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Purnagiri Temple of Kumau कुमाऊ का पूर्णागिरी मंदिर

यदि आप उत्तराखण्ड (विशेषतः कुमाऊ) की यात्रा पर हैं या फिर जाने का मन बना रहे हैं तो मां पूर्णागिरि के मंदिर जाना न भूलें। मान्यता है की यहाँ मां के भक्तों की सभी इच्छायें पूरी होती हैं। मां पूर्णागिरी का मंदिर उत्तराखण्ड के कुमाऊ के चंपावत जिले के टनकपुर क्षेत्र में पड़ता है। यदि आप इस यात्रा की तुलना माता वैष्णो देवी की यात्रा से करें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। कुमाऊ की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच मां का सुंदर दरबार सजा है।

यहां मां के मंदिर में दर्शन करने के लिए श्रद्धालु देश भर से आते हैं। प्रति वर्ष यहाँ चैत्र नवरात्र में एक विशाल मेला शुरू होता है जो की जून महीने तक चलता है। इस दौरान मां के भक्तों भारी संख्या में यहां आते हैं। भगवान विष्णु द्वारा माता सती के मृत शरीर का चक्र द्वारा खंडन किये जाने पर उनकी नाभि यहाँ गिरी थी। ऊँची चोटी पर गाड़े गये त्रिशुल आदि शक्ति के उस स्थान को इंगित करते हैं जहाँ नाभि का भाग गिरा था। यह धाम माता के 108 सिद्ध पीठों में से एक है। इसलिये यह स्थान महाकाली पीठ के रूप में भी जाना जाता है।

Purnagiri mata Image source: Google Image
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आप पूर्णागिरि धाम जा रहे हैं तो नेपाल भी जा सकते हैं क्योंकि यहां से नेपाल बहुत नजदीक है। नेपाल में भगवान सिद्धनाथ और ब्रह्मदेव मंदिर है जहाँ आप जा सकते हैं। यहाँ तक की मान्यता यह भी है की पूर्णागिरि मंदिर की यात्रा ब्रह्मदेव मंदिर में जाये बिना पूर्ण नहीं होती।

यहाँ स्थित काली नदी भारत और नेपाल को विभाजित करती है। काली नदी ही यहाँ से समतल की ओर बहते हुए शारदा नदी के नाम से जानी जाती है। माता पूर्णागिरी के धाम से काली नदी का विशाल फैलाव, टनकपुर शहर और नेपाली गाँव देखे जा सकते हैं।

मां पूर्णागिरी से जुड़े कई चमत्कार हैं लेकिन झूठा मंदिर से जुड़ी एक गाथा बहुत ही प्रसिद्ध है।

झूठा मंदिर की गाथा

मां पूर्णागिरि के दर्शन कर लौटते समय रास्ते में झूठा मंदिर की पूजा की जाती है। झूठा मंदिर के बारे में बताया जाता है कि एक बार एक सेठ ने पुत्र प्राप्ति के लिए मां पूर्णागिरी से मन्नत मांगी थी। सेठ ने मन्नत पूरी होने पर सोने का मंदिर बनाने की बात कही। मां की कृपा से सेठ के घर में पुत्र ने जन्म लिया। इसके बाद सेठ ने सोने का मंदिर न बनवाकर तांबे का मंदिर बनवा दिया और उस पर सोने का पानी चढवाया। जब मंदिर को मजदूर स्थापित करने के लिये ले जा रहे थे तो उन्होंने रास्ते में मंदिर जमीन पर रख दिया और आराम करने लगे। इसके बाद जब उन्होंने मंदिर को उठाया तो वह उठा ही नहीं सके। इसलिए सेठ और मजदूर मंदिर को वहीं पर छोड़कर वापस लौट गए।

माता वैष्णो देवी की यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।
चार धाम यात्रा गाइड पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

पूर्णागिरी मंदिर कैसे पहुंचे ?

मां पूर्णागिरि के मंदिर तक आप सड़क, रेल और वायु मार्ग से जा सकते हैं। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर है जो 20 किमी की दूरी पर स्थित है। वायु मार्ग से जाने पर आपको पंतनगर उतरकर मंदिर जाने के लिए 121 किमी की यात्रा तय करनी पड़ेगी। वहीं, माता के दर्शन करने के लिए लोग अपने वाहनों से भी आते हैं।

दिल्ली से टनकपुर के लिये सीधी बस उपलब्ध है। टनकपुर पहुँच कर आगे टुन्यास तक 20 किलोमीटर का सफर बस/शेयर्ड टैक्सी द्वारा कर सकते हैं। यहाँ से मंदिर तक तीन किलोमीटर का सफर आपको पैदल ही तय करना होता है। पैदल रास्ता बहुत अच्छा बना हुआ है।

Image source: Flickr
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कहाँ रुके ?

रुकने के लिये पर्याप्त व्यवस्था है यहाँ। बहुत से होटलों और धर्मशालाओं में आप अपना ठिकाना ढूंढ सकते हैं।

(चोपता तुंगनाथ यात्रा यहाँ पढ़ें।)

जाने के लिये उपयुक्त समय

माता के दर्शन आप पुरे वर्ष में कभी भी कर सकते हैं। प्रति वर्ष यहाँ चैत्र नवरात्रों (अप्रैल) से जून तक मेला लगता है जिस दौरान यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। इसलिये यदि आप मेले का आनंद लेना चाहते हैं तो इस दौरान आ सकते हैं किन्तु यदि आप भीड़ से बचना चाहते हैं तो सर्दियों में आयें। जुलाई, अगस्त का मौसम भी यहाँ शानदार होता है जब की हरियाली अपने चरम पर होती है और चारो ओर केवल बादल दिखाई देते हैं।

तो कब आ रहे हैं माता के धाम ?

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