Dalhousie near club house

Dalhousie Trip Part 1

“डलहौज़ी” Dalhousie – नाम तो सुना ही होगा ! हिमाचल में है, नाम से तो बहुत अनोखा सा लगता है लेकिन जब भी बात सैर सपाटे की आती है तो हमारी गाड़ी का स्टेयरिंग शिमला या मनाली की ओर घूम जाता है। वैसे कसोल भी जाने वालो की कमी नहीं, लेकिन डलहौज़ी ख़याल पता नहीं क्यों हमारे दिमाग में आता ही नहीं ?

सितम्बर में हुई केदारनाथ यात्रा के बाद लगभग चार महीने बीत चुके थे लेकिन कोई यात्रा हुई नहीं थी और इसी वजह से घुमक्कड़ी बग एक बार फिर सक्रीय होने लगा था लेकिन समझ नहीं आ रहा था की जाया कहाँ जाये। मेरे लगभग परमानेंट घुमक्कड़ी पार्टनर देबासीस से जब भी कोई बात करो तो उनका यही कहना होता की पाण्डेय जी आप प्लान बनाओ की कहाँ चलना है और फिर किसी न किसी बहाने सब ठण्डे बस्ते में चला जाता।

जनवरी में तो मैंने ओरछा Orchha जाने के लिये झाँसी का टिकट भी बुक करवा लिया था लेकिन आज कल ताज एक्सप्रेस की हो रही लेट – लतीफ़ी के चलते फिर से उसे रद्द करवा दिया। वैसे भी मुझे पहाड़ और बर्फ़ से अधिक प्रेम है…. लेकिन अब बहुत हो चुका था और अब कहीं न कहीं जाना था।

उत्तराखण्ड, मैं बहुत बार जा चुका हूँ, इस बार हिमाचल जाना था। शिमला और मनाली मैं जाना नहीं चाहता था…. बात मैकल्यॉड गंज और डलहौज़ी के बीच फंस रही थी और अंततः हर प्रकार की गुणा – गणित के बाद डलहौज़ी Dalhousie को फाइनल किया गया और साथ ही देबासीस को बता दिया। वैसे डलहौज़ी के पास ही खजियार Khajjiar भी है, जिसे मिनी स्विट्ज़रलैंड के रूप में भी जाना जाता है। केदारनाथ यात्रा में हमारे साथी रहे गौरी शंकर पुरोहित ने भी जाने की इच्छा जताई और वह भी यात्रा में शामिल हो गए।

1 फरवरी, दिन शनिवार शाम पांच बजे तक मैं और गौरी कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पहुँच चुके थे पांच मिनट में ही देबासीस भी। शाम 5:50 बजे की बस थी।

“दिल्ली – कटरा, दिल्ली – कटरा….” प्राइवेट बस वाले की यह आवाज़ सुन कर मुझे कई साल पहले वाली वैष्णों देवी की अधूरी यात्रा याद आ गयी जिसमे झंझटों की शुरुआत ऐसे ही प्राइवेट बस वालों ने की थी। गौरी ने पूछा की ये भी जम्मू जाते हैं? मैंने कहा की ये जम्मू नहीं जहन्नुम की यात्रा करवाते हैं। कुछ भी करना लेकिन इन प्राइवेट बस वालों के चक्कर में मत पड़ना।

दिल्ली से डलहौज़ी जाने वाली बस डलहौज़ी से 47 किलोमीटर आगे चम्बा तक जाती है। बस की हालत देख कर झटका सा लगा क्योंकि यह यात्रा लगभग 13 घंटों की होने वाली थी बस की सीटें दिल्ली की डीटीसी की सीटों से भी बुरी हालत में थी। खैर…. यात्रा तो करनी ही थी। यहाँ मैं एक सलाह अवश्य दूंगा की डलहौज़ी जाने के लिये वॉल्वो को ही चुने, या फिर पठानकोट तक ट्रेन से और उसके आगे बस की यात्रा करें। हमारी बस साधारण ही थी और इसी बस में सर्दी की रात बितानी थी।

बस अपने नियत समय पर चल पड़ी। इस बस को दिल्ली – सोनीपत – पानीपत – करनाल – अम्बाला – लुधियाना – जालंधर – पठानकोट – बनीखेत होते हुए डलहौज़ी जाना था। वैसे पठानकोट से होते हुए जम्मू तक का सड़क सफ़र मैं पहले भी बहुत बार कर चुका हूँ और इसलिये पता था की उत्तराखण्ड की अपेक्षा यह रास्ता आबादी से भरपूर है और अच्छा बना भी हुआ है लेकिन 13 – 14 घंटे का सफ़र और वो भी ऐसी सीटों पर, सोच – सोच कर नींद आने लगी थी।

मजनू का टीला और सिंघु बॉर्डर पार करते हुए हम जल्द ही दिल्ली से आगे बढ़ चुके थे लेकिन हाईवे पर लगने वाले ट्रैफिक जाम की कारण बस रेंग रही थी और अब यह ट्रैफिक जाम हमें कम से कम मुरथल Murthal तक तो मिलना ही था। मुरथल से याद आया, पराठों के लिये बहुत प्रसिद्ध है यह जहाज और विशेषकर यहाँ का अमरीक सुखदेव ढाबा (वैसे ढाबा लगता तो नहीं)। दिल्ली – एनसीआर के बाइकर्स के लिये यह लोकप्रिय पॉइंट है। केवल मुरथल ही नहीं सी रास्ते पर बड़े – बड़े आलीशान होटलों, फार्महाउस और रिसॉर्ट्स की भरमार है, जिनमे ‘हवेली’ भी प्रमुख है।

मुरथल से आगे बढ़ने पर ट्रैफिक अब कुछ कम हो चला था। लगभग रात 9 बजे कुरुक्षेत्र द्वार के सामने वाले फ्लाईओवर के ऊपर हमारी बस निकली… कुरुक्षेत्र द्वार की भव्यता और जगमगाहट देख कर ही अंदाज़ा लग जाता है की अंदर की रौनक कितनी होगी। कई बार सोचा है कुरुक्षेत्र जाने का, देखते हैं कब जाना होता है।

अब नींद आने लगी थी (और सर्दी भी)। जैसे – जैसे रात बड़े, वैसे ही सर्दी। कुछ ही देर में नींद आ गयी रात एक बजे नींद खुली तो पाया की बस जालंधर के पास है, यहाँ थोड़ी राहत की बात थी की अब अगला पड़ाव 2 घंटे बाद पठानकोट होगा और उसके तीन घंटे बाद डलहौज़ी। वैसे कंडक्टर ने बता दिया था की यह बस डलहौज़ी न जाकर उससे 9 किलोमीटर पहले ही बनीखेत से होते हुए चम्बा निकल जायेगी और हमे बनीखेत में ही उतरना होगा। बनीखेत – डलहौज़ी मार्ग अत्यधिक बर्फ़बारी के कारण अवरुद्ध बस जैसे बड़े वाहन के लिये अवरुद्ध हो गया था।

यह रास्ता खूब हरे – भरे खेतों के नज़ारों से भरा हुआ है लेकिन रात होने के कारण अभी तो केवल अँधेरा ही था। लगभग सुबह के चार बज रहे होंगे, बस थोड़ी ऊंचाई पर बढ़ रही थी… अथार्त पठानकोट समीप ही था और कुछ ही देर में हम पठानकोट पहुँच गये। पठानकोट सामरिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण शहर है। यहाँ से पाकिस्तान सीमा समीप ही है और ऊपर से अभी कुछ वर्ष पहले यहाँ के एयरबेस पर आतंकवादी हमला भी हो चुका है। यहाँ से एक सीधा रास्ता जम्मू की ओर जाता है, और दाहिनी ओर जाता रास्ता हिमाचल की ओर। यही दाहिनी ओर वाला रास्ता कुछ ही आगे दो रास्तों में बट जाता है, एक मार्ग डलहौज़ी और चम्बा की ओर चला जाता है और दूसरा धर्मशाला की ओर।

पठानकोट में 15 मिनट के लिये बस रुकी लेकिन भयंकर सर्दी के कारण बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ देर रुकने के बाद हम बढ़ चले डलहौज़ी की ओर। अब बस पहाड़ों पर दौड़ रही थी और पठानकोट में सवारियों के उतरने से कुछ खाली भी हो चली थी। यहाँ पीछे वाली सीट पर बैठी एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका ने हिमाचल बारे में बहुत से जानकारियां दी, जैसे की हमे डलहौज़ी में रुकना चाहिये या खजियार में ? चम्बा Chamba कैसा है ? चमेरा लेक जाना चाहिये या नहीं आदि ?

अब सर्दी बर्दाश के बाहर हो रही थी और हो भी क्यों न, तापमान भी तो -1 डिग्री था। सुबह लगभग साढ़े छः बजे बस नैनी खड्ड में रुकी। यहाँ लगभग 15 मिनट बस को रुकना था। बगल में ही रावी नदी बह रही थी। रावी नदी की विशालता देखनी हो तो पठानकोट से जम्मू के रास्ते पर दिखती है। वेदों में इसका वर्णन इरावती के रूप में मिलता है। हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा के पीर पंजाल पर्वतों से निकल कर यह नदी हिमाचल और पंजाब से होते हुए पाकिस्तान में सिंध नदी में मिल जाती है।

नैनीखड्ड में एक लड़की ने पूछा की इस नदी में पानी क्या पहाड़ों से ही आता होगा ? समझ नहीं आ रहा था की क्या जवाब दिया जाये ? 😀 नैनीखड्ड से निकल कर हम बढ़ चले बनीखेत की ओर। अब उजाला हो चला था और बायीं ओर पहाड़ों पर बर्फ़ भी दिखने लगी थी। बर्फ़ को देख कर उत्साह और बढ़ गया था।

वैसे अब तक मैं थोड़ा कंफ्यूजन में था की सामने दिख रही पर्वतमालाएं कौन सी हैं ? कुछ ही देर में हम बनीखेत पहुँच चुके थे।

बनीखेत में बहुत से छोटे – बड़े होटल बने हुए हैं और जब भी आप डलहौज़ी के लिये ऑनलाइन होटल बुक करवाते हैं तो सबसे अधिक होटल बनीखेत के ही दिखाई पड़ते हैं। मेरी राय यही है डलहौज़ी आने वाले यात्री बनीखेत में होटल बुक न करवायें क्योंकि डलहौज़ी Dalhousie बनीखेत Banikhet से 9 किलोमीटर दूर है और वहां के लिये आपको फिर से टैक्सी बुक करनी पड़ेगी। वैसे यहाँ से डलहौज़ी के लिये सुबह आठ बजे से बस भी मिलने लगती है।

यहाँ बस स्टैंड पर उतरते ही सबसे पहला सामना हुआ दो लोगों की लड़ाई से। जम कर मार – पीट हो रही थी, शायद सवारी बैठाने का झगड़ा था। बनीखेत से सीधा रास्ता चम्बा चला जाता है और दायीं ओर वाला रास्ता डलहौज़ी। यहाँ से मात्र 9 किलोमीटर के सफ़र के लिये हमें 100 रुपये प्रति सवारी देना पड़ा। यहाँ एहसास हो चुका था की हिमाचल उत्तराखण्ड से थोड़ा महंगा तो है।

डलहौज़ी से थोड़ी ही पहले सेना की छावनी है। वैसे कुछ भी कहो, हिमाचल में रोड बहुत अच्छे बने हुए हैं और लगभग सुविधायें भी मौजूद हैं। कुछ ही देर में हम डलहौज़ी पहुँच चुके थे। उम्मीद के विपरीत डलहौज़ी खाली – खाली सा ही दिख रहा था। वैसे यह मौसम ऑफ सीजन माना जाता है, क्योंकि एक तो डलहौज़ी में कम लोग घूमने आते हैं और उनमे भी अधिकतर गर्मियों में आते हैं। सर्दियों में आने वाले शिमला, मनाली की ओर चले जाते हैं।

Dalhousie

शेष अगले भाग में…..

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Anshuman ChakrapaniadminPandey JeeadminAffiliateLabz Recent comment authors
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Great content! Super high-quality! Keep it up! 🙂

Pandey Jee
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Pandey Jee

बहुत ही बढिया और रोचक पोस्ट

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Thanks

Anshuman Chakrapani
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“ये जम्मू नहीं जहन्नुम की यात्रा करवाते हैं। कुछ भी करना लेकिन इन प्राइवेट बस वालों के चक्कर में मत पड़ना।”

इसका क्या चक्कर है भाई जी. वैसे एक बार हम भी फंस चुके हैं इन बस माफिया के चक्कर में. वो तो पूरा परिवार ही साथ था, वरना ये धूर्त लोग न जाने क्या कर बैठते.