पहली घुमक्कड़ी और उत्तराखण्ड की ओर पहला कदम First trip and first step towards Uttarakhand

‘पाण्डेय जी, ये कौन सा स्टोन पहना हुआ है ? राशि वाला है क्या?’ – मेरे दायें हाँथ की ऊँगली पर एक चमचमाते पत्थर वाली अंगूठी को देख कर आलोक ने ऐसा पूछा।
मैंने कहा – ‘हाँ, जरकन है ! पापा ने पण्डित जी कहने पर पहनाया था।’
‘ये किसलिये’ – आलोक ने फिर पूछा।

ऐसे सवाल मुझसे अक्सर पूछे जाते हैं और फिर मुझे सुनानी पड़ती है एक लम्बी दास्तान जो की मेरी घुमक्कड़ी की शुरुआत का सबसे बड़ा कारण भी बनी।

यह पोस्ट एक यात्रा से सम्बंधित तो है लेकिन यहाँ फोकस किसी स्थान विशेष की यात्रा पर न होकर जीवन यात्रा पर थोड़ा सा अधिक है… अथार्त यहाँ आप मेरे बारे में कुछ और बाते भी जानेंगे।

यह 21 फ़रवरी 2011 का दिन था जब मैंने अपनी पुरानी जॉब से रिज़ाइन देकर एक नयी नौकरी ज्वाइन कर ली थी और आज मेरी नौकरी का पहला दिन था। एक इंटरनेशनल बी.पी.ओ. होने के कारण रात की शिफ्ट थी। पता नहीं क्यों यह नयी जॉब और यहाँ का माहौल कुछ अच्छा सा नहीं लग रहा था।

खैर… ट्रेनिंग शुरू हुई और इसी के साथ ही मैने इस नयी जॉब को भी छोड़ने का फैसला कर लिया क्योंकि यह एक हार्ड-कोर सेल्स जॉब थी और उसमें भी अमेरिकियों को कॉल करके इंश्योरेंस बेचना था जो की मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं था। मैंने जॉब जल्द-बाज़ी में ज्वाइन की थी और छोड़ी भी जल्द-बाज़ी में ही।

खैर… अब पीछे मुड़ कर तो देखना नहीं था। अगले ही दिन से नयी नौकरी की तलाश शुरू हो गयी… दिल्ली की धूल भरी सड़कों पर वाहनों के शोर के बीच हाँथ में ए4 साइज वाला बायोडाटा लेकर कंपनी दर कंपनी भटकना आसान नहीं होता। आखिर 10 दिनों की दौड़ – भाग के बाद एक जगह नौकरी लगी। बेरोज़गारी में जो मिला वही अपना लिया। यहाँ कॉल करके एजुकेशनल कोर्स सेल करने थे। मन को मार कर यहाँ भी ट्रेनिंग ले रहा था।

यह ट्रेनिंग का दसवां दिन अथार्त अंतिम दिन था। 2011 क्रिकेट विश्व कप का फाइनल आज ही था और इसीलिये ऑफिस वालों ने मैच दिखाने के लिये बड़ी – बड़ी स्क्रीन्स लगायी हुई थी।

खैर… इधर भारत ने मैच जीता और उधर मैंने जॉब छोड़ी। आप भी कहेंगे की मैं एक बेहद लापरवाह किस्म का इंसान था, वैसे भी सच्चाई तो यही थी। इस बार किस्मत थोड़ी अच्छी रही की शीघ्र ही पीतमपुरा की एक कंपनी में जॉब लग गयी।

जॉब तो लग गयी थी और मैं थोड़ा खुश भी था लेकिन अब मैं पहले वाला इंसान नहीं रहा था। कुछ तो यहाँ का माहौल और कुछ मेरे दिमाग में चल रही उलझनो की वजह से मै अक्सर छुट्टी ले लिया करता था… तीन महीने होते – होते यहाँ से भी मन हट चुका था और आखिर वही हुआ जो अब तक हो रहा था।

अब मेरे हाँथ में कोई जॉब नहीं थी। डीटीसी बस का मासिक पास मेरे हाँथ में था और मैं पीतमपुरा की गलियों में भटक रहा था। घर पर इस बारे में कुछ नहीं बताया, क्योंकि पिछली दो जॉब छोड़ने की वजह से वे पहले ही परेशान थे, ऊपर से मेरी सगाई भी इस साल हो चुकी थी और साल 2012 में मेरी शादी भी होनी थी।

रोज़ घर से बैग लेकर निकलना और दिल्ली की बसों में भटकना… यही नियती बन चुकी थी। बैंक अकाउंट भी खाली हो चुका था। खाने का एकमात्र ठिकाना था दिल्ली का बंगला साहिब गुरुद्वारा…. कभी – कभार सेवा भी कर दिया करता था।

पैदल सड़कों की ख़ाक छानना भी अब अच्छा लगने लगा था। बस से इंडिया गेट पहुंचना… वहां से पैदल ही बंगला साहिब गुरुद्वारा और फिर पैदल ही नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन तक भटकना ही अब प्रतिदिन की दिनचर्या बन चुकी थी। मन पूरी तरह से टूट चुका था और किसी भी ऐसे क्षेत्र की तरफ जाने की हिम्मत भी नहीं कर पाता था जहाँ ऑफिस आदि हों।

एक दिन ऐसे ही भटक रहा था। पहाड़गंज की गली के एक कोने पर 4 नशेड़ी कम्बल ओढ़कर, गोला सा बनाकर बैठे हुए थे, स्मैकिये थे और शायद नशा ही ले रहे थे। उनके बगल में कुछ नशेड़ी जैसे दिखने वाले लोग छोले – कुल्छे खा रहे थे। मेरी जेब में उस डीटीसी पास के अलावा मात्र 10 रुपये ही थे और मुझे भूख भी लगी हुई थी।

आज दोपहर में लंगर खाया नहीं और शाम के चार बजे होने की वजह अब से गुरूद्वारे का लंगर भी ख़त्म हो चुका था। मनस्थिति बहुत विचित्र थी, ऐसा पहली बार था जब मैंने उन नशेड़ियों से छोले – कुल्छे मांग कर खाये।

ऐसा लगने लगा था की शायद मैं भी किसी दिन ऐसे ही किसी फुटपाथ इन लोगों जैसी स्थिती में मिलुंगा। उन दिनों कुछ ऐसी आदते लगी या फिर ऐसा कहें की मनस्थिति में कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ, जिनसे छुटकारा पाने का प्रयास आज भी जारी है।

यूहीं भटकते – भटकते एक महीना बीत चुका था और अब घर पर सैलरी देने का समय आ चुका था…किसी तरह बहाना बना दिया! लेकिन अब झूठ के सहारे अधिक दिन तक चलना मुश्किल हो रहा था। घर वालों से चेहरा चुराने लगा था…अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, ना ही यह शहर और ना ही यह घर।

मैंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया था। ऋषिकेश के बारे में सुन रखा था की बहुत से भटके हुए लोगों को वहां ठिकाना मिलता है। शायद ऋषिकेश ही मेरा ठिकाना होने वाला था। रात के एक बज रहे थे और आज 25 अगस्त शुरू हो चुकी थी। सबसे ख़ास दोस्त शाहिद नदीम सिद्दीकी को मैसेज कर के मैंने अपने फैसले के बारे में बताया। लगातार कॉल पर कॉल और मैसेज के जरिये मुझे समझाने का उनका हर प्रयास असफल हो रहा था।

आज 25 अगस्त के दिन घर वाले मेरी होने वाली पत्नी के लिये गहने बनवाने के लिये बाहर गए हुए थे। यह मेरे लिये अच्छा मौका था। मैंने अपने जरुरी कपड़े, सर्टिफिकेट्स, 800 रुपये और दो पराठे लिये और इन्ही के साथ घर छोड़ दिया।

मेट्रो आगे बढ़ती जा रही थी और शाहिद की कॉल्स को डिसकनेक्ट करने का सिलसिला भी जारी था। पहले पुरानी दिल्ली स्टेशन पहुंचा, लेकिन अब तक हरिद्वार की ट्रेन निकल चुकी थी। किसी ने बताया की आनंद विहार से भी हरिद्वार के लिये बस मिलती है। आनंद विहार ISBT की उबड़ – खाबड़ सड़कों पर उड़ती धूल और धुंए के बीच एक बस वाला हरिद्वार – हरिद्वार चिल्ला रहा था।

अधूरा सफ़र

वैष्णों देवी तक तो कई बार परिवार के साथ जा चुका था लेकिन हरिद्वार की ओर यह पहला सफ़र था। तब कहाँ सोचा था की NH-58 मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग बन जायेगा। दोपहर के 1 बज रहे थे, सहचालक ने बताया की हरिद्वार शाम 7 बजे तक पहुंचेंगे।

मेरी जेब में मात्र 800 रुपये थे जिसमे से 200 रुपये मैं किराये के रूप में दे चुका था। बहुत से परिवार वाले इस बस में यात्रा कर रहे थे। बस वाला भक्ति भाव से ओत-प्रोत था, शायद इसीलिये लगातार भक्ति गाने ही बज रहे थे। इस 3X2 वाली बस में मैं 3 सीटों वाली सीट पर खिड़की की ओर बैठा था और बाकि की दो सीटों पर दो युवा लड़के बैठे थे, शायद होमोसेक्सुअल थे… ऐसा उनकी बातों से पता चल रहा था। खैर…. जो भी हो, मुझसे तो अच्छी ही स्थिती में थे। वे अपनों से दूर तो नहीं थे न, मेरी तरह।

‘मुसाफ़िर हूँ यारो, न घर है… न ठिकाना….’ आज पहली बार यह गाना सुनते हुए अच्छा लग रहा था। मेरठ, मुज़फ्फर नगर जैसे शहर आज पहली बार देख रहा था। उस समय मुज़फ्फर नगर बाई पास का निर्माण कार्य चल रहा था, इसीलिये बस शहर के बीच से गुज़र रही थी। एक जगह जाम लगा हुआ था, कुछ दबंग किस्म के लोग एक लड़के की बेतहाशा पिटाई किये जा रहे थे और पास ही एक लड़की खड़ी रो रही थी। प्रेम – प्रसंग का मामला था।

कितने अजीब है न हम लोग ! ऐसे तो मथुरा की गलियों के चक्कर लगाते फिरते हैं, राधा – कृष्ण के प्रेम को ग्रन्थ को तरह पूजते हैं लेकिन जब बात अपनों की आती है तो हम बर्दाश्त नहीं कर पाते।

बस में हम वापस आकर बैठे। भूख लग चुकी थी लेकिन पैसे सीमित होने की वजह से भूख को इग्नोर सा कर दिया। बस आगे बढ़ती जा रही थी और मन कहीं पीछे अटका हुआ था। इकलौती बहन की शादी के बाद मैं अपने माता-पिता का एकमात्र बेटा था, ऊपर से मेरा रिश्ता भी पक्का हो चुका था। मेरी ऐसी हरकत की वजह से उन पर क्या बीतेगी, समाज को क्या जवाब देंगे… खैर, भगवान इस दुनिया में किसी को भी बेसहारा नहीं छोड़ता।

अब तक शाम हो चुकी थी और बस हरिद्वार पहुँचने वाली थी। बारिश तेज़ थी। बस अड्डे पर पहुँच कर सोचा की आगे के सफ़र से पहले पापा को एक अंतिम कॉल करके बता दूँ।

एक एसटीडी बूथ से कॉल लगायी… दूसरी ओर से आवाज़ आयी – कौन ?
‘पापा, मैं’
‘हाँ क्या हुआ ?’
‘पापा, मैने घर छोड़ दिया है और यह अंतिम कॉल है ! मै अब आगे जा रहा हूँ।’
‘कहाँ हो अभी?’
‘अभी हरिद्वार में।’
‘जहाँ हो, वहीं से वापस आओ, अभी। अगर ऐसा नहीं किया तो हम दोनों को नहीं देख पाओगे।’

यह स्थिती मेरे लिये बहुत बुरी थी। बिना समय गवायें, वापस दिल्ली की बस में बैठ चुका था।

रात भर के सफ़र के बाद आख़िर सुबह 7 बजे तक घर के पास पहुँच चुका था लेकिन घर में घुसने की हिम्मत नहीं थी। आखिर, एक घंटे तक इधर – उधर भटकने के बाद घर में दाखिल हुआ। पापा नौकरी पर जा चुके थे, रात भर रोने की गवाही माँ की आखों ने दे दी थी। दिन जैसे – तैसे बीता, शाम को पापा से सामना हुआ। थप्पड़ तो नहीं पड़ा, लेकिन बहुत सी बाते हुई हमारे बीच। माफ़ी मांगी और आगे से ऐसा नहीं करने का प्रॉमिस किया।

एक नयी सुबह

हाँ, तो इस पोस्ट की शुरुआत मेरी अंगूठी से हुई थी। घर में सब मेरे द्वारा ऐसा कदम उठाने के कारण डरे हुए से थे। पंडित जी ने पापा को, मुझे जरकन रत्न पहनाने की सलाह दी। उनका कहना था की इस रत्न की वजह से मेरे कदम घर में रुकेंगे… वो अलग बात है की ठीक तीन महीने बाद नवंबर में ही मेरा अगला सफ़र शुरू हो चुका था और तब से हर साल बहुत सी यात्रायें होती हैं। इस तीन महीनों के बीच एक ठीक – ठाक नौकरी भी लग चुकी थी जो की मुझे पसंद भी थी।

कुछ बदला – बदला सा मैं और मेरा अगला सफ़र,

हरिद्वार और ऋषिकेश का सफ़र।

नवंबर 2011 का महीना था और मेरा मन एक घुमक्कड़ी के लिये ललचाने सा लगा था। घर पर इस बारे में बताया तो उन्होंने बेहिचक मुझे जाने की अनुमति दे दी। शायद पिछले अनुभव से वे भी डर से गये थे। मैं उस सफ़र को पूरा करना चाहता था जिसे पिछली बार अधूरा छोड़ आया था।

रात 9:30 बजे हरिद्वार वाली बस मिल गयी और शुरू हो गया मेरा सफ़र। इस बार पिछली बार की तरह कोई चिंता नहीं थी। इस बार कोई पीछे नहीं छूट रहा था… नयी नौकरी भी थी। दिल्ली के ट्रैफिक से बाहर निकलते ही नींद आ गयी।

मेरठ से एक परिवार बस में चढ़ा, परिवार नहीं पूरा कुनबा था। करीब 16 लोग होंगे और सबकी सीटें पहले से ही बुक थी। बस में बैठे उन्हें आधा घंटा भी नहीं हुआ होगा की उनका भोजनालय खुल गया। खाने के डिब्बे एक सीट से दूसरी सीट तक पास किये जाने लगे, अचार की महक पूरी बस में फ़ैल चुकी थी। ऐसा लग रहा था की मानो जन्म – जन्मांतर के भूखे हों। खैर, ऐसे लोग ही सफ़र को खुशनुमा बनाते हैं। वो अलग बात है की कुछ ही देर बाद उनमें से तीन लोग उल्टियां करना शुरू चुके थे और फिर भी ठूंसे जा रहे थे।

सुबह के चार बजे मैं हरिद्वार पहुंच चुका था। पैदल ही हर की पौड़ी की ओर चल पड़ा। हरिद्वार की गलियों को पहली बार देखना बहुत अच्छा लग रहा था। घाट पर पहुंचा तो वहां की सुंदरता देख कर विस्मित सा हो रहा था। नवंबर का महीना होने के कारण गंगा के शीतल जल में नहाने की हिम्मत तो नहीं थी लेकिन फिर मेरी अंतरात्मा ने झकझोरा और नहाना पड़ा।

(हरिद्वार के बारे में जानने के लिये और एक और हरिद्वार यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

यहाँ नहा कर पूजा कराई और घाट पर घूमने लगा। तभी पीछे से आवाज़ आयी – ‘बाबा को कुछ खाने को दो’, मैंने पांच रुपये दिए तो उसने और मांगे। मैंने देने से मना कर दिया और इसी के साथ मुझ पर गालियों की बौछार शुरू हो गयी। वे कुछ अघोरी किस्म के बाबा लग रहे थे। मैंने वहां से निकल लेने में ही भलाई समझी।

मनसा देवी के दर्शनों की इच्छा थी लेकिन रास्ते से अनभिज्ञ था और अकेला भी था। आखिर एक साथ मिल ही गया। लखनऊ से एक हमउम्र लड़का आया था और मेरी ही तरह मनसा देवी के दर्शन को जाना चाहता था। हम साथ ही चल पड़े।

एक पतली सी गली से सीढ़ियां ऊपर मनसा देवी के मंदिर की ओर जा रही थी। वैसे सीढ़ियों की चढ़ाई कठिन है लेकिन तब मेरे लिये सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल नहीं होता था। अँधेरा होने के कारण एक सांभर विचरण करता हुआ मिला। कुछ बन्दर भी सोये हुए से थे। वैसे अँधेरे में यह रास्ता अकेले तय करना सही नहीं है। आधे घंटे की चढ़ाई के बाद हम पहुँच गए मनसा देवी के दरबार। माता के दर्शन किये।

अब तक उजाला हो चुका था और यहाँ से हरिद्वार का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था। ऋषिकेश वाली दिशा में देखने पर बहुत दूर कुछ बर्फ़ से ढकी चोटियां दिखाई दे रही थी। आज तक नहीं जान पाया हूँ, की वे कौन से चोटियां हैं? कुछ देर फोटोग्राफी करने के बाद हम वापस नीचे आ गये। गंगा माता की आरती शुरू हो चुकी थी। आरती देखने के बाद हम दोनों ही चल पड़े अगली मंज़िल ऋषिकेश की ओर।

View from Mansa Devi Hill
View from Mansa Devi Hill

Har Ki Paudi
Har Ki Paudi

यह सफ़र हम दोनों के लिये ही पहला सफ़र था। यह तो पता था की ऋषिकेश जाना है लेकिन ऋषिकेश में कहाँ? यह नहीं पता था। शेयर्ड ऑटो वाले ने ही सलाह दी की आप राम झूला पर उतरो और वहां से लक्ष्मण झूला तक का सफ़र स्वर्ग आश्रम वाले क्षेत्र से होते हुए पैदल तय करो। मैं आज तक उस सलाह को मानता हूँ।

यदि आप घुमक्कड़ हैं, अकेले हैं तो ऋषिकेश घूमने का सबसे अच्छा तरीका यही है की राम झूला स्टैंड पर उतरें, नाव द्वारा गंगा पार करें, और वहां से कच्चे रास्ते से होते हुए पैदल लक्ष्मण झूला पहुंचे। बहुत अच्छा अनुभव होगा। यदि आप राफ्टिंग करना चाहते हैं तो लक्ष्मण झूला पहुँच कर वहां से किसी राफ्टिंग एजेंसी से भी संपर्क कर सकते हैं, या फिर नीलकंठ महादेव भी जा सकते हैं।

राजा जी नेशनल पार्क से होते हुए गुज़रना और वो भी रविवार की सुबह, बहुत अच्छा लगता है। पेड़ों के पत्तों से छनकर आती हुई धूप बहुत अच्छी लगती थी। यह ऋषिकेश का पहला सफ़र था, ऐसा लग रहा था की मानों की अलग दुनिया की ओर जा रहा हूँ। एक घंटे के सफ़र के बाद आखिर हम राम झूला पहुँच गये।

पहली बार गंगा को इतना शांत और साफ़ देखा था। व्यवस्थित घाट, मंदिर, सस्पेंशन ब्रिज, आश्रम, विदेशी, योग स्कूल… किसी फ़िल्मी दुनिया जैसा माहौल था।

घाट पर जाकर नाव में बैठ गये। वहां हमारे अतिरिक्त सभी दक्षिण भारतीय थे। एक अम्मा गंगा जल लेकर सभी पर छिड़क रही थी, उनकी केवल भाषा ही भिन्न थी… अपनापन तो वही ठेठ भारतीय था। गीता भवन वाले घाट पर पहुँच कर गलियों की ओर चल पड़े। कोई निश्चित गंतव्य नहीं था, जो मिला वही देख लिया। ऐसी ही थी अपनी घुमक्कड़ी। मैं और लखनऊ वाले भाई जी घाट से होते हुए परमार्थ निकेतन पहुंचे। परमार्थ निकेतन की भव्यता किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकती है, हमारे साथ भी ऐसा हुआ। एक हज़ार कमरों वाला यह एक विशाल आश्रम है जिसका संचालन स्वामी चिदानंद सरस्वती करते हैं। यहाँ पहली बार रुद्राक्ष का पेड़ देखा था।

एक रेस्टॉरेंट में खाने के लिए मेनू मंगाया तो वही लखनवी अंदाज़ – पहले आप, पहले आप। मुझे तो जो मिल जाये खाने को, खा लेता हूँ लेकिन सामने वाले की पसंद का ध्यान रखना भी कोई चीज़ होती है। लेकिन उसका एक ही जवाब की जो आप मंगा लो। मैंने भी आखिर मसाला डोसा ही मंगा लिया। लखनऊ वाले को शायरियों से किसी को पकाना बहुत पसंद था और उसका शिकार इस बार मैं था। इतनी बुरी भी नहीं थी शायरियां।

यहाँ से निकल कर लक्ष्मण झूला की ओर पैदल चल पड़े। कच्चा रास्ता बहुत खूबसूरत है। दोनों तरफ हरियाली के बीच पतले रास्ते से होते हुए जाना अच्छा लगता है। जैसे – जैसे लक्ष्मण झूला के पास आते जा रहे थे, गंगा के पानी का शोर बढ़ता जा रहा था। थोड़ी ही देर में हम थे लक्ष्मण झूला पर।

Ram Jhula Ghat Rishikesh
Ram Jhula Ghat Rishikesh

Ram Jhula Rishikesh
Ram Jhula Rishikesh
Lakshman Juhla Rishikesh
Lakshman Juhla Rishikesh

On the way toward Lakshman Jhhula
On the way toward Lakshman Jhhula


On the way toward Lakshman Jhula

यह स्थान जैसा सुना था, उससे कहीं बढ़ कर था। पुरातन और आधुनिक सभ्यता का मिश्रण यहीं देखा जा सकता है। त्रयंबकेश्वर मंदिर (13 मंजिल शिव मंदिर) में जाने की इच्छा तो थी लेकिन 13 मंजिले चढ़ने की हिम्मत नहीं बची थी। इसलिये बाहर से प्रणाम किया। यहाँ कुछ टैक्सियां नीलकंठ की ओर जा रही थी। अब यहाँ तक आ गये थे तो नीलकंठ तो जाना ही था।

उस समय नीलकंठ तक का किराया 120 रुपये था, जिसमें की आने और जाने का किराया शामिल था। भरी हुई गाड़ी में स्वयं को एडजस्ट किया ही था की गाड़ी चल पड़ी। पहली बार शिवालिक का सफ़र वास्तव में आनंदमयी था। घने जंगलों से होते हुए हम पहुंचे फूल चट्टी, जहाँ कुछ देर रुकने के बाद फिर बढ़ चले। अब ऐसा लग रहा था की घुमक्कड़ी में शायद बहुत देरी कर दी मैंने।

गाड़ी में बैठी हुई कुछ लड़कियां देवप्रयाग की बात कर रही थी। यह शब्द मेरे लिये नया था लेकिन उनके मुँह से देवप्रयाग का विवरण सुनकर मन बना लिया था की अगली बार वहीं जाना है। मेरे में उस समय देवप्रयाग का महत्तव केदारनाथ यात्रा जितना ही हो गया था। थोड़ी ही देर में हम नीलकंठ मंदिर पहुँच चुके थे।

(चारधाम यात्रा गाइड पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

यहाँ मौसम बहुत ठंडा था। शायद कुछ देर पहले बारिश भी हुई होगी। जूते गाड़ी में ही उतार कर मंदिर की लाइन में लग गये। यह मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना हुआ है। मान्यता है की समुद्र मंथन में निकले हलाहल विष को पीने के कारण भगवान शिव के शरीर में बहुत गर्मी फ़ैल गयी थी जिसे उन्होंने इस स्थान पर शांत किया था। भगवान भोलेनाथ के दर्शनोपरांत हम वापस चल पड़े।

नीलकण्ठ से लक्ष्मण झूला तक के सफ़र में मेरी तबियत बिगड़ गयी थी लेकिन उस लखनऊ वाले ने स्थिती को अच्छे से संभाल लिया था। उस बेचारे ने कोई उपाय न पाकर अपना डब्बे गंगा जल मुझे पिला दिया। ऐसी स्थिती को देख कर कभी – कभी लगता है की सोलो घुमक्कड़ी हमेशा अच्छी नहीं।

(बदरीनाथ यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।)

दोपहर ढाई बजे तक हम ऋषिकेश बस अड्डे पर थे। उसे हरिद्वार जाना था और मुझे दिल्ली। थके – हारे और मन में पहली घुमक्कड़ी की मीठी यादों को बसाये हम निकल पड़े अपने – अपने शहरों की ओर।

एक बात और – दिल्ली पहुँच कर याद आया की हम दोनों एक – दूसरे का नाम पूछना तो भूल ही गए और नंबर भी। पहली घुमक्कड़ी का बेहद ख़ास और अच्छा साथी था वो लेकिन अब कहाँ है ? पता नहीं।

वह अंगूठी आज भी मेरी ऊँगली में हैं और शायद उसी की कृपा है की अब एक घुमक्कड़ बन चुका हूँ।

किसी ने सही कहा है की घुमक्कड़ी आपको एक सुलझा हुआ इंसान बना देती है….थैंक यू घुमक्कड़ी।

On the way toward Neelkanth Temple
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Neelkanth Temple
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