हम अक्सर घूमने – फिरने के लिए शहर से दूर के स्थानों को ही वरीयता देते हैं। विशेषकर हम दिल्ली वालों का दिल तो हिमालय की वादियों में ही बसता है। मैं भी उनमे से एक हूँ। आपने मेरी पिछली यात्राओं में उत्तराखंड के दर्शन किये होंगे, लेकिन इस बार कुछ अलग है। इस बार बाइक उठाई और दिल्ली में ही निकल पड़ा। लिस्ट में था क़ुतुब मीनार और हौज़ खास स्थित डियर पार्क।

30 सितम्बर, रविवार का दिन था। सुबह ही घर से निकल पड़ा। द्वारका, वसंत विहार, मुनिरका आदि के यातायात में फंसते हुए पहुँच गया क़ुतुब मीनार। बाइक पार्किंग में खड़ी करके टिकट ली। स्वदेशियों के लिए टिकट का मूल्य 30 रुपये और विदेशियों के लिए 500 रुपये है।

द्वारका, दिल्ली

क़ुतुब मीनार दर्शन से पहले क़ुतुब मीनार के बारे में जानकारी लेना उचित होगा।73 मीटर ऊँची इस मीनार का निर्माण वर्ष 1193 में आरंभ हुआ था। इस इमारत में 5 मंजिलें हैं। पहली 3 मंजिलों का निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से और अंतिम की 2 मंजिलें संगमरमर द्वारा निर्मित हैं। क़ुतुब मीनार परिसर में ही स्थित भारत की पहली मस्जिद क़ूवत-उल-इस्लाम का निर्माण भी क़ुतुब मीनार के साथ ही हुआ था। इसका निर्माण 27 हिन्दू मंदिरों को गिराकर उनसे प्राप्त सामग्री द्वारा किया गया है।

क़ुतुब मीनार का निर्माण वर्ष 1193 में दिल्ली सल्तनत के संस्थापक क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने आरम्भ करवाया था। वर्ष 1220 में उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसमें 2 मंजिले और जोड़ दी। लेकिन वर्ष 1369 में बिजली कड़कने के कारण इसकी कुछ मंजिले क्षतिग्रस्त हो गयी थी। इसलिए फ़िरोज़शाह तुगलक ने इसका निर्माण फिर से आरम्भ किया। वर्ष 1505 में एक भूकंप की वजह से क़ुतुब मीनार को काफी क्षति पहुंची जिसे बाद में सिकंदर लोधी ने ठीक करवाया था। 1 अगस्त 1903 को एक और भूकंप आया, जिसके कारण इस इमारत को काफी नुकसान हुआ जिसके ब्रिटिश इंडियन आर्मी के मेजर रोबर्ट स्मिथ वर्ष 1928 में ठीक करवाया। साथ – साथ इस मीनार के ऊपर एक गुम्बद भी बनवाया गया लेकिन बाद गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग के कहने पर उसे हटवा दिया गया।

क़ुतुब परिसर के में ही स्थित है इल्तुतमिश का मकबरा जहाँ उसकी कब्र है, लेकिन कहा जाता है की वास्तविक कब्र भूमिगत है। अलाउद्दीन खिलजी ने क़ुतुब परिसर में ही एक और मीनार ‘अलाई मीनार’ का निर्माण करवाना शुरू किया। उसका इरादा इसे क़ुतुब मीनार इस दुगना ऊँचा बनवाना था लेकिन उसकी मृत्यु के साथ ही उसकी इच्छा अधूरी रह गयी। आप हैरान होंगे यह जानकर की वर्ष 1910 तक दिल्ली – गुरुग्राम मार्ग क़ुतुब मीनार और क़ूवत-उल-इस्लाम मस्जिद के बीच से होकर गुज़रता था।

क़ुतुब परिसर में ही स्थित है लौह स्तम्भ, जिसका निर्माण गुप्त वंश के महाराज चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने चौथी शताब्दी में करवाया था। यह भारतीय धातु कला की पराकाष्ठा है। इसकी ऊंचाई 7 मीटर है और यह पहले यहाँ स्थित हिन्दू मंदिरों का ही भाग था। इसका निर्माण शुद्ध इस्पात द्वारा किया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व प्रमुख रसायन शास्त्री डॉ॰ बी.बी. लाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के 20-30 किलो को टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है। आज से सोलह सौ वर्ष पूर्व गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की उक्त तकनीक भी आश्चर्य का विषय है, क्योंकि पूरे लौह स्तम्भ में एक भी जोड़ कहीं भी दिखाई नहीं देता। सोलह शताब्दियों से खुले में रहने के बाद भी उसके वैसे के वैसे बने रहने (जंग न लगने) की स्थिति ने विशेषज्ञों को चकित किया है।

यहाँ मेट्रो और बस द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। नज़दीकी मेट्रो स्टेशन क़ुतुब मीनार है। बहुत से लोग यहाँ आते हैं। बच्चे, बूढ़े आदि सभी अपनी – अपनी जिज्ञासाएं पूरी करने आते हैं। युवाओं की भी कमी नहीं। कुछ परिवार के साथ आते हैं और कुछ परिवार की संभावनाओं के साथ। कुछ मेरे जैसे भी होते हैं, जिनके घूमने का कोई उद्देश्य नहीं होता।

क़ुतुब मीनार के बाद मेरी इच्छा संजय वन देखने की थी, किन्तु समयाभाव के कारण इरादा बदल दिया और हौज़ खास स्थित डियर पार्क देखने चला गया। डियर पार्क दक्षिण दिल्ली में स्थित हौज़ खास क्षेत्र में है। यहाँ पहुँचने के लिए नज़दीकी मेट्रो स्टेशन हौज़ खास है। डियर पार्क पिकनिक आदि के लिए सर्वोत्तम स्थल है। बहुत से लोग यहाँ समय बिताने आते हैं। डियर पार्क में ही एक झील भी है जिसका निर्माण सर्वप्रथम अला-उद-दिन खिलजी ने वर्ष 1295 में सीरी क्षेत्र के निवासियों को जल आपूर्ति के लिए करवाया था। इसे हौज़-ए-इलाही कहा जाता है। बाद में यह झील सूख गयी। तुगलक वंश के शाशन के दौरान फ़िरोज़ शाह ने इसकी फिर से खुदाई करवाई और इसे हौज़ खास का नाम दिया।

पार्क में विभिन्न जीव जैसे हिरण, खरगोश आदि विचरण करते रहते हैं। पार्क में भोजन इत्यादि के लिए चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। पार्क के बाहर और अंदर भी रेस्टोरेंट इत्यादि बने हुए हैं। पार्क में प्रवेश करने पर कुछ दूर चलने के बाद मार्ग दो दिशाओं में विभक्त हो जाता है। बायीं दिशा वाला मार्ग झील की ओर और दायीं दिशा वाला मार्ग खरगोश, हिरण आदि जीवों की आश्रय स्थली की ओर जाता है। दिल्ली जैसे कंक्रीट के जंगल में हरियाली देखनी हो तो डियर पार्क एक उत्तम विकल्प है।

पार्क से कुछ दूरी पर ही स्थित है भगवान जगन्नाथ का मंदिर। इच्छा तो यहाँ भी जाने की थी, किन्तु दोपहर का समय होने के कारण शायद मंदिर बंद होगा, ऐसा सोच कर नहीं गया और वापस चल पड़ा घर की ओर।

तो यह थी छोटी सी यात्रा।

Gallery of kuwat ul islam masjid
क़ूवत-उल-इस्लाम मस्जिद का गलियारा
Qutub Minar
क़ुतुब मीनार
अलाई दरवाज़ा
अलाउद्दीन खिलजी का मदरसा
इल्तुतमिश का मकबरा

अलाई मीनार – इस मीनार का निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने आरम्भ करवाया था और वह इसे क़ुतुब मीनार से दोगुना ऊँचा बनवाना चाहता था, किन्तु उसकी मौत के साथ उसकी इच्छा भी अधूरी रह गयी

 

लौह स्तम्भ


हौज़ खास झील
hauz khas lake
हौज़ खास झील

जगन्नाथ मंदिर, हौज़ खास
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