‘माता के दर्शनों की इच्छा तो सभी की होती है किन्तु दर्शन होते उसी को हैं जिसे माता स्वयं बुलावा भेजती हैं।’ पहले मैं इस तरह की बातों को विशेष तरज़ीह नहीं देता था लेकिन वर्ष 2009 में की गयी माता वैष्णों देवी की एक अधूरी यात्रा ने मुझे इस मान्यता पर यक़ीन करने पर विवश कर दिया। ऐसा क्यों हुआ ? कैसे हुआ ? इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे ! पहले माता वैष्णों देवी तीर्थ के बारे में जानेंगे।

जम्मू – कश्मीर राज्य के रियासी जिले के त्रिकूट पर्वत पर स्थित हैं माता वैष्णों देवी कर दरबार। दरबार तो यही कोई 700 वर्ष पहले से स्थित है, लेकिन माता की उपस्थिति यहाँ हज़ारो सालों से है। माता का दरबार रियासी जिले के कटरा में त्रिकूट पर्वत पर 1585 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक गुफ़ा में है। पहले तो यहाँ तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग था जो की कटरा से अर्द्धकुवारी, हाथीमत्था, सांझी छत, होते हुए जाता था। लगभग 15 वर्ष पहले अर्द्धकुवारी से एक अन्य मार्ग का निर्माण कर दिया गया जो की पुराने मार्ग की अपेक्षा सुगम था। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड ने कटरा के पास से एक और मार्ग का निर्माण करवा दिया है जो की ताराकोट गाँव से होते हुए अर्द्धकुवारी के पास नए मार्ग मिलता है। पहले जो यात्रा 14 किलोमीटर की थी, अब 8 किलोमीटर रह गयी है।

यात्रियों के लिए सुविधाएँ बढ़ाना अच्छी बात है, किंतु सुविधाओं के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़ को उचित नहीं कहा जा सकता। अँधा-धुंध निर्माण कार्यों की वजह से पहाड़ पर गर्मी बढ़ती जा रही है और अब वहां पहले जैसी खूबसूरती नहीं रह गयी है। मैं पहली बार वर्ष 1997 में इस तीर्थ पर गया था और आखिरी बार 2013 में। 1997 में प्रकृति की सुंदरता जिस तरह यहाँ फैली हुई थी, अब वो बात नहीं। खैर.. जो भी हो, हम कर भी क्या कर सकते हैं ?

इस वृतांत में मैं माता वैष्णों से जुड़ी धार्मिक कहानी की चर्चा नहीं करूँगा क्योंगी हममें से अधिकांश लोगों को इसके बारे में पताहै और जो भक्तगण माता वैष्णों देवी महात्मय पढ़ना चाहते हैं, वे यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

अब बढ़ते हैं यात्रा की ओर

यह वर्ष 2009 के अगस्त महीने की बात है। पूरे सात वर्ष हो गए थे किसी यात्रा पर गए। सावन आरम्भ हो चुका था, जिसके कारण वर्षा तो जोरों पर थी ही, साथ – साथ घुमक्क्ड़ी की इच्छा भी जोरो पर थी। उस समय मुझे यात्रा के नाम पर कुछ गिने चुने स्थानों के नाम ही पता थे। जैसे वैष्णों देवी, अमरनाथ आदि। मैने अपने सनी के सामने की यात्रा का प्रस्ताव रखा। वो तैयार थे। इस बार स्वतंत्रता दिवस की लम्बी छुट्टियां पड़ने वाली थी। तय हुआ की शुक्रवार 13 अगस्त को यात्रा पर निकला जाये। यही हमने गलती कर दी और वह क्या थी आप इस लेख को पढ़ कर समझ ही जायेंगे।

मैंने अब तक सभी यात्रायें ट्रेन से ही की थी, किन्तु इस बार अचानक योजना बनने के कारण कन्फर्म टिकट नहीं मिला और तय हुआ की बस से ही चला जाये।

13 अगस्त को हम सुबह 9 बजे कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पहुँच गए। अब यह बस द्वारा पहली लम्बी यात्रा थी तो कुछ गलतियां होना स्वाभाविक था। बरसात बहुत तेज़ हो रही थी। बस अड्डे के बाहर ही एक निजी बस वाला मिल गया और कहा की मात्र 350 रुपये में वो कटरा तक ले जायेगा। बताया की बस में टीवी भी है। अब एक तो बस में टी.वी और ऊपर से किराया इतना कम ! कोई समझदार ही किन्तु – परन्तु कर सकता था। हम तो चल पड़े उसकी बस की ओर। बस भी बस अड्डे से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर खड़ी थी। पहले तो हमे अच्छी सीट मिल गयी। किन्तु जैसे ही बस में भीड़ बढ़ी हम दोनों को ड्राईवर के साथ वाली सीट पर भेज दिया गया। मुझे ड्राईवर के पास वाली सीटों से सख्त परहेज़ है। जैसे – तैसे बस चल पड़ी। बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

दिल्ली सीमा पर करते ही जो पहला शहर आता है, वह है हरियाणा का सोनीपत। तेज़ बरसात, हाईवे के दोनों और पेड़ और हरे – भरे खेत देख कर मन में हरियाली छा गयी। राई, बहालगढ़ और समालखा आदि को पार करते हुए बस पहुंची पानीपत। अब तो बरसात कम होने की अपेक्षा और और तेज़ हो चली थी। बस के वाइपर भी ख़राब हो गए। जब शीशे से दिखना बंद हो गया तो बस ड्राइवर ने शीशे पर पत्ती वाला तम्बाकू मल दिया। कमाल की बात थी की तम्बाकू लगाने के बाद शीशे पर पानी रुक ही नहीं रहा था और शीशे से बिलकुल साफ दिख रहा था। यह तकनीक मैंने पहली बार देखी थी। शायद ऐसे ही जुगाड़ों के कारण कहा जाता है की एक भारतीय बड़ी से बड़ी मुसीबत से भी बाहर निकल सकता है।

एक बात तो बताई ही नहीं की बस में टीवी तो था, लेकिन उस पर सिवाय दो पंजाबी गानों के गानों के और कुछ नहीं चल रहा था। पुरे सफर में केवल वही दो गाने रिपीट होते रहे। ठेठ पंजाबी गाने होने के कारण एक भी समझ में नहीं आया। यह ठीक वैसा ही अत्याचार था जैसा अत्याचार वर्तमान में ढिंचैक पूजा जी कर रही हैं।

करनाल और कुरुक्षेत्र से होते हुए हम कुछ ही घंटों में अम्बाला पहुँच गए। यहाँ से एक मार्ग लुधियाना होते हुए जम्मू जाता है। दूसरा मार्ग चंडीगढ़ होते हुए हिमाचल और तीसरा मार्ग पटिआला आदि चला जाता है। हमें पहले मार्ग की ओर जाना था। लगभग 2 घंटो बाद खन्ना पार करते हुए हम लुधियाना पहुंचे। लुधियाना पंजाब का एक बड़ा औद्योगिक केंद्र है जिसका परिचय मार्ग के दोनों ओर बसे उद्योग दे रहे थे। सम्पूर्ण एशिया में इस्तेमाल होने वाली साईकिलों में से 50% का उत्पादन लुधियाना में होता है। इसके अतरिक्त विभिन्न ट्रैकटर कंपनियों की उत्पादन इकाइयां यहाँ स्थित हैं। मर्सीडीज़ और बी.एम.डब्ल्यू कारों में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न पुर्जों का उत्पादन यहाँ होता है।

लुधियाना के ट्रैफिक में फंसते हुए हम शहर से बाहर निकले। अब तक बरसात बंद हो चुकी थी। सड़क के किनारे स्थित एक ढाबे पर बस रुकी। ढाबा देखने में तो अच्छा ही था। बाहर चारपाइयाँ बिछी हुई थी। यात्रियों के पहुँचते ही गर्मागर्म खाना परोस दिया गया। तमाम कटोरियाँ सामने बिछा दी गयी। यह कटोरियाँ नहीं इंद्रजाल थी हमारे लिए। खाना कुछ बासी सा लग रहा था जो की गर्म करके परोसा गया था।

खाना ख़त्म होते ही बिल थमा दिया गया। बिल देखते ही सभी के होश उड़ गए। हम दोनों के खाने का बिल था 530 रुपये। यात्रिओं के विरोध से निपटने के लिए ढाबे वाले ने कुछ गुंडे पहले ही खड़े कर रखे थे। खैर, बिल तो देना ही था ! सो, दे दिया। तब से मैं कभी भी बस यात्रा के दौरान हाईवे वालो ढाबों से कुछ नहीं खरीदता। इससे भी भयंकर लूट दिल्ली – हरिद्वार मार्ग पर पड़ने वाले खतौली के ढाबों में होती है।

फिल्लौर और फगवाड़ा से होते हुए शाम 6 बजे हम जालंधर पहुंचे। यहाँ एक और समस्या मुँह खोले खड़ी थी। हमे यहीं उतार दिया गया। कहा गया की बस यहीं तक है। 50 रुपये वापस कर दिए गए और कहा गया की दूसरी बस में चले जाओ।

अब कर भी क्या सकते थे। चल दिए जम्मू वाली बस ढूंढने। एक बस मिली। हम बैठ गए। जम्मू तक का किराया था 150 रुपये प्रति सवारी और पिछली बस वाले ने वापस किये थे मात्र 50 रुपये प्रति सवारी। तब मेरी नौकरी भी अच्छी नहीं थी, इसलिए एक – एक रुपये का नुकसान मेरे लिए बहुत था।

रात 9 बजे बस ने पठानकोट को पीछे छोड़ते लखनपुर सीमा से जम्मू क्षेत्र में प्रवेश किया। अभी साम्बा ही पहुंचे थे की बस रूक गयी। सहचालक ने बताया की पास ही आतंकवादियों से मुठभेड़ चल रही है, इसलिए आगे नहीं जा सकते। यह एक नयी मुसीबत थी। लगभग तीन. घंटे तक बस वहीं रुकी रही। उसके बाद बस चली। यातायात को दूसरे मार्ग पर डाईवर्ट कर दिया गया था। रात लगभग 1 बजे बस जम्मू बस अड्डे पहुंची। यह अच्छी बात थी की जम्मू – कश्मीर राज्य में रात में भी यातायात जारी रहता है। उत्तराखंड में ऐसा नहीं है। शीघ्र ही कटरा वाली बस मिल गयी।

अंततः रात 3 बजे हम कटरा पहुँच ही गए। बरसात तेज़ थी। असली समस्या तो अब आरम्भ होने वाली थी। पूरा कटरा भारी भीड़ से भरा हुआ था। पैर रखने का भी स्थान नहीं था। पास ही एक दुकान से काम चलाऊ बरसाती ली। कुछ ही देर में वह भी फट गयी। खैर.. जाने दो।

माता के दर्शन की पैदल यात्रा आरम्भ करने से पहले यात्रियों को पंजीकरण कराना आवश्यक होता है। यह पंजीकरण यात्रियों की सही संख्या और किसी दुर्घटना की स्थिति में राहत अभियानों में सहायता करता है। सोचा की पर्ची बनवा ली जाये। लेकिन यह क्या… इतनी लम्बी लाइन ? स्वतंत्रता दिवस और रविवार की छुट्टियों के कारण लाखों लोग दर्शन के लिए आये थे। लगभग एक किलोमीटर लम्बी लाइन और उसके भी तीन फेरे। अब क्या किया जाये ? लग गए हम भी लाइन में। सनी चाय लेकर आया। लाइन में खड़े – खड़े चाय पी।

धीरे – धीरे सुबह हो गयी। यात्रा पंजीकरण भवन भी खुल गया। कुछ लोगो ने लाइन तोड़ कर आगे बढ़ने का प्रयास किया तो पुलिस ने डंडे से स्वागत किया। जैसे – तैसे लोग लाइन में लगे पड़े थे। लगभग तीन घंटे बाद फिर से लोगो का एक समूह लाइन तोड़ कर हंगामा करते हुए आगे बढ़ा। इस बार पुलिस ने लाठी – चार्ज कर दिया। स्थिति गंभीर थी। इसी बीच खबर आयी की यात्रा मार्ग में अर्धकुँवारी के पास भूस्खलन होने के कारण यात्रा रोक दी गयी है। यह खबर आते ही पंजीकरण भवन फिर से बंद हो गया। अब तक दोपहर के तीन बज चुके थे। लाइन में खड़े – खड़े अब माता के दर्शन की उम्मीद धूमिल पड़ती जा रही थी। इसी बीच सनी के जानकार मिले। वो कटरा में कुछ सरकारी कर्मचारियों को जानते थे। उन्होंने अपना मोबाइल नंबर दिया और कहा की कुछ देर और प्रयास करो, यदि पंजीकरण ना हो पाये इस नंबर पर संपर्क करना। हमे कुछ उम्मीद सी दिखाई दी, लेकिन किसी ने सत्य ही कहा है की जो होना होता है वह हो कर ही रहता है।

Vaishno devi darshniy darwaja

मेरे पास कोई कागज़ नहीं था, इसलिए मैंने वह नंबर 20 रुपये के नोट पर लिख लिया । किस्मत ऐसी खराब की थोड़ी ही देर बाद नंबर का विचार मन से निकल गया और भूल वश उस 20 रुपये की हम दोनों पेप्सी पी गए। इसके साथ ही नंबर भी चला गया। इसका ध्यान हमें एक घंटे बाद आया। अब तक बहुत देर हो चुकी थी।

फिर सोचा की यात्रा पर्ची चेक पोस्ट पर ही चल कर पुलिस को अपनी मजबूरी बताई जाए, हो सकता है पुलिस हमें बिना पंजीकरण के ही दर्शन करने दे। लेकिन यह प्रयास भी विफल हुआ। पुलिस वाले नहीं माने। भीड़ की स्थिति देख पर लग रहा था की पंजीकरण में अभी दो दिन और लग सकते हैं। हमारे पास इतनी छुट्टियां नहीं बची थी।

अब तक रात के आठ बज चुके थे। माता का पर्वत सामने था। इतने समीप आ कर भी अब दर्शन असंभव हो चले थे। अंततः भारी मन से माता से विदा लेना ही उचित समझा। माता को कटरा से ही प्रणाम किया और दिल्ली वाली बस में बैठ गए। थकान के कारण बस में बैठते ही नींद आ गयी। अगली सुबह हम दिल्ली में थे।

किसी ने सत्य ही कहा है की माता के दर्शन उसे ही होते हैं जिसे माता स्वयं बुलावा भेजती हैं।

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