Kuber temple

जागेश्वर से वृद्ध जागेश्वर की यात्रा Trek to Jageshwar from Vridh Jageshwar

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यात्रा का तीसरा और अंतिम दिन

लगभग 15 घंटों की भरपूर नींद लेने के बाद आज सुबह पांच बजे नींद खुली। आज सुबह वृद्ध जागेश्वर की पैदल यात्रा पर निकलना था। पिछले दिन जिससे भी वृद्ध जागेश्वर जाने का रास्ता पूछता था वो पहले तो आरतोला से पहले वाला मोटर मार्ग ही बताता था, जब पैदल रास्ते के बारे में पूछता तो कहता – ‘हाँ… है तो… एक रास्ता, मंदिर के पीछे से, शायद बंद हो… आप चेक कर लेना’।

खैर…. हमें तो उसी पैदल रास्ते से जाना था। इसलिये सुबह साढ़े पांच बजे निकल पड़े हम तीनों पैदल ही। जागेश्वर धाम के पास पहुँचने पर एक दुकान वाले ने बताया की 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता है लेकिन उस रास्ते से कोई जाता नहीं है। वैसे पूरा रास्ता तय करने के बाद पता चला यह रास्ता लगभग 4.5 किलोमीटर लम्बा है।

Morning in Jageshwar
Morning in Jageshwar

जागेश्वर मंदिर से आगे बढ़ते ही दायीं ओर जटा गंगा पार करके कुबेर मंदिर बना हुआ है। पुरे विश्व में यह अकेला मंदिर है जो कुबेर देवता को समर्पित है। यहाँ हमें वापसी में दर्शन करने थे। दुकान वाले ने बताया था की कुबेर मंदिर से आगे ब्रह्म कुंड के पास एक पुल है, वहीं से एक पक्का रास्ता वृद्ध जागेश्वर को जाता है। ब्रह्म कुंड पहुँच कर दो रास्ते मिले, एक तो पुल पार करके दाहिनी ओर चौड़ा पक्का रास्ता जा रहा था जिस पर नैनी लिखा था और दूसरा बायीं ओर एक पतली सी लेकिन पक्की पगडण्डी ऊपर की ओर जा रही थी और ऊपर कुछ घर बने हुए थे। हमें लगा की उन घर वालों ने ही वो पगडण्डी बनायी होगी अपने घर तक जाने के लिये। ऐसा सोचते हुए हम दायीं ओर वाले रास्ते पर चल दिये।

Kuber Temple in Jageshwar
Kuber Temple in Jageshwar
(जागेश्वर धाम की यात्रा यहाँ पढ़ें)

इस रास्ते पर जा तो रहे थे लेकिन कुछ संदेह हो रहा था की वृद्ध जागेश्वर का रास्ता इतना आसान तो नहीं हो सकता। वह रास्ता आगे जाकर दो भागों में बट गया – सीधा रास्ता नैनी की ओर और एक रास्ता वहीं थोड़ी ऊंचाई पर स्थित फॉरेस्ट रेस्ट हाउस की ओर। अब कुछ समझ नहीं आ रहा था। फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में एक महिला से वृद्ध जागेश्वर का रास्ता पूछा। उसने बताया की जो बायीं ओर जाती पगडण्डी तुम छोड़ कर आये हो, वही वृद्ध जागेश्वर की ओर जाती है। कविता ने मुझे चार बाते सुना दी 🙂

Forest rest house on Naini Road
Forest rest house on Naini Road
Jageshwar view from Naini Road
Jageshwar view from Naini Road

हम इस रास्ते पर एक किलोमीटर आ चुके थे, अब वापस चल दिये। वापस पगडण्डी पर आकर ऊपर की ओर चल दिये। यह पगडण्डी खड़ी चढ़ाई लिये हुए थी। अब विश्वास हुआ की यही सही रास्ता है। ऊपर से एक मजदूर आ रहा था, उससे फिर से पूछा की क्या यही सही रास्ता है उसने कहा हाँ और बोला की 4.5 किलोमीटर की चढ़ाई है। मेरे लिये तो कोई विशेष समस्या नहीं थी लेकिन साथ में छोटा बच्चा भी तो था और उसके बारे में भी सोचना था।

खैर…. सोच लिया था की अब जाना है तो जाना है। हम ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे थे। कुछ ऊंचाई तक तो घर बने हुए थे…. लोग अपने दैनिक कार्यों में लगे हुए थे। थोड़ा आगे जाने पर आबादी वाला क्षेत्र समाप्त हो गया। अब जागेश्वर धाम भी दिखना बंद हो गया था और हम जंगल में थे। यहाँ से दूर – दूर की चोटियां दिखनी शुरू हो गयी थी। हम आगे बढ़ते जा रहे थे और बोतल का पानी भी समाप्त होता जा रहा था। विनायक की फुर्ती देख कर लग रहा था ऐसी स्पीड से तो ये एवरेस्ट चढ़ जाये।

Vinayak
Vinayak

(दिल्ली से जागेश्वर की यात्रा यहाँ पढ़ें)

पानी समाप्त होते देख चिंता बढ़ रही थी की ऐसे रास्ता कैसे पार होगा ? ये सोचते जा रहे थे…. सबसे आगे विनायक, उसके पीछे कविता और फिर मैं। तभी एक घर दिखा और घर भी कोई झोपड़ी नहीं, एक अच्छा दो मंजिला पहाड़ी शैली का मकान था जिसके तीन ओर अच्छे खेत बने हुए थे। मैं वहां पानी लेने चला गया, उन्होंने पानी तो दिया ही और साथ ही चाय के लिये भी पूछा। हम धन्यवाद कहते हुए आगे बढ़ चले।

यही है वो घर जहाँ से पानी लिया था
यही है वो घर जहाँ से पानी लिया था

View from that house
View from that house

उन लोगों ने बताया था की यही रास्ता तुम्हे वृद्ध जागेश्वर ले जायेगा, रास्ता मत छोड़ना और शॉर्टकट के चक्कर में मत पड़ना। उनकी बात मानते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। एक स्थान पर ऊंचाई पर JCB मशीन दिखी, इसे देख का अंदाज़ा लग गया की अवश्य यहाँ कहीं से कोई पक्का रास्ता आया होगा तभी यह JCB आयी। वहां पहुँच कर एक चौड़ा कच्चा रास्ता दिखा… अब चूंकि उन लोगों ने कहा था की रास्ता मत छोड़ना, यह पगडण्डी इसी चौड़े कच्चे रास्ते में मिल रही थी तो हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े। आगे बढ़ते जा रहे थे और यह रास्ता भी कहीं आगे की ओर जा रहा था।

यहाँ भी संदेह सा हो गया की कहीं हम गलत रास्ते पर तो नहीं ? नीचे थोड़ी खायीं में एक झोपड़ी दिख रही थी और वहां एक महिला बर्तन धो रही थी। आगे का रास्ता पता करने का एकमात्र सहारा वह महिला थी लेकिन वहां तक पहुँचने के लिये कम से कम 150 फ़ीट नीचे उतरना होगा और उतना ही चढ़ना भी होगा। अब जाना तो था ही, इसलिये मैं धीरे – धीरे वहां तक पहुंचा। उसने अपने बेटे को हमारे साथ भेजा रास्ता बताने के लिये। वहां ऊपर आकर उसने बताया की आप गलत रास्ते पर हो, मेरे साथ चलो। वह हमें पीछे की ओर उसी JCB की ओर ले गया वहीं से पहाड़ पर जाती एक कच्ची पगडण्डी दिखाई और कहा की थोड़ी ही आगे जाकर यह पक्की मिलेगी।

JCB in on the way
JCB in on the way

यहाँ रास्ते की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। हम आगे की ओर चल पड़े। अब यह रास्ता बेहद घने जंगल में था… कई स्थानों पर तो धूप भी नहीं पहुँच पाने के कारण अँधेरे जैसी स्थिती हो गयी थी। यहाँ जानवरों का कुछ डर सा लगा। इतना तो विश्वास था की यहाँ खतरनाक जानवर होंगे लेकिन दिखा कोई नहीं सिवाय कुछ हिरणो और लंगूरो के। यहाँ पहली बार फ़ोन में सिग्नल आया और वो भी 4G। गूगल मैप यहाँ से वृद्ध जागेश्वर की दूरी आधा किलोमीटर बता रहा था लेकिन मुझे पता था की ऐसे जंगलों में अक्सर गूगल मैप फेल हो जाता है, इसलिये इस पर अधिक भरोसा करना ठीक नहीं था।

(कैलाश मानसरोवर यात्रा गाइड यहाँ पढ़ें)

अब विनायक की हिम्मत जवाब देने लगी थी इसलिये उसे गोद में लेकर चल पड़ा। आगे बढ़ते जा रहे थे की तभी घंटे की आवाज आने लगी, अथार्त अब मंदिर समीप ही था। कुछ ही दूरी पर मंदिर दिख गया और साथ ही वापस जोश लौट आया। 4.5 किलोमीटर कड़ी पैदल चढ़ाई करके हम वृद्ध जागेश्वर तक पहुँच आये थे। यहाँ पहुँच कर कुछ निराशा हुई, धूप तो निकली थी लेकिन पहाड़ों पर धुंध छायी हुई थी। इसलिये यहाँ से हिमालय दर्शन होना संभव नहीं था। यदि धुंध नहीं होती तो यहाँ त्रिशूल, नंदा देवी जैसी चोटियाँ देखी जा सकती थी।

मंदिर में जाकर दर्शन किये। यहाँ बहुत कम श्रद्धालुओं के आने के कारण पूजा आदि कार्य पूरे विधि-विधान से पंडित जी समपन्न करवा पाते हैं। यहाँ भगवान भोलेनाथ लिंग रूप में न होकर एक शिला के रूप में हैं। कहा जाता है की जागेश्वर मंदिर समूह से पहले भोलेनाथ को यहीं पूजा जाता था। यदि मौसम साफ़ हो तो यहाँ से आप विशाल हिमालयी चोटियां देख सकते हैं।

Vridha Jageshwar Temple
Vridha Jageshwar Temple
यदि यह धुंध न होती हमें भी यहाँ से हिमालय दर्शन हो जाते
यदि यह धुंध न होती हमें भी यहाँ से हिमालय दर्शन हो जाते

दर्शनोपरांत हमारी इच्छा थी की पैदल वाले रास्ते से ही वापस जाया जाये लेकिन फिर विनायक को देखा, वो थोड़ा थक गया था और यदि अभी उसे और चलवा देता तो शायद शाम तक बीमार भी हो सकता था। मंदिर के पास से ही पनुआनौला के लिये शेयर्ड टैक्सी मिल गयी जिसने की प्रति सवारी 30 रुपये लिये। उस टैक्सी द्वारा हम 20 मिनट में पनुआनौला पहुँच गये, पनुआनौला से ही जागेश्वर की टैक्सी मिलती है।

(चार धाम यात्रा गाइड यहाँ पढ़ें)

पनुआनौला एक बड़ा बाजार है, यहाँ नाश्ता करने हम वापस एक टैक्सी द्वारा जागेश्वर की ओर बढ़ चले। 11 बजे तक हम जागेश्वर में अपने होटल में थे और अभी चेक-आउट में डेढ़ घंटा बाकी था और इस समय को मैं आराम करके बेकार नहीं करना चाहता था। इसलिये पत्नी और बेटे को वहीं आराम करता छोड़ वापस जागेश्वर की ओर बढ़ चला। एक बार फिर जागेश्वर मंदिर में दर्शन किये।

यहाँ से अगला मंदिर था कुबेर मंदिर। कुबेर मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर जटा गंगा पार करके बना हुआ है। वहां मेरे अलावा कोई भक्त नहीं था। मंदिर भले ही छोटा हो किन्तु बहुत अच्छी जगह पर बना हुआ है। यहाँ से जागेश्वर मंदिर समूह का शानदार दृश्य दिखाई देता है। मंदिर में कोई पुजारी उस समय तो नहीं थे, अपितु उसके पास ही बने चंडी मंदिर में पुजारी जी बैठे हुए थे। चंडी मंदिर में भी भगवान शिव ही विराजमान हैं। मंदिर में दर्शन किये और उसके बदले प्रशाद में मिला पंडित जी का ढेर सारा आशीवार्द जो की ठेठ कुमाउनी भाषा में था। बहुत अच्छा लगा।

Jata Ganga Jageshwar
Jata Ganga Jageshwar
Kuber devta temple
Kuber devta temple
Pandit ji at Chandika Devi temple
Pandit ji at Chandika Devi temple

यहाँ से दर्शन करके बढ़ चला वापस जागेश्वर की ओर। मंदिर से होटल की ओर थोड़ा आगे बढ़ते ही जागेश्वर का पुरातात्विक संग्रहालय है जहाँ जागेश्वर और यहाँ के अन्य मंदिर समूहों में निकली अत्यंत प्राचीन प्रतिमायें देखी जा सकती हैं।

आप यहाँ शिलाओं पर तराशे भित्तिचित्र देख सकतें है, जैसे की नृत्य करते गणेश, इंद्र या विष्णु के रक्षक देव अष्ट वसु, खड़ी मुद्रा में सूर्य, विभिन्न मुद्राओं में उमा महेश्वर और विष्णु, चामुंडा, कौमारी, कनकदुर्गा, महिषासुरमथिनी, लक्ष्मी, दुर्गा, कुछ राजसी भित्तिचित्र आदि।

यहाँ के भित्तिचित्रों पर बहुत खूबसूरत शिल्पकारी है। इन्हें कोई क्षति नहीं पहुंचाई गयी। आप इनके मूल रंग व कुशल कारीगरी बखूबी देख सकतें हैं। संग्रहालय की सर्वोत्तम कलाकृति है पौन राजा की आदमकद प्रतिकृति जो अष्टधातु में बनायी गयी है। इसे दंडेश्वर मंदिर से लाया गया है।

Jageshwar Museum
Jageshwar Museum

एक बात और, आप यहाँ फोटो नहीं ले सकते हैं।

अब यहाँ से वापसी की बारी थी लेकिन बड़ी समस्या थी आरतोला मोड़ पहुँचने में। कोई भी टैक्सी वाला आरतोला जाने को राजी नहीं था, सभी बुकिंग में जा रहे थे और बुकिंग भी आस – पास की नहीं…. कोई पिथौरागढ़, कोई नैनीताल। आखिर एक शेयर्ड टैक्सी मिल ही गयी जो की यहाँ से अल्मोड़ा के मात्र 80 रुपये प्रति सवारी ले रहा था।

हम फटाफट सवार हो कर चल पड़े अल्मोड़ा। यहाँ हमारे अतिरिक्त सभी स्थानीय लोग थे। टैक्सी में गाज़ियाबाद के दो लड़के मिले जो की अल्मोड़ा में रह कर सरकारी संस्थान से होटल प्रबंधन में स्नातक कर रहे थे। उन्होंने बताया की उनका नंबर दो शहरों मेरठ और अल्मोड़ा में आया था लेकिन उनके पिता ने मेरठ पास होने के बावजूद उन्हें अल्मोड़ा ही भेजा, कारण…. उनके पिता को डर था की बच्चे मेरठ में रह कर बिगड़ जायेंगे। खैर…यह डर और चिंता तो हर माता – पिता में होती ही है।

(यात्रा में पैसे कैसे बचायें)

आखिर हम 3:30 बजे तक अल्मोड़ा पहुँच चुके थे और अभी बस के चलने में 2 घंटे बाकी थे। अब दो घंटे कहीं तो बिताने थे। एक दुकान वाले ने नंदा देवी मंदिर जाने की सलाह दी। धारानौला से अल्मोड़ा बस स्टैंड की ओर ऊंचाई पर जाने वाले रास्ते पर कुछ आगे जाकर दायीं सीढिंया जाती हैं मंदिर की ओर। यह मंदिर यहाँ के लाला बाजार में स्थित है। हर वर्ष सितम्बर में यहाँ मेला लगता है। मंदिर एक बड़े प्रांगण में स्थित है और आस पास के कॉलेज और स्कूल के छात्रों के लिये समय बिताने का महत्वपूर्ण स्थान भी है। यदि आप भी अल्मोड़ा की यात्रा पर हैं तो एक बार नंदा देवी मंदिर अवश्य आयें।

Nanda Devi Temple Almora
Nanda Devi Temple Almora
Shiva temple in Nanda Devi temple courtyard
Shiva temple in Nanda Devi temple courtyard

मौसम अच्छा था और हवा भी तेज़ बह रही थी। हम भी जा बैठे आँगन में शिव मंदिर के बाहर छाया में और यहाँ बैठे – बैठे कब पांच बज गये पता ही नहीं चला। अब यह समय था घर वापसी का।

हम यहाँ अल्मोड़ा बस स्टैंड पर जा पहुंचे। सोचा की कुछ लेते चलें लेकिन मुझे नहीं लगता की यहाँ बाल मिठाई और चॉकलेट मिठाई के अलावा और भी कुछ मिलता है। हर दुकान पर बाल मिठाई ही दिख रही थी, यहाँ तक की एक कपड़े की दुकान वाला भी थोड़ी सी बाल मिठाई लेकर बैठा हुआ था बेचने के लिये। खैर…. मैंने चॉकलेट मिठाई ली ! चॉकलेट मिठाई का मतलब ये नहीं की ये चॉकलेट से बनी होगी। ये भी वही बाल मिठाई ही है, बस इस पर बाल मिठाई की तरह सफ़ेद दाने नहीं लगे होते।

कुछ ही देर में दिल्ली की बस चल पड़ी दिल्ली की ओर। खैरना जैसे खूबसूरत स्थान से होते हुए हम बढ़ चले अपनी उसी दुनिया की ओर जहाँ से आये थे…. इन पहाड़ों से एक वादे के साथ की अभी तो तुमसे मिले हैं, दोस्ती निभानी तो बाकी है।

अब आते हैं इस यात्रा में हुए खर्च पर। इस यात्रा में हम तीन लोग थे लेकिन मैं यहाँ केवल व्यक्तिगत खर्च का विवरण दे रहा हूँ।

व्ययरुपयों में
यातायात एवं होटल किराया
नवादा से आनंद विहार तक मेट्रो पास द्वारा यात्रा45
आनंद विहार बस टर्मिनल (दिल्ली) से अल्मोड़ा बस द्वारा500
अल्मोड़ा से आरतोला मोड़ तक टैक्सी शेयर्ड टैक्सी द्वारा यात्रा100
जागेश्वर में होटल किराया (यह पूरे कमरे का है)1300
वृद्ध जागेश्वर से पनुआनौला शेयर्ड जीप द्वारा30
पनुआनौला से जागेश्वर टैक्सी द्वारा100
जागेश्वर से अल्मोड़ा शेयर्ड टैक्सी द्वारा80
अल्मोड़ा से आनंद विहार (दिल्ली) बस द्वारा500
आनंद विहार से नवादा मेट्रो द्वारा45
भोजन350
प्रशाद और दक्षिणा (जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर)300
कुल योग3350 रुपये

यदि आप अगस्त के बाद जायें तो यही खर्च घट कर 2500 तक आ सकता है क्योंकि अभी के खर्च में 1300 रुपये का कमरा शामिल था जिसका किराया यात्रा मौसम ख़त्म होते ही 350-400 रुपये तक आ जाता है।

यात्रा यहीं तक। अगला भाग होगा जागेश्वर धाम यात्रा गाइड से सम्बंधित जो की पहली बार जा रहे यात्रियों के लिये बहुत उपयोगी होगा।

तब तक के लिये हर – हर महादेव।

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