Kedarnath

Kedarnath Trip

केदारनाथ यात्रा Kedarnath yatra आरम्भ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। आज उठना तो सुबह पांच बजे ही था और ऐसा हुआ भी लेकिन रजाई नाम की ही एक चीज़ बनाई है भगवान ने। पहले आप – पहले आप वाली परम्परा निभाते – निभाते ही सुबह के छः बज चुके थे। इस बीच देबासीस और आलोक मंदिर दर्शन के लिये निकल चुके थे और कुछ देर बाद हम भी पहुंचे। जब तक हम पहुँच पाये लगभग 80 लोग हमारे आगे पंक्ति में लगे हुए थे…. देबासीस और आलोक दर्शन कर चुके थे।

Nandi in front of Kedarnath Temple
Nandi in front of Kedarnath Temple

यहाँ प्रशाद वाले दर्शन के बाद ही पैसे लेते हैं। बहुत से पंडित जी लोग मंदिर के बाद यजमान की तलाश में घूम रहे थे लेकिन उनका पहला प्रश्न यही होता था की आप कहाँ से हैं? खैर… विवेक कुमाऊ से ही है और उन्होंने मोर्चा सम्भाला हुआ था।

कहीं भी और विशेषकर पहाड़ों में फोटोग्राफी के लिये सबसे अच्छा समय सूर्योदय से एक घंटे पहले सूर्योदय के एक घंटे बाद ही होता है और ठीक ऐसा ही सूर्यास्त के समय भी होता है। हमें भी उम्मीद थी की चलो फोटोग्राफी भी अच्छी हो जायेगी, लेकिन यहाँ तो पहाड़ों पर बादल घिरे हुए थे और हल्की बारिश जारी थी और ऊपर से दोनों हांथों में प्रशाद की थाली।

सबसे आगे गौरी, फिर विवेक और सबसे अंत में मैं खड़े – खड़े अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। एक बात और, यहाँ दर्शन और पूजा के लिये पण्डित की आवश्यकता नहीं है…. लेकिन मेरी सलाह है की यहाँ आप पण्डित की सहायता ले ही लें तो बेहतर होगा क्योंकि मंदिर के अंदर बहुत भीड़ होती है और ज्योतिर्लिंग के समक्ष अधिक से अधिक 1-2 मिनट रुक पाने का ही समय मिलता है किन्तु पंडित वहां के स्थानीय होते हैं और मंदिर के सभी क्रियाकलापों से परिचित होते हैं। पण्डित प्रति व्यक्ति 100 रुपये दक्षिणा ही लेते हैं और यदि आप बड़े परिवार के समूह में हैं तो 500 रुपये लेते हैं, किन्तु वे आपको ज्योतिर्लिंग के समक्ष 10-12 मिनट तक आराम से बैठा कर विधिवत पूजा करवा देते हैं, भीड़ को मैनेज करने का अच्छा अनुभव होता है उन्हें। वैसे भी आप सैकड़ों – हजारों किलोमीटर से आये हों और फिर 19 किलोमीटर का पैदल सफ़र करके बाबा के धाम तक पहुंचे हो और आपको मात्र 1 मिनट ही मिले दर्शन करने को, यह थोड़ा अच्छा नहीं लगता…. अतः पण्डित को दक्षिणा देना गलत नहीं और वैसे भी पूजा की जो विधियां पुरोहित जानते हैं, वे शायद आम इंसान न जानता हो। हमने भी ऐसा ही किया था।

यहाँ सर्दी बहुत पड़ती है और ऐसी सर्दी में नंगे पैर जमीन पर खड़े होना मुश्किल होता है किन्तु 19 किलोमीटर की पैदल यात्रा की तुलना में यह कष्ट कुछ भी नहीं। इसी कारण हम सभी ने अपने जूते प्रशाद वाले के पास ही उतार दिये थे। आरम्भ में कुछ समस्या हुई किंतु कुछ ही देर में आदत हो गयी। वैसे यहाँ बहुत से लोग जूते पहन के ही मंदिर की लाइन में लगे थे और दर्शन के लिये मंदिर में जाने से ठीक पहले मंदिर के द्वार पर ही जूतों का ढेर लगा रहे थे। यह तरीका वास्तव में मुझे गलत लगा। यदि आप इतना भी कष्ट नहीं झेल सकते तो क्या कर सकते हैं ?

आगे बढ़ने से पहले केदारनाथ धाम के इतिहास के बारे में कुछ बाते कर लेते हैं।

कथा केदारनाथ धाम की (History of Kedarnath)

महाभारत युद्ध के बाद भाई बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवो ने द्रौपदी सहित हिमालय प्रयाण किया, अथार्त हिमालय को चले गए। मार्ग में उन्हें भगवान् शिव दिखे। शिव जी ने सोचा की कहीं पांडव मोक्ष न मांग लें, इसलिए उन्होंने ने भैंसे का रूप धारण किया और भागने लगे, किन्तु भीम ने उन्हें पहचान लिया था। भीम उनके मार्ग में दो चट्टानों पर पैर फैला कर खड़े हो गए। अब भोलेनाथ भीम के पैरों के नीचे से तो निकल नहीं सकते थे, अतः भैंसे रुपी भगवान् शिव धरती में समा गए। कुछ समय बाद उनके शरीर के अंग हिमालय में पांच अलग अलग स्थानों पर प्रकट हुए। इन्ही पांच स्थानों को पंच केदार कहा जाता है। प्रथम केदार अथार्त केदारनाथ में पृष्ट भाग, तुंगनाथ में भुजा, मध्यमहेश्वर में नाभि, चेहरा रुद्रनाथ में, और जटाएं कल्पेश्वर में। यह पांचो केदार उत्तराखंड में स्थित हैं। भगवान का शीश नेपाल में प्रगट हुआ और वहां उन्हें पशुपतिनाथ के रूप में जाना जाता है।

कहा जाता है भगवान् केदारनाथ Kedarnath का बेहद भव्य मंदिर महाबली भीम ने एक ही रात में बनवा दिया था किन्तु युग परिवर्तन के दौरान वह मंदिर नष्ट हो गया। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की खोज की और वहां वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया। वैसे यह आश्चर्य वाली बात हैं न की जिस बीहड़ क्षेत्र में पहुंचना आज भी इतना मुश्किल होता है वहां आज से बारह सौ वर्ष पूर्व इतने शानदार मंदिर का निर्माण कैसे संभव हुआ होगा। न केवल शानदार, अपितु बेहद मजबूत भी। 13वीं से 17वीं शताब्दी अथार्त 400 वर्षों तक यहाँ पूर्ण हिमयुग था और मंदिर पूर्ण रूप से बर्फ में समा गया था किन्तु उसके बाद भी मंदिर को कोई नुक्सान नहीं हुआ। वर्ष 2013 की हिमालयी सुनामी (Kedarnath disaster) में जहाँ पूरी केदार घाटी नष्ट हो गयी, राम बाड़ा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया और उत्तराखण्ड ने भयानक बर्बादी झेली…. वहीं केदारनाथ मंदिर और मंदिर के सामने स्थति नंदी प्रतिमा कोई भी नुकसान नहीं पहुंचा…. अब इसे क्या कहा जाये? भगवान भोले नाथ का प्रताप या उस समय की शानदार इंजीनियरिंग ?

आगे बढ़ते हैं।

केदारनाथ मंदिर Kedarnath temple मजबूत पहाड़ी शिलाओं से बना हुआ है। मंदिर के मुख्य द्वार के ऊपर एक राजा की प्रतिमा उकेरी गयी है, शायद गढ़वाल के तत्कालीन राजा को दर्शाती हो यह प्रतिमा। द्वार के दोनों ओर जय और विजय की प्रतिमायें बनी हुई हैं। शिलाओं पर की गयी अनोखी कलाकारी देखते – देखते आखिर अपना नंबर भी आ गया। एक बात थोड़ी बुरी लगी की लोगों ने मंदिर के मुख्य द्वार पर ही जूतों का ढेर लगा रखा था।

मंदिर के सभा मण्डप में प्रवेश करते ही तमाम पण्डित यजमानों को बुला रहे थे, हमने भी एक पण्डित जी से बात कर ली। सभा मण्डप में पाण्डवों, द्रौपती, और अन्य देवी – देवताओं के विग्रह बने हुए हैं जो देखते ही बहुत प्राचीन जान पड़ते हैं। यहाँ सभा मण्डप में भारी भीड़ थी लेकिन जैसे तैसे मैं, गौरी और विवेक गर्भ गृह में पहुँच ही गये। बाहर चाहे कितनी भी सर्दी हो किंतु यहाँ मंदिर के अंदर गर्मी थी और वो भी बिना किसी इंतेज़ाम के। कुछ ही देर में हम समक्ष थे भगवान् केदारनाथ के ज्योतिर्लिंग के। यह स्वयंभू ज्योतिर्लिंग किसी शिवलिंग के रूप में न होकर एक शिला के रूप में हैं। यहाँ एक अलग ही दिव्य अनुभूति हो रही थी और लग रहा था की मानों हम साक्षात् भोलेनाथ के चरणों में हों। गर्भ गृह में भारी भीड़ के उपरांत भी पण्डित जी ने हमारे बैठने की जगह बना ही दी और विधिवत पूजा करवा दी।

यहाँ से बाहर निकल कर मंदिर को एक बार फिर प्रणाम किया। वर्ष 2013 में आयी आपदा में सबसे बड़ी तबाही मंदिर के पीछे पहाड़ में बने चोराबरी ग्लेशियर जिसे वासुकी ताल के रूप में भी जाना जाता है, से आयी मंदाकिनी नदी ने मचाई थी। अत्यधिक वेग से आया पानी अपने साथ बड़ी – बड़ी चट्टानें भी बहा कर लाया था लेकिन इन चट्टानों में से एक बड़ी चट्टान मंदिर के ठीक पीछे आकर रुक गयी और पानी दो दिशाओं में बट गया जिससे की मंदिर बच गया। अब इसे शिला मान कर पूजा भी जाता है।

थोड़ी – बहुत चहल कदमी करने के बाद हम अपने होटल पहुंचे और सामान समेट कर वापसी कर ली। वापसी में अच्छी बात यह थी हम पांचो साथ में ही थे।

Kedarnath Temple front view
Kedarnath Temple front view
Kedar Ghati
Kedar Ghati

Kedarnath Temple
Kedarnath Temple

Bheem Shila Kedarnath
Bheem Shila Kedarnath

सबसे आगे देबासीस और गौरी, उनके पीछे विवेक, फिर मैं और सबसे पीछे आलोक भाई थे। केदारनाथ आते समय आलोक के पैरों में कुछ समस्या हो गयी थी जिससे की उन्हें चलने में तकलीफ हो रही थी। बरसात भी तेज़ हो चुकी थी और हम तेज़ी से नीचे बढ़ते जा रहे थे। जो नज़ारे रात के अँधेरे में नहीं देख पाये थे अब दिन में स्पष्ट देख पा रहे थे।

पोर्टेबल स्पीकर पर नमों – नमों और अन्य गाने बजाते – बजाते गौरी भाई कभी – कभी इतनी आगे निकल जा रहे थे की ब्लूटूथ से कनेक्शन टूट जा रहा था और गाना वहीं बंद हो जा रहा था। 🙂 चलते – चलते अब भूख लग चुकी थी, वैसे भी सुबह से कुछ नहीं खाया था। एक ढाबा देख कर मैगी खायी और फिर बारिश में भीगते हुए निकल पड़े। इसे मैगी का जोश कहें या ढलान वाले रास्तों की कृपा, की अब सबकी चलने की रफ़्तार काफ़ी तेज़ हो चुकी थी और हम सबके बीच फासला भी बढ़ चुका था। विवेक, गौरी और देबासीस तेज़ी से चलते हुए मुझसे बहुत आगे निकल गए और पैर की समस्या के कारण आलोक मुझसे बहुत पीछे रह गये।

Crash Helicopter
Crash Helicopter
मैं
मैं

New way towards Bhimbali
New way towards Bhimbali

रामबाड़ा से आ रहा रास्ता जहाँ भीमबली से आ रहे रास्ते से मिलता हैं वहां से मैं भीमबली वाले रास्ते की ओर चल पड़ा। यह रास्ता रामबाड़ा वाले रास्ते से बहुत अच्छा बना हुआ है और चौड़ा भी है। इसमें मोड़ कम है। कुछ ही देर में मैं भीमबली पुल पर था। यह पुल कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई पर है और गहरी संकरी खायीं में बहती मंदाकिनी को देख कर थोड़ा भय लगता है।

भीमबली (Bhimbali) पहुँचने का अर्थ था की अब गौरीकुण्ड मात्र 6 किलोमीटर दूर ही रह गया है। किसी सफ़र से वापसी अक्सर अच्छी नहीं लगती क्योंकि अब हमें वापस उसी दुनिया में लौट जाना होता है जहाँ से ऊब कर हम इन पहाड़ों में आये थे लेकिन क्या करें, जाना तो था ही फिर से आने के लिये। केदारनाथ जाते समय जिन पहाड़ों और झरनो को देख कर यात्रा का जोश बढ़ रहा था अब वही झरने और पहाड़ अच्छे नहीं लग रहे थे।

View from Bhimbali Bridge
View from Bhimbali Bridge

कुछ ही दूरी पर एक वृद्ध व्यक्ति को कंधे का सहारा देकर ले जाते लोग दिखे। फिसल कर गिरने से उनकी कमर और घुटने में कुछ चोट लग गयी थी और उन्हें मेडिकल यूनिट ले जाया जा रहा था। सवा तीन बजे तक मैं गौरी कुण्ड पहुँच चुका था और कुछ ही देर में आलोक भी। यहाँ विवेक, गौरी और देबासीस को न पाकर कुछ देर प्रतीक्षा की…. नेटवर्क तो यहाँ था नहीं इसलिये ढाबे वाले के पास मैसेज लिख कर छोड़ा की यदि वे तीनों आयें तो सीधा सोनप्रयाग पहुंचे।

गुप्तकाशी से सोनप्रयाग आते समय बेहद ख़राब रास्तों के कारण हमने तय किया था की तीन विवेक और देबासीस ही कार से गुप्तकाशी तक जायेंगे और बाकी के तीन लोग बस या टैक्सी से जायेंगे। सोनप्रयाग पहुँचने पर नेटवर्क आया तो पता लगा की देबासीस, विवेक और गौरी गुप्तकाशी के लिये निकल चुके हैं और अब हमें वहीं मिलना है। सोनप्रयाग से गुप्तकाशी के लिये अंतिम गाड़ी दोपहर बारह बजे तक ही मिलती है लेकिन यहाँ तो शाम के चार बज रहे थे और टैक्सी वाले 3000 रुपये मांग रहे थे। खैर… हमारी किस्मत अच्छी रही की एक मालवाहक बोलेरो मिल गयी और उसी के सहारे हम उसी कीचड़ भरे रास्ते से होते हुए शाम छः बजे तक गुप्तकाशी पहुंचे। सोनप्रयाग से गुप्तकाशी आते हुए केदारनाथ पर्वत की अप्रतिम छटा देखते ही बन रही थी। हरे पहाड़ों पर पड़ी हुई बर्फ़ मानों किसी स्वर्ग से कम नहीं लग रही थी।

वैसे हमारी योजना यह थी की आज रात चोपता में रुका जाये और अगले दिन वापसी गोपेश्वर से की जाये लेकिन अँधेरे को देखते हुए और और बोलेरो वाले की सलाह मानते हुए हम गुप्तकाशी में ही रुक गये और अगले दिन अगत्स्यमुनि वाले साधारण रास्ते से वापसी सुनिश्चित की। यहाँ तीनों ने गुप्तकाशी में कमरा पहले से ही बुक कर लिया था। वैसे अच्छा ही था क्योंकी अब और चलने की हिम्मत बची नहीं थी।

कमरे में पहुँचते ही गीले बैग से सारा सामान निकाल कर सूखने के लिये फैलाया और रजाई की शरण ले ली। वैसे यहाँ सर्दी कम थी।

यात्रा का अंतिम दिन।

आज यात्रा का अंतिम दिन अथार्त वापसी का दिन था और हमें किसी भी हालत में रात तक दिल्ली पहुँच जाना था। वैसे कितना बुरा लगता हैं यात्रा के दौरान ऐसी बाते करना। क्या करें, जाना तो है ही। देरी न करते हुए हम उठे और होटल के छज्जे से एक बार चौखम्बा की ओर देखा। थोड़े – थोड़े बादलों में ढका हुआ चौखम्बा अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहा था। उत्तराखण्ड में चाहें मैं किसी भी सफ़र पर रहूं लेकिन अगर एक बार चौखम्बा दिख जाये अलग ही ताज़गी आ जाती है। पता नहीं क्यों इतना लगाव है इससे ?

गुप्तकाशी के बादलों में ढका चौखम्बा
गुप्तकाशी के बादलों में ढका चौखम्बा

कुछ ही देर में हम कार में थे और वापसी के रास्ते पर पर चल पड़े थे। वैसे वापसी में कुण्ड से रुद्रप्रयाग की ओर जाता रास्ता इतना बुरा भी नहीं लग रहा था। हम सुबह – सुबह ही निकल पड़े थे और इस कारण अभी पहाड़ से पत्थर गिराने वालों काम नहीं शुरू हुआ था और इसिलिये यातायात भी बाधित नहीं था, शायद इसीलिये यह रास्ता सही लग रहा था या फिर ऐसा भी हो सकता है की हम इससे भी भयंकर रास्ते का सफर गुप्तकाशी से सोनप्रयाग तक जाते समय कर चुके थे, इसीलिये ऐसा लग रहा था।

सुबह 8 बजे तक हम रुद्रप्रयाग बाई – पास के पास पहुँच चुके थे। यहाँ कुछ ऐसा हो गया की हमें स्वयं पर हंसी आ गयी। हुआ यह की बाई – पास वाला पुल पार करते ही एक जगह थोड़ा मलबा गिराया हुआ था जिस कारण हमारी और अन्य गाड़ियां धीरे चल रही थी… की तभी पीछे से एक 16 – 17 का लड़का हाँथ में किताब लिये पीछे से तेज़ी से भागता आया और हमारी गाड़ी से आगे निकल गया, केवल इतना ही नहीं वो तो आगे चल रही कुछ और गाड़ियों को भी पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गया। वास्तव में हास्यास्पद स्थिती ही थी यह। वैसे देख कर लग रहा था की वो सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहा होगा।

केदारनाथ आते समय बीनू जी से जयालगढ़ में आने का वादा किया था लेकिन अब हम और हमारे कपड़े इतने गंदे हो चले थे की उनके यहाँ जाने में शर्म आ रही थी। श्री नगर, जयालगढ़, देव प्रयाग को पीछे छोड़ते हुए हम पहुंचे मलेथा। यहाँ पहाड़ से गिरते हुए पानी को देख कर कार धो लेने का विचार आया और साथ ही नाश्ते का भी। यहीं मलेथा में एक ढाबे पर पराठों और दही का नाश्ता किया और उसके बाद गाड़ी धो कर ऋषिकेश की ओर चल पड़े।

वैसे शायद ही कोई ऐसा हो जिसे किसी न किसी जानवर से डर न लगता हो, मुझे भी लगता है बन्दर से। यहाँ पास ही एक बन्दर अपने बच्चे को लेकर पेड़ पर बैठा था। गौरी भाई बन्दरों वाली आवाज़ में उसकी ओर आवाज लगाने लगे, शायद दोनों एक दूसरे की भाषा समझते हों 😀 लेकिन मुझे डर था की कहीं बन्दर चिढ़ कर हमारी ओर न आ जाये।

Maletha
Maletha
View between Maletha and Byasi
View between Maletha and Byasi

वैसे इस पूरे सफ़र में यदि किसी ने सबसे अधिक हमारा साथ दिया तो वो था इस सफ़र का छठा साथी – अथार्त विवेक भाई की वैगन – आर। यह कार उन्होंने 10 वर्ष पूर्व ली थी और वो भी पुरानी इसके उपरांत भी इस पूरे सफ़र में कार ने कहीं साथ नहीं छोड़ा। कहीं खराब होना तो दूर, यह तो पंचर तक नहीं हुई। अगत्स्यमुनि से कुण्ड और गुप्तकाशी से सोनप्रयाग Guptkashi to Sonprayag के भयंकर रास्तों को इस तरह बिना किसी परेशानी के झेल लेना और वो भी इस 10 साल पुरानी छोटी कार के लिये कोई खेल थोड़े ही न था… वैसे विवेक भाई की ड्राइविंग भी शानदार रही।

हम दोपहर तीन बजे तक राम झूला पर पहुँच चुके थे। ऋषिकेश Rishikesh में थोड़ा सैर – सपाटा और स्नान करने का विचार था इसलिये यहीं पार्किंग में कार लगाई और पहुँच गये स्वर्ग आश्रम की ओर हमेशा की तरह आज भी भीड़ थी और ऊपर से नवरात्र का दूसरा दिन होने के कारण यहाँ जागरण की तैयरियां चल रही थी। यह जानते हुए की आलोक को चलने में बहुत तकलीफ हो रही है, मैं सभी को परमार्थ निकेतन से आगे वाले गीता भवन के घाट पर ले गया। नहाने की दृष्टि से यह मेरा प्रिय घाट है। यहाँ गिने – चुने लोग आते हैं और घाट भी बहुत बड़ा होने के साथ साफ़ – सुथरा भी है। वैसे ऋषिकेश के सभी घाट स्वच्छ ही हैं।

यहाँ पास ही पूर्णानंद घाट Purnanand Ghat पर एक और सस्पेंशन ब्रिज बनाया जा रहा है जो की राम झूला Ram Jhula Rishikesh से भी अधिक विशाल है। सस्पेंशन ब्रिज की यही विशेषता है की यह पर्यावरण को कम से कम क्षति पहुंचाते हुए कम समय और कम व्यय में तैयार हो जाता है।

Bridge near Purnanand Ghat Rishikesh
Bridge near Purnanand Ghat Rishikesh

सोचा था की यहाँ शाम 4 बजे तक निकल लेंगे तो चीला वाले रास्ते से होते हुए हरिद्वार पहुँच जायेंगे लेकिन हमें तो यहीं शाम के छः बज चुके थे और अब यह तय था की चीला वाला रास्ता बंद हो चुका होगा और हमें ऋषिकेश – हरिद्वार मुख्य हाईवे के यातायात में फंसते हुए ही जाना होगा और हुआ भी यही।

चंद्रभागा वाला पुल पार करते ही हम भयंकर जाम में फंस चुके थे। खैर… पहाड़ों को छोड़ने की जल्दी होती भी किसे है, हम भी ऐसे ही धीरे – धीरे बढ़ चले दिल्ली की ओर इस उम्मीद से की एक बार फिर आयेंगे इन पहाड़ों की ओर।

From left: Alok, Vivek, Debasis, Gauri and I

अगला भाग शीघ्र ही आयेगा जिसमें केदारनाथ यात्रा से सम्बंधित सभी जानकारीयाँ दी जायेंगी।

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