Sankri

यात्रा स्थल: सांकरी और केदारकांठा बेस कैम्प
अवधि: 11 अप्रैल से 14 अप्रैल 2018
यात्रा व्यय: 3388 रुपये
यात्रियों की संख्या: एक

घुमक्कड़ी मोड

पोस्ट का शीर्षक पढ़कर तो आप समझ ही गए होंगे की यह घुमक्कड़ एक बार फ़िर से उत्तराखंड ही जा पहुंचा है। क्या करें ? यह भूमि ही ऐसी है की इससे अधिक दिनों तक दूर नहीं रहा जा सकता। बहुत से कारण हैं इसके जिसमे सबसे पहला कारण है यहाँ फैली अपार प्राकृतिक सुंदरता। इसके अतिरिक्त यहाँ के लोगों का मिलनसार होना और अन्य राज्यों की अपेक्षा कम महंगा होना भी यहाँ बार – बार आने के कारणों में से एक है।

पहाड़ों में बहुत सी यात्रायें कर चुका हूँ। इसलिए इस बार पहाड़ों (विशेषकर उत्तरखंड) से हट कर कहीं और जाने की इच्छा थी। इसी बीच बनारस पर बना एक वीडियो यूट्यूब पर देखा तो याद आया की मेरे भी खून में तो मणिकर्णिका की ही भस्म है। जहाँ मेरा बचपन बीता वो शहर मेरी घुमक्कड़ी वाली लिस्ट से इतनी दूर कैसे रह गया ? बस सोच लिया की इस बार बनारस की गलियों में ही यायावरी की जाये।

ऑफिस से 9 दिनों की छुट्टियां स्वीकार हो गयी थी और बनारस से मिलने की तारीखों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी। सब सही चल रहा था की इसी बीच कुछ ऐसी घटनायें घाटी की बनारस जाने का विचार त्यागना पड़ा। अब बनारस फिर कभी।

आज 11 अप्रैल अथार्त वो दिन था जिस दिन से मेरी छुट्टियां आरम्भ हो रही थी लेकिन अभी तक तय नही था की जाना कहाँ है ? लिस्ट में दो जगहें टॉप पर ट्रेंड कर रही थी, पहली थी हिमाचल की करेरी झील और दूसरी थी उत्तराखंड की हर की दून। अंततः तय किया की करेरी झील ही ठीक है। ऐसा सोच कर बैग में कुछ कपड़े रखे और पहुँच गया ISBT कश्मीरी गेट। यहाँ हिमाचल प्रदेश परिवहन निगम की खिड़की पर भारी भीड़ देख कर करेरी झील विचार मन से जाते रहे। दूसरी ओर सामने खड़ी देहरादून वाली बस तो मानों कह रही हो ‘इधर – उधर भटकने से अच्छा यहीं आजा।’

अंततः वही हुआ जो हर बार हुआ है। 290 रुपये का टिकट लिया और जाकर बैठ गया उत्तराखंड वाहिनी में। शाम 7 बजकर 30 मिनट पर बस ने पहला हॉर्न बजाय और निकल पड़ी प्रेम नगर (ISBT देहरादून) की ओर। गाज़ियाबाद और मोदी नगर से होती हुई बस खतौली पहुंची। यहाँ 30 मिनट रुकने के बाद अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी।

दिल्ली में मैंने बहुत से शिकंजी के ठेलों पर लिखा हुआ देखा है ‘मोदी नगर की मशहूर जैन शिकंजी’, शायद आपने भी देखा होगा। हैरान था मैं यह देख कर की वाकई मोदी नगर में एक आलिशान रेस्टोरेंट है, जिसका नाम ही है ‘जैन शिकंजी’। संभव है की आने वाले समय में हमें ‘अग्रवाल स्वीट कॉर्नर’ की तरह जगह – जगह ऐसे ही ‘जैन शिकंजी’ रेस्टोरेंट देखने को मिले।

मैं भी कहाँ शिकंजी में व्यस्त हो गया। आगे चलते हैं। मुज़फ्फर नगर, रुड़की आदि होते हुए रात 1 बजे ये उत्तराखंड वाहिनी देहरादून पहुंची। दिल्ली की अपेक्षा यहाँ मौसम बहुत ठंडा था। अब याद आया की मैं स्वेटर तो लाया ही नहीं। आगे गुज़ारा कैसे होगा इसकी चिंता छोड़ कर मैंने डोरमेट्री का रुख किया जो की ISBT की पहली मंज़िल पर है।

वैसे अकेले यात्री (विशेषकर घुमक्कड़) के लिए डोरमेट्री बेहतर विकल्प और कुछ नहीं। जिन्हे डोरमेट्री के बारे में नहीं पता उन्हें मैं बता दूँ की डोरमेट्री होटल का विकल्प है। इसमें एक कमरे में 4-5 बेड होते हैं और आपको प्रति बेड के हिसाब से किराया देना होता है। खैर, सुबह जल्दी भी उठना था, इसलिए आज की यात्रा यहीं समाप्त होती है।

दूसरा दिन

सुबह 6 बजे नींद खुलते ही फटाफट बैग पैक किया और नीचे पहुँच गया। अब चूँकि करेरी झील पीछे छूट चुकी थी और मैं देहरादून पहुंच भी चुका था तो मुझे हर की दून ही जाना चाहिए था, लेकिन हर की दून की यात्रा में कुल 56 किलोमीटर (28 किलोमीटर एक ओर) की पैदल यात्रा है और कुल 6-7 दिन लगते हैं दिल्ली से हर की दून की पूरी यात्रा में। मेरे पास एक तो समय कम, कपड़े कम और ऊपर से बजट कम। इसलिए हर की दून का विचार त्याग दिया और केदारकांठा बेस कैम्प तक की यात्रा करना पक्का किया।

आप भी सोच रहे होंगे की यह इंसान आखिर चाहता क्या है ? नहीं – नहीं अब यात्रा में बदलाव नहीं होगा और हम केदारकांठा बेस कैम्प ही जायेंगे।

 

कैसे पहुंचे केदारकांठा ?

केदारकांठा उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के अंतगर्त आता है और गोविन्द वन्य जीव विहार में स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए सबसे पहले आपको देहरादून और फ़िर वहां से सांकरी पहुंचना होगा। देहरादून रेलवे स्टेशन के पास से सांकरी के लिए सुबह 8 बजे उत्तराखंड परिवहन निगम की बस जाती है। यह बस आपको विकास नगर, डामटा, बर्नीगाड़, नौगांव, पुरोला, मोरी और, नैटवाड़ से होते हुए शाम पांच बजे तक सांकरी पहुंचा देगी।

सांकरी से केदारकांठा के लिए 14 किलोमीटर की पैदल यात्रा आरम्भ होती है। पैदल मार्ग में आपका पहला पड़ाव होगा जुड़ा का तालाब जो की सांकरी से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बाद अगला पड़ाव है केदारकांठा बेस कैम्प जो की जुड़ा का तालाब से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पैदल यात्रा का पहला दिन यहीं समाप्त होता है। अगले दिन आप बेस कैम्प से केदारकांठा 7 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके पहुँच सकते हैं।

विशेष सावधानियाँ

1. आपके पास गर्म कपड़ों का विशेष प्रबंध होना चाहिए।
2. केदारकांठा, गोविंद वन्य जीव विहार में स्थित है। इसलिए नैटवाड़ जो की सांकरी से 10 किलोमीटर पहले हैं वहां पंजीकरण करवाना होगा जिसमें आपको एक निश्चित शुल्क देना होगा।
3. ट्रैकिंग के दौरान अपने साथ गाइड ले जाना अनिवार्य है।
4. चूंकि पैदल यात्रा में कुल 3 दिन लगते हैं और मार्ग में कोई होटल आदि नहीं हैं, इसलिए टेंट, स्लीपिंग बैग, स्टिक, टॉर्च, भोजन सामग्री आदि अवश्य ले जायें।

क्या देखें

केदारकांठा यात्रा के अतिरिक्त भी यहाँ देखने के लिये बहुत कुछ है जैसे की सांकरी और सौंड़ गाँव, सोमेश्वर मंदिर, सेब के बाग, जुड़ा का तालाब आदि।

 

आगे बढ़ते हैं…

सुबह 8 बजे बस देहरादून से चल पड़ी। यहाँ से विकास नगर होते हुए शीघ्र ही बस बरकोट मार्ग पर बढ़ चली। बस में मेरे साथी थे अत्तर सिंह राणा जो की देश के दूरस्थ गांव जखोल के निवासी हैं। जखोल जो की सांकरी से 12 किलोमीटर आगे और इस बस का गंतव्य भी। कुछ देर इधर – उधर निहारता रहा और फिर नींद आ गयी। वैसे भी मुझे ऋषिकेश से देवप्रयाग और देहरादून के आस – पास के पहाड़ी रास्तों पर भयंकर बोरियत महसूस होती है।

लगभग 11 बजे नींद खुली। बस डामटा पहुँच चुकी थी। डामटा उत्तरकाशी जिले के अंतगर्त आता है। यहाँ 20 मिनट का पड़ाव था। सवारियों के चाय – नाश्ते के ख़त्म होते ही बस आगे बढ़ चली। अप्रैल का महीना था, तो गर्मी होना आम बात है। यहाँ भी दिल्ली से थोड़ी ही कम गर्मी थी। बस आगे बढ़ती जा रही थी और मेरे मोबाईल की बैटरी घटती जा रही थी। समझ नहीं आता की ये मोबाइल कंपनियां 6 इंच के मोबाइल में इतनी कमज़ोर किडनी क्यों लगाती हैं ?

Damta Uttarkashi
डामटा

बर्नीगाड़, नौगांव आदि होते हुए बस पुरोला पहुंची। पुरोला, देहरादून – सांकरी मार्ग पर देहरादून के बाद सबसे बड़ा शहर है ! शायद उत्तरकाशी जितना ही बड़ा। इसे हर की दून मार्ग का मुख्य द्वार भी कहा जाता है और यह समुद्रतल से 1584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यदि आपके पास अतिरिक्त समय है तो आपको एक दिन टोंस नदी के किनारे बसे इस शहर में भी बिताना चाहिये।

पुरोला से सांकरी की दूरी 55 किलोमीटर रह जाती है। पुरोला से आगे बढ़ते ही वातावरण मनमोहक हो जाता है। अब आपका सामना होता है चीड़ के घने जंगलों से। बस अब ऊंचाई की ओर बढ़ती जा रही थी और ठंडी हवायें खड़खड़ाती खिड़कियों से होकर कानों को छू रही थी।

Purola
पुरोला
Purola uttarkashi
पुरोला
Moving ahead purola
पुरोला से आगे की ओर

लगभग 3 घंटे बाद बस नैटवाड़ पहुंची। इस बीच मोरी नाम के छोटे से शहर में लगभग आधे हमसफ़र उतर चुके थे। नैटवाड़ से ही गोविंद वन्य जीव विहार में प्रवेश होता है। यहाँ वन विभाग की चेक पोस्ट है। पर्यटकों को यहाँ प्रवेश शुल्क देना होता है जो की पहले तीन दिनों के लिए 150 रुपये और उसके बाद 50 रुपये प्रति दिन।

नैतवाड़ बेशक एक छोटा सा क़स्बा है लेकिन यह भौगोलिक रूप से काफ़ी महत्वपूर्ण है। रूपिन पास जाने वाले ट्रेकर्स भी यहीं से अपनी यात्रा आरंभ करते हैं। उत्तराखंड की बड़ी नदियों में से एक और यमुना की सबसे बड़ी सहायक नदी टोंस का निर्माण यहीं से होता है। हिमाचल के सांगला से आ रही रूपिन नदी और उत्तराखंड के हर की दून से आ आने वाली सुपिन नदी नैटवाड़ में संगम करके टोंस नदी का निर्माण करती है। यहाँ से लगभग 148 किलोमीटर की दूरी तक बहने के बाद टोंस नदी देहरादून के कालसी में यमुना में मिल जाती है। कहा तो यह भी जाता है की यमुना से अधिक पानी टोंस में बहता है।

कागज़ी प्रक्रिया  पूरी करते समय पता लगा के वहां स्थित वन अधिकारी भी मेरे गृह नगर बनारस के ही रहने वाले हैं। अभी वन अधिकारी अश्विन पाण्डेय से बात – चीत हो ही रही थी की बस का हॉर्न बजने लगा। उनसे विदाई ली और चल पड़ा सांकरी की ओर। यहाँ से बेहद घने जंगल शुरू हो जाते हैं और यदि आप किस्मत वाले रहे तो भालू भी देख सकते हैं। नैटवाड़ – सांकरी मार्ग की दशा बेहद खराब है।

लगभग 9 घंटों का थकाऊ पहाड़ी सफ़र पूरा करके बस शाम 5 बजे सांकरी पहुंची।

बहुत सुन्दर स्थान है सांकरी। ‘आधुनिक सभ्यता’ से बेहद दूर पहाड़ों के बीच बसे इस स्थान से केदार कांठा की पैदल यात्रा आरम्भ होती है। यदि आपको हर की दून जाना है तो यहाँ से टैक्सी से द्वारा पहले 12 किलोमीटर तालुका पहुंचना होगा और फिर वहां से आपकी 28 किलोमीटर लम्बी पैदल यात्रा आरम्भ होगी।

सांकरी पहुंचते ही सबसे पहला काम था रुकने का ठिकाना ढूंढना I किसी भी होटल में ₹500 से कम का कमरा नहीं था, लेकिन तभी पता लगा की यहाँ गढ़वाल मण्डल विकास निगम का रेस्ट हाउस भी है और उसमे डोरमेट्री भी I

आलिशान रेस्ट हाउस… डोरमेट्री मे प्रति बेड किराया मात्र ₹170 I

अंधे को और क्या चाहिये.. दो नैन I

मैने ख़ुशी – ख़ुशी 5 बेड वाले कमरे में अपना सामान रख दिया I रेस्ट हाउस इंचार्ज ने बताया की मेरे कमरे एक और मेहमान रुकेंगे I ऐसा कह के वे अपना ऑफिस लॉक करके चले गये I यह अच्छा ही था क्योंकि पूरी बिल्डिंग में हम दोनों के अतिरिक्त और कोई नहीं था।

एक बात और, यहाँ किसी भी ट्रेक के लिए आपको गाइड लेना अनिवार्य है। राजेंद्र से 1000 रुपये प्रति दिन में बात तय हुई जिसमे पोर्टर का काम भी वही करने वाला था। वैसे मेरी इच्छा केदारकांठा चोटी तक जाने की थी किन्तु गाइड का शुल्क और अन्य कारणों के कारण मैंने बेस कैम्प तक ही जाना तय किया। गाइड ने बता दिया की अगली सुबह 7 बजे तक यात्रा आरम्भ कर देनी है। मैंने मैगी खाते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया। ढाबे वाली ने कहा की रात 8 बजे तक आ कर खाना खा लेना।

sankri to taluka road
सांकरी से तालुका की ओर जाता मार्ग
GMVN dormitory
GMVN डोरमेट्री
GMVN Rest house sankri
गढ़वाल मंडल विकास निगम रेस्ट हाउस (मेरा ठिकाना)

यात्रा का पहला भाग यही समाप्त होता है। अगले भाग में आप को लेकर चलेंगे केदारकांठा बेस कैम्प, सांकरी और सौंड़ गांवों की यात्रा पर। तब तक के लिए यात्रा जारी है….

admin
pandeyumesh265@gmail.com

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Yogi Saraswathimanshu guptaadminअनित कुमार Recent comment authors
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अनित कुमार
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अनित कुमार

इस बार पढ़ने में जादा मज़ा आया। उम्मीद से जल्दी प्रकाशित हो गई। अकेले घूमने में यही फायदा हैं। आप अपने को कहीं भी ले जा सकते हैं।

Yogi Saraswat
Guest
Yogi Saraswat

बहुत खूब !! यात्रा बहुत जानकारी दे रही है !! आगे चलते है