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मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की यात्रा में मेरा अनुभव My experience in visit to Mehandipur Balaji Temple

मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (Mehandipur Balaji Temple), यात्रा और वहां से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी के बारे में पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

वैसे तो देश में शक्ति के प्रतीक हनुमान जी के अनेक मंदिर हैं लेकिन जब उनके परम धामों की बात आती है तो कुछ धामों के नाम सर्वप्रथम दिमाग में आ जाते हैं जैसे की अयोध्या की हनुमान गढ़ी, वाराणसी का संकटमोचन धाम, राजस्थान के सालासर बालाजी और मेहंदीपुर के बालाजी (Mehandipur Balaji Temple)। अन्य हनुमान मंदिरों में जाने के कारणों में भक्ति सहित अनेक कारण हो सकते हैं किन्तु जैसे ही हम किसी से उसके मेहंदीपुर बालाजी मंदिर जाने की बात सुनते हैं तो मन में कई प्रश्न उठने लगते हैं।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

हनुमान चालीसा की इन्ही चौपाइयों में समाहित है मेहंदीपुर बालाजी धाम (Mehandipur Balaji Temple) की महिमा। जीवन में कई बार हमें ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनका हल बहुत ही जटिल होता है या असंभव सा ही दिखता है। ऐसी स्थिती में केवल भगवान की शरण में जाना ही एकमात्र उपाय नज़र आता है। मेहंदीपुर बालाजी धाम की महिमा से आप सभी परीचित होंगे ही, इसलिये वहां भक्त के जाने का मुख्य कारण क्या होता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं। हम सीधे बढ़ते हैं अपनी यात्रा पर।

Mehandipur Balaji
Mehandipur Balaji

(एक बात और, हो सकता है की इस लेख से कुछ भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती हैं किंतु विश्वास करें, किसी को ठेस पहुँचाना मेरा उद्देश्य नहीं। यहाँ वही पढ़ने को मिलेगा जो मैंने अनुभव किया। महावीर हनुमान जी का भक्त मैं भी उतना ही हूँ जितने की आप सब।)

बहुत दिनों से मेहंदीपुर बालाजी महाराज के दर्शनों की इच्छा थी…थी भी और नही भी। इस बीच परिवार के एक सदस्य के साथ कुछ ऐसा हो रहा था जो सामान्य नही था। व्यवहार में तेज़ी से परिवर्तन होता देख हम सभी चिंतित थे। यदि आधुनिक विज्ञान को मानने वाले व्यक्ति की सोच के आधार चलें तो यह मात्र डिप्रेशन का केस था और कुछ नही, और वहीं यदि धार्मिक नज़रिये से देखें तो आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। मैं उनमे से हूं जो विज्ञान और धर्म दोनों को मानते है किंतु मेरे लिये धर्म वह है जिसकी शिक्षा हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों और ग्रंथों ने दी है।

दिल्ली – लेह बस सेवा
आदि कैलाश यात्रा

मेरी इच्छा थी/है कि किसी अच्छे मानसिक डॉक्टर को दिखाया जाये लेकिन माता जी को भूत और टोटके आदि को लेकर शक था। उनको ऐसा लगता है कि किसी ने पीड़ित का बुरा करने के लिये काली शक्तियों का सहारा लिया है इसलिए मेहंदीपुर धाम ले जाया जाये। खैर… भगवान के दर्शन तो बिना किसी कारण के भी कर लेने चाहिये।

मैं उनकी बात मान गया और एक मित्र से सलाह करके मेहंदीपुर धाम जाने के लिये रेलवे आरक्षण करवा लिया। यात्रा में हम कुल छः लोग थे जिसमें की दो बच्चे भी शामिल थे और 2 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर दिल्ली जंक्शन (पुरानी दिल्ली) से आश्रम एक्सप्रेस का बांदीकुई (राजस्थान) के लिये आरक्षण था।

धाम को मानने वाले सभी लोगों से यही सुना था की यदि कोई ऊपरी असर है तो मंदिर में मंदिर में प्रवेश करते ही मरीज़ के हाव – भाव बदल जायेंगे और विचित्र व्यव्हार करने लगेगा..साथ ही उन्होंने यह बताया कि अगर ऐसा हुआ तो मंदिर से दर्शन कर के निकलते – निकलते मरीज़ का व्यवहार बिल्कुल सामान्य हो जायेगा और वह ठीक हो जायेगा। और भी बातें पता कर ली थी कि जैसे मंदिर से बाहर निकलने के बाद मंदिर को पीछे मुड़ कर नही देखना है, किसी से कुछ खाने का सामान नही लेना, प्रशाद किसी को नही बाटना है आदि।

हम सभी दोपहर ढाई बजे तक रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे। वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी की पिछले कुछ वर्षों में रेलवे स्टेशनो की व्यवस्था में अभूतपूर्व रूप से सुधार हुआ है और यही सुधर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी दिखाई दे रहा था। कभी यहाँ कूड़े के ढेर लगे रहते थे, हर ओर बदबू ही बदबू, टूटा – फूटा स्टेशन ! लेकिन अब सब बदल चुका है। स्टेशन के सामने ही एक सुंदर पार्क बना हुआ है, हर ओर स्वच्छता, चमकते फर्श, बैठने के लिये कुर्सियां, एस्क्लेटर और जगह – जगह रखे गमले स्टेशन को खूबसूरत बना रहे हैं।

रेल अपने नियत समय तीन बजकर बीस मिनट पर चल पड़ी थी। यह रेल दिल्ली से अहमदाबाद जाती है। भीड़ – भाड़ न के बराबर थी और यह काफी सुकून भरा था मेरे लिये। वैसे तो मैं राजस्थान पहले भी जा चुका हूँ लेकिन तब बस से गया था, यह पहली रेल यात्रा थी। अलवर से मेरा विशेष अनुराग है और इसका कारण है वहां के ऊँचे – ऊँचे और हरे – भरे पहाड़। इस रेल को भी इन्ही पहाड़ों से होते हुए जाना था।

तीन घंटे और चालीस मिनट के सफ़र में लगभग एक घंटा बीस मिनट दिल्ली – एनसीआर में बीतना था। खैर.. दिल्ली छावनी, बिजवासन, गुड़गांव और, पटौदी को पीछे छोड़ते हुए हम राजस्थान में प्रवेश कर चुके थे। अब हर ओर हरे – भरे खेत थे और कुछ बूंदा – बांदी हो रही थी। मुझे ऐसा ही सफ़र पसंद है। रिवाड़ी पार करते ही पहाड़ दिखने शुरू हो गए थे। ऊंचाई तो बहुत अधिक नहीं थी और इस क्षेत्र में होती भी नहीं किन्तु हरियाली मन मोहने वाली थी।

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पहाड़ भी अलग – अलग प्रकार के, कुछ तो ऐसे की विश्वास ही न हो की यह राजस्थान ही है। शाम साढ़े छः बजे तक हम राजगढ़ पहुँच चुके थे और अब अगला स्टेशन बांदीकुई ही था। राजगढ़ स्टेशन के पीछे पहाड़ियों पर एक किला बना हुआ है, शायद वही राजगढ़ है। कभी समय मिला तो आऊंगा इन किलों की सैर पर। रास्ते के सभी स्टेशनों पर यह रेल 2 मिनट से अधिक नहीं रुकी थी और बांदीकुई में भी इसका ठहराव 2 मिनट ही था।

Bandikui Railwway Station
Bandikui Railwway Station

हम शाम 7 बजे तक बांदीकुई पहुँच चुके थे। स्टेशन पर अच्छी – खासी भीड़ को देख कर अनुमान लगा लिया था की अधिकतर लोग यहाँ मेहंदीपुर बालाजी धाम से ही आये हुए हैं। यहाँ से मेहंदीपुर का सफर एक घंटे (36 किलोमीटर) का है। स्टेशन से बाहर निकलते ही एक बोलेरो मिल गयी जो की 25 रुपये प्रति सवारी के हिसाब से चलने के लिये मान गया। थोड़ी देर पहले ही हुई बरसात के कारण रास्तों पर टिड्डों की भरमार थी।

मैंने सुना था की राजस्थान के रोड शानदार बने हुए हैं और यह यह यहाँ स्पष्ट दिखाई भी दे रहा था। बीकानेर – आगरा मार्ग गाड़ियां सरपट भाग रही थी और बारिश एक बार फिर शुरू हो चुकी थी। आखिर रात साढ़े आठ बजे तक हम मेहंदीपुर में पहुँच चुके थे। रास्तों पर अच्छी – खासी भीड़ थी और किसी मेले जैसा माहौल था।

यहाँ ठहरने की कोई समस्या नहीं है। बहुत सारी धर्मशालायें और होटल आदि बने हुए हैं। धर्मशालायें आपको 100 – 200 रुपये में और होटल में कमरा 400 – 500 रुपये में मिल जाता है। हमें भी गुरुधाम नामक होटल में 2 कमरों का सेट मात्र 600 रुपये में मिल गया। यहाँ भी टिड्डों की भरमार थी और टिड्डे भी इतने ज़्यादा की हर ओर टिड्डे ही टिड्डे। भोजन आदि करने के बाद मेहंदीपुर धाम की ओर जाकर जायजा लिया।

यहाँ दो तरह का प्रशाद मिलता है :-

1. दरखास्त

यह मुख्य प्रशाद है। मेहंदीपुर बालाजी धाम में हर भक्त को दरखास्त लगानी चाहिए ये दरखास्त आपको मंदिर परिसर के पास किसी भी दुकान से मिल जाती है। 10 रुपये की इस दरखास्त में लड्डू, बतासे ओर घी होते हैं। दरखास्त का सर्व-प्रथम भोग श्री बाला जी महाराज जी को लगता है और उसके बाद फिर भैरो बाबा और प्रेतराज सरकार को लगता है। तत्पश्चात दरखास्त का वह दोना भक्तों को अपने उपर से वार कर मंदिर परिसर के बाहर एक स्थान है वहां पशुओं के लिये डाल देना होता है।

2. अर्जी

यदि आप किसी विशेष मनोकामना से आयें हैं या किसी प्रेत बाधा / बीमारी आदि से पीड़ित हैं श्री बाला जी महाराज जी के मंदिर में अर्जी लगानी होती है। अर्जी 181 रुपये की लगती है जिसमे बाला जी महाराज का लड्डू का भोग, भैरो बाबा का काली उड़द का भोग और प्रेतराज सरकार का चावल का भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है की जब अर्जी स्वीकार हो जाती है तो कुछ भक्त बाबा के दरवार में सवामणि करते है ओर कुछ भक्त हर बार सवामणि करते है। खैर, सवामणी करना या न करना आपकी इच्छा पर निर्भर करता है। अर्जी लगाने का समय प्रातः 7:00 बजे से 12:00 बजे तक होता है।

ध्यान दें की एकादशी के दिन श्री बाला जी मंदिर मे अर्जी का भोग नही लगता। यदि आपका अर्जी लगाना बेहद आवश्यक है तो आप लाल कपड़े में 281 रुपये बाँधकर श्री बाला जी महाराज के मंदिर मे अर्पित कर सकते हैं। एक बात और की अर्जी का आर्डर आपको रात में प्रशाद वालो करवानी पड़ती है।

हमने भी अपनी अर्जी का आर्डर प्रशाद वाले को दे दिया और उसने सुबह चार बजे आने के लिये कहा। इसी के साथ हमारी पहले दिन की यात्रा पूरी हुई।

दूसरा दिन

सुबह चार बजे हम प्रशाद वाले से अर्जी और दरखास्त लेकर मंदिर की पंक्ति में लग चुके थे। पंक्ति भी क्या, य्ये लम्बी और चौड़ी लाइन और लगभग 1500 लोग। अब कुछ लोगों के विचित्र से व्यव्हार दिखने शुरू हो गये थे..जैसे कि बाल खोल कर झूमना, जीभ निकालना, चीखना, रोना, सर पटकना और जय बालाजी का उच्चारण करना। खैर मुझे इन सब दृश्यों की उम्मीद भी थी तो मैं विचलित नही हुआ। हमारा मरीज़ अभी बिल्कुल सामान्य था। एक घण्टे बाद मंदिर हॉल के गेट खुले और हम भीड़ में धक्के खाते हुए हॉल में चले गये।

अब भयंकर दृश्यों की बारी थी…बहुत सी महिलाएं चीखती और दौड़ती हुई आ रही थी, कइयों ने खुद को घायल कर लिया था बाल खुले हुए थे, कुछ गुमसुम भी थी, कुछ ने जीभ निकाल रखी थी, कुछ दांत दिखा रही थी, कुछ ने तो लोहे की ग्रिल पर अपना सर दे मारा, कुछ को उनके परिजनों ने गोद मे उठा रखा था… साथ – साथ ही उनका दुखी – परेशान परिवार उनके पीछे दौड़ रहा था। यह दृश्य वास्तव में पीड़ादायक था! हम अंदाज़ा भी नही लगा सकते कि उनके परिवार पर क्या बीत रही होगी ?

हनुमान चालीसा शुरू हो चुकी थी। हनुमान चालीसा गाना मुझे बहुत पसंद है और यहाँ भी हनुमान चालीसा को अक्षरक्ष दोहरा रहा था। कुछ ही देर में मुख्य मंदिर के कपाट खुल गये हम सभी बालाजी के दरबार में पहुँच चुके थे। भारी – भीड़ के कारण वहां भक्तों को मात्र 1 सेकंड ही रुकने दिया जा रहा था और तुरंत आगे बढ़ा दिया जा रहा था। हम भी बालाजी महाराज की एक झलक देख कर आगे बढ़ा दिये गये।

Mehandipur Balaji Image source: Google Image
Mehandipur Balaji Image source: Google Image

मंदिर में बाला जी महाराज के दर्शनोंपरांत सभी को पीछे वाले प्रेतराज जी के हॉल में भेजा रहा था जहाँ सभी मरीज बुरी तरह जमीन पर तड़प रहे थे। प्रेतराज जी और भैरो नाथ जी के दर्शनोपरांत हमें अर्जी जिसमे 12 लड्डू, काली उड़द की दाल और एक कटोरा भात थे मंदिर के पीछे फेकने को कहा गया। 2 लड्डू मरीज को खाने को दिए गए और बाकि सभी सामान हमने कहे अनुसार फेंक दिया। यह मुझे अच्छा नहीं लगा, जिस अन्न के लिए हम इतनी मेहनत करते हैं उसे इस प्रकार फेंका जाता देख कर बहुत बुरा लग रहा था।

खैर… दर्शन पूरे हुए और हम मंदिर से बाहर आ गए। हमारा मरीज इस पूरी दर्शन यात्रा में सामान्य रहा, अथार्त की अब हम निश्चिंत थे कि कोई टोना-टोटका आदि नहीं है और अब हम दिल्ली पहुंच कर मनोचिकित्सक के पास ही जायेंगे।

यहाँ से निकल कर मंदिर के सामने गली में पीछे जाकर समाधी वाले बाबा के की समाधी पर जाना था। यहाँ पवित्र जल का वितरण सुबह 8 से 10 के बीच होता है। हम भी यहाँ पहुँचे, किन्तु यहाँ और भी अधिक लम्बी लाइन थी और 10 बजे तक भी अपनी बारी आने की कोई उम्मीद नहीं थी। ‘घर में लगभग पांच लीटर गंगा जल रखा हुआ है’, मन को यही दिलासा देकर यहाँ से बालाजी महाराज से अंतिम विदाई लेकर हम अपने होटल वापस आ गए।

दोपहर ढाई बजे बांदीकुई से दिल्ली के लिये पोरबंदर से आने वाली एक एक्सप्रेस का आरक्षण था, अतः यहाँ भोजन आदि करके हम दोपहर 12 बजे मेहंदीपुर शहर से वापसी की यात्रा पर निकल चुके थे।

इस पूरी यात्रा के दौरान कुछ बातें निकल कर आई :-

  • मैंने लगभग 100 से अधिक पीड़ित देखे, एक से बढ़ कर एक गंभीर केस…लेकिन 5-6 पुरुषों को छोड़ कर सभी महिलाएं ही थी।
    अधिकतर परिवार देहाती ही थे
  • भूत – प्रेत हैं या नहीं यह तो पता नहीं, किंतु यहाँ अधिकतर केस भूत – प्रेत के कम और एक्सट्रीम डिप्रेशन / पागलपन के अधिक लग रहे थे।
  • खैर… ऐसा भी नहीं है कि सभी मानसिक रोगी ही हों, क्योंकि कुछ तो सच्चाई है तभी तो लोगों का विश्वास है लेकिन फिर भी मुझे लगा कि इन मरीजों को भगवान के दर्शनों के साथ – साथ एक अच्छे मानसिक उपचार की भी जरूरत है।
  • यहां का प्रशाद (अर्जी) घर नही ले जाया जाता। इसमें 12 लड्डू, उड़द की दालऔर एक बड़ा कटोरा चावल होता है। 2 लड्डू निकाल कर बाकी पूरा प्रशाद वहीं छत के पीछे वाले कूड़ेदान में फेंकना होता है। यह मुझे बिल्कुल भी सही नहीं लगा क्यों इस प्रक्रिया में यहां अन्न की बहुत ज़्यादा बर्बादी हो रही है। यह तो मां अन्नपूर्णा का सरासर अपमान है। यहाँ के महंत को इस प्रथा में कुछ तो सुधार करना ही चाहिये।
  • मंदिर में भारी – बहुत भारी भीड़ होती है किंतु भीड़ को नियंत्रित करने को लेकर कोई व्यवस्था नहीं है, कभी भी बड़ी दुर्घटना – भगदड़ हो सकती है।
  • कुछ बातें बहुत अच्छी लगी जैसे कि यहां के धर्मशाला और होटल वाले बहुत अच्छे लोग हैं, मनमाना किराया नही मांगते और ठीक ऐसे ही गाड़ी वाले भी हैं। उनका व्यव्हार भी बहुत अच्छा है।
  • मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा है और उसके बाद यहां व्यवस्था और अच्छी हो जायेगी। अब बस यदि अन्न की बर्बादी और स्वच्छता पर भी यहां के पंडे कुछ विचार करें तो और अच्छा हो।

और इसी के साथ यात्रा पूरी होती है। यदि किसी भी पाठक की आस्था को ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ।

बोलो बजरंग बली की जय !!

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