यहाँ इतनी ज़्यादा बर्फ पड़ चुकी थी की उनके अधिकांश टेंट दब चुके थे। बहुत से टेंटों की जगह तो केवल फ्रेम थे और उनका तम्बू उतार दिया गया था।

यह जगह थी ही इतनी सुंदर की हम यहीं फोटो लेने के लिये रुक गये। रिसॉर्ट की ओर चलते हुए पैर बर्फ़ में 1 फ़ीट तक धंस रहे थे। चलते – चलते एक टैंट के फ्रेम के रखी कुछ कुर्सियों पर बैठने की कोशिश की तो कुर्सियां हमें लिये बर्फ़ में धंस गयी।

कुछ देर बैठने के बाद फोटो लेनी शुरू कर दी। अभी फोटो ले ही रहे थे की किसी की आवाज़ आयी – ‘वहां से उतर जाओ, बर्फ़ के नीचे मेरा बेड पड़ा है… टूट जायेगा’।

हिमालयन रिसॉर्ट यहाँ टेंट के साथ – साथ ‘स्नो पॉड’ और कॉटेज भी उपलब्ध कराता है। ये स्नो पॉड पारदर्शी गोलाकार कमरे होते हैं और इनमे सभी सुविधायें उपलब्ध होती है लेकिन ये बहुत महंगे भी होते हैं। एक रात का किराया यहाँ 3500 रुपये है।

खैर… अभी तो यहाँ सब खाली पड़ा था। इसलिये कुछ ऊंचाई पर बने स्नो पॉड पर फोटो लेने के लिये प्रणव, कृष्णा और मैं बढ़ चले। दीपक जी कुर्सी पर बैठे – बैठे नींद पूरी कर रहे थे। यहाँ बर्फ़ की अधिकता कुछ ज़्यादा ही थी। बार – बार पैर घुटनों के ऊपर तक धंस रहे थे। प्रणव और कृष्णा जी तो स्नो पॉड तक पहुँच गये लेकिन मैं 30-40 मीटर पहले ही रुक गया, कारण की रिस्क थोड़ा ज़्यादा था। मैं कुछ देर वहीं रुका और फिर वापस कुर्सियों की ओर आकर बैठ गया। प्रणव और कृष्णा का फोटो सेशन आधे घंटे से अधिक जारी रहा।

Near Himalayan Resort
Near Himalayan Resort
Himalayan Resort
Himalayan Resort

Snow Pod of Himalayan Resort
Snow Pod of Himalayan Resort
Snow Pod
Snow Pod

उनके वापस लौटने पर मक्कू बैंड से लाये पराठे निपटाये और फिर से हम आगे चल पड़े।

मोच के कारण अब तक मेरे दायें पैर में बहुत ज़्यादा सूजन आ चुकी थी और दर्द के मारे बुरा हाल था। मोच का असर ऐसा की बुखार भी आने लगा। कुछ आगे जाने पर एक लड़की दिखाई दी, उसने बताया की आगे बनियाकुण्ड से थोड़ी दूरी प्रिंसटाइन कैंप के पास से एक शॉर्टकट रास्ता है चोपता जाने का…लेकिन वो रास्ता बर्फ़ से पूरी तरह सपाट हो चुका है और चढ़ाई बहुत ज़्यादा है। मैं ऐसे रास्तों से दूर ही रहता हूँ। कुछ दूरी पर वह रास्ता दिखा। केवल कुछ पैरों के निशान थे बर्फ़ पर। हम अपने सीधे रास्ते पर ही चलते रहे।

अब धीरे – धीरे चलने के कारण मैं बहुत पीछे छूट चुका था मुझमें और मेरे बाकि साथियों में लगभग 1 किलोमीटर का फासला आ चुका था। दोपहर हो चुकी थी और पहाड़ वीरान। मेरे साथी भी बहुत आगे थे। दूर – दूर तक कोई नहीं, हर ओर केवल बर्फ़ से ढके पहाड़, रास्ते, बर्फ से दबी गाड़ियां, बहुत से लोग अपनी गाड़ियां यहाँ फंसी हुई छोड़ कर चले गये थे।

पेड़ों पर लदी हुई बर्फ़ गिरने से भी अजीब सी आवाज आती थी और उनसे कुछ डर सा भी उत्पन्न होता था। डर किसी भूत – प्रेत का नहीं, जानवरों का था। मैं चला जा रहा था की अचानक एक 7-8 साल का लड़का सामने से आता दिखाई दिया। वेश – भूषा से टूरिस्ट ही लग रहा था। पहले तो कुछ अजीब सा लगा की ऐसे जंगल में यह बच्चा अकेला क्या कर रहा है, फिर सोचा की शायद इसके घर वाले पीछे आ रहे होंगे ! ऐसा सोच कर मैं आगे बढ़ चला।

Baniyakund
Baniyakund
Baniyakund
Baniyakund
Baniyakund camp
Baniyakund camp

Baniyakund temple

डस्टर वाला कपल

कुछ ही देर में पीछे से एक डस्टर आती दिखाई दी। पैरों में मोच के कारण मेरी दर्द से बुरी हालत थी और अब तो उस कारण बुखार भी हो गया था। डस्टर को देख कर एक उम्मीद सी जगी की शायद लिफ्ट मिल जाये, लेकिन उसमें बैठे कपल को देख कर रुक गया। वैसे भी वो लोग मुझसे मात्र 100 मीटर आगे जाकर ही रुक गये और उनका फोटो सेशन शुरू हो गया और शायद अनंत काल तक चलता रहा।

मैं धीरे – धीरे आगे चलता गया.. कुछ आगे गया था की चोपता दिखने लगा था। मुझे लगा की सामने दाहिनी ओर दिखने वाला रास्ता ही अब चोपता का अंतिम मोड़ है लेकिन यह मात्र एक भ्रम था क्योंकि वहां पहुँचने पर पता चला की अभी दो मोड़ और हैं। अब हर ओर जो थोड़ी – बहुत हरियाली दिखाई दे रही थी वह भी बर्फ में दब चुकी थी। हर और केवल बर्फ़ ही थी, और कुछ नहीं। कहीं मारुती दबी हुई थी, तो कहीं स्कूटर।

साइबेरिया कभी वास्तव में तो देखा नहीं, लेकिन जैसा टीवी पर देखा है ठीक वैसा ही यहाँ का नज़ारा था। एक पल को लगा की यदि सरकार यहाँ सुविधायें उपलब्ध कराये तो यह स्थान पर्यटन के मामले में मनाली से कहीं आगे निकल जायेगा, लेकिन फिर सोचा की जैसा चल रहा है वैसा ही ठीक है वर्ना लोग इसे भी मनाली ही बना देंगे।

दूर – दूर तक केवल श्वेत बर्फ़ और कुछ नहीं। अब चोपता बहुत समीप था… आगे बढ़ता जा रहा था की सामने से प्रणव और कृष्णा जी आते दिखाई दिये।

”लाइये… ये बैग मुझे दे दीजिये” – प्रणव ने कहा। मैं चोपता पहुँच चुका था और मेरे साथी मुझसे आधा घंटा पहले पहुँच चुके थे। आस – पास की सभी दुकाने बंद थी, केवल एक ही ढाबा खुला था। मैगी तैयार हो ही चली थी, वैसे मुझे नूडल्स बिलकुल भी पसंद नहीं है लेकिन पहाड़ों में यही एकमात्र सहारा होते हैं। वैसे भी बर्फ़बारी के कारण पिछले कई दिनों से यहाँ राशन की आपूर्ति नहीं हो पायी थी।

Ahead of Baniyakund
Ahead of Baniyakund
From left Krishna, Deepak and Pranav
From left Krishna, Deepak and Pranav

Near Chopta
Near Chopta

Chopta Trip

Final road to Chopta
Final road to Chopta

कौन था वो बच्चा ?

हम सभी ने मैगी, सूप, चाय आदि निपटाए। एक बात और, मुझे लगा था की जो बच्चा रास्ते में मिला था उसके घर वाले उसके पीछे ही आ रहे होंगे। मैं चोपता तक आ गया लेकिन उसके माता – पिता या कोई सम्बन्धी मुझे नहीं मिला, यहाँ तक की कोई इंसान ही नहीं मिला। मैंने अपने साथियों से उस बच्चे के बारे में पूछा की क्या वो बच्चा यहाँ आया था ? उन्होंने और ढाबे वाले ने साफ़ कह दिया की यहाँ कोई परिवार नहीं आया है। यह मेरे लिये बिलकुल ही दिमाग घुमा देने वाली बात थी की आखिर वो था कौन ?

”चोपता तो देख लिया, अब वापस चलते हैं” – प्रणव ने कहा।
”बाबा तुंगनाथ यात्रा के प्रवेश द्वार तक गये ?”
”नहीं”
मैंने कहा की जहाँ आप खड़े हैं ये चोपता की शुरुआत है और मात्र 70 मीटर दूर प्रवेश द्वार और वहीं चोपता का अंत। वहां भी चलो।

पहुंच गये चोपता

चल पड़े हम सब। दुकाने और छोटे – छोटे होटल तो कई खुल गयें हैं यहाँ लेकिन सभी बंद थे और बर्फ़ से दबे हुए थे। यहाँ की एकमात्र पुलिस चौकी तो न जाने कहाँ बर्फ़ में समा गयी थी। उसका पता लगाना भी मुश्किल था। चोपता का प्रसिद्ध मोक्ष लॉज भी बंद और बर्फ़ से ढका हुआ था। रास्तों पर एक मीटर मोटी बर्फ और उन्ही के बीच में से कुछ फ़ीट तक बर्फ़ काट कर चलने लायक रास्ता बनाया गया था।

बाबा तुंगनाथ के प्रवेश द्वार पर पहुँच कर सांसे थम गयी। प्रवेश द्वार आधा बर्फ़ में दब गया था। वहां दो ढाबे और खुले हुए थे। वहां खड़े कुछ लोगों ने बताया की ऊपर जाना असंभव है। वैसे भी जब प्रवेश द्वार पर ही ऐसी हालत थी तो आगे के बारे में अनुमान लगाना कोई मुश्किल कार्य नहीं था। यहाँ पर एक विदेशी मीडिया वैन भी खड़ी थी। मेरे साथी इतनी बर्फ़ देख कर बहुत प्रसन्न थे और मैं भी लेकिन अफ़सोस था की हम ऊपर नहीं जा सकते थे।

Hotel in Chopta
Hotel in Chopta
Moksha Lodge
Moksha Lodge
Chopta
Chopta
Baba Tungnath Trek entry gate
Baba Tungnath Trek entry gate

 

Foreign Media Wagon
Foreign Media Wagon
Chopta and Tungnath Trek Entry gate
Chopta and Tungnath Trek Entry gate

यहाँ कुछ अधिक तो अब था नहीं देखने के लिये, सिवाय बर्फ़ के। इसलिए कुछ फ़ोटो ली और वापसी की ओर मुड़ गये। शाम के 4 बज चुके थे और अब तेज़ी से नीचे पहुंचना आवश्यक था। पहाड़ों में अंधेरे में चलना खतरे से खाली नहीं है। जहाँ मैगी खायी थी, वहीं दो भोटिया कुत्ते मिले। उन्हें बिस्किट खिलाये। वैसे ये कुत्ते बहुत ही वफ़ादार और समझदार होते हैं। ये हमारे पीछे – पीछे चल पड़े।

पहाड़ी जंगलों में यदि आप अकेले ट्रैकिंग कर रहे हों और वहां आस – पास कोई भोटिया कुत्ता दिखे तो आप उसे खाने के लिये कुछ दे दें। मैं दावा करता हूँ की ये आपको अकेला नहीं छोड़ेगा और एक सुरक्षाकर्मी की भूमिका निभायेगा। हम तेज़ी से आगे बढ़ते जा रहे थे। अब बर्फ़ पर फिसलन बहुत बढ़ चुकी थी, इसी का परिणाम था की केवल प्रणव को छोड़ कर हम सभी कई बार गिरे। कुछ ही देर में दीपक और प्रणव काफ़ी आगे निकल चुके थे।

अब थोड़ा – थोड़ा अंधेरा भी हो चला था। हमें शीघ्र ही दुगलभिट्टा पहुंचना था। रास्ते में जहाँ जूते छोड़े थे, वहां से जूते लिये और बढ़ चले दुगलभिट्टा की ओर।

शाम 6 बजे तक हम दुगलभिट्टा पहुँच चुके थे। प्रणव और दीपक यहाँ प्रतीक्षा करते दिखे। यहाँ सुबह वाली बोलेरो तो नहीं थी लेकिन स्वास्थ्य विभाग की एक गाड़ी यहाँ से ऊखीमठ जाने के लिये खड़ी थी। हम उसमें बैठ गये।

15 मिनट में हम मक्कू बैंड पहुँच चुके थे और अब अंधेरा हो चुका था। वापसी में गिरने के कारण पैर में एक और मोच आ चुकी थी। दो – दो मोच के साथ अब मेरे लिये चलना मुश्किल था और इसलिये सीधा बेड की शरण ली। पिछली रात ढाबे वाले ने खाना बहुत फीका बनाया था और इसी कारण आज दीपक जी ने ढाबे वाले से कह दिया था की हमारा खाना वे स्वयं बनायेंगे। वैसे आम तौर पर कोई भी ढाबे वाला किसी को अपना चूल्हा नहीं सौंपता है लेकिन यहाँ सुभाष जी कोई आना कानी नहीं की।

आख़िरकार 2 घंटे की प्रतीक्षा के बाद दीपक जी खाना ले ही आये। खाना आज वाकई स्वादिष्ट बना था। कुछ इधर – उधर की बातें हुई, उस बच्चे के बारे में चर्चा हुई। हमने तय कर लिया था की अगले दिन सुबह 5 बजे निकल लेना है और इसी कारण आज जल्दी सोना ही एकमात्र उपाय था।

Returning
Returning

Makku Band
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Makku Band
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इस पोस्ट में केवल इतना ही। अगला भाग शीघ्र।

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RITESH GUPTA
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आपका ये पोस्ट बहुत अच्छा लगा और बेहद रोमांचक भी …… अथाह बर्फ का सागर उमड़ा हुआ था और आप लोग चले जा रहे थे चोपता के तरह….पैर में मोच लगना दुखदायी होता है …. बाकी हकीकत में चोपता के बर्फ से ढकी वादियों और रास्ते के चित्रों में मुझे बहुत ही आश्चर्य चकित किया …एक शानदार पोस्ट ………….