Kriya Yoga

Ricky Martin’s spiritual journey in India Part 3

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स्वामी जी

थाईलैंड Thailand वाले छोटे योगी जी हमें पुरी स्थित एक में आश्रम में ले गए – ‘आश्रम’ अथार्त एक ऐसा स्थान जहाँ आप शांति से ध्यान लगा सकते हैं – जहाँ हमने अपना समय स्वामी योगेश्वरानंद गिरी से योग और अन्य क्रियायें सीखने में व्यतीत किया। स्वामी योगेश्वरानंद जी उस आश्रम के प्रमुख गुरु होने के साथ – साथ योगाभ्यास में बहुत उच्च स्तर तक पहुँच चुके थे।

स्वामी जी एक बहुत ही शांत व्यक्ति थे जिनके चारो ओर एक विशेष आभा फैली हुई थी। विशेष ऊर्जा से परिपूर्ण उस व्यक्तित्व के सानिध्य में मुझे एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति हो रही थी। यह मेरा सौभाग्य था की मैं उनसे मिल पाया। मेरे लिये एक सौभाग्य एक और बात यह भी थी की मैं उस देश (प्यूर्तो रीको Puerto Rico) से हूँ जहाँ का एक और नागरिक स्वामी योगेश्वरानंद गिरी के सानिध्य में रहा और परमहंस हरिहरानंद के नाम से जाना गया।

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जिस प्रकार स्वामी योगेश्वरानंद गिरी ने स्वयं किसी महान गुरु के सान्निध्य में रहकर अध्ययन किया और कालांतर में योगेश्वरानंद के नाम से जाने गये, उसी प्रकार बहुत से छात्र योगी उनकी अगली पीढ़ी के रूप में तैयार हो रहे थे। स्वामी योगेश्वरानंद गिरी से पहले वहां एक और स्वामी थे, और उनसे पहले भी एक और स्वामी थे। मुझे सोच कर बहुत अच्छा लग रहा था की आज मैं उस आश्रम में था जहाँ गुरूओं और छात्रों की लंबी परम्परा थी और मेरी पहुँच उन सभी तक थी। लेकिन मैं यह स्पष्ट करदूँ की केवल इसलिए कि मैं यहाँ स्वामी जी का विशेष छात्र था, इसका अर्थ यह नहीं है की मैं उन तकनीकों और शिक्षाओं का ज्ञान आगे भी बढ़ा सकता हूँ जो उन्होंने मुझे सिखाई थीं, क्योंकि मैं ऐसा करने के लिये प्रशिक्षित नहीं हूं।

स्वामी का जन्म ही योगी बनने के लिये हुआ था; उन्होंने अपना पूरा जीवन योग का अध्ययन करने और अपने शरीर को योगी के रूप में ढालने के लिये तैयार करने में बिताया और यही उनकी नियति है। वहीं दूसरी ओर, मुझे केवल छोटी अवधि के लिए उनके सानिध्य में अध्ययन करने का विशेषाधिकार मिला। यह विषेशाधिकार ही था क्योंकि सभी के लिये स्वामी जी से शिक्षा प्राप्त करना संभव नहीं था।

Ricky Martin in India
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जब मैं पहली बार मैं स्वामी योगेश्वरानंद जी से मिला, मैंने देखा की थाईलैंड वाले छोटे योगी जी जो की उनकी परम्परा के ही शिष्य थे, उन्होंने स्वामी जी के चरणों को स्पर्श करके संस्कृत में प्रार्थना की। जिस तरह छोटे योगी जी ने स्वामी जी के प्रति अपने हाव – भाव, विनम्रता और सम्मान का प्रदर्शन किया वह बहुत ही खूबसूरत था और इसीलिये मैंने अपने योगी दोस्त को आदर्श मानते हुए मैंने स्वामी जी के समक्ष अपने घुटने टेक दिये और फिर स्वामी जी के चरण स्पर्श किये। मुझे नहीं पता था कि स्वामी के पैर छूने के दौरान छोटे योगी जी ने क्या प्रार्थना की और यह भी नहीं जानता की ऐसे समय किसी को क्या कहना या सोचना चाहिए, इसलिये मैंने स्वामी जी के चरण स्पर्श करते समय पानी भाषा में ही प्रभु की प्रार्थना (“Our Father…”) करना शुरू कर दी।

शायद यह पहली बार ही हो रहा था की मैं प्रार्थना करते समय इतने लम्बे समय तक घुटनो पर झुका रहा और वो भी एक गुरु के सामने, यह थोड़ा अजीब सा लगा मुझे। इतने लम्बे समय तक किसी के सामने घुटनो पर झुके रहना मेरे लिये बिल्कुल ही नई स्थिति थी। मैं समझ नही पा रहा था की मुझे क्या करना है ? मेरे दिमाग में बहुत से विचार चल रहे थे की जैसे की यदि मेरे दोस्तों ने मुझे ऐसा करते देख लिया तो क्या कहेंगे ? मेरे मैनेजर का चेहरा भी मेरी आँखों के सामने आ रहा था जो की अक्सर लोगों को मुझे छूने से और पब्लिक मैगज़ीन के लिये फोटो लेने से रोका करता था।

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मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी, लेकिन बाद में मुझे एहसास हुआ कि विनम्रता के इस छोटे से व्यवहार ने मुझ पर बहुत अच्छा प्रभाव डाला। मैंने ग्लैमर, विलासितापूर्ण यात्रा, होटल सुइट्स और प्राइवेट प्लेन्स की दुनिया में रहकर इतने साल बिताए थे कि अब विनम्र हो जाना मुझे आवश्यक लगा। अपने घुटनों पर बैठना और किसी गंदे पैरों को स्पर्श करना मेरे लिए एक बहुत ही प्रतीकात्मक और शक्तिशाली इशारा था, क्योंकि इसका ऐसा करने का सीधा अर्थ था की मैं अपने अहंकार को त्याग रहा था।

जो कुछ भी मैंने किया था वह मेरी स्थापित छवि को तोड़ने के लिये पर्याप्त था। मैं एक विश्व विख्यात कलाकार हूँ और अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार यदि मैं चाहता तो स्वामी जी से केवल हाँथ मिला कर उनका हाल – चाल पूछ सकता था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं करके स्वयं को उनके समक्ष समर्पित कर दिया।

मैंने फर्श पर घुटने टेक दिए और उनके चरण स्पर्श कर लिये। उस क्षण मुझे ऐसा लगा की इस व्यवहार ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। मुझे लगा कि मैं सही काम कर रहा हूं। इस तरह मैंने अपने अस्तित्व को पहचानने के लिये और उसके सबसे गहरे हिस्से से जुड़ने के लिये एक लंबी यात्रा की शुरुआत की। मैंने अपनी सार्वजनिक रूप से स्थापित छवि को व्यक्तिगत छवि से अलग करने में कई साल बिता दिये थे लेकिन कामयाब नहीं हो पाया था, और मैं आखिरकार अब मुझे ऐसा करने का तरीका मिल गया था।

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Swami Yogeshwaranand Ashram Image source https://www.kriya.org/benefits.html

स्वामी जी के साथ मैंने क्रिया योग का अध्ययन किया। यह एक बहुत ही अलग प्रकार की योग क्रिया है। क्रिया योग उन साधारण योगासनों की तरह नहीं है जिनमे बहुत अधिक शारीरिक परिश्रम की आवश्यकता होती है, अपितु इस योग में हमें आतंरिक रूप से स्वयं को पहचानना होता है। स्वामी जी ने मुझे कुंडलिनी जागृत करने की प्रक्रिया समझायी और इसमें मेरी सहायता भी की। कुंडलिनी शक्ति आतंरिक विकास को बढ़ावा देने वाली ऊर्जा है जो अदृश्य और अथाह है और साथ ही यह रीढ़ के माध्यम से सात चक्रों से होते हुए मस्तिक्ष तक जाती है।

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माना जाता है कि क्रिया योग के निरंतर अभ्यास से हम शरीर के अंदर और बाहर की उन प्राकृतिक ध्वनियों को सुनने में सक्षम हो जायेंगे जो की एक साधारण व्यक्ति के लिये असंभव है। क्रिया योग के दर्शन के अनुसार, हमारा शरीर उन ध्वनियों और तरल पदार्थों से भरा होता है जहां ऊर्जा आती है और चली जाती है लेकिन हम आधुनिक दुनिया की भाग – दौड़ में रहते हुए उन्हें अनदेखा कर देते हैं। ये वे शारीरिक ध्वनियाँ हैं जिन्हें वे वास्तव में मौन की ध्वनि कहा जाता हैं। इन्हें सुनकर आप इन्हें अपने केंद्र से जोड़ सकते है। ऐसी स्थिती में आपको शांति, शांति और केवल शांति मिलेगी।

मौन वास्तव में एक स्थिती है, केवल एक स्थिती। यह वह ध्वनि है जिसे आप तब सुनते हैं जब आप अपने घर में सभी रोशनी के सभी रास्ते और सभी गैजेट बंद कर देते हैं, तब जब आप अकेले होते हैं और सोने के लिए अपने बिस्तर पर लेटते हैं। उन क्षणों में आप जो सुनते हैं वह मौन की ध्वनि है। यह वह ध्वनि है जिसे अभ्यास के माध्यम से सुना जा सकता है। मौन की ध्वनि को सुनने के अभ्यास ने मुझे ध्यान करने में सहायता की। स्वामी जी ने यह ज्ञान ही मुझे मुख्य रूप से दिया था।

जब मैं भारत के कोने में समुद्र के किनारे उस गाँव में पहुँचा था, तब मुझे इस बारे में जरा भी अनुमान नहीं था की मैं यह सब सीखने जा रहा हूँ। मैं भारत की यात्रा इसलिये गया था क्योंकि मेरी नज़र में भारत एक अनोखा और विविधताओं से भरपूर देश है और फिर मुझे आराम की भी जरुरत थी। ऊपर से छोटे योगी के शब्दों ने मेरे अंदर बहुत सी जिज्ञासायें जगा दी थी इस देश के बारे में…. लेकिन जो ज्ञान मैं अब प्राप्त कर रहा था उसके बारे में मुझे बिल्कुल भी अनुमान नहीं था की ऐसा भी होगा। मैंने यह नहीं सोच कर आया था की मैं यह सब सीखने जा रहा हूँ। वास्तव में, जब मुझे पहली बार बताया गया कि स्वामी जी एक योग गुरु हैं, तो मैंने यही अनुमान लगाया की वह मुझे मेरे कान को पैरों की एड़ियों से स्पर्श करना सिखायेंगे।

पश्चिम देशों में योग का अभ्यास पूरी तरह से व्यावसायिक हो गया है। आज वहां योग केवल एक व्यवसाय है, और कोई भी प्रमाणित योग प्रशिक्षक बनने के लिये कुछ सौ डॉलर देकर प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है। लेकिन भारत, अथार्त जिस देश में योग का जन्म हुआ था, योग सिखाने वाले लोगों ने पूरा जीवनकाल ऐसा योग में ही बिता दिया है। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि योग का व्यवसायीकरण करना बुरा है – यदि आप को यह अच्छा लगता है और इससे आपको शांति मिलती है, तो आपको ऐसा करना चाहिये। मेरा सौभाग्य था की मैं एक ऐसे ऋषि से योग सीख रहा था जिन्होंने योग के पूरे दर्शन को सही तरीके से समझाया।

मैंने उस यात्रा में स्वामी जी के साथ केवल चार दिन बिताए, लेकिन उन चार दिनों ने मेरे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। आश्रम में प्रतिदिन हम विभिन्न प्रकार के समारोह आयोजित करते थे जिसमें वे विभिन्न प्रकार के संस्कृत मंत्रों के उच्चारण द्वारा मुझे दिव्य ध्वनि और मौन की ध्वनि को खोजने में सहायता करते थे। एक बार जब आप मौन की ध्वनि को सुनने में सक्षम हो जाते हैं तो आप इसे किसी भी स्थिती में सुन सकते हैं…. चाहे आप रेलवे स्टेशन पर हों या अकेले अपने कमरे में हों, आप यह ध्वनि सुन सकते हैं। केवल अभ्यास के माध्यम से आप इसमें अभ्यस्त हो सकते हैं। अधिक अभ्यास के द्वारा आप उस मौन की ध्वनि और कंपन को अनुभव करने में सक्षम हो सकते हैं जो आपके पूरे शरीर में घूमती रहती है।

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सब कुछ मौन से शुरू होता है। एक बार जब मौन की ध्वनि सुन लेते हैं, तो आप अपने आप को उन सभी से अलग करने में सक्षम होते हैं जो भौतिक है और आपके आस-पास फैला हुआ है। और इस प्रकार आप ध्यान की अगली अवस्था तक पहुँच जाते हैं। जब उन्होंने मुझे यह सभी क्रियाएं सिखाई तो मुझे न केवल विश्वास हुआ कि मुझे अपना केंद्र मिल गया, अपितु मुझे ब्रह्मांड की ऊर्जा से भी जुड़ने में सहायता मिली।

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एक दिन योगाभ्यास के दौरान वह मेरे बगल में बैठ गये और मेरे कानों पर अपनी हथेलियां रख दी। मुझे एक अद्भुद सी ऊर्जा का अनुभव हुआ… कुछ विशेष सी ध्वनियाँ सुनाई दी जो की मेरे भीतर तक समा गयी। उसके बाद स्वामी जी ने अपना एक हाथ मेरी रीढ़ पर और दूसरा हाथ मेरी छाती पर रखा और पूछा: “क्या आप कुछ अनुभव कर रहे हैं?” उस क्षण में, मुझे विशेष कंपन का अनुभव हुआ। फिर उन्होंने मेरी आँखों पर हाथ रखा, मुझे पेंडुलम जैसा कुछ दिखने लगा।

मैंने सोचा, “यह सब क्या है? यह आदमी तो वास्तव में एक जादूगर है!”

बाद में मैंने यह सभी क्रियाएं फिर से अपने अपने दम पर करने का प्रयास किया, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका।
उन्होंने कहा “प्रयास करते रहो। ध्यान रखना की, अभ्यास के द्वारा ही आप उच्च स्थिती तक पहुँच पाओगे। अभ्यास के साथ सब कुछ संभव है। जब विश्व का अंत सुनामी, तूफान और बवंडर के साथ होना आरम्भ होगा तो सभी मनुष्य एकत्रित जायेंगे और ईश्वर से प्रार्थना करना आरम्भ कर देंगे, लेकिन आप… आप उस स्थिती में भी स्थिर होंगे और बैठ कर ध्यान लगायेंगे… मौन की ध्वनि सुन पायेंगे। आप अपने शरीर में एक दिव्य कंपन का अनुभव करेंगे। दुनिया आपके चारों ओर ढह रही होगी लेकिन आप ध्यान में केंद्रित और शांत रहेंगे।”

जो भी मैंने स्वामी जी की सहायता से सीखा और अनुभव किया, फिर कभी अनुभव नहीं कर पाया…. शायद अभ्यास की कमी ही मुख्य कारण थी इसके पीछे लेकिन उनके दिया ज्ञान मेरे अंदर अभी भी समाया हुआ था। उस यात्रा के दौरान मैंने जो कुछ भी सीखा, उसका पालन करते हुए मुझे लगता है कि उनकी शिक्षाओं का वास्तविक अर्थ यही था की इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके आसपास कितने लोग और कितना शोर है, यदि आप संतुलित हैं और शांत हैं तो मौन की ध्वनि को सुन सकते हैं। जब आप मौन की ध्वनि सुन रहे होते हैं तो, चाहे तेज़ आवाज़ में सायरन बजाते हुए पुलिस की गाड़ी आपके बगल से निकल जाये या फिर हवाई जहाज़ ही आपकी छत पर उतर जाये, आपको उनकी आवाज़ नहीं सुनाई देगी…. यहाँ तक की आपको पता भी नहीं लगेगा की ऐसा कुछ घटा है। यह कुछ और नहीं, मौन की ध्वनि की शक्ति है। जैसे ही आप इसे सुनना और अनुभव शुरू करते हैं आप अपने शरीर से परे अपनी आत्मा को अनुभव कर सकते हैं… उससे जुड़ सकते हैं।

भारत India जाने से पहले, मैंने शायद ही कभी अकेले या मौन में समय बिताया हो। जब भी मैं अपने कमरे में जाता… तुरंत ही टेलीविजन चालू कर देता था, लेकिन इसे देखने के लिए नहीं, बस कुछ देर अकेलापन दूर हो जाये इसलिये। शोर से भरी इस दुनिया में अपने अंदर क्या चल रहा है, मैं उसे समझ ही नहीं पाया था… यह शायद इसलिये भी था क्योंकि मैं उन अपनी वास्तविकताओं को देखना ही नहीं चाहता था जो मुझे नापसंद थी। जब मैं भारत से लौटा, तो मैंने अपनी आदतों विपरीत स्वयं की खोज करनी शुरू की। मुझे मौन चाहिये था, मुझे मौन की आवश्यकता थी।

आश्रम में मैं हर सुबह योग और ध्यान का अभ्यास करने में पैंतीस मिनट बिताता था, और मैं दोपहर में भी यही करता था। वे क्षण और कार्यकलाप मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गए। जब भी मैं अशांत होता, इस अभ्यास ने मुझे शांत रखने में सहायता की। उन्होंने मुझे स्वयं का सामना करना सिखाया जिससे की मैं उस डर को ख़त्म कर सकूँ, जिसने मुझे अपने सत्य से दूर कर दिया।

दुर्भाग्य से, जैसे मैं कुछ दिनों के लिए घर आया, फिर से अपनी पुरानी दिनचर्या में वापस चला गया। ऐसा नहीं है की मैंने प्रयास नहीं किया; मैंने सामान्य रूप से ध्यान करने के लिए स्वयं को तीस मिनट का समय दिया, धीरे-धीरे यह बीस मिनट में बदल गया, फिर दस, और यह तब तक होता रहा जब तक मैंने पूरी तरह से अभ्यास करना बंद नहीं कर दिया।

(स्वामी योगेश्वरानंद गिरी जी के आश्रम में अधिक जानने के लिये यहाँ क्लिक करें)

क्या ऐसा नहीं हो सकता है की मौन के वे पल मुझे मेरी उस सच्चाई के बहुत करीब ला दें, जिसका सामना मुझे एक न एक दिन करना ही पड़ेगा? शायद… लेकिन इतना तो था की अभी वह समय नहीं आया था की मैं स्वयं को स्वीकार कर सकूँ।

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