आज हम किसी अनजान स्थान की यात्रा पर निकलने से पहले गूगल मैप में वहां तक पहुँचने के मार्ग की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। केवल एक क्लिक और सम्पूर्ण यात्रा का नक्शा हमारे सामने। कितना आसान है ना यह ? लेकिन जब गूगल मैप नहीं था तब क्या करते थे ? आप का जवाब होगा कागज़ पर छपा नक्शा। आप सही हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है की पहली बार यह नक्शा बनाना कितना मुश्किल रहा होगा ?

नक़्शे तो हज़ारों वर्ष पूर्व से बनते आ रहे हैं लेकिन इन नक्शों की कहानी में नैन सिंह रावत का ज़िक्र न किया जाए तो यह कहानी अपूर्ण रह जायेगी।

यह समय था 18वीं शताब्दी का। उत्तराखंड की भोटिया महल की सात घाटियों में से एक जोहार घाटी में जन्मे थे नैन सिंह। अधिक पढ़े लिखे थे नहीं थे लेकिन हिमालय के भूगोल का विलक्षण ज्ञान रखने वाले इस इंसान की कहानी किसी सुपर हीरो से कम नहीं है। ब्रिटिश सरकार की तरफ़ से ख़ुफ़िया यात्रायें करने वाले इस शख़्स को ‘स्पाई पंडित’ के नाम से भी जाना जाता था।

इनकी विलक्षण भौगोलिक जानकारी के कारण ही ब्रिटिश इनके क़ायल हो गए। इनकी इच्छाशक्ति का ही कमाल था की बिना ख़ास संसाधनों के हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में 13000 मील से ज़्यादा की पैदल यात्रा करते हुए मध्य एशिया का कालजयी मानचित्र तैयार कर दिया।

उत्तराखंड के सुदूर मिलम नामक गांव 21 अक्टूबर 1830 को जन्मे थे नैन सिंह। ऐसे दुर्गम गाँव में पैदा होने के कारण अनुभव ने उन्हें पहाड़ों का जानकार बना दिया। घर में आर्थिक तंगी थी जिसके कारण वर्ष 1852 में नैन सिंह ने अपना घर छोड़ कर व्यापार करना शुरू कर दिया। व्यापार के सिलसिले में इन्हे अक्सर लम्बी यात्रायें करनी पड़ती थी। इन यात्राओं में सबसे अधिक उन्हें तिब्बत जाना पड़ता था। इन्ही यात्राओं के दौरान इनकी भेंट तिब्बती और ब्रिटिश लोगों से होती रही जिसके कारण इन्हे कई भाषाओँ का ज्ञान हो गया। ब्रिटिशर्स इनसे इतना प्रभावित हुए की वर्ष 1855 में रॉयल जिओग्राफ़िकल सोसाइटी लंदन ने उन्हें सम्पूर्ण मध्य हिमालय क्षेत्र के सर्वे की ज़िम्मेदारी सौंप दी।

नैन सिंह ने अपनी 10 वर्षों तक चली यात्रा के दौरान कुमाऊं से काठमांडू, मध्य एशिया से ठोक-ज़्यालंगु और यारकंद खोतान की तीन दुर्गम यात्रायें की। तिब्बत की राजधानी ल्हासा का परिचय दुनिया से कराने वाले नैन सिंह ही थे। उन्होंने ने ल्हासा की समुद्र तट से ऊंचाई, अक्षांश और देशांतर आदि की जानकारी दी। उन्होंने ने ही बताया की चीन की सांगपो और भारत की ब्रह्मपुत्र नदियां एक ही है। केवल कंपास, बैरोमीटर और थर्मामीटर की सहायता से उन्होंने यह मानचित्र तैयार किया। आज भी यह मानचित्र इस क्षेत्र को समझने में सहायक है।

इस यात्रा के दौरान उन्होंने ने एक विशेष विधि को दूरी नापने के लिए अपनाया। वे 33 इंच का एक कदम रखते और 2000 क़दमों को 1 मील मान लेते थे। इसके लिए उन्होंने ने 100 मनकों की एक माला का उपयोग किया। प्रत्येक 100 कदम पर एक मनका गिरा देते थे। पूरी माला जपने तक 10000 कदम यानी 5 मील तय हो जाते थे।

नैन सिंह रावत की यात्रा

जब 10 वर्षों बाद उन्होंने यह मानचित्र और अन्य जानकारियां ब्रिटिश सरकार को सौंपी तो ब्रिटिश सरकार उनके कार्य से इतनी प्रसन्न हुई की उन्हें मुरादाबाद के तीन गाँवों की ज़ागीरदारी सौंप दी। उन्हें सरकार द्वारा सम्मानित किया गया। 1 फ़रवरी 1882 को मुरादाबाद में ही उन्होंने अंतिम साँसे ली। वर्ष 2004 में भारत सरकार ने इनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।

ऐसे महान घुमक्क्ड़ों के कारण ही आज भी घुमक्कड़ी ज़िंदा है। इस स्पाई पंडित को हमारा नमन।

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Ajit ShuklaNiranjan PrajapatiadminNaman Recent comment authors
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Naman
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Naman

कोटि कोटि नमन पंडित जी के लिए और आप के लिए जो आप ये यथार्थ सामने लाये

Niranjan Prajapati
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Niranjan Prajapati

Very good Information.Thanks

Regards
Niranjan Prajapati

Ajit Shukla
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Ajit Shukla

Also a museum in Munsiyari
And a biography hum bhi ghumakkad the.