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तुंगनाथ से चंद्रशिला और फिर गुप्तकाशी (Tungnath to Chandrashila and then Guptkashi)

चलो चंद्रशिला

बाकि दुनिया से बेखबर यहाँ बैठा हुआ था की तभी एक आवाज़ से ध्यान टूटा। ‘पांडेय जी.. चलो’, देबासीस बुला रहा था।

भोले नाथ से फ़िर मिलने का वादा करके मै अपनी मित्र मण्डली में वापस आ गया।

अब हमें अपनी अंतिम मंज़िल चंद्रशिला की ओर प्रस्थान करना था। चंद्रशिला का रास्ता तुंगनाथ मंदिर के पीछे से जाता है। आगे जाकर यह दो मार्गों में बट जाता है। सीधा मार्ग गोपेश्वर की ओर, और बाईं दिशा वाला मार्ग चंद्रशिला की ओर। यहाँ अक्सर कुछ लोगो को भ्रम हो जाता है और वो गलती से गोपेश्वर की ओर चल पड़ते हैं। अब तक हम सभी क्षमता जान चुके थे। इसलिए मैने देबासीस से कह दिया के वो बाकि लोगों को अपने साथ – साथ लेकर चले। स्वप्निल, कुशाग्र, और ज्योतिर्मय देबासीस के साथ तेजी से आगे बढ़ चले। पीछे – पीछे मै, अनित और रोहित चल दिए।

चंद्रशिला मार्ग वास्तव में बेहद कठिन है। आप ऐसा भी कह सकते हैं की मार्ग तो है ही नहीं, यह एक बेहद संकरी पगडंडी है। बर्फ़ न देख पाने का मलाल था तो कहीं न कहीं एक सुकून भी था। जिस तरह भयंकर बर्फ़बारी यहाँ होती है, शायद ही सभी चंद्रशीला जाने की हिम्मत जुटा पाते। बर्फ़बारी के बाद पथ पूर्ण रूप से गायब हो जाता है और मुसीबतें बढ़ जाती हैं। ऐसा मै फ़रवरी वाली यात्रा में देख चुका हूँ।

कुछ दूर चलने पर एक सीधी चढ़ाई आती है जिसे देख कर ऐसा लगता है की यही चंद्रशिला है, किन्तु ऐसा नहीं है। मंज़िल दूर है। उस चढ़ाई पर चढ़ कर चंद्रशिला का ध्वज दिखाई दिया, लेकिन चढ़ायी अत्यंत कठिन थी। इस स्थान पर हवा में ऑक्सीजन की भी कुछ कमी महसूस होती है। यहाँ मेरे साथियों और मुझमे अधिक दूरी नहीं थी। अब वे भी थकने लगे थे।

तुंगनाथ से चंद्रशीला की लगभग एक घंटे की कठिन यात्रा के बाद हम एक अलग ही दुनिया में थे। हम चंद्रशिला पहुँच चुके थे। स्वप्निल तो अधिक थकान होने के कारण ऊपर जाकर सो ही गया। यहाँ हमारे अतिरिक्त हरिद्वार से आये हुए दो डॉक्टर भी थे जो किसी शोध के लिए यहाँ आये थे। यहाँ पहुँचते ही सभी अपने – अपने फोटो सेशन में लग गये। माँ चंद्रशिला मंदिर के अतिरिक्त इस बार यहाँ किसी ने हनुमान जी की एक छोटी से प्रतिमा भी स्थापित कर रखी है। दाहिनी ओर थोड़ा सा उतरते ही शिवलिंग है।

चंद्रशिला की समुद्रतल से ऊंचाई 4000 मीटर है और यहाँ विशाल हिमालय की बहुत सी चोटियां सपष्ट दिखाई देती हैं। यहाँ से आप केदारनाथ, बन्दरपूँछ, त्रिशूल, चौखंबा और नंदादेवी आदि चोटियों के दर्शन कर सकते हैं। साफ मौसम और खिली धुप होने के बावज़ूद ठण्ड बहुत थी। इस ऊंचाई पर आकर आप बाकि दुनिया को भूल जाते हैं। लगता ही नहीं की इसके अतरिक्त भी एक दुनिया है जहाँ हमें बाकि जिम्मेदारियाँ निभानी हैं। उत्तराखंड को देव भूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहाँ पर आकर मैं भी अपने सीमित ज्ञान का परिचय देने लगा। कहने का अर्थ है की सबको सामने दिख रही चोटियों के बारे में बताने लगा। सभी ने तारीफ़ की।

Towards Chandrashila
रोहित और मै चंद्रशिला की ओर

चंद्रशिला मंदिर
चंद्रशिला शिखर से हिमालय का दृश्य

सबसे पीछे से – ज्योतिर्मय, देबासीस, रोहित, अनित और मै

वापसी

अब तक यहाँ बैठे – बैठे एक घंटा होने वाला था, लेकिन नीचे जाने का मन नहीं कर रहा था। फ़िर भी जाना तो था ही न। दिल्ली से निकलते समय मेरी ही योजना थी की देवरिया ताल भी जाना है, लेकिन सबकी और स्वयं की भी थकान देख कर कहीं और जाने की हिम्मत नहीं थी।  इसलिए देवरिया प्लान कैंसल। ज्योतिर्मय और स्वप्निल तेजी से नीचे की ओर बढ़ चले। बाकि के पांच धीरे – धीरे आ रहे थे। रोहित और देबासीस ने तुंगनाथ मंदिर के आस – पास कहीं बर्फ देखी थी। यह एक जमा हुआ झरना था जो की धूप न पहुँच पाने के कारण पिघला नही था। चलो, कहीं तो बर्फ मिली। सभी इतनी ही बर्फ़ देख कर बहुत खुश थे।

कुछ देर फ़ोटो सेशन के बाद हम सभी वापस चोपता की ओर बढ़ चले। अब तक स्वप्निल और ज्योतिर्मय बहुत आगे निकल चुके थे। सामने से एक परिवार आता दिखाई दिया जिसमे दो छोटे – छोटे बच्चे भी थे। ऐसे लोगो को देख कर गुस्सा ही आता है। इस कठिन यात्रा में स्वयं तो परेशान होंगे ही और बच्चों को भी करेंगे। केदारनाथ आपदा में मरने वाले लोगों में ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत थी जो छोटे – छोटे बच्चे लेकर आये थे।

कुछ शॉर्ट – कट लिए और पहुंच गये चोपता। भोजन आदि निपटा कर मैंने एक टैक्सी वाले से बात की जो 1500 रुपये में गुप्तकाशी तक चलने के लिए मान गया। वैसे तो वापसी में ऊखीमठ में रुकना ठीक होता है, लेकिन उसमे एक समस्या थी। ऊखीमठ से हरिद्वार के लिए केवल एक ही बस है जो की सुबह 5:30 बजे मिलती है। इतनी सुबह सभी के लिए उठना संभव नहीं था। इसलिए गुप्तकाशी को चुना, वहां बस अड्डा है। वैसे तो गुप्तकाशी और उखीमठ आमने – सामने वाले पहाड़ों पर ही बसें हैं लेकिन उनके बीच की दुरी लगभग 15 किलोमीटर है।

गाड़ी चोपता को पीछे छोड़ती हुई गुप्तकाशी की ओर फ़र्राटा भर रही थी। यहाँ से गुप्तकाशी लगभग 45 किलोमीटर दूर है। चोपता – उखीमठ मार्ग बहुत शानदार बना है। कहीं भी गड्ढे या स्पीड ब्रेकर नही हैं। दुगलबिट्टा, बनियाकुंड, मनसूना से होते हुए हमने उखीमठ को पार किया। यहाँ उखीमठ में भगवान ओम्कारेश्वर का मंदिर है। इसी मंदिर में भगवान केदारनाथ की शीतकालीन पूजा होती है। इसके अतिरिक्त इस मंदिर को भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध और बाणासुर की बेटी ऊषा की विवाह स्थली के रूप में भी जाना जाता है।

यहाँ से कुछ दुरी पर कुंड नामक स्थान है, जहाँ से हमने मन्दाकिनी नदी को पार कर गुप्तकाशी शहर में प्रवेश किया। मंदाकिनी वही नदी है जिसने केदारनाथ आपदा में सबसे अधिक तबाही मचाई थी। यहाँ किसी जल विद्युत् परियोजना पर काम हो रहा था। गुप्तकाशी और ऊखीमठ शहरों के बीच बहने वाली यह नदी प्रकृति की सुंदरता में चार चाँद लगा देती है। एक और गुप्तकाशी, दूसरी ओर ऊखीमठ बीच में बहती मंदाकिनी और उसके पीछे विशाल चौखंबा। जिसने यह दृश्य नहीं देखा, वह इसकी सुंदरता की कल्पना भी नहीं कर सकता।

गुप्तकाशी शहर केदारनाथ यात्रा का अहम पड़ाव है। यहाँ से गौरीकुंड की दूरी 30 किलोमीटर है। गौरीकुंड से ही केदारनाथ यात्रा आरंभ होती है। गुप्तकाशी में प्रसिद्ध गुप्तेश्वर महादेव का भी मंदिर है। इच्छा तो थी वहां भी जाने की, किन्तु एक तो और चढ़ने की हिम्मत नहीं बची थी और अब मंदिर के बंद होने का समय भी हो चला था। संध्या आरती शुरू हो चुकी थी।

हमने इस बार भी वही होटल चुना जहाँ पिछले वर्ष सितम्बर में रुके थे। 2000 रुपये में तीन कमरों की लिए बात बानी। यहाँ सभी सुविधाएँ मौजूद थी जैसे की बिजली और टी.वी. आदि। गीज़र भी था, लेकिन नहाना किसे था ?

होटल मालिक ने कह दिया था की रात 8 बजे से पहले सभी लोग नीचे आकर खाना खा लें, उसके बाद दुकान बंद हो जाएगी और हुआ भी ऐसा ही। रात 8 बजे तक पूरा गुप्तकाशी बाज़ार बंद हो चुका था। खाना खाकर कुछ देर को बाहर आग सेकने के लिए हम लोग खड़े थे। यहाँ फ़िर कुछ ऐसा हुआ की मेरी और स्वप्निल की बहस हो गयी। इसके बाद हम सभी अपने कमरों में आ चुके थे। शराब का एक दौर यहाँ भी चला और फ़िर टी.वी. पर फुटबाल मैच देखते – देखते कब नींद आ गयी पता ही नहीं लगा। यहाँ एक बात और पता चली की कुशाग्र राष्ट्रिय स्तर पर फुटबाल का खिलाड़ी रह चुका है। बहुत अच्छा लगा यह जान कर की हमारी मण्डली में नेशनल लेवल फुटबाल प्लेयर भी है।

बर्फ़ मिलने की ख़ुशी – बायें से देबासीस और कुशाग्र
चोपता से वापसी
चोपता से वापसी
Guptkashi
गुप्तकाशी

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इस यात्रा के अन्य भागों को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें।

चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 1 (तैयारी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 2 (दिल्ली से ऋषिकेश)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 3 (ऋषिकेश से चमोली)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 4 (चमोली से चोपता)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 5 (चोपता से श्री तुंगनाथ मंदिर)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 6 (तुंगनाथ से चंद्रशिला और फिर गुप्तकाशी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 7 (गुप्तकाशी से दिल्ली)

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adminप्रदीप चौहान Recent comment authors
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प्रदीप चौहान
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बहुत बढ़िया दर्शन करवाए आपने चंद्रशिला के ! साफ़ मौसम अक्सर कम ही देखने को मिलता है चंद्रशिला में, लेकिन आपकी किस्मत अच्छी थी कि आपको साफ़ मौसम मिला ! वैसे आप किस महीने में गए थे वहां ?