Way to Punchpula

Dalhousie and Khajjiar Trip Part 3

डलहौज़ी और खज्जियार की यात्रा Trip to Dalhousie and Khajjiar को आरम्भ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। आज यात्रा का अंतिम दिन था और वापसी की बस दोपहर 3:15 बजे बस से होनी थी। अतः हमारे पास आज डलहौज़ी घूमने के लिये पर्याप्त समय था। वैसे हमारी इच्छा दैनकुंड चोटी Dainkund Peak पर भी जाने की थी लेकिन अत्यधिक बर्फ़बारी होने के कारण वहां तक जाने के रास्ते बंद हो गये थे।

जैसा की पिछले भाग में लिखा, गाँधी चौक यहाँ से सबसे नज़दीकी बाजार है ! डलहौज़ी बस स्टैंड से ऊपर की ओर खज्जियार Khajjiar की तरफ़ जाने वाले मुख्य रास्ते पर ही 2 किलोमीटर आगे है गांधी चौक। यह मौसम पर्यटन के दृष्टि से डलहौज़ी के लिये ऑफ सीज़न माना जाता है… यही कारण था का इस रास्ते पर होटल तो कई थे लेकिन क़स्बा सुनसान ही था। यहाँ रास्ते से घाटी के दूर – दूर तक के दृश्य दिखाई पड़ते हैं।

Near Dalhousie Club
Near Dalhousie Club

सुबह – सुबह की सैर, दूर – दूर तक दिखते नज़ारे, सुनसान रास्ते और किनारों पर पड़ी बर्फ़…. सुकून की चाह रखने वालों के लिये डलहौज़ी बहुत अच्छी जगह है। शहरों की भाग – दौड़ से दूर यह क़स्बा आपको खुद से रूबरू होने का समय देता है। चाहे आप सोलो हों, ख़ास दोस्त के साथ या ग्रुप में… ख़ास तौर पर यदि आप दोस्त या अपने जीवनसाथी के साथ हैं तो इन अनजाने से रास्तों पर पैदल चलना आपके रिश्ते थोड़ा सा और अच्छा कर सकता है।

(खज्जियार यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

Valley view from Dalhousie
Valley view from Dalhousie

अभी केवल एक ही किलोमीटर आये थे की चौक दिखा, ऐसा लगा की गाँधी चौक है लेकिन यहाँ तो नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ती स्थापित थी… फिर गांधी चौक ?? खैर… यह गाँधी चौक तो नहीं था लेकिन इसका नाम भी नहीं पता था तो हमने सुभाष चौक ही नाम रख दिया। यहीं सेंट फ्रांसिस चर्च (Saint Francis Church Dalhousie) भी है। सन 1875 में निर्मित यह चर्च शानदार है। मैं आज तक केवल एक ही चर्च में गया था। सुबह का समय होने के कारण चर्च खाली ही था। फिल्मों में कॉन्फेशन बॉक्स के बारे में सुना था, जहाँ लोग जीसस के सामने अपने जीवन से जुड़ी वे सच्चाइयाँ स्वीकारते हैं जो वे किसी से नहीं कह पाते। आज पहली बार कॉन्फेशन बॉक्स देखा।

चर्च से बाहर आये, अच्छी धुप निकल चुकी थी। सुबह की खिली हुई धुप, दूर – दूर तक वादियों को निहारने लायक चौक और किनारों पर लगी बेंच…. नाश्ते के लिए इससे बेहतर स्थान हमें नहीं मिल सकता था। मैगी और ऑमलेट का आर्डर दिया और वहीं निपटाया (ऑमलेट दोस्तों ने खाया :D)। यहीं से सीधा रास्ता गाँधी चौक जाता है।

Saint Francis Church Dalhousie
Saint Francis Church Dalhousie
Subhash Chowk Dalhousie
Subhash Chowk Dalhousie

गाँधी चौक वास्तव में बड़ा बाजार है और यहाँ से धौलाधार का शानदार दृश्य दिखाई देता है। यहाँ से आगे की ओर दो रास्ते जाते हैं, ऊपर वाला डीपीएस स्कूल की ओर, और नीचे वाला पंचपुला होते हुए खज्जियार की ओर। यहाँ टैक्सी स्टैंड के साथ – साथ सेंट जॉन चर्च भी है। अब यहाँ तक आ ही गये थे और समय भी बहुत बचा हुआ था, इसलिये 2.5 किलोमीटर आगे पंचपुला की ओर चल पड़े।

Gandhi Chowk Dalhousie
Gandhi Chowk Dalhousie
Gandhi Chowk Dalhousie
Gandhi Chowk Dalhousie

गाँधी चौक से पंचपुला जाने वाली सड़क भी खाली ही थी। नीचे की ओर जाते इस रास्ते पर चलते हुए एक बार फिर से मक्कूबैंड से चोपता का पैदल सफ़र याद आ गया। जब आप ऐसे रास्तों पर चले जा रहें हों और बात करने के लिये कुछ भी टॉपिक न हो तो फिर कुछ भी बाते होती हैं। हमारे साथ भी ऐसा ही था। लगभग 2 किलोमीटर आने के बाद कुछ जमे हुए झरनों का समूह दिखा। यह सातधारा था। डलहौज़ी में पानी की आपूर्ति यहीं से होती है और इसी के साथ डलहौज़ी की सीमा भी यहीं समाप्त हो जाती है।

हमें पंचपुला जाना था। कुछ आगे बढ़ने पर किसी फौजी सिख की स्मारक दिखाई दिया। यही पंचपुला था और यहाँ शहीदे – ए – आज़म सरदार भगत सिंह के चाचा जी की मूर्ती लगी हुई थी। ऑफ सीज़न होने के कारण लगभग सभी होटल खाली थे। यहाँ बर्फ़ भारी मात्रा में थी। गाँधी चौक से ही एक कुत्ता हमारे साथ – साथ यहाँ तक आया था। ऐसी यात्राओं में ये कुत्ते ही अक्सर ही आपके साथी बन जाते हैं और पूरी वफ़ादारी से सफ़र में आपका साथ निभाते हैं। यहाँ उसे बिस्किट दिलवाया।

पंचपुला में बच्चों के मनोरंजन का ध्यान रखते हुए झूले भी लगाए गए हैं और कुछ दुकाने हैं। इस खूबसूरत जगह पर एक प्राकृतिक कुंड और छोटे-छोटे पुल हैं जिनके नाम पर इस जगह का नाम रखा गया है। एक ज़िपलाइन भी बनी हुई थी जो की फिरहाल बंद थी। यहाँ से सीधा आगे जाने वाला रास्ता ही खज्जियार का मुख्य रास्ता है जो की फिरहाल बर्फ़बारी के कारण कुछ ही आगे जाकर बंद हो गया था। यहीं कुछ देर बर्फ़ पर फोटो सेशन आदि करने के बाद हम वापस बढ़ चले। यह इस सफ़र का अंतिम गंतव्य था।

Way to Punchpula
Way to Punchpula
Satdhara Dalhousie
Satdhara Dalhousie
Punchpula Dalhousie
Punchpula Dalhousie
Punchpula Dalhousie
Debasis
Debasis
Gauri

दोपहर 12 बजे तक हम वापस डलहौज़ी आ चुके था और हमारे चेक आउट का समय भी हो चुका था लेकिन बस 3:15 बजे की थी। अतः सामान क्लॉक रूम में रख कर ढाबे पर खाना खाने चले गए और फिर बस स्टैंड वाले पार्क जहाँ खूब बर्फ़ पड़ी हुई थी। अब हमारे पास यहाँ बैठ कर धुप सेकने के अतिरिक्त कुछ काम नहीं था। किसी भी सफ़र में सबसे बुरा होता है लौटना….. इसे बुरा तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि फिर से इन पहाड़ों की ओर लौटने के लिये शहरों की और जाना जरूरी होता है। डलहौज़ी तो वैसे भी मेरी इच्छाओं का हिस्सा रहा ही नहीं लेकिन इन 2 दिनों में लगाव सा हो गया था इस जगह से।

Debasis
Debasis
I

बस अपने नियत समय पर आ चुकी थी। डलहौज़ी को अलविदा कहते हुए हम अपनी सीट पर जाकर बैठ गए। बस खाली ही थी और वापसी के पूरे सफ़र में यह आधी भी नहीं भर पाई। आज मौसम साफ था, इसीलिये डलहौज़ी से पठानकोट (Dalhousie to Pathankot)के कुछ पहले तक भी धौलाधार के बर्फ़ से ढके पर्वतों का शानदार दृश्य दिखता रहा…. या फिर ऐसा था की मानो पर्वत कह रहे हों की देख लो हमे जी भर कर, फिर न जाने कब मौका मिले…..

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of