Cheela Rishiksh Road

Trip to Chopta Delhi to Rishikesh चोपता यात्रा दिल्ली से ऋषिकेश

कहीं किताबों में पढ़ा था की घुमक्कड़ी धर्म के अनुसार एक ही स्थान पर फिर से जाना धर्मविरुद्ध कार्य है और यदि आप वहां बार – बार जा रहे हैं तो यह एक अक्षम्य अपराध है और अगले जन्म में आपका घुमक्कड़ी से विहीन होना तय है।

(चोपता के बारे में सम्पूर्ण जानकारी के लिये नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।

Trip to snowy Chopta बर्फीले चोपता की यात्रा

इस लिंक पर आपको चोपता के बारे में पूरी जानकारी मिल जायेगी, जैसे की चोपता के बारे में, चोपता कहाँ है, चोपता कैसे पहुंचे, चोपता कब जायें, बाबा तुंगनाथ की कहानी, मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थान आदि।)

अपनी कहानी कुछ अलग है। मुझे यदि कोई एक स्थान पसंद, बहुत पसंद आ जाये तो मैं तब तक वहां जाना नहीं छोड़ता जब तक की मैं स्वयं ऊब न जाऊं। पहली बार मैं चोपता वर्ष 2014 में गया था… तब से लेकर अब तक चार बार चोपता जा चुका था और मैं अकेला ही नहीं कुछ मित्र भी होते थे साथ में। कभी बर्फ मिली, कभी नहीं मिली, कभी बाबा तुंगनाथ के दर्शन हुए, कभी नहीं हुए। इस बीच कुछ और भी यात्रायें होती रही।

वर्ष 2018 की सर्दियां शुरू हो चुकी थी और इस बार तो बर्फ़बारी की ख़बरें तो कुछ ज़्यादा ही आने लगी थी। कुछ न्यूज़ चैनल तो चकराता और चंबा (उत्तराखण्ड) में भी भयंकर बर्फ़बारी दिखने लगे थे। अब ऐसे में मन कैसे शांत बैठे ? मन तो कहीं और जाने का था लेकिन मेरी नज़रों में चोपता की की ख़ूबसूरती के सामने कहीं कुछ टिकता ही नहीं।

इसलिये बैठे – बैठे बना डाली योजना चोपता जाने की और वो भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट से न हो कर, कार से। चोपता जाते समय बहुत से खूबसूरत दृश्य दिखाई देते हैं, लेकिन बस में बैठे होने के कारण अक्सर ऐसी ख़ूबसूरती कैमरा सेट करने से पहले ही ओझल हो जाती थी। यदि अपनी गाड़ी हो तो आनंद की सीमा ही कुछ और होती है।

8 जनवरी के दिन चोपता यात्रा की घोषणा सोशल मीडिया पर कर दी और यात्रा का व्यय रखा 5999 रुपये प्रति वयक्ति, जिसमें की दिल्ली से चोपता आना – जाना, भोजन और रहने का खर्च शामिल था। शुरुआत में बहुत से लोगों ने यात्रा में रुचि दिखाई…. कोई गाड़ी के बारे में जानना चाहता था, कोई यह जानना चाहता था की अगली यात्रा कब होगी क्योंकि वे इस बार जा पाने में असमर्थ थे। कुछ लोग यह भी जानना चाहते थे की यदि सवारी बढ़ जाये तो क्या उसका भी कोई उपाय है ?

सभी प्रश्नो के उत्तर बराबर दिये जा रहे थे। वैसे शुरुआती रुझान देख कर तो ऐसा लग रहा था की मुझे टैम्पो ट्रैवलर बुक करना पड़ जायेगा लेकिन वास्तविकता से तो मैं अनभिज्ञ था नहीं। जैसे – जैसे यात्रा का दिन अथार्त 8 फ़रवरी 2019 समीप आता गया, लोग कम होते गये।

ऐसे ही समय बीतते – बीतते फ़रवरी का महीना आ गया। इस बीच लखनऊ वाले कृष्णा शर्मा, मेरठ वाले प्रणव रंजन मिश्रा और दिल्ली के आनंद विहार से अजय मिश्रा जी तैयार हो गए थे चलने के लिये। कृष्णा जी लखनऊ से से सीधा हरिद्वार ही आने वाले थे, इसलिये उन्हें वहीं मिलना था। प्रणव भाई वैसे तो गुरुग्राम में रहते हैं लेकिन पिछले 20 दिनों से एक के बाद एक कई यात्रायें कर चुके थे और उनकी कुछ छुट्टियाँ अभी भी बाकी थी और वे अपने मेरठ वाले घर पर थे (इन बाकी वाली छुट्टियों के लिये उन्हें अपने ऑफिस से भयंकर जंग लड़नी पड़ी)।

आखिर 8 फ़रवरी का दिन आ गया और आज रात 8:30 बजे यात्रा शुरू करनी थी। कार्यक्रम कुछ ऐसा था की रात 8 बजे दिल्ली में द्वारका मोड़ से निकालेंगे, रात 10 बजे तक आनंद विहार से अजय मिश्रा जी को यात्रा में शामिल कर लेंगे, रात 11:30 बजे प्रणव जी को मेरठ से और सुबह 5 बजे हरिद्वार से कृष्णा जी को लेते चलेंगे… लेकिन जो सोचते हैं वैसा हो जाये तो ‘होनी’ की अहमियत समाप्त न हो जाये ?

सुबह कृष्णा जी की कॉल आयी… उन्होंने बताया की उनकी ट्रेन छूट गयी है और अब वे लखनऊ से शाम वाली बस में बैठेंगे। वैसे कोई चिंता वाली बात थी नहीं क्योंकि उनसे 9 फ़रवरी को सुबह हरिद्वार में मिलना था। जैसे – तैसे दिन बीता ! ठीक रात 8:30 बजे ड्राइवर दीपक शर्मा जी गाड़ी से यात्रा शुरू हो गयी।

कुछ ही मिनट बाद आनंद विहार वाले अजय जी की कॉल आयी, उनके साथ कुछ अनहोनी हो गयी थी और इस कारण वे यात्रा में नहीं जा सकते थे। अब हम केवल तीन लोग मैं, प्रणव और कृष्णा जी यात्रा में रह गये थे। शादी की लग्न वाला दिन होने के कारण उस दिन दिल्ली में भयंकर ट्रैफिक था। ड्राइवर दीपक जी के कहे अनुसार हम हमें जी टी करनाल रोड से निकल कर ईस्टर्न पेरिफेरल से होते हुए मुरादनगर के पास दिल्ली – हरिद्वार रोड पर आना था।

ट्रैफिक के कारण दिल्ली से हमें ईस्टर्न पेरिफेरल तक पहुँचते – पहुँचते ही रात के 12 बज गये थे। दिल्ली के ट्रैफिक को झेलने का आदि तो मैं हूँ लेकिन आज कुछ ज़्यादा ही हो गया था। वैसे जितना दिमाग ख़राब होना था हो चुका, अब जो सामने वह था एक बेहद शानदार, चौड़ा और सौर ऊर्जा से जलती लाइट्स से जगमगाता रोड। यह रोड कोई और नहीं, ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे था।

इसे कुंडली – गाज़ियाबाद – पलवल एक्सप्रेसवे और नेशनल एक्सप्रेसवे – 2 के नाम से भी जाना जाता है। दिल्ली के चारो ओर दो एक्सप्रेसवे बनायें गए हैं। पहला है वेस्टर्न पेरिफेरल और दूसरा है ईस्टर्न पेरिफेरल। वेस्टर्न पेरिफेरल कुंडली से शुरू होकर मानेसर से होते हुए पलवल तक जाता है और ईस्टर्न पेरिफेरल कुंडली से शुरू होकर गाज़ियाबाद से होते हुए पलवल तक जाता है।

यह इस प्रकार बनाया गया है की हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच आवागमन करने वाले जिन वाहनों को न चाहते हुए भी दिल्ली के ट्रैफिक में फंसना पड़ता था, अब वे बिना दिल्ली में प्रवेश किये ही अपने गंतव्यों तक पहुँच सकते हैं। 135 किलोमीटर लम्बा ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे बेहद शानदार बना है और सभी हाई-टेक सुविधाओं से सुसज्जित है। यहाँ सभी लाइट्स सौर ऊर्जा से जलती हैं।

ट्रैफिक पर नज़र रखने के लिये कैमरे लगाये गए हैं, जन-सुविधाओं का भी ध्यान रखा गया है। तय सीमा से अधिक गति से चलने पर टोल एग्जिट पर ही आपको चालान थमा दिया जाता है। पुरे एक्सप्रेसवे पर जगह – जगह सौर ऊर्जा पैनल लगे हैं जिनसे 4000 किलोवाट बिजली का उत्पादन होता है। अब इसे यमुना एक्सप्रेसवे से जोड़ने पर कार्य चल रहा है।

हमने राई से ईस्टर्न पेरिफेरल पर प्रवेश किया। रोड की चौड़ाई इतनी की 2 लड़ाकू जहाज एक साथ उतर जायें, सभी कारें 100 किलोमीटर से अधिक की स्पीड से भाग रही थी। FM पर बज रहे गाने सुनते हुए कभी – कभी नींद भी आ जाती थी लेकिन आराम हराम था।

गाने सुनते – सुनते कार एक मोड़ से आगे निकल गयी… एक बार तो ऐसा लगा की हम शायद आगे निकल चुके हैं। गाज़ियाबाद के मुरादनगर के लिये एक रास्ता हाईवे से नीचे उतरता है और हमें लगा की शायद वह रास्ता पीछे रह गया है। एक्सप्रेसवे पर ऐसी गलतियां बहुत भारी पड़ जाती हैं। गूगल मैप पर चेक करने पर पता चला की हम सही रास्ते पर हैं।

राई से मुरादनगर के बीच कर 58 किलोमीटर का सफर तय करने में हमें मात्र 40 मिनट लगे लेकिन जैसे ही मुरादनगर पहुंचे यहाँ फिर से वही ट्रैफिक मिला। इस बीच प्रणव भाई भी परेशान होने लगे थे। रात 2 बजे हम प्रणव भाई की गली में थे और वे बैग लेकर घर के बाहर प्रतीक्षा कर रहे थे। अब सफर में ड्राइवर सहित हम तीन लोग शामिल हो गए थे और अब सीधा हरिद्वार पहुंचना था।

प्रणव भाई कुछ दिन पहले ही प्रयाग कुम्भ से लौटे थे… उन्होंने ने बताया की किस प्रकार प्रयागराज कुम्भ को भव्य बनाया गया है। किसी विकसित देश के अंतर्राष्ट्रीय आयोजन से बढ़ कर है इस बार का कुम्भ मेला। रात 3:30 बजे खतौली के एक ढाबे पर गाड़ी रोकी, यहाँ भोजन किया और फिर चल पड़े आगे की ओर।

(कुम्भ 2019 के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें)

रात के अँधेरे में हाईवे के दोनों ओर ढाबों की लाइट्स लॉस वेगास से कम नहीं लग रही थी 🙂 देश दुनिया के तमाम मुद्दों पर चर्चायें चल रही थी, जैसे बाबा रामपाल, बाबा राम रहीम, कुम्भ, पाकिस्तान, रूस, इसराइल, मोदी, राहुल, अलाना – फलाना – ढिकाना आदि – आदि। समय बिताने के लिये कुछ तो करना ही था न।

रात के अँधेरे को चीरते हुए सुबह 5 बजे तक हम हरिद्वार पहुँच चुके थे। कृष्णा जी से व्हाट्सऍप पर पता चला की वो सुबह 7 बजे तक पहुँच पायेंगे। अब हमारे पास 2 घंटे थे। दीपक जी तो गाड़ी पार्किंग में लगा कर नींद फरमाने लगे और हम दोनों चल पड़े पैदल ही हर की पौड़ी की ओर।

हरिद्वार की गलियों की यही बात मुझे अच्छी लगती है की वे चाहे कितनी भी खाली हों लेकिन हवाओं में रौनक बनी रहती है। माहौल में सर्दी तो थी लेकिन कुछ ज़्यादा नहीं। हर की पौड़ी घाट पर बने पुल पर पहुँच कर गंगा मैया को प्रणाम किया। सुबह और अँधेरे का समय होने के कारण हरिद्वार शांत था। भीड़ बिलकुल नहीं थी। पुजारी लोग अपने – अपने ठिकाने सजाने में लगे थे। कुछ पुजारी आटा गूंधने में लगे हुए थे (पिंडदान के लिये)।

Haridwar Har ki paudi
Haridwar Har ki paudi

प्रणव भाई ने फटाफट अपनी डिजिटल तोप (DSLR) सेट की और चल पड़े फोटो लेने। मैं आज से पहले कभी फेसबुक पर लाइव नहीं आया था, आज वो भी आजमा लिया। चलते – चलते एकांत की ओर पहुँच गये, जहाँ से हरिद्वार की प्रसिद्द शिव मूर्ति और नदी के बीच बनी गंगा माँ की मूर्ति समीप दिखाई देती है। वहां बिलकुल शांति थी। एक कोने में जल रही आग भी माहौल को गर्म कर पाने में असफल सी सिद्ध होती दिख रही थी। यहाँ शांत बह रहे गंगा जल को लगातार देखना बहुत सुकून दे रहा था। अब हल्का – हल्का उजाला होने लगा था और शिव मूर्ति की तरफ से आने वाली लालिमा बहुत ही सुंदर लग रही थी। यहाँ फोटो लेते – लेते एक घंटे से ऊपर का समय निकल गया अब 7 बजने वाले थे।

तेज़ी से चलते हुए हरिद्वार बस अड्डे के सामने पहुंचे। कृष्णा जी अपना बैग लिये प्रतीक्षा करते दिखे। अब इस यात्रा के अंतिम यात्री भी शामिल हो चुके थे। आश्वस्त मन से हम चल पड़े ऋषिकेश की ओर। हरिद्वार से ऋषिकेश जाने के दो रास्ते हैं। पहला है मुख्य हाईवे और दूसरा है चीला बैराज वाला। मुख्य हाईवे पर बहुत जाम लगता है, इसलिये हमारी कार चल पड़ी चीला बैराज वाले रास्ते से होते हुए ऋषिकेश की ओर।

एकांत घाट
एकांत घाट

Haridwar
Haridwar
Haridwar Police Station
Haridwar Police Station

अब जब यात्रा में सभी लोग शामिल हो चुके हैं तो एक बार आप सभी का परिचय जान लें।

मैं: मुझे आप जानते ही हैं की दिल्ली में रहता हूँ, गुरुग्राम में नौकरी करता हूँ, घुमक्कड़ हूँ और शौकिया ब्लॉगर भी।
प्रणव रंजन मिश्रा: गुरुग्राम में नौकरी करते हैं, मेरठ में रहते हैं, नये – नये घुमक्कड़ हैं।
कृष्णा शर्मा: लखनऊ के रहने वाले हैं, डाकघर में नौकरी करते हैं और घुमक्कड़ तो शायद जन्म से हैं।
दीपक शर्मा: हमारे ड्राइवर दिल्ली के रहने वाले हैं। पहले BPO में नौकरी करते थे और अब गाड़ी चलाते हैं।

वैसे चीला वाले रास्ते पर भले ही कुछ गड्ढे हों, लेकिन सुबह के समय इस रास्ते पर चलने का अलग ही आनंद है। पहाड़ों से उतरती पीली केसरिया धुप जब घास पर पड़ती है तो अद्भुत दृश्य उत्पन्न होता है। सामने की ओर दिख रही शिवालिक पर्वत मालायें, दाहिनी ओर बह रही गंगा नहर, सीधा रास्ता किसी वॉलपेपर से कम नहीं लग रहा था। गंगा नहर के निर्मल जल पर पड़ रही किरणे स्वर्णिम मोतियों जैसी लग रही थी।

इस सीधे रास्ते से होते हुए आखिर 40 मिनट में हम लोग ऋषिकेश पहुँच चुके थे और अब पहाड़ों की ओर बढ़ चलना था।

Cheela Rishiksh Road
Cheela Rishiksh Road
सुबह की शांति
सुबह की शांति

इस भाग में इतना ही, ऋषिकेश से मक्कू बैंड तक का सफ़र पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें और मक्कू बैंड से चोपता तक का सफ़र पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।


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