दिल्ली से जागेश्वर की यात्रा Trip to Jageshwar from Delhi

यात्रा मोड

कई बार यात्रा की योजना कब बन जाये स्वयं को भी नहीं पता लगता…जैसे की अब इस यात्रा को ले लेते हैं। बेशक पिछली यात्रा मैंने लगभग साढ़े तीन महीने पहले की थी लेकिन अभी भी कहीं जाने की इच्छा नहीं थी ! कारण ? एक तो भयंकर गर्मी जिसमे की दिल्ली और उसके आस – पास लगने वाले ट्रैफिक जाम से ही निकलने में 4 घंटे लग जाते हैं और दूसरा ये की पहाड़ों से अधिकतर अराजकता के ही समाचार आ रहे थे जैसी की फलां शहर में पानी का संकट हो गया, कहीं पर्यटक जाम में फस गये, कहीं होटलों की मारामारी मची है।

मई के समर संग्राम को झेलते हुए हम जून में प्रवेश कर चुके थे। बेटे की गर्मी की छुट्टियां चल रही थी। तभी अचानक मन में विचार आया की पूरी गर्मी ऐसे ही घर पर काटना सही नहीं और सोच लिया की इसी सप्ताह निकलेंगे कहीं। पहले दिल्ली से अल्मोड़ा जायेंगे और फिर वहां बिनसर… नहीं – नहीं कौसानी… वैसे मयंक ने तो जागेश्वर की भी बहुत तारीफ की थी… छोड़ो सब, अल्मोड़ा पहुँच कर सोचा जायेगा। इसी छोड़ी हुई सोच के साथ आनंद विहार (दिल्ली) से अल्मोड़ा वाली बस जो की रात में 8 बजे निकलती है, 9 जून (रविवार) के लिये उसका आरक्षण करवा लिया। इस यात्रा में मेरा साथ जाने वाले थे कविता (पत्नी) और विनायक (बेटा)।

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विनायक उस समय नानी के घर था। कविता को यात्रा बारे में बता दिया। पिछले एक महीने से मेरी नाईट शिफ्ट चल रही थी जो की 8 जून तक भी जारी थी, 9 जून को ही सुबह अपने यात्रीनामा फेसबुक समूह के एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में हुमायूँ के मकबरे पर सदस्यों की मीटिंग भी रख ली थी और और उसी दिन शाम को यात्रा पर भी निकलना था। बहुत ही व्यस्त कार्यक्रम था और मुझे चिंता थी की बस में 12 घंटे कैसे बीतेंगे वो भी तब जब की साथ में तीन साल का बेटा हो ?

देखते ही देखते 9 जून आ गया, आज रात की शिफ्ट कर के आया था और सुबह ही समूह की मीटिंग भी थी। मीटिंग में हिस्सा लिया और दोपहर 3 बजे तक घर आया। जितनी तैयारी कर पाया, कर ली और जो नहीं हो पायी उसे छोड़ दिया। वैसे भी सफर में बहुत कुछ छूट जाता है। खैर… मेरे पास कुल 2 घंटे थे आराम करने के लिये, सो वही कही किया।

कुछ अपने से चेहरे

कुछ ही देर में शाम के 6 बज चुके थे और मैं, कविता और विनायक यात्रा के लिये निकल पड़े थे। लगभग 1 घंटे और 15 मिनट की मेट्रो यात्रा करके हम आनंद विहार बस अड्डे पर पहुँच चुके थे। मानो पूरा शहर ही यहाँ इकठ्ठा हो गया हो। एक ज़द्दोज़हद सी थी शहर से कहीं दूर चले जाने की। परिवार वाले, बिना परिवार वाले सभी थे यहाँ। धूल और पसीने से तरबतर चेहरों पर हलकी सी मुस्कान यह बताने के लिये काफी थी की वे अपनों से मिलने जा रहे हैं।

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कभी – कभी लगता है की देश में दो तरह के समाज हैं, पहला है आम समाज जो की हमारे गांवों और कस्बों में बस्ता हैं, जहाँ हम अपने परिवार, रिश्तेदार, मुँह बोले चाचा – चाची, बाबा, अम्मा, भैया आदि के बीच रहते हैं, उनके साथ अपने दुःख – दर्द बाटते हैं, अपनी क्षेत्रीय भाषा में बात – व्यवहार करते हैं। दूसरा है वो समाज जो दिल्ली, गुरुग्राम जैसे शहरों में बस यूँही बस गया है, जिनमे अलग – अलग समाजों से रोजी – रोटी की तलाश में आये हुए लोग हैं। ये समाज कुछ ऐसा होता जा रहा है की पहली मंजिल पर रहने वाले को यह नहीं पता होता की दूसरी मंजिल वाले के घर में आज चूल्हा जला या नहीं। इसी दूसरे समाज से पहले समाज के बीच के सफर में जो खुशी मिलती है, वह आज इन अनजाने चेहरों पर दिखाई दे रही थी।

हमारी बस पहले से ही अपने स्थान पर आ चुकी थी। पसीने से लथपथ हम जा बैठे बस के अग्निपथ पर। बस अपने नियत समय अथार्त रात 8 बजे चल पड़ी। दिल्ली और गाजियाबाद के यातायात से निजात पाते हुए हम गढ़मुक्तेश्वर की ओर बढ़ चले। मैं इस रास्ते पर वैसे मसूरी (हापुड़) तक तो गया हूँ लेकिन इतना लम्बा सफर पहली बार कर रहा था। रात और ऊपर से ट्रैफिक के बीच अधिक समझ नहीं आया की बस कहाँ – कहाँ से होते हुए जा रही है। वही जाने – पहचाने से रोड किनारे वाले ढाबे नज़र आ रहे थे जिनमे अधिकतर शिवा नाम से थे। सुना है की इधर शिवा ढाबों का बड़ा नाम है। वैसे मुझे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के हाईवे किनारे वाले ढाबों से विशेष एलर्जी है। अब तक 2 बार इन पर खाना खाया है और अनुभव बेहद बुरा रहा है। एक तो ये लोग मनमानी कीमत वसूलते हैं और दूसरा की खाने का स्वाद बेहद बुरा होता है।

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गढ़मुक्तेश्वर में ठहराव

बाबूगढ़, हापुड़ और सिम्भावली होते हुए बस रात 11:30 बजे तक गढ़मुक्तेश्वर पहुँच चुकी थी। यहाँ पहला पड़ाव था। एक बड़ा सा ढाबा था और वही बेतरतीब दुकाने। अब बीवी – बच्चा साथ में थे तो कुछ तो देना ही था, वो बात अलग थी की कविता भी ढाबों पर मिलने वाले खाने के बारे में जानती थी। हिम्मत करके हमने तीन गिलास लस्सी ली…. लस्सी नहीं पानी ही था सफ़ेद रंग का। कुछ देर यहाँ रुकने के बाद चल पड़े आगे की ओर।

दो लोगों की सीट पर हम तीन लोग किसी तरह एडजस्ट करते हुए कब सो गए पता ही नहीं चला। आँखें खुली तो रात के 2:30 बज चुके थे और बस कालाढूंगी और हल्द्वानी के बीच वाले जंगलों के बीच कहीं सरपट दौड़ रही थी। घने जंगलों के बीच शानदार रोड था यह। हम उत्तराखण्ड राज्य में प्रवेश कर चुके थे। गजरौला, मुरादाबाद, टांडा और बाज़पुर कहीं पीछे छूट चुके थे। देखते ही देखते बस हल्द्वानी बस अड्डे पर पहुँच चुकी थी।

अब अल्मोड़ा दूर नहीं

अब इतना सुकून था की अब मात्र 4 घंटे बचे हैं अल्मोड़ा पहुँचने में। हल्द्वानी बस अड्डे पर भयंकर भीड़ थी। लोग रात से ही यहाँ डेरा जमा कर बैठे हुए थे और किसी तरह बस में सवार हो जाने को आतुर थे। आज सोमवार शुरू हो चुका था और सप्ताहांत में अपने पहाड़ी गांवों में गए हुए लोग अब शहर की ओर लौटने के लिये बस के इंतज़ार में थे।

यहाँ इतना तो समझ आ गया की यदि उत्तराखण्ड में मई – जून में यात्रा करनी है तो बस का आरक्षण पहले ही करवा लें, अन्यथा बस तो भूल ही जायें। वैसे भी ऐसी खबरें आ रही थी की नैनीताल जाने वाले यात्रियों को 10 किलोमीटर पहले ही उतारा जा रहा है।

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हल्द्वानी से कुमाऊ के लगभग सभी शहरों के लिये साधन मिल जाते हैं। एक टैक्सी वाले को धारचूला – धारचूला चिल्लाते देख, आदि कैलाश स्मरण हो आया। अगले वर्ष जब वहां जाऊंगा तो शायद यहीं से गाड़ी पकड़नी पड़े। यहाँ 20 मिनट रुकने के बाद हम बढ़ चले पहाड़ों की ओर।

वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी, कुमाऊ की सड़के गढ़वाल से कहीं बेहतर हैं। हो सकता है आल वेदर रोड बनने के बाद इस मामले में गढ़वाल आगे निकल जाये। दो लाइन का रोड, सफ़ेद पट्टियाँ और रात में रेडियम वाले इंडिकेटर बेहद खूबसूरत लग रहे थे।

अनुमान के अनुसार इस बस को सुबह 6 बजे भीमताल के सामने से निकलना था और मेरी बड़ी इच्छा थी भीमताल देखने की लेकिन बस मेरी इच्छाओं को अपने बड़े – बड़े पहियों के नीचे रौंदते हुए डोलमार से होते हुए ज्योलिकोट वाले रास्ते पर चल पड़ी। रात के अंधेरे में पहाड़ों पर रौशनी से जगमग करते हुए शहर सितारों की दुनिया जैसे ही लग रहे थे, अफ़सोस इस बात का था की मैं केवल अंदाज़ा लगा सकता था की ये कौन से शहर हैं।

कुछ ही देर में उजाला हो चुका था और बस कैंची धाम के पास पहुँच चुकी थी। ऊँचे – ऊँचे पहाड़ों के बीच घिरा हुआ कैंची धाम बहुत सुन्दर लग रहा था। कैंची धाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है लेकिन फिर भी बताते चलें की यह बाबा नीम करोली का आश्रम है। बाबा, हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त थे। बहुत से लोगों के जीवन को संवारा है बाबा ने। बाबा के प्रसिद्द भक्तों में एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग भी शामिल हैं। ये दोनों हस्तियां यहाँ तब आयी थी जब ये जीवन के कठिन दौर से गुज़र रहे थे और इन्हें कोई जानता भी नहीं था। कहते हैं ही बाबा के आशीवार्द ने ही दोनों को आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया है। बड़ी इच्छा थी आश्रम में जाने की लेकिन बस ने एक लम्बा सा ‘नो’ कह दिया।

यात्रा में पैसे बचाने के तरीके

यहाँ से आगे पहला छोटा शहर था खैरना। कुछ छोटी – बड़ी दुकाने यहां बसी हुई हैं। खैर… खैरना कितना सुन्दर है यह तो वापसी की यात्रा में ही पता चलेगा। थोडा आगे बढे तो एक और बड़ा शहर दिखा, नैनीताल से थोड़ा ही छोटा रहा होगा यह। नाम है भोवाली। एक मित्र हैं मयंक, उनके अनुसार बाइक ही यात्रा करने का सर्वश्रेष्ठ विकल्प है, लेकिन मैं आरामपसंद इंसान बस को वरीयता देता हूँ। इन पहाड़ों की ख़ूबसूरती आज इस मामले में मयंक को मुझसे एक पॉइंट अधिक दे रही थी।

अब यहाँ से अगला और अंतिम पड़ाव था अल्मोड़ा। ऊँचे पहाड़ों की ख़ूबसूरती के बीच से होते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। एक चिर – परिचित गाना ‘बेड़ू पाको बारा मासा’ किसी ने मोबाइल स्पीकर पर बजाया हुआ था। चाहे इस गाने की कुछ ही पंक्तियाँ समझ आती हों लेकिन गाना मुझे बहुत पसंद है। जून के महीने में भी यहाँ मौसम में ठंडक थी।

हमने सोचा था की अब बस सीधा अल्मोड़ा ही जाकर रुकेगी लेकिन अल्मोड़ा शहर से 5 किलोमीटर पहले ही नाश्ते के लिये एक जगह ये रुक गयी। समझ नहीं आया की जब अल्मोड़ा 5 किलोमीटर ही रह गया है तो अभी बस को रोकने की क्या आवश्यकता थी? खैर… कारण जो भी रहे हों, लेकिन यह स्थान बहुत सुन्दर था। दूर – दूर तक फैली हरी – भरी वादियाँ और ऊंचाई पर दिखता अल्मोड़ा शहर। यहाँ का मौसम दिल्ली से बिलकुल अलग था। दिल्ली की भयंकर गर्मी के विपरीत यहाँ सर्दी थी। पास ही पहाड़ से एक पतली सी जल धारा निकल रही थी। नल में पानी होने के बावजूद मैंने उस धारा से पानी पीना अधिक अच्छा समझा… वैसे भी जीवन भर तो नल का ही पानी पीना है।

Stop before Almora
Stop before Almora

यहाँ लगभग आधा घंटा रुकने के बाद बस चल पड़ी अल्मोड़ा की ओर। यहाँ से कुछ दूरी पर है कर्बला कब्रगाह और वो भी विवेकानंद जी के नाम से। यह कुछ समझ नहीं आया। यदि किसी को कर्बला और विवेकानंद के जुड़ाव के बारे में पता हो तो कमेंट करे।

यहाँ से कुछ आगे जाने पर अल्मोड़ा शहर से ठीक पहले मार्ग दो हिस्सों में बट जाता है। नीचे की ओर जाने वाला रास्ता रानीखेत और बागेश्वर होते हुए मुनस्यारी की ओर जाता है। ऊपर की ओर जाने वाला रास्ता जागेश्वर और पिथौरागढ़ होते हुए धारचूला की ओर जाता है। हमें ऊपर की ओर जाना था। यह मेरा कुमाऊ का पहला सफर था और इधर अभी बहुत कुछ है तलाशने को।

और मात्र 10 मिनट में हम थे अल्मोड़ा के माल रोड पर। माल रोड पर केवल रोडवेज बसों का स्टैंड है। यहाँ चाय वाले ने बताया की जागेश्वर के लिये गाड़ी नीचे धारानौला से मिल जायेगी। बस स्टैंड से कुछ आगे जाकर कुछ सीढ़ियां दायीं दिशा में ऊपर की ओर जाती हैं। उन्ही पर आगे जाकर T-पॉइंट से बायीं ओर नीचे की ओर जाने वाला रास्ता धारानौला की ओर जाता है।

अल्मोड़ा शहर वास्तव में बहुत खूबसूरत है और इसकी ख़ूबसूरती में बढ़ोतरी कर देती हैं यहाँ की स्वच्छता। रोड पर कहीं भी कचरे का नामों-निशान नहीं था। सोमवार का दिन होने के कारण बच्चे स्कूल जा रहे थे।

धारानौला की ओर जाने वाला रास्ता तेज़ ढलान लिये है। धारानौला पहुँच कर पीछे मुड़ कर देखा तो हैरान रह गये की वापसी में जब हम थके – हारे जागेश्वर से लौटेंगे तो फिर से यह चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी। धारानौला से जो रोड धारचूला की ओर जाता है उसी रोड पर धारानौला से लगभग 33 किलोमीटर आगे आरतोला से दायीं ओर एक रोड जागेश्वर की ओर मुड़ता है। उस रोड पर तीन किलोमीटर आगे जागेश्वर धाम है। धारानौला से जागेश्वर के लिये सीधी टैक्सी नहीं मिलती है। जागेश्वर के नाम से किसी भी टैक्सी में बैठ जाइये, वो आपको आरतोला उतार देगी, जहाँ से आपको 3 किलोमीटर पैदल ही चलना होता है। यदि आपकी किस्मत अच्छी रही तो गाड़ी भी मिल सकती है।

चलो जागेश्वर

यहाँ से एक शेयर्ड टैक्सी लोहाघाट जा रही थी, हम उसी में सवार हो गये। ड्राइवर ने पहले मुझे बीच में बैठने के लिये कहा लेकिन यहाँ मेरा मोटापा पहली बार काम आ गया। मैंने उसे समझाते हुए कहा की बीच में तो तुम लोग चार सवारी बैठाते हो, यदि मैं बैठ गया तो कुल तीन ही सवारी बैठ पायेंगी। मुस्कुराते हुए उसने आगे बैठने का इशारा कर दिया 😀

अल्मोड़ा शहर को तेज़ी से पीछे छोड़ते हुए यह टैक्सी चल पड़ी थी। पहाड़ी की ऊंचाई पर बसा हुआ अल्मोड़ा एक बड़ा शहर है और यह यहाँ से बाहर निकलते हुए स्पष्ट दिख रहा था। वैसे अल्मोड़ा में भी देखने को बहुत कुछ है जैसे की चिड़ियाघर, नंदा देवी मंदिर आदि। वापसी में हमने नंदा देवी मंदिर में दर्शन किये थे।

टैक्सी में बंधी हुई चुन्नी और उसमें बंधी हुई घंटिया देख कर कविता ने इशारे में मुझसे इनके बारे में पूछा।

यहाँ की लगभग सभी गाड़ियों में आपको ऐसी छोटी – बड़ी घंटियां दिख जायेंगी। इस क्षेत्र के लोगों में यहाँ के चितई गोलू देवता के प्रति विशेष आस्था है। इन्हें न्याय के देवता रूप में जाना जाता है। मंदिर में टंगी लाखों चिट्ठियां यह बताने के लिये काफी हैं कितने भक्तों ने न्याय की अर्ज़ी लगायी है। गोलू देवता मंदिर में चढ़ावे के रूप में घंटियां भी बांधी जाती हैं। शायद यही कारण है गाड़ियों में घंटियों के बंधे होने का। मैंने भी कविता को यही कारण बता दिया।

अल्मोड़ा से जागेश्वर का रास्ता बेहद शानदार बना हुआ है। रोड पर गड्ढे तो क्या एक खरोंच भी नहीं है। सफ़ेद पट्टियों वाला शांत रास्ता, किनारों पर लाल बजरी और दोनों ओर चीड़ के जंगल किसी को भी लुभाने के लिये काफी हैं। ऐसे रास्ते पिछली बार पुरोला के आस – पास दिखे थे। अन्य फेसबुकियों की तरह लाइव आने का शौक तो हमें भी है, सो आ गये कुछ देर के लिये लाइव इन रास्तों को दिखाते हुए।

रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर दिखा। आबादी से दूर यह मंदिर आश्चर्य में डालने के लिये बहुत था। यह था दाना गोलू देवता का मंदिर। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से गोलू देवता के दो मंदिर हैं, पहला यह दाना गोलू देवता मंदिर और दूसरा चितई गोलू देवता मंदिर। कुछ आगे जाने पर चितई गोलू देवता का मंदिर भी दिखा। मंदिर के बाहर अनेकों पूजा सामग्री की दुकाने और उन पर बिक रहे घंटे भक्तों की आस्था की कहानी कह रहे थे। यहाँ पांच मिनट रुकने के पश्चात् हम चल पड़े आरतोला की ओर।

Way towards Aartola

Chitayi Golu Devta Temple
Chitayi Golu Devta Temple

आरतोला से पहले एक छोटा सा बाजार है पनुआनौला। पनुआनौला से भी जागेश्वर धाम के लिये गाड़ियाँ मिल जाती हैं… यह बात बाद में पता चली। पनुआनौला से कुछ आगे जाने पर एक रास्ता बायीं ओर जाता दिखा। यह वृद्ध जागेश्वर की ओर जा रहा था। इस यात्रा में हम वृद्ध जागेश्वर भी चलेंगे लेकिन बाद में।

कुछ देर में हम पहुँच चुके थे आरतोला मोड़ पर। गाड़ी द्वारा हमारा सफ़र यहीं तक था। यहाँ से तीन किलोमीटर पैदल ही जाना था। खैर…. 13 घंटो तक गाड़ी में बैठने के बाद अब और बैठने की हिम्मत नहीं बची थी। पैदल चलना सुकून देता। इतने लम्बे सफर के बाद विनायक भी थक चुका था। यहाँ एक ढाबे पर नाश्ता मंगवाया। नाश्ते और स्नैक्स के रूप में इस क्षेत्र में मुख्य्र रूप आलू और चने की सब्जी को छोटी – छोटी पकौड़ीयां छिड़क कर रायते के साथ परोसा जाता है। 30 रुपये में मिलने वाला यह नाश्ता पेट भरने के लिये बहुत होता है। ढाबे वाले ने बताया की यहाँ से जागेश्वर धाम तक टैक्सी भी जाती है लेकिन उसके लिये प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

हम पैदल ही चल पड़े। देवदार के वनों के बीच बने एक खूबसूरत रास्ते पर हम चल रहे थे। कुछ आगे जाकर एक पुल आता है। पुल पार कर के कुछ आगे बढ़े ही थे की जागेश्वर शैली में बना एक छोटा सा मंदिर दिखा। ऐसे मंदिर इस पूरे क्षेत्र में जगह – जगह बने हुए हैं। यहाँ कुछ देर बैठने के बाद आगे बढ़ चले। मयंक ने सलाह दी थी की दंडेश्वर मंदिर अवश्य जाना। हमारी वहाँ जाने की प्रबल इच्छा थी और मंदिर की तलाश में आगे बढ़ते जा रहे थे की तभी एक कार आकर रुकी। वैसे तो वहां कोई भी हमें देख कर समझ सकता था की हम जागेश्वर ही जा रहे हैं, उसने भी वही पूछा – कहाँ जा रहे हो ? ‘जागेश्वर’ – मैंने कहा। उसने कहा – ‘बैठों, मैं भी वहीं जा रहा हूँ।’

 

Vinayak

Way towards Jageshwar from Artola
Way towards Jageshwar from Artola

और इसी के साथ हम दंडेश्वर मंदिर समूह के दर्शन बाहर से ही करते हुए आगे निकल गए। देवदार के वनो से घिरा हुआ यह क्षेत्र बहुत सुंदर है और इन्ही खूबसूरत क्षेत्रों से होते हुए कुछ ही देर में पहुँच गये जागेश्वर धाम।

वैसे इस क्षेत्र में स्थानों के नाम एक विशेष पैटर्न पर हैं जैसे की धारानौला, पनुआनौला, आरतोला, अल्मोड़ा आदि… क्या कोई कुमांउनी मित्र इसके पीछे कारण बता सकता है ?

धाम से 250 मीटर पहले ही कार को रोकना पड़ा क्योंकि गर्मी की छुट्टियां होने के कारण यात्रियों का एक बड़ा रेला यहाँ आ धमका था और इस कारण यहाँ ट्रैफिक जाम लग गया था। स्थिती देख कर यह समझते देर नहीं लगी की यहाँ होटल महंगे मिलने वाले हैं। तीन होटल वालों ने तो यह कहते हुए मना ही कर दिया की कमरे भरे हुए हैं। आखिर एक गेस्ट हाउस वाले से बात हुई और बात 1300 रुपयों में तय हुई। वैसे कुछ लोग भीड़ से घबराते हैं और उनमें मैं भी हूँ लेकिन ऐसे स्थानों पर भीड़ का भी अपना ही आनंद है।

आज की यात्रा यहीं तक… अगला भाग पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

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संगीता
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संगीता

बहुत अच्छा नजरा है . सही टाइम पर अपने इस जगह के बारे मे पोस्ट किया है हम सब कही जाने का प्लान बना ही रहे थे सर यह का मौसम कैसा है ज्यादा गर्मी तो नही है ना

Durgesh
Guest

बहुत सही कहा मयंक जी ने की यहां यात्रा बाइक से करना अत्यंत सुहावना है। मैंने भी दिल्ली से बाबा नीम करौली की यात्रा इसी मई 2019 को की है।
Nice Blog

धन्यवाद