Tungnath temple

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चोपता से श्री तुंगनाथ मंदिर (Chopta to Shri Tungnath Temple)

अब भूख भी लग चुकी थी। कुछ परांठे निपटा कर बुग्याल ढाबे वाले को रात के खाने का ऑर्डर दे दिया। अब अँधेरा छाने लगा था और दूर पहाड़ के पीछे छिपते सूर्य की लाल किरणे विस्मित कर रही थी।

ठंड बढ़ते देख रजाइयों का सहारा लेना ही ठीक समझा। कमरे में आ गए और फ़िर खुला मदिरालय। वैसे मै नशे से कोसो दूर हूँ और चोपता जैसी जगह पर शराब का सेवन मुझे उचित भी नहीं लगता, लेकिन मै किसी को भी नाराज़ नही करना चाहता था। इसलिए मैने कुछ नही कहा। एक तरफ मेरे चारो साथीयों (स्वप्निल, देबासीस, ज्योतिर्मय और कुशाग्र) के हाँथो में पेग थे और दूसरी ओर मै चित्रगुप्त बना बैठा था। दिल्ली से अब तक कितना खर्चा हुआ, इस सबके हिसाब – किताब की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर ही थी। कुछ भूली – बिसरी यादों पर भी चर्चाओं का दौर चला।

इस बीच स्वप्निल ने ट्रेकिंग पर भी शराब ले जाने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन मुझे यह तनिक भी उचित नही लगा। वैसे यह यात्रा तीर्थ को ध्यान में रख कर नही की जा रही थी, किन्तु यह भी सत्य है की इस यात्रा का गंतव्य ही भगवान तुंगनाथ का मंदिर है। किसी भी सभ्य समाज में तीर्थ स्थलों पर शराब ले जाना उचित नही समझा जाता। मैने स्वप्निल से साफ – साफ कह दिया की शराब ऊपर नही जायेगी। इस पर उसका तर्क यह था की भगवान भी तो नशा करते थे।
‘क्या हम भगवान हैं ? उन्होने तो ज़हर भी पिया था, क्या वह भी पी सकते हो ?’….मैने कहा। इस यात्रा में विवादों की यह अगली कड़ी थी।

कुछ ही देर में ढाबे पर जा कर पेट में कूद रहे चूहों को शांत किया और फ़िर तो सोने के अतिरिक्त कुछ और काम बचा भी नही था। अगले दिन जल्दी उठ कर ट्रेकिंग भी शुरू करनी थी।

 

आज हमारी यात्रा का तीसरा दिन था

बाहर भयंकर सर्दी और अंदर रजाई के कारण बाहर निकलने का मन तो नही था, लेकिन जिस काम के लिए आये थे वह रजाई में तो संपन्न नही हो सकता था ना। देबासीस ने सुबह तीन बजे ही सबको जगा दिया था। साथियों को उस पर गुस्सा तो बहुत आया और आना भी चाहिए। ऐसी सर्दी में किसी को जल्दी उठाना माफ़ करने लायक काम नही है।

दिल्ली में स्वयं से वादा किया था की सुबह नहा कर ही यात्रा आरंभ करेंगे, लेकिन दिल तो वादा खिलाफ़ी करने को तैयार बैठा था। कोई नहीं नहाया। स्वप्निल और देबासीस बाहर चाय लेने गए तो पता लगा की रात में बाघ आया था (वैसे यहाँ लोग तेंदुए को भी बाघ ही बोलते हैं)।

Himalaya view from chopta
हिमालय दर्शन

कुछ ही देर में हम सभी यात्रा के लिए बाहर तैयार खड़े थे। अभी उजाला तो नही हुआ था, लेकिन चाँद की रौशनी ही हमारे पथ को रौशन करने वाली थी। बम – भोले का जयकारा लगाकर हम बढ़ चले अपनी मंज़िल की ओर। सभी अपनी – अपनी क्षमता के अनुसार आगे पीछे चल रहे थे। देखते ही देखते देबासीस आँखों से ओझल हो गया और पीछे – पीछे स्वप्निल भी। दोनो में एक प्रकार की होड़ थी की चंद्रशिला पर पहले कौन पहुंचेगा। अब यात्रा में हम पांच (कुशाग्र, ज्योतिर्मय, रोहित, अनित और मै) साथ – साथ चल रहे थे। मै तो वैसे भी सबसे पीछे ही चलता हूँ।

अँधेरा घना था और इस कारण जानवरो का डर भी। वैसे अँधेरे में भी हिमालय दूधिया रौशनी में नहाया हुआ स्पष्ट देखा जा सकता था। लगभग दो किलोमीटर चलने के पश्चात् जंगल पीछे छूट गये। अब हमारे सामने थे घास के विशाल मैदान और विशाल चौखम्बा। इस बीच मैं अपने साथियों को बताता भी रहा की सामने कौन से पहाड़ हैं और इस क्षेत्र की क्या विशेषतायें हैं। चौखम्बा की ऊंचाई 7138 मीटर है। यह वाक़ई बहुत विशाल है। गंगा नदी के स्त्रोतों में से एक इस पर्वत के ग्लेशियर्स भी हैं। चौखम्बा पर दाहिनी ओर से पड़ती सूर्य की रौशनी के कारण वह हिमालय राज के मुकुट के समान प्रतीत हो रहा था।

Mount Chaukhamba view from Tungnath trek
दूर कहीं चौखंबा है
यही है चौखंबा

यह यात्रा कठिन यात्राओं की श्रेणी में आती है। अब तक थकान भी होने लगी थी। सर्पीले मोड़ों को छोड़ कर अब हम सीधे उस मार्ग पर थे जो तुंगनाथ तक जाता है। कुछ ही देर में एक शोध केंद्र दिखाई दिया। यह हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय का शोध केंद्र है।अब मंदिर के पास के होटल दिखाई देने लगे थे। इसका अर्थ था की अब हम मंदिर के समीप ही हैं।

बस कुछ देर और, और हम पहुँच गए बाबा तुंगनाथ के द्वार। मंदिर से कुछ पहले एक कुंड हैं। शिवलिंग का अभिषेक इसी कुंड के जल से किया जाता है। वैसे अभी कुंड में पानी नही था।

एक बात और, जिस बात की शिकायत ऋषिकेश में थी, वही यहाँ भी थी। यहाँ भी लोगों ने कचरे का अंबार लगा रखा था, बिखरी हुई पॉलीथीन, कोल्ड ड्रिंक की बोतलें आदि आधुनिक मानव की सभ्यता – संस्कृति की गवाही दे रही थी।

मंदिर द्वार से पहले कुछ दुकाने हैं, जो की दिवाली के बाद से ही बंद पड़ी थी। इसका कारण यह है की यहाँ बाबा तुंगनाथ की यात्रा अक्षय तृतीया (अप्रैल/ मई) से लेकर भैया दूज तक चलती है। अब बर्फ पड़ने वाली है। देखते ही देखते सभी दुकाने बर्फ में समाहित हो जायेंगी। पिछली बार जब फ़रवरी में आया था, तब इन दुकानों के दरवाज़े तक बर्फ़ में छुपे हुए थे। यात्रा अब तक बहुत अच्छी रही, किन्तु एक बात का दुःख अवश्य रहा की जो बर्फ़ देखने के लिए सभी साथी यहाँ आये थे, वो अभी नही पड़ी थी। सब हमारे हाथों में तो नही होता न।

मै अभी फ़ोटोग्राफी में लगा था की मंदिर प्रांगण से दोस्तों की आवाज़ आने लगी। वे सभी पहले ही पहुँच चुके थे। मंदिर प्रांगण के द्वार पर लगे बड़े से घंटे को बजा कर मंदिर प्रवेश किया और जूते वहीं उतर दिये। वैसे इतनी भयानक ठण्ड में जूते उतारने की हिम्मत तो नही होती, किन्तु भोलेनाथ के लिए यह तो कुछ भी नहीं। मंदिर के आँगन का प्रवेश द्वार मंदिर के पीछे से है। मंदिर का गर्भ गृह तो बंद था लेकिन मेरी इच्छा कुछ समय गर्भ गृह के बाहर बिताने की थी। वहीं दरवाजे के पास बैठ गया। ऐसा बैठा की कब 15-20 मिनट बीत गये पता ही नही चला।

एक असीम सी शांति है यहाँ। मानों आप साक्षात् भोले नाथ के चरणों में बैठ कर आप उनसे बातें कर रहे हो। ऐसा कहीं नही लगा की मंदिर बंद है। अगर आप कुछ देर यहाँ बितायें तो आप को अवश्य ऐसा लगेगा की भोले नाथ स्वयं आप के सामने बैठे हैं और जो भी आपका मन उनसे कह रहा है, वे उसके जवाब दे रहे हैं।

Garbage in mountain
तथाकथित आधुनिक सभ्यता की निशानियाँ

Tungnath temple
जय हो बाबा तुंगनाथ
Small temples dedicated to Pandav in Tungnath complex
मंदिर परिसर में पांडवों को समर्पित छोटे मंदिर

 

बाबा तुंगनाथ की कथा

तुंगनाथ यात्रा की बात कर रहे हैं तो इसका इतिहास भी जानना आवश्यक है।

महाभारत युद्ध में के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। कई वर्षों तक सफ़लतापूर्व शाशन करने के बाद पांडवों और द्रौपदी ने सन्यास के लिए हिमालय प्रयाण किया। हिमालय क्षेत्र में एक स्थान पर भगवान शिव खड़े थे जिन्होनें पांडवों को देख लिया। वे जानते थे पांडवों ने कोई वर मांग लिया तो वे मना नही कर सकते, इसलिए उन्होंने भैंसे का रूप बना कर भागना शुरू कर दिया किन्तु भीम ने उन्हें देख लिया था। शिव जी का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए एक स्थान पर भीम दो चट्टानों पर पैर फैला कर खड़े हो गए। भैंसे रुपी शिव जी ऐसा देख कर धरती में समा गये। कुछ समय बाद उनके शरीर के विभिन्न अंग हिमालय में अलग – अलग स्थानों पर प्रकट हुए। उन स्थानों को पञ्च केदारों के नाम से जाना गया। इस प्रकार भगवान की पूजा रुद्रनाथ में मुख, केदारनाथ में पृष्ठ भाग, मध्य महेश्वर में उदर (पेट), कल्पेशर में जटायें और तुंगनाथ में भुजा के रूप में होती हैं।

सभी केदारों के कपाट अक्षय तृतीया (अप्रैल/ मई) पर या उसके आस – पास खुलते हैं और दीवाली के बाद भैया दूज पर बंद हो जाते हैं। इसके पश्चात् बाबा की डोलियों को नज़दीकी गांवों में ले जाया जाता है जहाँ शीत काल में उनकी पूजा होती है। इस प्रकार भगवान तुंगनाथ की पूजा शीतकाल में मक्कूमठ नामक गांव में होती है।

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इस यात्रा के अन्य भागों को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें।

चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 1 (तैयारी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 2 (दिल्ली से ऋषिकेश)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 3 (ऋषिकेश से चमोली)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 4 (चमोली से चोपता)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 5 (चोपता से श्री तुंगनाथ मंदिर)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 6 (तुंगनाथ से चंद्रशिला और फिर गुप्तकाशी)
चोपता – तुंगनाथ – चंद्रशिला यात्रा भाग 7 (गुप्तकाशी से दिल्ली)

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