Goverdhan Parikrama

Goverdhan Parikrama in winter सर्दियों में गोवर्धन परिक्रमा

पहली बार जब मार्च 2018 में गोवर्धन परिक्रमा पर गया था, गोवर्धन कुछ ऐसा मन में समाया की शरीर तो अपने शहर वापस आ गया लेकिन मन वहीं रह गया। परिक्रमा रात में की थी और कुछ विशेष देख भी नहीं पाया था लेकिन फिर भी उस रास्ते पर पसरी शांति ने मन को मोह सा लिया था।

(गोवर्धन की पिछली परिक्रमा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

रात के सन्नाटे में वहां हारमोनियम की धुन पर गायी जा रही राधे नाम की धुन को सुनो तो ऐसा लगता है की मानों श्याम भी वहीं ढोलक पर ताल दे रहे हों। राधे – कृष्ण की भक्ति का रस ही ऐसा है की जो डूबा, बस डूबता ही गया। इसी भक्ति में डूबे हुए मन ने तय कर लिया था की यहाँ तो आते रहना है।

यह महीना दिसंबर 2018 का था और मैं ऑफिस से 10 दिनों की छुट्टियों पर था। मन में एक बार फिर से गोवर्धन जाने की इच्छायें उठने लगी थी। गोवर्धन और मथुरा के सदाबहार यात्री मयंक पाण्डेय जो की लगभग हर महीने ही परिक्रमा पर जाते रहते हैं, उनसे बात की। अनित भी इस वार्तालाप में शामिल थे।

इतना तो पक्का था की जाना है लेकिन यात्रा की तारिख को लेकर उहापोह की स्थिती थी क्योंकि मैं तो छुट्टियों पर था ही, मयंक का भी साप्ताहिक अवकाश शनिवार और रविवार को होता है लेकिन अनित को मंगलवार के दिन मुक्ति मिलती है।

अंततः तय कर लिया की 23 दिसंबर (रविवार) के दिन सुबह ताज एक्सप्रेस से निकालेंगे और परिक्रमा कर के शाम घर वापसी। यात्रा में आगे बढ़े, इस पहले जान लेते हैं कुछ बातें गोवर्धन पर्वत और परिक्रमा के बारे में।

गोवर्धन के बारे में कुछ जानकारियाँ

कोई गोवर्धन कहता है, कोई गिरिराज… नाम में क्या रखा है। गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की एक नगर पंचायत गोवर्धन का भाग है। लम्बवत आकार में फैला यह पर्वत वह भूमि है जहाँ श्री कृष्ण ने गोप – गोपियों संग लीलायें रचायी, जहाँ श्याम अपनी गईया चराने आते थे। यही वह पर्वत है जो की मथुरा वासियों की आजीविका में बड़ी भूमिका निभाता था और यही वह पर्वत है जिसे बाल कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ ऊँगली पर धारण किया था ताकि देवराज इंद्र के प्रकोप से मथुरा वासियों की रक्षा की जा सके।

देश – विदेश से तीर्थ यात्री गोवर्धन की परिक्रमा करने आते हैं। यह परिक्रमा 2 परिक्रमाओं का योग है, जिसमें बड़ी परिक्रमा 4 कोस (12 किलोमीटर) और छोटी परिक्रमा 3 कोस (9 किलोमीटर) की होती है। 12 किलोमीटर वाली बड़ी वाली परिक्रमा गोवर्धन पर्वत क्षेत्र से होकर गुज़रती है और 9 किलोमीटर वाली छोटी परिक्रमा शहरी क्षेत्र से। परिक्रमा के दौरान मार्ग में अनेक तीर्थ पड़ते हैं जैसे आन्योर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूँछरी का लोटा, दानघाटी आदि।

बड़ी परिक्रमा को भी करने के दो रास्ते हैं। पुराना रास्ता पर्वत की तराई अथार्त बिलकुल पर्वत से लगा हुआ कच्चा रास्ता है और नया रास्ता, पर्वत से लगभग 100 मीटर के फासले पर बनाया गया पक्का रास्ता है जो की पर्वत के सामानांतर ही चलता है।

यदि आप रात में परिक्रमा कर रहे हैं तो नये वाले पक्के रास्ते से ही करें लेकिन यदि आप दिन में परिक्रमा कर रहे हैं और समय का अभाव है तो पुराने वाले कच्चे रास्ते से परिक्रमा कर सकते हैं।

पौराणिक इतिहास

कथाओं के अनुसार गोवर्धन पर्वत पहले मथुरा में नहीं था, अपितु इसे यहाँ लाया गया ! लेकिन कहाँ से और क्यों ?

रामायण काल के दौरान जब लंका पर चढ़ाई के लिये सागर पर सेतु बनाया जाने लगा तो श्री राम को लगा की सेतु बनाने के लिए पत्थर कम पड़ सकते हैं इसलिए उन्होंने महावीर हनुमान को उत्तर में हिमालय से किसी पर्वत को ले आओ। आज्ञानुसार जब हनुमान जी हिमालय पहुंचे तो सबसे पहले उनकी भेंट गोवर्धन पर्वत से हुई। हनुमान जी ने गोवर्धन को श्री राम की इच्छा बताई। इस पर गोवर्धन जी उनकी सहायता के लिए एक शर्त पर तैयार हो गए की वे आजीवन प्रभु श्री राम के काम में आएंगे।

हनुमान जी ने उनकी यह शर्त मान ली और उनको लेकर चल पड़े। वे अभी मथुरा के पास ही पहुंचे थे की श्री राम का सन्देश आया की सेतु बन चुका है और अब पत्थरों की आवश्यक्ता नहीं है। ऐसा सुनकर गोवर्धन बहुत नाराज़ हुए और उन्होने हनुमान जी से कहा की यह तो उनका अपमान है। इस पर हनुमान जी ने उसने वहीं प्रतीक्षा करने को कहा, तब तक वे श्री राम से बात करके आते हैं।

हनुमान जी ने श्री राम को गोवर्धन नाराज़गी के बारे में बताया तो श्री राम ने उन्हें कहा की ‘गोवर्धन को कहो की वे मथुरा में ही रुके, मैं द्वापर में कृष्ण अवतार में उन्हें कनिष्ठ ऊँगली पर धारण करूँगा।’ वचनानुसार विष्णु अवतार श्री कृष्ण ने उन्हें द्वापर में अपनी कनिष्ठ ऊँगली पर धारण किया।

कैसे पहुंचे गोवर्धन ?

गोवर्धन पर्वत मुख्य मथुरा शहर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आप यहाँ जीप/ बस आदि द्वारा मथुरा से पहुँच सकते हैं। मथुरा के लिए देश के लगभग सभी भागों से रेल उपलब्ध हैं। दिल्ली से भी आप मथुरा तक बस और रेल द्वारा सरलता से पहुंच सकते हैं।

कहाँ ठहरें ?

गोवर्धन क्षेत्र में होटल और धर्मशालों आदि की कोई कमी नहीं हैं। यदि आप त्योहारों के मौसम में नहीं जा रहे हैं तो ऑनलाइन बुकिंग न करके, रियल टाइम बुकिंग करना ही अच्छा है।

चलो यात्रा पर चलते हैं

चूँकि हम सबकी छुट्टियों को लेकर कर असमंजस की स्थिती बनी हुई थी इसलिये ट्रेन की टिकट यात्रा से कुछ दिन पहले तक फाइनल नहीं हो पायी थी। इसलिए यात्रा से शायद 3 या 4 दिन पहले ही ताज एक्सप्रेस का टिकट हो पाया। पिछली बार की तरह इस बार भी यात्रा में मयंक पाण्डेय साथी थे। दो साथी और जुड़े थे अनित कुमार और मयंक के दोस्त रवि।

मयंक नॉएडा में रहते हैं, अनित मयूर विहार, रवि महरौली में और मैं पश्चिमी दिल्ली में। इसलिये तय हुआ की मैं नई दिल्ली से और बाकि साथी हजरत निजामुद्दीन जंक्शन से मिलेंगे।

23 दिसंबर, 2018

ताज एक्सप्रेस नयी दिल्ली से सुबह 6 बजकर 45 मिनट पर चलती है और मेरा घर रेलवे स्टेशन से 27 किलोमीटर दूर है। सुबह पौने सात बजे पहुंचना भी था…. ऐसे में हम दिल्ली वालों के लिये एक ही आशा की किरण है और वो है दिल्ली मेट्रो। सुबह सवा पांच बजे ही घर से निकल पड़ा था…. गली में किसी घर में बने ग्राउंड फ्लोर वाले हॉल से तारा रानी की कहानी की आती आवाज सुनकर लगा की जागरण हो रहा है। माता का आशीर्वाद और प्रशाद दोनों लेकर चल पड़ा मेट्रो स्टेशन की ओर।

6 बजकर 30 मिनट तक मैं नयी दिल्ली स्टेशन पहुंच चुका था। सर्दियों की सुबह थी तो जाहिर सी बात है की अँधेरा और धुंध ही होंगे। अँधेरे और धुंध का यह कॉम्बिनेशन मुझे बहुत अच्छा लगता है। अब प्लेटफॉर्म नंबर तो याद नहीं की कौन सा था… यहाँ प्लेटफॉर्म पर ताज एक्सप्रेस की जगह शान-ए-पंजाब एक्सप्रेस खड़ी पाकर बड़ा अजीब सा लगा।

”टिकट घर के डिस्प्ले बोर्ड पर तो इस प्लेटफॉर्म पर ताज एक्सप्रेस के बारे में लिखा था लेकिन यहाँ तो शान-ए-पंजाब एक्सप्रेस खड़ी है?” तभी एक TTE से पूछा तो उसने बताया की यही है ताज एक्सप्रेस, जो की पंजाब से शान-ए-पंजाब और दिल्ली से ताज एक्सप्रेस बन जाती है।

ताज एक्सप्रेस के साधारण चेयर कार कोच भी शताब्दी एक्सप्रेस वाले हैं और अंदर से बहुत अच्छे हैं लेकिन लोगों को नासमझी ने इसकी दुर्दशा कर दी है। वर्तमान में सरकार तो रेलवे को अंतर्राष्ट्रीय स्टार का बनाने के लिये बहुत सुधार कर रही है लेकिन देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो आज भी आदिम युग में जीना चाहते हैं और इसी कारण कभी ताज एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों के सीट कवर फाड़ते हैं तो कभी वंदे भारत एक्सप्रेस के शीशों पर पत्थर मारते हैं। ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे।

Taj Express
Taj Express

ट्रेन अपने नियत समय पर चल पड़ी। अभी हर ओर धुंध थी और मैं पहली बार इतनी सुबह किसी ट्रेन से यात्रा कर रहा था। सभी सीटें लगभग भरी ही हुई थी। सुबह 7 बजकर 5 मिनट पर ट्रेन हजरत निजामुद्दीन जंक्शन पहुँच चुकी थी और देखते ही देखते मयंक, अनित और रवि आ गये… और इनके साथ – साथ आया भीड़ का हुजूम। ट्रेन की सीटें तो भर ही चुकी थी और अब खड़े होने की भी जगह नहीं बची थी। देख कर ऐसा लग रहा था की मानों बहुत से लोग तो जनरल वाले और बिना टिकट ही घुसे हुए हैं।

हम चारों की सीटें थोड़ी – थोड़ी दूरी पर थी। ट्रेन यहाँ से तो अपने समय पर चल पड़ी थी लेकिन अब उसे लेट होना था। मथुरा पहुंचने का समय सुबह 9 बजे था लेकिन हम 9 बजे तक तो फरीदाबाद ही पहुंच पाये थे। यहाँ से थोड़ी और भीड़ चढ़ गयी।

बहुत से लोग खड़े होकर ही सफ़र कर रहे थे जिनमे बहुत सी महिलायें भी थी… कभी – कभी थोड़ी दया भी आ जाती है ऐसे लोगों को खड़ा देख कर लेकिन फिर अपना ध्यान आ जाता है की शरीर तो हमारा भी है, सफ़र तो हमें भी करना है, थकान तो हमें भी होती है… दिल कहता है की सीट दे दो लेकिन दिमाग दिल को खींच कर वापस बैठा देता है।

मेरी सीट की दाहिनी ओर 4-5 बुर्के वाली महिलायें खड़ी थी। एक बच्चे का पिता होने के नाते जनता हूँ की बच्चे कब – कब परेशान करते हैं और वही हाल यहाँ भी था। एक महिला का बच्चा लगातार रोये जा रहा था… पहले लगा की शायद कोई परेशानी होगी इसे लेकिन वो ज़िद्दी किस्म का बालक था और वो तब तक चुप नहीं हुआ जब तक की उसकी अम्मी ने उसकी उचित मात्रा में फिजियोथेरेपी नहीं कर दी 🙂

मयंक अपने दोस्त को काफी देर से कुछ समझा रहे थे लेकिन क्या, ये मैं कानो में इयरफोन लगे होने के कारण सुन नहीं पाया। अनित भाई अपनी ही धुन में मस्त थे। अब तक दोपहर के 11:30 बज चुके थे और ट्रेन अपनी मंद-मंद कच्छप गति से चलते हुए अंततः मथुरा जंक्शन पहुँच ही गयी। ट्रेन के बाहर भरी भीड़ ट्रेन में घुसने के लिये तैनात थी। जैसे – तैसे बाहर निकल पाये। झांसी वाले मज़दूरों का बड़ा रेला ट्रेन में घुसने का हर संभव प्रयास कर रहा था।

स्टेशन से बाहर निकल का कचौड़ी सब्जी का नाश्ता किया और निकल पड़े गोवर्धन स्टैंड की ओर फटफटिया में सवार हो कर। मथुरा स्टेशन से गोवर्धन स्टैंड की दूरी 20 किलोमीटर है। एक तो इस गाड़ी में भीड़ और ऊपर से ड्राइवर बाबू ने गाने तो ऐसे बजा रखे थे की मानों उस्ताद अरिजीत सिंह के खानदान से हों। गाँव – देहात के बीच बने शानदार रोड पर सफ़र तय करते हुए हम एक घंटे में गोवर्धन स्टैंड तक पहुंच चुके थे।

गोवर्धन बस स्टैंड पहुँच कर ही मन खुश हो जाता है और लगता है की हम 30-40 साल पहले की दुनिया में आ गये हैं। छोटे देहाती बाजारों की तरह है यह क्षेत्र। आज यहाँ कोई त्यौहार था। मदिरों में भारी भीड़ थी और भंडारा भी हो रहा था।

Daan Ghati Temple Goverdhan Bus Stand
Daan Ghati Temple Goverdhan Bus Stand

परिक्रमा आरंभ

मान्यता है की परिक्रमा करते हुए गोवर्धन पर्वत आपकी दायीं ओर होना चाहिये। इसलिये बड़ी परिक्रमा पहले की जाती है। मयंक अक्सर 12 किलोमीटर वाली बड़ी परिक्रमा नंगे पैर ही करते हैं, इसलिये उन्होंने जूते यहीं उतार दिये और चल दिये नंगे पैर परिक्रमा को। वैसे भी बृज की रज (धूल) है ही ऐसी की पैरों को सुकून देती है। परिक्रमा मार्ग पर भारी भीड़ थी। दिन में यहाँ भीड़ होती ही हैं। कुछ दूर चलने पर हम मुख्य रास्ते से उतर कर कच्चे रास्ते (पर्वत के साथ वाला) पर चल पड़े।

यहाँ एक छोटी सी कुटिया बनी हुई है। पहले यह संत श्री गया प्रसाद जी कुटिया थी और अब यही उनका समाधी स्थल है। सामने गोवर्धन जी की छोटी सी पाषाण प्रतिमा स्थापित है। उन्हें प्रणाम करके हम आगे चले। यह कच्चा और थोड़ा ऊबड़-खाबड़ रास्ता पहाड़ से बिलकुल लगा हुआ है। रास्ते में रेत बहुत है पैर उसमें धंसते चलते हैं। नंगे पैर यहाँ चलना बहुत अच्छा लगता है।

Gaya Prasad Kutiya
Gaya Prasad Maharaj Kutiya
Giriraj Ji Maharaj
Giriraj Ji Maharaj

इस रास्ते पर बंदरों भारी तादात होने के कारण यहाँ सावधानी बरतना आवश्यक है। विशेष रूप सी आप जेब में हाँथ डाल कर न चलें, इससे बंदरों को लगता है की आपकी जेब में कुछ खाने का सामान है और वो आपको घेर लेते हैं। हमारे साथ भी ऐसा हुआ था।

(आदि कैलाश यात्रा पढ़ें)

यहाँ भिखारियों की भी बहुत बड़ी तादात है और विशेष रूप से छोटे बच्चों को उन्होंने इस धंधे में उतार रखा है, कुछ तो बहुत परेशान भी करते हैं – जिसमें की आपको घेरना और हाँथ खींचना शामिल है। इसलिये यदि आप अकेले हैं और इन सबसे परेशानी होती है, तो आप परिक्रमा मुख्य रास्ते से ही करें।

मयंक के चलने की गति बहुत तेज़ है और वो रवि के साथ – साथ लगभग 300 मीटर आगे चल रहे थे, उनके पीछे मैं और मेरे पीछे फोटोग्राफर अनित। चलते – चलते ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ गोवर्धन ‘U’ आकार में मुड़ जाता है।

”चलो तुम सबको जाम फल खिलाता हूँ” – मयंक ने कहा। मुझे लगा की शायद जामुन की बात कर रहे हैं, लेकिन सर्दियों में जामुन कौन बेचता है ?
मैंने कहा – ”जामफल ??”
मयंक: अरे वो तो बिक रहे हैं।
मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई लेकिन जामुन तो कहीं नहीं दिखे।
तभी मयंक अमरुद के रेढ़ी पर पहुंच गये। अब समझ आया की जामफल किसे कहते हैं। 😀

यहाँ अमरूद तो खरीद लिये लेकिन सामने 5 मीटर की दूरी पर किसी की खूफिया निगाहें हम पर गाड़ी हुई थी। एक बूढा वानर इसी ताक में बैठा की कब अमरुद की थैली छीन कर भागे। उसको उसका हिस्सा देना आवश्यक था नहीं तो हम पर हमला तय था। उसके एक अमरुद दिया और आगे चल पड़े।

From left Ravi, Mayank, Anit
From left Ravi, Mayank, Anit

यहाँ से हम पक्के रास्ते पर चल पड़े। कुछ दूर चलने पर गौड़ समुदाय का कृष्ण मंदिर दिखा। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की हूबहू नक़ल यह मंदिर बहुत भव्य बना हुआ है। हमने मंदिर के आँगन में जाकर प्रणाम किया, कुछ फोटो लिये और बाहर आ गए।

(कैलाश मानसरोवर यात्रा पढ़ें)

कुछ दूरी पर उत्तर प्रदेश सरकार का विश्राम स्थल बना हुआ है जहाँ सभी प्रकार की जन सुविधायें जैसे की शौचालय, विश्राम हॉल, लंगर हॉल, दुकाने आदि उपलब्ध हैं। यहाँ से थोड़ी दूर चलने पर मार्ग के दोनों ओर पुराने मकान दिखने लग जाते हैं अथार्त अब हम ग्रामीण क्षेत्र से निकल कर शहरी क्षेत्र में आ गये थे।

Gaur Temple Goverdhan Parikrama Road
Gaur Temple Goverdhan Parikrama Road
Gaur Temple Goverdhan Parikrama
Gaur Temple Goverdhan Parikrama
Gaur Temple Goverdhan Parikrama
Gaur Temple Goverdhan Parikrama

 

यूँही कच्चे – पक्के रास्तों से चलते हुए हमने अपनी बड़ी परिक्रमा पूरी की और अब बारी थी छोटी परिक्रमा अथार्त 9 किलोमीटर वाली परिक्रमा की। वैसे यह परिक्रमा मात्र कहने भर के लिये ही छोटी है, थकान इसी परिक्रमा में अधिक होती है। इसका कारण यह है की अधिकांश परिक्रमा कंक्रीट के पक्के रास्तों और गलियों से होती हुई गुज़रती है।

गोवर्धन के भीड़ भरे मोहल्लों से गुज़रते हुए हम चल पड़े। यहाँ बहुत से मठ हैं जिनमे श्वेत वस्त्र धारण किये विधवायें रहती हैं। मथुरा और काशी इन मठों के लिये भी जाने जाते हैं। आलोचक और प्रशंशक दोनों ही हैं इन मठों के। खैर… इस बहस में हम और आगे नहीं बढ़ेंगे।

एक बात और यहाँ मार्ग के किनारे जगह – जगह छोटे – छोटे पत्थर के बने मन्दिर रखे हुए हैं और इनकी अच्छी खासी संख्या भी है। मन में जिज्ञासा हुई इनके बारे में जानने की तो मयंक ने बताया की बहुत से लोग अपनी कामना की पूर्ति होने पर भगवान का मंदिर बनवाने का प्रण लेते हैं। अब हर कोई तो बड़ा मंदिर बनवा नहीं सकता, इसलिये इन छोटे मंदिरों को बनवा कर वचनापूर्ति कर ली जाती है।

Small Temples on Goverdhan Parikrama path
Small Temples on Goverdhan Parikrama path

मयंक और उनका दोस्त धीरे हमसे बहुत आगे निकल चुके थे। कभी लगता था की वे तेज़ चल रहे हैं और कभी लगता था की हम धीरे चल रहे हैं। अंततः निष्कर्ष यही निकला की मैं ही कच्छप गति से चल रहा हूँ। कुछ देर में शाम होने लगी थी और अब हम मोहल्लों से बाहर आ गये थे।

यहाँ भण्डारा हो रहा था। वैसे तो अब यह लगभग समाप्त ही हो चला था किन्तु सब्जी और हलवा अभी भी बाकी थे जो की हमारे लिये काफी थे। अब सामने भण्डारा हो रहा हो तो कौन आगे बढ़ सकता है। स्वादिष्ठ सब्जी और हलवे का भोग लगाया और तभी आगे बढ़े। पास ही एक वज़न तौलने वाली मशीन भी लगी हुई थी। मुझे इन मशीनों से सख्त नफरत है 🙂 हो भी क्यों न, मशीन ने वजन बताया पुरे सौ किलो 🙂 बाकी साथियों ने वजन करवाया तो यह रस्म निभाना मेरे लिये भी आवश्यक था।

यहाँ बहुत से बैटरी रिक्शा उपलब्ध थे। थकान भी बहुत हो गयी थी लेकिन परिक्रमा तो हमें पैदल ही करनी थी। अब अँधेरा होने लगा था और हम कुसुम सरोवर के पास थे। इच्छा तो थी वहां भी जाने किन्तु समयाभाव के कारण आगे बढ़ चले।

कुछ दूर चलने पर रौशनी और चहल – पहल दिखने लगी थी। अब परिक्रमा लगभग पूरी ही हो चली थी और सामने था एक राधा – कृष्ण मंदिर। यहाँ मंदिर के कर्मचारियों ने बैरीकेटर रास्तों पर कुछ इस तरह से लगाये हुए हैं की उनसे बच कर निकलना बहुत मुश्किल है। वहां से वंदन करके आगे बढ़े और समीप ही था मानसी गंगा मंदिर अथार्त जहाँ गोवर्धन महाराज की पूजा होती है।

मानसी गंगा को एक गहरे और विशाल सरोवर के रूप में श्री कृष्ण ने अपने मन से उत्पन्न किया था। यहाँ गोवर्धन जी शिला रूप में विराजमान हैं और उन्हें दूध और जनेऊ आदि भेट किया जाता है। एक विशाल कुंड है और कुंड से ही पाइप द्वारा पानी बाहर लाकर लोगों के नहाने के लिए नल लगाये गये हैं। मंदिर परिसर बहुत विशाल है। यहाँ गोवर्धन महाराज और मानसी माता को भेंट चढ़ायी और अंतिम प्रणाम किया।

अब तक शाम के 7 बज चुके थे और यह हमारी वापसी का समय था। एक ढाबे पर भोजन आदि करने के बाद निकल पड़े फिर से उसी बस्ती की ओर जिसे प्रैक्टिकल लोगों का शहर कहा जाता है।

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