Jageshwar Temple

जागेश्वर धाम यात्रा Trip to Jageshwar Dham

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जून की गर्मी में लू के थपेड़े खाते हुए आखिर हम दिल्ली की गर्मी से जागेश्वर के सुहावने मौसम तक पहुँच ही आये थे। वैसे दिन में तो यहाँ भी थोड़ी गर्मी ही थी लेकिन इतनी भी नहीं की पसीने से लथपथ हों। यहाँ तीन होटल वालों से बात करने के बाद आखिर चौथे होटल वाले से एक कमरा 1300 रुपयों में तय हो गया था। वैसे कमरा भी काफी अच्छा था। इस लम्बी यात्रा में थकान तो बहुत हो गयी थी और ऊपर से 2 रातों से जगे होने के कारण मुझमे 2 कदम भी चलने की हिम्मत नहीं बची थी, लेकिन हमने यही सोचा था की पहले स्नान करके भोलेनाथ के दर्शन करेंगे और उसके बाद आराम।

कमरे में पहुँच कर पता चला की अभी बिजली नहीं आ रही है और इन्वर्टर से केवल एक लाइट जल रही थी। यह देख कर कविता भन्ना गयी की एक तो 1300 रुपये का कमरा और ऊपर से बिजली भी नहीं 🙂 खैर… मुझे तो आदत है यह सब झेलने की। 10 मिनट में ही बिजली आ गयी थी।

स्नान करके मंदिर प्रांगण में जा पहुंचे। गर्मी की छुट्टियां और सोमवार का दिन होने के कारण आज यहाँ अच्छी खासी भीड़ थी। आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कुछ बाते जागेश्वर मंदिर के बारे में।

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जागेश्वर धाम

जागेश्वर धाम भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिगो में से एक है । यह ज्योतिलिंग “आठवां” ज्योतिलिंग माना जाता है | इसे “योगेश्वर” के नाम से भी जाना जाता है। ऋगवेद में ‘नागेशं दारुकावने” के नाम से इसका उल्लेख मिलता है….. दारुकावने अथार्त देवदार के वनो के बीच। जयसंहिता अथार्त महाभारत में भी इस तीर्थ की महिमा का वर्णन है।

प्राचीनकाल में गुप्त साम्राज्य के दौरान कुमाऊ क्षेत्र में कत्यूरी राजाओं का शाशन था| जागेश्वर मंदिर समूह का निर्माण भी इसी शाशनकाल में हुआ था, इस कारण इन मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक दिखाई देती है।

मंदिर के निर्माण की अवधि को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा तीन कालो में बाटा गया है – कत्युरीकाल, उत्तर कत्युरिकाल और चंद्रकाल। इन राजाओं ने देवदार के घने वनों के मध्य केवल जागेश्वर ही नहीं अपितु अल्मोड़ा जिले में 400 सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया है जिसमे की अकेले जागेश्वर में ही लगभग 124 छोटे-बड़े मंदिर है।

मंदिरों का निर्माण लकड़ी तथा सीमेंट के जगह पर पत्थरो की बड़ी-बड़ी स्लैब से किया गया है। दरवाज़े की चौखटे देवी-देवताओ की प्रतिमाओं से चिन्हित है। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है। जागेश्वर को पुराणों में “हाटकेश्वर” और भू-राजस्व लेख में “पट्टी-पारुण” के नाम से जाना जाता है। जटागंगा के तट पर समुद्रतल से लगभग 6200 फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। प्रकृति ने इस स्थान पर अपने अनमोल खजाने से सुंदरता जी भर कर लुटाई है।

कहा जाता है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है। जागेश्वर का जिक्र चीनी यात्री व्हेन त्सांग ने भी अपने यात्रा संस्मरण में किया है।

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पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। मान्यता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई इच्छायें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनायें पूरी नहीं होती। केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।

(जानकारी का स्रोत: विकिपीडिआ एवं अन्य धार्मिक पुस्तकें)

जागेश्वर मंदिर समूह में कुल 125 मंदिर हैं और इसके आस – पास भी कई मंदिर हैं जिनमे प्रमुख हैं:

महामृत्युंजय महादेव मंदिर

Mahamrityunjay Temple in jageshwar
Mahamrityunjay Temple in jageshwar

यह जागेश्वर मंदिर परिसर का सबसे प्राचीन व विशालतम मंदिर है। यह परिसर के बीचों बीच स्थित है। परिसर में प्रवेश करते ही आप इस मंदिर को अपने दायीं तरफ देख सकते हैं।

मान्यता है यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा की परंपरा सर्वप्रथम आरम्भ हुई थी। यदि आप आग्रह करें तो यहाँ के पुजारी आपको पाषाणी लिंग के ऊपर खुदी शिव की तीसरी आँख अवश्य दिखाएँगे। इस महामृत्युंजय महादेव मंदिर का शिवलिंग अति विशाल है और इसकी दीवारों पर महामृत्युंजय मन्त्र बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है। पुरातत्ववेत्ताओं ने दीवारों पर संस्कृत व ब्राह्मी भाषा में लिखे गये 25 अभिलेखों की खोज की है जो 7 वीं से 10 वीं सदी के बताये जाते है। मंदिर के शिखर पर लगी एक पाषाणी पट्टिका पर एक राजसी दम्पति द्वारा लकुलीश की पूजा अर्चना प्रदर्शित है। इसके ऊपर भगवान शिव के तीन मुखाकृतियों की शिल्पकारी की गयी है।

(आदि कैलाश यात्रा पढ़ें)

जागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर

Jageshwar jyotirling temple
Jageshwar jyotirling temple

यह जागेश्वर धाम का प्रमुख मंदिर है। यहाँ महादेव ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हैं। यहाँ आप रुद्राभिषेक भी करवा सकते हैं।

पुष्टि देवी मंदिर

यह मंदिर परिसर के दाहिनी ओर अंतिम छोर पर, महामृत्युंजय महादेव मंदिर के पीछे स्थित है। इसमें एक छोटा गलियारा है। इस मंदिर के भीतर पुष्टि भगवती माँ की मूर्ति स्थापित है।

दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर

इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति है। मूर्ति अपेक्षाकृत नवीन लगती है क्योंकि यह मूर्ति बाकि मंदिर परिसर की शिल्पकला से मेल नहीं खाती है।

नवग्रह मंदिर

यह 9 मंदिरों का एक समूह है जो समर्पित है 9 ग्रहों को। इस मंदिर समूह में सूर्य, शनि आदि के मंदिर शामिल हैं।

केदारेश्वर मंदिर

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृति और शिवलिंग जागेश्वर धाम में भी है।

लकुलीश मंदिर

लकुलीश भगवान् शिव के 28 वें अवतार माने जाते हैं। इस अवतार में भगवान् शिव के हाथ में एक छड़ी दिखाई देती है। जागेश्वर धाम में भगवान शिव के इस अवतार को दर्शाते शिलाखंड कई मंदिरों के दीवारों पर लगे हैं।

तान्डेश्वर मंदिर

लकुलीश मंदिर के बगल में एक और छोटा मंदिर है जिसके भीतर भी शिवलिंग स्थापित है। इसके शिलाखंडों पर तांडव नृत्य करते शिव की प्रतिमाएं हैं।

बटुक भैरव मंदिर

यह मंदिर परिसर के बांयी ओर स्थित पहला मंदिर है। मंदिर के प्रवेशद्वार से भीतर जाने से पहले, जहां जूता घर है, ठीक उसी के पास यह मंदिर स्थित है।

कुबेर मंदिर

कुबेर मंदिर एक पहाड़ी के ऊपर जटा गंगा के पार स्थित है। यहाँ से जागेश्वर मंदिर परिसर का शीर्ष दृश्य दिखाई पड़ता है। अन्य मंदिरों की तरह, कुबेर मंदिर के भीतर भी मुख्य देव के रूप में शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगे शिलाखण्ड पर कुबेर की प्रतिमा गड़ी हुई है। कुबेर मंदिर के पास एक छोटा सा चंडिका मंदिर है जिसके भीतर भी मुख्य देवता के रूप में शिवलिंग ही स्थापित है।

दंडेश्वर मंदिर समूह

दंडेश्वर मंदिर परिसर मुख्य जागेश्वर मंदिर से करीब 1 किलोमीटर पहले है। यहाँ एक बड़ा मंदिर व 14 अधीनस्थ मंदिर हैं। यह इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और विशालतम मंदिर है। भगवान् शिव यहाँ लिंग रुपी ना होते हुए, शिला के रूप में हैं।

एक दंतकथा के अनुसार भगवान शिव यहाँ वन में समाधिस्थ थे। उनके रूप को देख इन वनों में रहने वाले ऋषियों की पत्नियां उन पर मोहित हो गयीं। इस पर क्रोधित हो कर ऋषियों ने शिव को शिला में परिवर्तित कर दिया। इसलिए शिव यहाँ शिला रूप में स्थापित हैं। कहा जाता है मंदिर का नाम दंडेश्वर दण्ड शब्द से लिया गया है।

जागेश्वर मंदिर के पास स्थित पुरातत्व सर्वेक्षण भवन में रखी गयी पौन राजा की धातु की मूर्ति कभी इस मंदिर का भाग हुआ करती थी।

(चारधाम यात्रा गाइड निःशुल्क पढ़ें)

आगे बढ़ते हैं….

यहाँ पहुँचने के पश्चात् सबसे पहले हमें मंदिर परिसर में स्थित महामृत्युंजय मंदिर दर्शन करने थे। महामृत्यंजय मंदिर एक बड़ा मंदिर हैं। मंदिर में मुख्य पुजारी के अतिरिक्त अन्य पुजारी भी रहते हैं। यदि आप चाहें तो आप यहाँ इन पुजारियों द्वारा भगवान शिव की विशेष पूजा, रुद्राभिषेक आदि करवा सकते हैं।

महामृत्युंजय मंदिर में दर्शन के पश्चात् हम पहुंचे जागेश्वर के मुख्य ज्योतिर्लिंग में। यहाँ अपेक्षाकृत लम्बी पंक्ति थी। यहाँ भगवान भोलेनाथ के दर्शन किये। महामृत्युंजय मंदिर की भांति इस मंदिर में और लगभग सभी बड़े मंदिरों मुख्य पुजारी के साथ अन्य पुजारी भी उपलब्ध रहते हैं। मंदिर में दर्शन के पश्चात् यहाँ मंदिर परिसर में अन्य मंदिरों के भी दर्शन किये

यहाँ एक बात दुखी करने वाली थी इतने खूबसूरत स्थान में बहने वाली जटागंगा में भी लोग गंदगी फैला रहे हैं। इस बार केदारनाथ धाम, बदरीनाथ नाथ और उत्तराखण्ड के अन्य धामों से अव्यवस्था की ख़बरें आ रही हैं। पहले लगता था की इस अव्यवस्था के लिये केवल मंदिर प्रशाशन ही उत्तरदायी है लेकिन इन धामों पर आकर पता चलता है की जनता भी समस्या पैदा करने में बराबर की सहभागी है। कुछ लोग इन धामों में केवल पर्यटन की दृष्टि से ही आ रहे हैं, उन्हें कोई मतलब नहीं है धाम की पवित्रता से।

यहाँ – वहां कचरा फैलाना, बेतरतीब गाड़ियां कड़ी कर देना, स्थानीय लोगों से सही बर्ताव न करना और धार्मिक स्थल को केवल सेल्फी पॉइंट बना कर रख देना इनका प्रिय शगल है। किसी के पहनावे पर सवाल करने का हमें कोई अधिकार नहीं लेकिन कुछ लोग यहाँ कुछ भी पहन कर आ रहे हैं, शायद वे ऐसे कपड़े धारण करते समय भूल जाते हैं की वे दिल्ली की किसी पार्टी में नहीं अपितु एक धार्मिक स्थल पर जा रहे हैं। जहाँ – तहाँ खड़े होकर सिगरेट पी जा रही है।

(गोवर्धन यात्रा पढ़ें)

यह दशा केवल जागेश्वर की ही नहीं अपितु सभी धामों की है। एक वीडियो में तो यह भी दिखाया जा रहा है की लोग केदारनाथ में ढोल बजवाकर भंगड़ा कर रहे हैं और दूसरे वीडियो में लगभग 50 पर्यटक तुंगनाथ मंदिर के आँगन में जूते पहन कर सेल्फियां ले रहे हैं। ऊपर से सवाल करने पर कुछ लोग बेशर्मी से जवाब दे रहे हैं की मंदिर समिति कहाँ है? अरे मंदिर समिति की तो जो गलती है सो है, लेकिन क्या तुम्हे स्वयं कोई बुद्धि नहीं ?

यही सब देख कर कभी – कभी लगता है इन धामों को आम जनता के लिये बंद ही कर देना चाहिये, केवल साधु-संतों और बुजुर्गों को दर्शन की अनुमति हो।

खैर… मंदिर में दर्शन करके हमने भोजन किया और अपने कमरे में वापस आ गये। सोचा था की तीन – चार घंटे की नींद लेकर शाम के समय आस – पास की छोटी सी सैर पर निकलेंगे लेकिन मुझे ऐसी नींद लगी की कब शाम के सात बजे और कब रात के दस, पता ही नहीं चला। इस बीच कविता और विनायक अन्य मंदिरों में दर्शन करके वापस भी आ चुके थे।

रात दस बजे नींद खुली तो ऐसा लगा की सुबह हो चुकी है, फिर बाहर झाँक कर देखा तो पाया की दुकानों के शटर गिराये जा रहे हैं और घड़ी में रात के 10 बजे हैं।

आज की यात्रा में इतना ही। अगले भाग में ले चलेंगे आपको वृद्ध जागेश्वर….. अगले भाग के लिये यहाँ क्लिक करें।

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Durgeshadminसुप्रियासंगीता Recent comment authors
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संगीता
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संगीता

बहुत अछि और सस्ती जगह है धन्यवाद

सुप्रिया
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सुप्रिया

सर बहुत अच्छा लिखते है आप में आप के सारे ब्लॉक पड़ती हो बहुत अछि तरह से आप सभी डिटेल देते है कंफ्यूसिओं है नही होता आप का ब्लॉग पढ़ कर कही जाने में किसी तरह की कोई परेशानी नही आती, सर हमारी family ने जागेश्वर जाने का प्लान बनाया है किया आप अपना फोने नंबर हमारे साथ शेयर करंगे अगर कही कोई प्रॉब्लम अये तो किया हम आप को कॉल कर सकते है

Durgesh
Guest

Nice information….I Must visit one day.

Durgesh
Guest

Nice Information…I must visit one day.