स्थान : मिर्ज़ापुर
तिथी: 05 मई, 2017

पूरे तीन महीने हो गए थे किसी यात्रा पर गए ! जी हाँ पुरे तीन महीने। फ़रवरी 2017 में चोपता गया था, फिर उसके बाद कहीं जाने का संयोग बन ही नही पाया था। कारण चाहे जो भी रहे हों। वैसे बहुत से लोगो को लगता है की तीन महीने कोई ज्यादा समय तो नहीं होता, पर मेरे लिए तो होता है।

एक माह पूर्व ही मेरे एक मात्र साले की शादी का निमंत्रण आया। वैसे जाने की कोई विशेष इच्छा तो नहीं थी पर इतनी हिम्मत भी नहीं थी की मना किया जा सके।

उन लोगो का गांव उत्तर प्रदेश – मध्य प्रदेश की सीमा पर है। सोचा की कुछ नया देखने को मिलेगा। वैसे भी इस क्षेत्र के बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं थी। बहुत अनुरोध करने पर ऑफिस से पांच दिन का अवकाश मिला।

वैसे वहां पहुँचने का नज़दीकी स्टेशन तो मिर्ज़ापुर है किन्तु समय नज़दीक होने के कारण वहां तक का रेलवे आरक्षण नहीं मिल पाया, इसलिए झारखण्ड एक्सप्रेस में इलाहबाद तक का ही टिकट ले लिया । 5 मई की शाम को अपने पिता जी के साथ मैं आनंद विहार स्टेशन पहुंचा। दिल्ली में ही रहने के बाद भी मैने आनंद विहार रेलवे स्टेशन पहली बार देखा था। मेरी नज़र में यह स्टेशन दिल्ली के सभी स्टेशनो में सर्वोत्तम है। आम स्टेशनो की तरह यहाँ स्टेशन के बाहर कोई आपा – धापी नहीं है। एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए किसी पुल पर नहीं चढ़ना पड़ता। यहाँ एक प्लेटफॉर्म से दुसरे प्लेटफॉर्म तक जाने के लिए भूमिगत मार्ग है और ऊपर प्लेटफॉर्म पर आने के लिए सीढ़ियों के साथ – साथ सपाट रास्ता है। दिव्यांगों के लिए यह एक अच्छी सुविधा है। स्टेशन पर केवल आई.आर.सी.टी.सी. की दुकाने हैं और सफाई व्यवस्था भी बेहतरीन है।

ट्रेन अपने निर्धारित समय से 2 घंटे देरी से आयी और 10 बजे ट्रेन चल पड़ी। सामने वाली सीट पर एक परिवार बैठा था जिन्हे डाल्टन गंज (झारखण्ड) जाना था।अब अँधेरे में कुछ दिखता तो हैं नहीं, इसलिए सो जाना ही उचित समझा। ट्रेन के इलाहबाद पहुँचने का समय था सुबह 4:30 बजे, लेकिन यह 2 घंटे पहले ही लेट हो चुकी थी।

 

दूसरा दिन

सुबह आँख खुली तो पता लगा की अभी तो कानपुर ही पहुंचे हैं। रिलायंस धाम वाले जिओ बाबा की कृपा अभी भी कहीं – कहीं आ रही थी। । ट्रेन अपनी गति से चली जा रही थी। इस बीच गूगल मैप पर लोकेशन भी पता करता रहा। फ़तेहपुर, रसूलाबाद, खागा आदि स्टेशनो को पार करते हुए आखिर कुल 4 घंटो की देरी के बाद सुबह 8:30 बजे ट्रेन इलाहाबाद पहुंची। स्वच्छता को लेकर सरकार द्वारा चलाये जाने वाली विभिन्न कार्यक्रमों का प्रभाव यहाँ स्टेशन और स्टेशन के बाहर की स्वच्छता पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था।

इलाहाबाद को प्रयाग के नाम से भी जाना जाता है। प्रयाग ही इस नगर का प्राचीन नाम है। पुराणों में वर्णित सप्त पुरियों में प्रयाग प्रमुख है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम स्थल भी है यह नगर। समुद्र मंथन से निकले अमृत की कुछ बूंदे इस संगम में गिरने के कारण प्रत्येक 12वें वर्ष पर यहाँ विश्व के सबसे बड़े मेले महाकुम्भ का आयोजन होता है। इसलिए धार्मिक रूप से यह महत्वपूर्ण नगर है। उच्च न्यायलय स्थित होने के कारण इस नगर को उत्तर प्रदेश राज्य की न्यायिक राजधानी का दर्जा भी प्राप्त है।

स्टेशन से निकल कर हम जीरो रोड पहुंचे। यहाँ से सरकारी बस मिलती है। मेरा विश्वास सरकारी बसों पर ही है, किन्तु ड्रमंडगंज जाने वाली एक मात्र बस जा चुकी थी। इसलिए रामबाग से एक प्राइवेट बस में बैठ गए। चालक ने बताया की बस कोरांव तक ही जाएगी। मैंने पिताजी से कहा की जहाँ तक जा रही है चलते हैं, आगे देखा जायेगा।

लगभग 10:30 बजे बस चल पड़ी। यमुना पर बने नैनी पुल से होते हुए बस ने नैनी शहर में प्रवेश किया। नया नैनी पुल आधुनिक इंजीनियरिंग का शानदार उदाहरण है। इलाहबाद को आप छोटा शहर कह सकते हैं, लेकिन सुविधाओं के मामले में यह दिल्ली जैसे शहरो से कम नहीं और स्वच्छता में दिल्ली से बेहतर। नगर में मुग़ल शैली में बने मकानों की बहुलता है। शनिवार को शायद बाजार बंद होता है यहाँ, इसलिए सभी दुकाने बंद ही थी। पास ही सरस्वती हाई – टेक सिटी (स्मार्ट सिटी) का का निर्माण कार्य जारी है। कुछ क्रिस्चियन मिशन स्कूल हैं।

New naini bridge Allahabad
नया नैनी पुल, इलाहाबाद
साभार: गूगल इमेज

गर्मी और धूप बहुत ज्यादा थी। कुछ देर बाद शहर समाप्त हो गया और खेत शुरू हो गए। पश्चिम दिशा से आ रही रेलवे लाइन ने मेजा रोड के पास क्रॉस किया। यह वही लाइन है जो दिल्ली से इलाहाबाद होते हुए मिर्ज़ापुर जाती है। यहाँ मेजा रोड रेलवे स्टेशन भी है। 5 – 10 साल के बच्चे थैलियों में पानी बेच रहे थे। ठंडे पानी की दो थैलियां मैंने भी ले ली। अच्छा तो नहीं लगता इतने छोटे बच्चों को काम करते हुए देखना ! गरीबी सब सीखा देती है। मेजा रोड से दाहिनी दिशा वाला मार्ग मेजा थर्मल पावर प्लांट और रीवां की ओर जाता है। हमे सीधे ही जाना था।

मेजा रोड से आगे बढ़ते ही एक वीरान क्षेत्र आरंभ हो जाता है। दूर – दूर तक घर तो क्या, कोई खेत भी नहीं। कुछ छोटी – छोटी पहाड़ी चट्टानें और झाड़ियां। बहुत बड़ा बियाबान है यह। मुझे ऐसा क्षेत्र देख कर भी डर लगता है की अगर बस ख़राब गयी तो मै तो प्यास से मर जाऊंगा। लगभग 10 किलोमीटर तक इस बियाबान से गुज़रने के बाद खेत दिखाई देने शुरू हुए। इसका अर्थ था की आस – पास ही कोई गांव भी है। यह एक आदिवासी क्षेत्र है। कुछ देर बाद मेजा ख़ास पहुंचे। यहाँ एक छोटा सा बाजार है। कुछ देर रुकने के बाद बस आगे चली। 1:30 घंटे बाद हम कोरांव पहुंचे। यह बस यहीं तक थी। कोरांव एक बड़ा बाजार है जहाँ पशुओं का व्यापार भी होता है। । दूर- दूर से लोग खरीदारी के लिए आते हैं। सामने ही एक बस खड़ी थी जो की ड्रमंडगंज जा रही थी। यहाँ से ड्रमंडगंज की दूरी 18 किलोमीटर है। कड़ी धुप में यात्रा करने के कारण बुरी तरह थक चुके थे। दोपहर 2:30 बजे हम ड्रमंडगंज पहुंचे।

ड्रमंडगंज वही स्थान है जहाँ मिर्ज़ापुर से आ रहा मार्ग, इलाहाबाद से आ रहे मार्ग से मिलता है। यहाँ से 18 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर प्रदेश – मध्य प्रदेश की सीमा है जिसे हनुमना के नाम से जाना जाता है। ड्रमंडगंज तक तो लगभग मैदानी क्षेत्र ही है, किन्तु यहाँ से कठिन पहाड़ी मार्ग आरंभ हो जाता है। बाईं दिशा वाला मार्ग यहाँ की प्रसिद्ध देवी श्री गड़बड़ा माता के मंदिर तक जाता है।

अब तक भूख लग चुकी थी। किसी भी रिश्तेदार का पास जाने से पहले ही में भोजन कर लेना मेरी आदतों में शुमार है। ऐसा इसलिए की मै जाते ही किसी को परेशान नहीं करना चाहता। इसलिए पास ही एक चाय की दुकान पर पकौड़ियों और लौंगलता का आर्डर कर दिया। आपको बता दूँ की लौंगलता पूर्वांचल की एक लज़ीज़ मिठाई है जो की खोये और मैदे से बनती है। अगर मीठे के शौक़ीन लोगो को यह मिठाई दी जाये तो वे एक बार में 4 से 5 तक खा सकते हैं।

ड्रमंडगंज दक्षिण – पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक मैदानी – पहाड़ी क्षेत्र है और मिर्ज़ापुर का भाग है । उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिलों (चंदौली, सोनभद्र, और मिर्ज़ापुर) में मिर्ज़ापुर भी शामिल है। पहाड़ी क्षेत्र और उनमे बसी जनजातियों के कारण नक्सलियों ने कई बार यहाँ अपनी गतिविधियां बढ़ने प्रयास किये। भोले – भले आदिवासियों को बहका कर अपने गिरोह में शामिल करना नक्सलियों के लिए आसान होता है। वे आदिवासियों के बच्चो का इस्तेमाल करते हैं। कुछ हमले भी हो चुके हैं यहाँ लेकिन अब पुलिस और प्रशाशन द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न जागरूकता कार्यक्रमों के कारण नक्सलवाद के पैर यहाँ से उखड़ने लगे हैं। हालाँकि अभी भी कभी – कभार नक्सली हमले कर के अपनी सक्रियता का परिचय दे ही देते हैं। चाय वाली अम्मा ने बताया की शहरो से कुछ लोग आते हैं जो की यहाँ के लोगो को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। कुछ तथाकथित एन.जी.ओ. भी समाजसेवा के नाम पर नक्सलवादी विचारधारा को बढ़ावा देने का प्रयास करते हैं। । मैंने और अम्मा ने किसी समस्या से बचने के लिए मैंने इस विषय में ज्यादा बात नहीं की। वैसे भी हम सभी जानते हैं की शहरों से आने वाले ये लोग कौन हैं। ये वही तथाकथित बुद्धिजीवी हैं जो दिल्ली जैसे शहरो के कॉलेजों में भारत विरोधी नारे लगवाते हैं।

चाय वाली अम्मा, बहुत बोलती है

यहाँ कई नदियां हैं पर उनमे पानी बहुत काम है। इन्ही नदियों में एक प्रमुख नदी है बेलन। जिस गांव में हमें जाना था वह यहाँ से गांव लगभग 4 किलोमीटर दूर है। वहां तक जाने के लिए एक ऑटो वाले से बात की। पहले तो उसने 250 रुपये मांगे, लेकिन 150 रुपये में मान गया। पहाड़ो के साथ – साथ लगे मार्ग से से हम गांव की ओर चल पड़े। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ गांव एक दुसरे से काफी दूरी पर बसे हैं। हमें जाना था भैंसोड़ जेर गाँव। भैंसो की अधिकता के कारण इसका यह नाम है। एक बेहद ख़राब रास्ते से होते हुए 3:30 बजे हम गाँव में पहुंचे।

गाँव से बाहर का मार्ग तो ख़राब है किन्तु गाँव गांव के अंदर सभी गलियां पक्की हैं। बहुत से घरो पर सौर ऊर्जा के पैनल लगे हैं। गाँव में नल कूप (नलके) तो केवल 2 ही हैं, लेकिन कुँओं की संख्या 15 है और पीने के पानी के स्त्रोत ये कुंए ही हैं। कुछ कुँओं में लोगो ने मोटर लगा दी है। एक पिछड़े क्षेत्र में होने के बाद भी यहाँ बिजली की कोई विशेष समस्या नहीं है। इसका कारण है इस गांव को राम मनोहर लोहिया ग्राम का दर्जा प्राप्त होना। इस कारण सरकार यहाँ विशेष ध्यान देती है। अब दामाद हूँ तो आव भगत तो होनी बनती ही है। अच्छा स्वागत किया गया। पहली बार कुंए से पानी खींच कर नहाना पड़ा, लेकिन आनंद आ गया। शाम को बारात में शामिल हो गया। रीती – रिवाजों से पहले द्वार पूजा और फिर विवाह आरम्भ हुआ। मुझे शादियों में देर तक जागना पसंद नहीं इसलिए वर पक्ष के लिए लगाए गए पंडाल में जा कर सो गया।

यहाँ बारात में गायक को ले जाने का रिवाज़ है। गायक इस ऑटो में बैठ कर गाता है और ऑटो के बहार बाजे वाले बाजा बजाते हैं।

 

तीसरा दिन

सुबह नींद खुली तो पाया की विवाह अभी भी चल ही रहा है। मुझे तो वर और वधु पर दया आने लगी थी की बेचारे कल शाम से ही भूखे बैठे हैं। कुछ ही देर में विवाह और अन्य रस्मे संपन्न हुई। नाश्ता करके हम लोग वापस गांव की ओर चल पड़े।

गर्मियों की धूप में कहीं जाने की इच्छा नहीं होती। इसलिए दिन भर घर में ही पड़ा रहा। शाम हुई तो सोचा की आस – पास कहीं घूमने चला जाये। गाँव से दक्षिण दिशा की ओर जाने वाले मार्ग की ओर चल पड़ा। लगभग 1 किलोमीटर चलने के बाद गांव की सीमा समाप्त हो गयी। यहाँ वन क्षेत्र आरम्भ हो जाता है। कुछ नीचे उतरने पर पाया की वहां एक नदी है। पानी तो कम ही था, लेकिन मेरे लिए पहाड़, वन और नदी का होना ही पर्याप्त था। दूर – दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था। फिर ध्यान से देखा तो पाया की नदी के दूसरी और कुछ छोटी – छोटी झोपड़ियां बनी हैं। नदी पार करके दूसरी और पहुंचा। वहां घने वन है और उनके बीच आदिवासियों के घर। मुझे यह समझते देर नहीं लगी की मै एक आदिवासी क्षेत्र में हूँ। यहाँ से एक रास्ता पहाड़ पर जा रहा था। दायीं ओर गुफा दिखी। एक बार तो सोचा की गुफा की ओर जाया जाये, फिर अपने आस पास दृष्टि डाली तो पाया की आदिवासी बच्चे, औरते और कुछ आदमी मुझे घूर कर देख रहे हैं। थोड़ा – थोड़ा अँधेरा भी हो चला था। मैंने बिना उनकी फोटो खींचे ही वापस जाने में भलाई समझी।

घर पहुंच कर मैंने उन लोगो को आदिवासियों के बारे में बताया। मेरे ससुर जी ने बताया के वे कोल और भील आदिवासी हैं। एक दौर में पहाड़ो में खनन कार्य जोरो पर था। दिन भर में 800 से 900 ट्रक पत्थर लेकर यहाँ से निकलते थे। आदिवासी मज़दूरों ने उस दौर में खूब कमाई की। एक दौर ऐसा भी आया की एक आदिवासी ने अपनी बेटी की शादी में कार दहेज़ के रूप में दी। फिर खनन कार्य के कारण पहाड़ों पर बढ़ता संकट देख कर इस कार्य पर रोक लगा दी गयी। अब उन आदिवासियों का पहाड़ की तराईं में बसे गाँवों में आना जाना लगभग बंद हो गया है।

शाम को कुछ इधर – उधर की बातें और फिर भोजन करने के बाद छत पर सोने के लिए चले गए। एक विशेषता और है यहाँ की, यहाँ मच्छर नहीं हैं या फिर बहुत कम हैं। अगर मुझे मच्छर ना काटें तो मुझे भयंकर गर्मी में भी नींद आ जाती है। यहाँ तो शाम के समय मौसम ठंडा हो गया था। कुछ ही देर में नींद आ गयी।


लोग कहते हैं की इस पेड़ पर भूत हैं..

 

 

चौथा दिन

आज वापसी की तैयारी थी। दोपहर 1 बजे ड्रमंडगंज जाने के एक ऑटो मंगाया गया। एक लम्बे, थकाऊ और धूल से सने 5 घंटे के सफर के बाद शाम 6:30 बजे हम लोग इलाहाबाद पहुंचे। वापसी की टिकट पुरुषोत्तम एक्सप्रेस की थी। अभी ट्रेन के आने में 1 घंटे और 10 मिनट का समय शेष था। इसलिए पिता जी, पत्नी और बेटे को स्टेशन पर बैठा कर मै इलाहबाद शहर घूमने निकल गया।

स्टेशन के आस – पास का क्षेत्र मुस्लिम बहुल है। एक से बढ़ कर एक शानदार मस्जिदे हैं। आस – पास कुछ पंडित जी लोगो की दूध – रबड़ी की दुकाने हैं जहाँ गर्मा – गर्म दूध मलाई डाल के दिया जाता है। मैंने भी खरीदा। स्वादिष्ट था। मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर बाहर निकल रहे मुस्लिम भाई पंडित जी लोगो की दुकान से दूध खरीद कर पी रहे थे। हिंदू – मुस्लिम के बीच ऐसी एकता देख कर अच्छा लगता है। ऐसी ही एकता की ज़रूरत आज पूरे देश को है।

ट्रेन अपने निर्धारित समय शाम 7:40 पर आ गयी और हम अपने शहर दिल्ली की ओर रवाना हो लिए।

मेरी पिछली यात्राओं कि तरह इस यात्रा में हिमालय, झील और बर्फ आदि तो नहीं थे किन्तु ग्रामीण परिवेश और नक्सलवाद को क़रीब से समझने का यह अच्छा अवसर था।


सुबह हो गयी। आज वापस जाना है।


खुल्दाबाद मस्जिद


खुल्दाबाद मस्जिद

मशूरियन माई मंदिर, इलाहाबाद
गर्मा – गर्म दूध रबड़ी तैयार है

प्लेटफॉर्म संख्या 4, इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस की प्रतीक्षा जारी है……
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adminआशीष पाली Recent comment authors
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आशीष पाली
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आशीष पाली

मै भी आपके साथ घूम आया यात्रा भी करवा दी और गांव भी घुमा दिया। बहुत अच्छा लिखते हैं आप। 1999 अगस्त में मैं और मेरा दोस्त पंकज जो अतरसुइया इलाहाबाद का रहने वाला था दोनों मोटरसाइकिल से विंध्याचल मंदिर दर्शन करने गए थे लौटने हुए खूब भीगे और फोटो मेजारोड की है।