They walked from Siberia to India to reach home

साइबेरिया से भारत Siberia to India तक 6400 किलोमीटर का सफ़र पैदल तय करके कैसे पहुंचा वो अपने घर ?

यह कहानी है दूसरे विश्व युद्ध second world war की। वर्ष 1940 में स्टालिन शाषित सोवियत संघ USSR ने पूर्वी पोलैंड Poland पर आक्रमण करके बहुत से आम नागरिकों और सैनिकों को बंदी बना लिया था। उन्ही सैनिकों में से एक था यानुष। यानुष को पकड़ कर सोवियत पुलिस अधिकारी के पास लाया गया। यानुष को जेल में डालने के लिये एक फर्जी मुकदमा गढ़ना आवश्यक था और इसलिये यानुष से एक सादे कागज़ पर हस्ताक्षर करने के लिये कहा गया, लेकिन यानुष ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर वे एक महिला को यानुष के सामने ले आये।

पुलिस अधिकारी: क्या तुम इसे जानती हो ?
महिला: जी हाँ ! यह मेरे पति हैं।
पुलिस अधिकारी यानुष से: यह महिला जो कह रही है क्या तुम उससे सहमत हो ?
यानुष: जी, यह मेरी पत्नी है।
पुलिस अधिकारी महिला से: तुम इसके बारे में और क्या जानती हो ?
महिला: यह कम्युनिष्ट पार्टी और स्टालिन से नफ़रत करते हैं और विदेशों में जासूसी करते हैं।

यानुष को यह सुनकर गहरा दुःख पहुंचा की उसकी पत्नी ही उसके खिलाफ़ गवाही दे रही हैं लेकिन उसे विश्वास था उसकी पत्नी को ऐसा करने के लिये विवश किया गया है। खैर… यानुष को 20 वर्ष की कैद की सजा सुनाते हुए साइबेरिया की एक जेल में भेज दिया गया।

जेल में यानुष के साथ – साथ अन्य कैदियों बताया गया की यहाँ पर केवल यह चारदीवारी ही तुम्हारी जेल नहीं है, बल्कि यह पूरा क्षेत्र ही तुम्हारे लिये जेल है क्योंकि यहाँ दूर – दूर हज़ारों किलोमीटर दूर तक केवल जंगल और बर्फ़ है और अगर वे किसी तरह वे जेल से भागने में सफल हो भी गये तो यहाँ के स्थानीय लोग कैदियों पर भारी इनाम के चलते उन्हें मार डालेंगे।

एक बार जेल में खाने की लाइन के दौरान हुए झगड़े में एक बूढा कैदी स्मिथ खाने से वंचित रह गया लेकिन यानुष ने उसे अपना आधा खाना दे दिया। वहीं एक और कैदी से यानुष की भेंट हुई।

यानुष: तुम यहाँ किस अपराध में बंद हो ?
कैदी: मैं एक फिल्म कलाकार हूँ, एक फिल्म में मैंने अमीर व्यापारी का किरदार निभाया और उस फिल्म में मैंने उस किरदार को कुछ ज्यादा ही अमीर बना दिया लेकिन यह बात कम्युनिष्ट सरकार को पसंद नहीं आयी और उन्होंने मुझे 10 साल के लिये यहाँ भेज दिया।
यानुष: एक फिल्म के लिये ऐसी सज़ा ?
कैदी: हाँ, यहाँ ऐसा ही है।

इस जेल में हज़ारों कैदी थे जिनमें कुछ हत्या और चोरी जैसे अपराधों में लिप्त होने के कारण भी बंद थे। एक दिन उस कलाकार कैदी ने यानुष को बताया की वो एक यहाँ से भागने का एक गुप्त रास्ता जानता है और उसे यानुष जैसे ही किसी हिम्मती व्यक्ति की तलाश थी जो उसके साथ भाग सके।

“लेकिन हम जायेंगे कहाँ ? यहाँ तीन तरफ तो सोवियत हैं और एक तरफ जर्मन हैं, वे हमें मार डालेंगे।” – यानुष ने कहा।

कलाकार ने कहा – “हम यहाँ से दक्षिण की ओर जा सकते हैं। यहाँ से हज़ारों किलोमीटर दूर दक्षिण में मंगोलिया Mongolia है, वहां हम सुरक्षित रह पायेंगे लेकिन मंगोलिया तक की यात्रा बहुत लम्बी होगी। हमें सर्दियों के मौसम के ख़त्म होने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी क्योंकि यदि अभी हम किसी तरह यहाँ से निकल भी गये तो सर्दी से मर जायेंगे…. हमें ढेर सारा खाना इकठ्ठा करना होगा, इसलिये हम सर्दियों के बाद जायेंगे।”

और इसके साथ ही उन्होंने खाना इकठ्ठा करना शुरू कर दिया। यहाँ सभी कैदी जंगल में लकड़ी काटने का काम करते थे। एक बार जब वे लकड़ियां काटने गये हुए थे, तभी वहां एक बर्फीला तूफ़ान आ गया जिसके कारण पांच कैदी मारे गए। जान बचाने के लिये बूढ़े कैदी स्मिथ ने सभी से जंगल की ओर भागने के लिये कहा और सभी उस ओर चले गये लेकिन इस पर पुलिस अधिकारी बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने उन सभी कैदियों जिनमें की स्मिथ और यानुष भी थे, को खदान में भेज दिया। खदाने उनके लिये किसी मृत्यु शिविर से कम नहीं थी।

खदान में काम करने के दौरान ही यानुष ने बूढ़े स्मिथ को कलाकार कैदी के बारे में बताया और कहा की वो यहाँ से भागने के रास्ते के बारे में जानता है। शुरू में तो स्मिथ ने साफ़ मना कर दिया लेकिन फिर वह मान गया क्योंकि इसके अतिरिक्त उनके पास और कोई उपाय था ही कहाँ ? देखते ही देखते कुल सात लोग इस योजना में शामिल हो गये। इन सात लोगों में थे – यानुष, स्मिथ, फिल्म कलाकार, एक हत्या अपराधी, एक चित्रकार, एक ऐसा व्यक्ति जिसे रात में नहीं दिखता था और, एक अन्य कैदी।

और इस तरह रात एक रात बर्फ़ीले तूफ़ान में वे लोहे की तार काट कर वहां से भाग निकले। कुछ दूर तक पुलिस और कुत्तों ने उनका पीछा करने का प्रयास किया लेकिन तूफान के कारण पैरों के निशान बर्फ में गायब हो गये थे और ऊपर से अँधेरे और तेज़ तूफ़ान के कारण वे अधिक दूर तक पीछा नहीं कर पाये।

रात भर चलने के बाद आखिर वे सभी जेल से बहुत दूर निकल चुके थे। यहाँ बर्फ़ बहुत ज़्यादा थी, इतनी ज़्यादा की पुलिस तो क्या कोई अन्य इंसान भी यहाँ नहीं आ सकता था। अब उन्होंने अपने बैग से खाना निकाला और भूख शांत की। अब यानुष ने धुप में बन रही परछाई से दक्षिण दिशा का पता लगाया और फिर वे दक्षिण की ओर चल पड़े क्योंकि उन्हें मंगोलिया Mongolia जाना था।

एक रात जंगल में भोजन बनाने के लिये लकड़ियां लाने के दौरान बर्फीले तूफ़ान में फंस कर उस कैदी की मृत्यु हो गयी जिसे रात में नहीं दिखता था। अब छः लोग बचे थे, वे चाह कर भी वहां रुक नहीं सकते थे और आखिर वे उसे दफना कर आगे चल पड़े।

अब वे चलते – चलते बहुत दूर निकल चुके थे। उन्हें एक झील तक जाना था। इस दौरान उन्हें रास्ते में जो भी जानवर मिलता उसे मार कर खा लेते। उनकी हालत खराब होती जा रही थी। उन्हें एक झील तक पहुंचना था लेकिन अपने तय किये समय से अभी भी वे एक सप्ताह पीछे चल रहे थे। उनमें आगे जाने का साहस नहीं बचा था। उन्हें लगा की अब वे नहीं बचेंगे लेकिन यानुष ने हिम्मत नहीं हारी थी। उसने कहा की वह अकेले ही आगे का रास्ता पता लगाने जा रहा है, यदि वह एक सप्ताह में नहीं लौट कर आता है तो समझ लेना की वह मर चुका है।

यानुष चल पड़ा झील का पता लगाने अकेले ही। भूख और लगातार चलते रहने के कारण उसे कई बार भ्रम हुआ की वह अपने घर पहुँच चुका है लेकिन उसने होश नहीं खोया। आखिर उसने झील का पता लगा ही लिया और लौट कर अपने साथियों को खबर दी। अब वे तेज़ी से झील की ओर बढ़ चले। रास्ते में उनका सामना एक लड़की से हुआ, वह सोवियत सेना Soviet Army से बच कर भाग रही थी। वह भी उनके साथ शामिल हो गयी। झील पर पहुँच कर उन्हें एक मरा हुआ जानवर मिला। अब उनके पास अच्छी मात्रा में भोजन इस जानवर के रूप में उपलब्ध हो चुका था।

जानवर का मांस खाकर वे आगे बढ़ चले और आखिर कई महीनों की लम्बी पैदल यात्रा के बाद वे मंगोलिया बॉर्डर तक पहुँचने में सफल हो गये। अभी तक की यात्रा में उन्हें बहुत से कष्ट उठाने पड़े। यह एक बहुत ही लम्बा सफ़र था जिसमें उन्होंने सोवियत शाशन से जान बचाने के लिये पहाड़ पार किये, जंगल पार किये, पेट भरने के लिये कीड़े खाये, मरे हुए जानवर खाये, कुत्तों को मार कर खाया।

यहाँ उस हत्या अपराधी साथी ने कहा वह अब यहीं रहना चाहता है, वह आगे नहीं जाना चाहता और इसी के साथ बाकी के बचे पांच साथी और वह लड़की उसे अलविदा कह कर आगे बढ़ चले। उन्हें लगा था की मंगोलिया पहुँच कर उनकी जान बच जायेगी लेकिन जब वे बॉर्डर पार कर के मंगोलिया पहुंचे तो उन्होंने वहां भी सोवियत संघ का झंडा लहराते हुए देखा और स्टालिन Stalin की फोटो देखी। जिन लोगों से जान बचा कर वे भाग रहे थे, वे अब मंगोलिया पर भी कब्ज़ा कर चुके थे। अब उन्होंने तय किया की वे पहले चीन China जायेंगे, फिर तिब्बत Tibet और वहां से हिमालय पार करके भारत क्योंकि भारत में ब्रिटिश शाशन होने के कारण उन्हें खतरा नहीं होगा।

अब तक के महीनो लम्बे सफ़र में अनेक मुसीबतें पार कर चुके थे और अब ये भारत जाना चाहते थे लेकिन भारत का सफ़र इतना आसान था कहाँ क्योंकि भारत India पहुँचने के लिये उन्हें हिमालय पार करना था जो की अब तक की सबसे मुश्किल चुनौती थी। अब वे भारत की ओर बढ़ चले लेकिन भारत के रास्ते में धूप, गर्मी, रेगिस्तान, भीहड़, प्यास जैसी चुनौतियाँ मुँह बाए खड़ीं थी। लगातार चलने के कारण सभी की हालत बिगड़ती जा रही थी। शरीर में की भयंकर कमी के कारण उनके साथ आयी लड़की कई बार गिरी लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और चलती रही क्योंकि वह नहीं चाहती थी की उसके कारण बाकी साथी मुसीबत में फंसे। इस दौरान उनमें से दो साथियों ने आगे जाने में असमर्थता जताई और कहा की अब वे यहीं रुकना चाहते हैं लेकिन यानुष के हिम्मत बंधाये जाने के कारण वे बढ़ चले।

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आखिर लगातार चलने के कारण वह लड़की हिम्मत हार गयी और उसने रेगिस्तान में ही प्राण त्याग दिये। अब बाकी के लोग उसे वहीं दफना कर आगे बढ़ चले। अब कुल पांच लोग बचे थे और सभी की हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ गयी थी लेकिन आगे तो बढ़ना ही था। अभी वे कुछ ही किलोमीटर आगे गये होंगे की उनके पांचवा साथी जो की चित्रकार था, रेत में गिरा वहीं का होकर रह गया। अपने साथी को मृत्यु की गोद में छोड़ कर वे आगे बढ़ चले, उनके पास कुछ नहीं बचा था।

स्मिथ की हालत भी बहुत ज़्यादा बिगड़ चुकी थी लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और बाकी के तीन साथियों के साथ आगे बढ़ता रहा। महीनों लम्बे रेगिस्तानी सफ़र के बाद आखिर वे चीन की दीवार Great wall of China तक पहुँच ही गये लेकिन चीन उनके लिये सुरक्षित नहीं था क्योंकि यहाँ जापान चीन पर लगातार हमले कर रहा था। इसलिये वे यहाँ न रुक कर तिब्बत की ओर बढ़ते रहे और एक महीने बाद तिब्बत पहुँच गये। यहाँ फिर से उनका सामना बर्फीले पहाड़ों से हुआ लेकिन तिब्बती लोगों ने उनका स्वागत किया और अच्छी आवभगत की।

उन लोगों ने बताया की यहाँ से भारत जाने के लिये (way to India) दो रास्ते हैं। सिक्किम Sikkim वाला रास्ता उनके लिये अच्छा रहेगा लेकिन अभी सर्दी बहुत है और यदि बर्फीला तूफ़ान आ गया तो वे फंस जायेंगे, इसलिये उन्होंने उन्हें सुझाव दिया गया की वे सर्दियाँ यहीं बितायें और फिर आगे बढ़ें लेकिन यानुष इससे सहमत नहीं था। उसने बाकी साथियों से कहा की यदि वे रुक गये तो फिर आगे नहीं बढ़ पायेंगे।

स्मिथ ने कहा की वह एक अमेरिकी नागरिक है और अब यहाँ से चीन जाना चाहता है। वह जानता था की चीन में अमेरिकी सैन्य अड्डा है जिसकी मदद से वह अमेरिका पहुँच सकता है। उसे विश्वास था की तिब्बती लोग उसे चीन पहुंचा देंगे। यानुष अपने दो साथियों को लेकर और स्मिथ को वहीं छोड़ कर आगे बढ़ चला।

अंततः एक लम्बे बर्फीले पहाड़ी सफ़र को तय करके यानुष और उसके दो साथी भारत पहुँचने में कामयाब रहे। यहाँ भारतीय लोगों ने उनका बहुत स्वागत किया। भारत पहुँचने के लिये इन्हे 6400 किलोमीटर लम्बा दुर्गम सफ़र तय करना पड़ा। ये लगभग एक वर्ष से पैदल चल रहे थे। मौत से लड़कर और अपने तीन साथियों को खो कर वे यहाँ तक पहुंचे थे।

अब सभी का सफ़र समाप्त हो चुका था लेकिन यानुष का नहीं क्योंकि उसे पोलैंड जाना था अपनी पत्नी के पास लेकिन पोलैंड Poland अभी भी सोवियत कब्ज़े में था। इसलिये यानुष अगले 50 वर्षों तक अपने घर नहीं जा पाया, देश – विदेश घूमता रहा क्योंकि पोलैंड जाने का अर्थ था मृत्यु।

आखिर वर्ष 1989 में पोलैंड स्वतंत्र हुआ और यानुष पोलैंड में अपने घर पहुंचा। यानुष बूढ़ा हो चुका था और उसकी पत्नी भी। एक – दूसरे के गले लग कर वे खूब रोये…. और इसी के साथ अंत हुआ इस लम्बे सफ़र का।

इस सच्ची घटना पर साल 2010 में The Way Back फ़िल्म भी बन चुकी है।

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विकास नैनवाल
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रोचक यात्रा रही ये। असम्भव सी प्रतीत होने वाली यात्रा इनसानी इच्छाशक्ति और जिजीविषा की उम्दा मिसाल है।