Ricky Martin in India

रिकी मार्टिन की भारत में आध्यात्मिक यात्रा भाग 2 Ricky Martin’s spiritual journey in India Part 2

(रिकी मार्टिन की भारत में आध्यात्मिक यात्रा Ricky Martin’s spiritual journey in India को आरम्भ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

हमेशा पश्चिम की ओर देखती मेरी आँखो का वास्तविकता से परिचय (Opening my western eyes)

आठ दिन बैंकॉक Bangkok में उस छोटे योगी के साथ बिताने के बाद मैं एक रेस्टॉरेंट के उद्घाटन के लिए मियामी Miami स्थित अपने घर वापस चला गया लेकिन यह दूरी बहुत लम्बे समय के लिये नहीं रहने वाली थी क्योंकि भविष्य में क्या होना है इसका निर्णय पहले ही हो चुका था। हमने अथार्त मैंने और उस योगी ने एक साथ भारत की यात्रा India tour करने की योजना बना थी लेकिन बहुत सारे काम लंबित भी पड़े थे इसलिये इससे पहले की हम इस लम्बी यात्रा पर निकलते की इन सारे कामों को निपटा लेना आवश्यक था।

इस यात्रा की सबसे बड़ी, महत्वपूर्ण और उत्साहित करने वाली बात तो यह थी की मुझे भारत यात्रा का अवसर मिलने वाला था और वो भी एक विश्व विख्यात पॉप स्टार के रूप में नहीं अपितु एक आम बैकपैकर Backpacker के रूप में। मुझे आज तक कभी ऐसा कुछ करने का मौका नहीं मिला था। पहली बार मैं एक यात्रा को लेकर इतना उत्साहित था लेकिन जो मुझे पता नहीं था वह यह था कि यह यात्रा उन सभी यात्राओं से बिल्कुल अलग होने वाली थी जो मैं आज तक करता आया था।

मैं सुबह – सुबह मियामी पहुँच गया था और उसी शाम सात बजे मैंने आम जनता और मीडिया वालों के लिये बने एक रेस्टॉरेंट का उद्घाटन किया। ठीक तीन घंटे बाद, रात के दस बजे मैं एक बार फिर फ्लाइट में सवार हुआ और अब मुझे सीधे भारत India जाना था। यदि यह यात्रा मेरी एक आम प्रोफेशनल यात्रा होती तो शायद मैं उतना उत्साहित नहीं होता, लेकिन इस बार यह यात्रा उन आम यात्राओं जैसी नहीं थी। मुझे एक प्रकार की विशेष ऊर्जा का अनुभव हो रहा था।

पूर्वनियोजित योजना के अनुसार मेरा बैकअप गायक दोस्त मेरे साथ आया था और उसके साथ ही मैं अपने नये – नये बने दोस्त अथार्त उस थाईलैंड वाले योगी से मिलने कोलकाता पहुंचा।

Ricky martin with his friend
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ऐसा नहीं है की मैं पहले भारत नहीं आया था, मैं कई बार पहले भी भारत चुका था लेकिन वे दौरे हमेशा काम से जुड़े हुए अथार्त प्रोफेशनल टूर होते थे … आम भाषा में कहें तो म्यूजिक कॉन्सर्ट और ऊपर से वे बहुत कम समय के लिये ही होते थे। भले ही भारत एक ऐसा देश है जिसने हमेशा मुझे मोहित किया लेकिन कभी भी मेरे पास इसे अच्छे से एक्स्प्लोर करने के लिये समय नहीं था। मैं अक्सर सोचा करता था की अब जब भी मैं अगली बार यहाँ आऊंगा तो इस देश के प्रमुख आकर्षणों और खूबसूरत स्थानों को देखने का यथासंभव प्रयास करूँगा, लेकिन ‘कल’ आता कहाँ है। मुझे कभी भी इस देश को और यहाँ के लोगों को समझने का समय ही नहीं मिला।

भारत में कुछ ऐसा था जिसने मुझे अंदर तक सोचने को मजबूर कर दिया था, इस देश में कुछ ऐसा था जिसने मुझे अपनी ओर खींचा। एक देश के रूप में भारत ने पहले से ही मेरे दिल में एक विशेष स्थान बना लिया था और इस विशेष स्थान को और पक्का कर दिया उस योगी से हुई भेंट ने। जब मैं उससे मिला तब मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में कितना कम जानता था। यह तब तक संभव नहीं हो पाया था जब तक की मैं अपने उस आध्यात्मिक लीडर (योगी) से मिलने के लिए अपने कंधे पर अपना बैकपैक लिये नहीं पहुंचा था। खैर… अब मैं भारत की वास्तविक सुंदरता की खोज के लिये तैयार था।

अब मैं इस पूरी यात्रा में उस थाईलैंड वाले योगी को छोटा योगी ही कह कर सम्बोधित करूंगा। वह छोटा योगी ही अब इस पूरी यात्रा में हमारा आध्यात्मिक लीडर था और अथार्त अब पूरी यात्रा की जिम्मेदारी उसके कन्धों पर थी। उसने पूरी यात्रा पहले से ही प्लान कर ली थी। हमें पहली रात कोलकाता में बितानी थी और फिर ट्रेन से ही पुरी (ओडिशा) के पास एक छोटे से गाँव की यात्रा पर निकलना था।मैं हमेशा कहता रहा हूँ यदि आपने अपनी भारत यात्रा के दौरान रेलवे स्टेशन पर कुछ समय नहीं बिताया तो इसका अर्थ है की आपने भारत देखा ही नहीं। भारतीय रेलवे स्टेशन मेरे द्वारा देखे गए अब तक के सबसे अद्भुत स्थानों में से एक हैं, जो की खूबसूरत भारतीय लोगों, उनकी दैनिक गतिविधियों, तरह – तरह की आवाज़ों और रंगों से से भरे हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रेलवे स्टेशन की यात्रा के दौरान आप भूल जाते हैं कि आप एक विदेशी हैं।

हज़ारों लोग अपने – अपने गंतव्यों की ओर जाने के लिये रेल पकड़ने की जल्दी में होते हैं। रेल में सीट पाने के लिये लोगों का एक दुसरे से बहस करना, थोड़ा सा लड़ भी लेना, लोगों का हँसते – बोलते देखना, छोटे – छोटे बच्चों का अपने पिता के कन्धों पर बैठे देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। सबसे बड़ी बात की आप स्वयं भी इस भीड़ का हिस्सा होते हैं और आप भी यहाँ वही करते हैं जो एक आम भारतीय करता है। आपको भी जल्दी होती है की कैसे भी करके आपको बैठने के लिये सीट मिल जाये। बच्चे हम विदेशियों को देख कर हँसते हुए चेहरों से बार – बार कहते हैं – ”हेलो! हेलो, सर!”

हम कोलकाता स्टेशन पर इधर – उधर रहे थे की ट्रेन आ गयी। हर ओर भयंकर भीड़ और लोगों का शोर, बच्चों की उछल – कूद और कुलियों का तेज़ी से सामान लेकर ट्रेन की ओर लपकना… वैसे पसंद भी तो मुझे यही था और मैं वास्तविक भारत ही तो देखने आया था। जैसे – तैसे हम ट्रेन के अंदर प्रवेश कर गये। धक्का – मुक्की जारी थी की तभी देखा चार बच्चे मेरे बैकपैक की ओर घूर रहे थे और मेरी पैंट खींच रहे थे। मैंने उन्हें कई बार मना किया लेकिन वे नहीं मान रहे थे। … आखिर मैंने बैकपैक उतारा थोड़ी ऊँची आवाज़ में कहा – STOP!

वे बांग्ला भाषा बोल रहे थे और मैं उनसे स्पेनिश और अंग्रेजी में बात करने की कोशिश कर रहा था लेकिन न ही वे मेरी भाषा जानते थे और न ही मैं उनकी। इसलिये आखिर मैंने उन चारों बच्चों को पकड़ लिया और स्पेनिश में गाना शुरू कर दिया – “पालो, पालो, पालो, पालो, पालो एसो….”। जैसे आप अपने बच्चों को बहलाने के लिये अपनी भाषा में बच्चों वाले गाने गाते हैं वैसे ही ”पालो, पालो…” भी एक प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी गीत है जो वहां के लोग आपने बच्चों को सुनाते हैं।

मैं गाये जा रहा था और वे आश्चर्यचकित हो कर देखे जा रहे थे की यह क्या गा रहा है ? लेकिन फिर वे भी मेरी नकल करके गाने लगे – “पालो, पालो, पालो, पालो, पलितो, पालो एसो…”

Ricky martin in india
Ricky martin in india

मेरी सामने वाली सीट पर बैठे वे बच्चे मजे से पालो पालो गा रहे थे। फिर मैंने उनको कुछ और भी गाने और खेल सिखाये जो मैं अपने छोटे से देश प्यूर्तो रीको से सीख कर आया था। एक बार फिर संगीत ने उन सभी भाषायी अवरोधों को पार कर लिया था जो हमें एक दूसरे को समझने में आड़े आ रहे थे। भले ही वे मेरे द्वारा कहे गये एक भी शब्द को नहीं समझ पा रहे थे और न ही मैं उनकी भाषा समझ पा रहा था लेकिन इतना तो था की संगीत के माध्यम से ही सही हमारे बीच एक सम्बन्ध सा बन गया था। यह एक बहुत ही खूबसूरत पल था जिसमें हमने अपनी संस्कृतियों के बीच की खाई को कम किया और मैंने अपने अंदर वो खुशी अनुभव की जो की आज तक नही की थी।

थोड़ी देर बच्चों के साथ खेलने के बाद, हम सभी अपने आप में व्यस्त हो गये। ट्रेन पुरी की ओर बढ़ती जा रही थी।

भारतीय संस्कृति के पवित्रतम नगरों में से एक होने के कारण पुरी एक बहुत ही प्रसिद्ध शहर है। श्री कृष्ण अवतार भगवान जगन्नाथ को समर्पित एक बहुत भव्य मंदिर यहाँ हजारों वर्षों से स्थित है। केवल हिंदुओं को ही मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति है। प्रति वर्ष हजारों विष्णु और कृष्ण के उपासक यहाँ एक विशेष यात्रा के लिये पहुँचते हैं। इस यात्रा के दौरान भगवान कृष्ण की प्रतिमा को एक विशाल रथ पर सवार करके के पुरी के प्रमुख मार्गों पर घुमाया जाता है जिसे यहाँ रथ यात्रा उत्सव के नाम से जाना जाता है।

(बदरीनाथ यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित होने के कारण यहाँ किनारों पर सुनहरी रेत फैली हुई है और इस कारण इस शहर को गोल्डन बीच के रूप में भी जाना जाता है। यह अनोखे नज़ारों वाला स्थान है, जहाँ आप सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों को एक ही स्थान से देख सकते हैं… सूर्यास्त के समय आप यहाँ बिना किसी तकलीफ के सूर्य को टकटकी लगाये देख सकते हैं।

Jagannath Puri
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इन सब के अतिरिक्त पुरी को योग, अध्यात्म और अन्य धर्मों के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू धर्म की विभिन्न शाखाओं जैसे मंदिर, मठ, आश्रम के साथ ही साथ यहाँ ईसाई और यहूदी धर्मों प्रार्थना स्थल भी हैं और मस्जिदें भी। यह देखना वास्तव में अद्भुद है की कैसे सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ रह सकते हैं। यह सभी प्रार्थना स्थल इस छोटे से किन्तु असाधारण शहर में एक स्थित हैं। यहाँ सभी धर्मावलम्बियों के अपने मंदिर, मस्जिद और चर्च आदि हैं जहाँ वे शांति से अपने धार्मिक कार्य कर सकते हैं। यह शहर एक पवित्र स्थान भी है जहाँ लोग मृत्यु के अंतिम दिनों में आते हैं और उनका अंतिम संस्कार किया जाता है।

एक ही दिन में मैंने एक मुस्लिम को दफनाये जाते हुए हुए देखा; एक विशेह प्रकार का हिंदू अंतिम संस्कार देखा जिसके अंतगर्त मृत शरीर को नदी बहाया जा रहा था; एक ही चाय की दुकान में एक ही बेंच पर एक बौद्ध, एक ईसाई और एक हिंदू को एक साथ चाय पीते देखा। बौद्ध भिक्षु की कलाई पर एक माला थी, ईसाई के सीने पर क्रॉस लटका हुआ था और, हिंदू के माथे पर एक तिलक था। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। यह वास्तव में मेरे लिये असधारण दृश्य था, इतना असाधारण की मेरा सर घूमने लगा।

मैं सोचने लगा की यह कैसे हो सकता है कि पश्चिमी दुनिया जिसे हम विकसित मानते हैं वहां हम इतनी संकुचित सोच रखते हैं और भारत जिसे तीसरी दुनिया का देश माना जाता है वहां ऐसा दृश्य ? मैं एक ऐसे समाज से आता हूँ जो हमें बताता है कि केवल अपने धर्म के कारण लोग अच्छे या बुरे हैं। एक ईसाई के लिये गैर ईसाई पापी है और एक मुस्लिम के लिये गैर मुस्लिम, काफ़िर। हम किस आधार पर और क्यों स्वयं को पूर्वाग्रहों और सांस्कृतिक पहचानों से भर लेते हैं ? अकारण ही हैं न यह सब ?

हमें सिखाया जाता है जो हमसे अलग है उससे दूर रहो, भेद करो। आखिर क्यों ? यह तो मात्र अज्ञानता ही है न। मनुष्यों के बीच मौजूद भेदों और मतभेदों पर ध्यान को देखने की बजाय, हमें उनके बीच की समानताओं को देखना चाहिये – और यह तो तथ्य है सभी समाजों में भेद से अधिक समानतायें हैं। यहीं मैं अपने दैनिक जीवन में भी आध्यात्मिक दृष्टि से करता हूँ। मैं हमेशा ही सभी लोगों में भेद तलाशने की बजाय समानतायें तलाशने की कोशिश करता हूँ और सच्चाई यह है कि मैं लगभग हर बार कुछ न कुछ समानतायें खोज ही लेता हूँ।

दुनिया में लाखों संस्कृतियाँ हैं, है ना? हम सभी विभिन्न प्रकार से अलग – अलग हैं, लेकिन अंत में यही मायने रखता है कि हम सभी इंसान हैं। हमारे अंदर केवल खुल के जीने की इच्छा होनी चाहिये। वैसे भी यह तो आप सभी जानते हैं न की जब हमें चोट लगती है तो हमारे शरीर से जो खून निकलता है उसका रंग एक ही होता है।

(सर्दियों में उत्तराखण्ड बर्फीले स्थानों के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें)

मेरी जीवन में एक ही इच्छा है और वह है मेरे और सभी मनुष्यों के जीवन में शांति रहे। मैं केवल बाहरी शांति की बात नहीं कर रहा हूँ, मेरे लिये आतंरिक शांति अथार्त मन की शांति अधिक महत्वपूर्ण हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उस शांतिपूर्ण जीवन तक पहुँचने के लिये कौन सा मार्ग चुनते हैं… चाहे वह कैथोलिस्म हो, इस्लाम हो, बौद्ध हो, हिंदू धर्म हो, ईसाई धर्म हो, यहूदी धर्म हो, क्वांटम भौतिकी हो, ताओवाद हो या फिर नास्तिकता – लेकिन इनमें से कौन सा धर्म या ‘वाद’ उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिये अधिक प्रभावशाली है, यह मायने रखता है और चूंकि हम में से प्रत्येक का मन अपने आप में एक ब्रह्मांड है, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है की आतंरिक शांति की स्थिति को प्राप्त करने के लिये हम सभी को अलग – अलग रास्ते खोजने की आवश्यकता होगी।

कोई भी चीज़ दूसरे से बेहतर नहीं है; कोई भी धर्म दूसरे धर्म से अधिक प्रभावी या अधिक मान्य नहीं है। बौद्ध धर्म में कहा जाता है की सबसे बड़ा पाप वह होता है जब आप किसी दूसरे धर्म वाले से कहते हैं की तेरा धर्म गलत है। यह न केवल यह दूसरों के प्रति अत्यधिक अहंकारता से भरा का कार्य है अपितु ऐसा करके आप स्वयं अपने धर्म के साथ गलत करते हैं। यदि इन छोटी – छोटी बातों को ध्यान में रखें तो और पालन करें तो हम इस तो संसार को एक बेहतर स्थान बना सकते हैं।

मेरी नज़र में, इंसान की सबसे बड़ी असफलता यह है कि हम हमेशा लोगों को परिभाषित करने, उन्हें वर्गीकृत करने और लेबल देने के लिए रास्ते तलाशते रहते हैं। इन मानव निर्मित श्रेणियों जिन्हे आप केटेगरी भी कहते हैं, अच्छी और बुरी चीजें अथार्त अच्छे और बुरे वर्ग हैं। मैं भी लोगों के लिये ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करता हूँ किन्तु उन्हें वर्गीकृत करने के लिये नहीं अपितु यह सोचने के लिये की क्या यह इंसान और इसका व्यव्हार मेरे साथ और मेरी सोच के साथ मेल खाता है या नहीं। मैं ऐसे मेल खाते (Compatible) लोगों को अपना बना लेने का प्रयास करता हूँ जो मेरे आत्मविकास में वृद्धि करते हैं और मुझे शांति देते हैं। मैं कोशिश करता हूं कि ऐसे लोगों पर ध्यान न दूँ जो भी मेरी शांति भंग करते हैं या मेरे आत्मविकास की गति को कम करते हैं। मैं हमेशा अपने लिए उस सर्वाधिक प्रभावी उपाय की तलाश में रहता हूँ जो मेरी व्यक्तिगत मान्यताओं, धर्म और दर्शन के साथ सबसे अधिक सम्बन्ध रखता है। मैं जब भी, जहाँ भी और जैसी भी स्थिति में जाता हूँ, अपनी सोच को नई शिक्षाओं और नए रास्तों को तलाशने के लिये खुला रखता हूँ। यदि मैंने स्वयं को केवल बौद्ध या कैथोलिक या हिंदू होने तक ही सीमित रखा तो फिर यह निश्चित ही मैं अन्य मान्यताओं, दर्शनों और शिक्षाओं को सीखने के लिये दरवाज़े बंद करने जैसा है।

कैथोलिक धर्म के साथ मेरे बहुत से अच्छे अनुभव थे और कुछ बौद्ध शिक्षाओं के प्रति भी मेरी गहरी आत्मीयता थी। वास्तव में मुझे हिंदू धर्म और ईसाई धर्म के बीच कई समानतायें दिखाई देती हैं, और मुझे लगता है कि हर एक धर्म में मुझे अपने व्यक्तिगत जीवन में आने वाली चुनौतियों के समाधान मिलते हैं।

(POK के खूबसूरत स्थानों के बारे में पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें)

संस्कृत में एक कहानी है जिसमें कहा गया है की – “बाइबिल के अनुसार यीशु तथाकथित अज्ञातकाल के दौरान ध्यान करने चले गये थे। इस दौरान उन्होंने भारत की यात्रा की और फिर हिमालय Himalaya को पार कर तिब्बत पहुंचे। ऐसा कहा जाता है कि वह एक काफिले के जुड़ गये और उसके साथ – साथ पूरे मध्य पूर्व (इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करते हुए) भारत, नेपाल और बाद में तिब्बत तक पहुंचे।” ऐसे दर्जनों तथ्य हैं जो इस कहानी का समर्थन करते हैं, लेकिन मेरे लिए सबसे दिलचस्प बात यह है कि अपनी इस लम्बी यात्रा से लौटने पर यीशु ने अपने शिष्यों के पैर धोए। है न आश्चर्य की बात ? यीशु ने अपने अनुयायियों को समझाया कि एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के पैर धोना विनम्रता और सेवाभाव की निशानी है। वास्तव में यह परम्परा हिंदू और सिख धर्म जैसे अन्य धर्मों में मौजूद है। हिंदू धर्म में किसी अन्य व्यक्ति के पैर छूना सम्मान की निशानी है। मुझे नहीं लगता कि यीशु के अपने अनुयायियों के पैर धोने में और हिंदू धर्म में पैर छूने की परम्पराओं में समानता मात्र एक संयोग है। मेरे लिये यह जानकारी मेरी उस सोच और विश्वास को और मजबूत करती है जिसके अनुसार मैं स्वयं को सभी धर्मों का मानता हूँ।

 

इस भाग में इतना ही। अगले भाग में आपको बातयेंगे की कैसे रिकी ने पूरी के एक आश्रम में एक विलक्षण स्वामी से भेंट की और वहां अपने दिन बिताये।

तब तक आप कमेंट करके बतायें की यह भाग आपको कैसा लगा ?

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