Jageshwar Dham

चलो जागेश्वर धाम Let’s go to Jageshwar Dham

मैं बनारस से हूँ और पहाड़ों से विशेष अनुराग रहा है। लगभग 12-13 वर्ष पहले जागेश्वर नाथ धाम के बारे में सुना था, ये उत्तराखण्ड वाले जागेश्वर नाथ नहीं अपितु बनारस के पास चकियां क्षेत्र के जागेश्वर नाथ हैं जिनका धाम वहां की पहाड़ियों पर है। यहाँ आस – पास का क्षेत्र विशेष प्राकृतिक छटा लिये हुए है। महर्षि याग्वल्क्य की तपोभूमि और भगवान शिव के धाम जागेश्वर धाम (चकियां) जाने की बहुत इच्छा थी जो की आज भी अधूरी है।

आज से 10 वर्ष पहले तक गूगल मैप इतना अधिक लोकप्रिय नहीं हुआ था। मोबाइल में इंटरनेट तो था नहीं। इसलिये जब भी 20 रुपये घंटे वाले साइबर कैफे में जाता था तो बनारस के पास वाले जागेश्वर नाथ धाम के बारे में गूगल मैप पर अवश्य सर्च करता था लेकिन गूगल मैप उत्तराखण्ड वाले जागेश्वर धाम को दिखा देता था और मैं मैप को बंद कर देता था।

खैर…. बात आई – गई हो गयी और धीरे – धीरे दोनों जागेश्वर धामों के बारे में पता भी लग गया। शायद यह खोजी जिज्ञासा ही थी की बाबा की कृपा हुई और उन्होंने अपने जागेश्वर धाम पर बुला ही लिया…. बनारस के पास वाले नहीं उत्तराखण्ड वाले जागेश्वर पर। जून, 2019 में हुई जागेश्वर धाम की यात्रा बहुत अच्छी रही। आप मेरी जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर की यात्रा यहाँ पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

अब कुछ बात हो जाये आपकी। आप में से बहुत से घुमक्कड़ और भक्त होंगे जो उत्तराखण्ड स्थित जागेश्वर धाम की यात्रा पर जाना चाहते होंगे लेकिन इस धाम के बारे में अधिक जानकारी नहीं होने के कारण कदम घर से बाहर नहीं निकाल पा रहे होंगे। तो आइये भ्रम को दूर करते हुए चलते हैं जागेश्वर धाम की आभासी यात्रा पर।

जागेश्वर धाम अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड

Jageshwar Temple
Jageshwar Temple

जागेश्वर धाम भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिगो में से एक है । यह ज्योतिलिंग “आठवां” ज्योतिलिंग माना जाता है | इसे “योगेश्वर” के नाम से भी जाना जाता है। ऋगवेद में ‘नागेशं दारुकावने” के नाम से इसका उल्लेख मिलता है….. दारुकावने अथार्त देवदार के वनो के बीच। जयसंहिता अथार्त महाभारत में भी इस तीर्थ की महिमा का वर्णन है।

प्राचीनकाल में गुप्त साम्राज्य के दौरान कुमाऊ क्षेत्र में कत्यूरी राजाओं का शाशन था| जागेश्वर मंदिर समूह का निर्माण भी इसी शाशनकाल में हुआ था, इस कारण इन मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक दिखाई देती है।

मंदिर के निर्माण की अवधि को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा तीन कालो में बाटा गया है – कत्युरीकाल, उत्तर कत्युरिकाल और चंद्रकाल। इन राजाओं ने देवदार के घने वनों के मध्य केवल जागेश्वर ही नहीं अपितु अल्मोड़ा जिले में 400 सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया है जिसमे की अकेले जागेश्वर में ही लगभग 124 छोटे-बड़े मंदिर है।

मंदिरों का निर्माण लकड़ी तथा सीमेंट के जगह पर पत्थरो की बड़ी-बड़ी स्लैब से किया गया है। दरवाज़े की चौखटे देवी-देवताओ की प्रतिमाओं से चिन्हित है। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है। जागेश्वर को पुराणों में “हाटकेश्वर” और भू-राजस्व लेख में “पट्टी-पारुण” के नाम से जाना जाता है। जटागंगा के तट पर समुद्रतल से लगभग 6200 फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। प्रकृति ने इस स्थान पर अपने अनमोल खजाने से सुंदरता जी भर कर लुटाई है।

कहा जाता है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है। जागेश्वर का जिक्र चीनी यात्री व्हेन त्सांग ने भी अपने यात्रा संस्मरण में किया है।

पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। मान्यता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई इच्छायें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनायें पूरी नहीं होती। केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।

जागेश्वर मंदिर समूह में कुल 125 मंदिर हैं और इसके आस – पास भी कई मंदिर हैं जिनमे प्रमुख हैं:

महामृत्युंजय महादेव मंदिर

Mahamrityunjay Temple in jageshwar
Mahamrityunjay Temple in jageshwar

यह जागेश्वर मंदिर परिसर का सबसे प्राचीन व विशालतम मंदिर है। यह परिसर के बीचों बीच स्थित है। परिसर में प्रवेश करते ही आप इस मंदिर को अपने दायीं तरफ देख सकते हैं।

मान्यता है यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा की परंपरा सर्वप्रथम आरम्भ हुई थी। यदि आप आग्रह करें तो यहाँ के पुजारी आपको पाषाणी लिंग के ऊपर खुदी शिव की तीसरी आँख अवश्य दिखाएँगे। इस महामृत्युंजय महादेव मंदिर का शिवलिंग अति विशाल है और इसकी दीवारों पर महामृत्युंजय मन्त्र बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है।

पुरातत्ववेत्ताओं ने दीवारों पर संस्कृत व ब्राह्मी भाषा में लिखे गये 25 अभिलेखों की खोज की है जो 7 वीं से 10 वीं सदी के बताये जाते है। मंदिर के शिखर पर लगी एक पाषाणी पट्टिका पर एक राजसी दम्पति द्वारा लकुलीश की पूजा अर्चना प्रदर्शित है। इसके ऊपर भगवान शिव के तीन मुखाकृतियों की शिल्पकारी की गयी है।

जागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर

यह जागेश्वर धाम का प्रमुख मंदिर है। यहाँ महादेव ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हैं। भारत में भगवान् शिव के 12ज्योतिर्लिंग हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह संस्कृत श्लोक उन 12 ज्योतिर्लिंगों की व्याख्या करता है-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालमोकांरममलेश्वरम् ।
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् । सेतुबंधे तु रामेशं नागेशं दारूकावने ।
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे । हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।
ऐतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ।

सनातन धर्म को मानने वाले अपने जीवनकाल में इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन की अभिलाषा रखतें हैं। जागेश्वर स्थित ज्योतिर्लिंग नागेश अर्थात् नागों के राजा के रूप में जाना जाता हैं। शिवलिंग यहाँ नाग से अलंकृत है।

जागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, जागेश्वर परिसर के एक छोर पर स्थित है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ द्वारपाल की आदमकद मूर्ति स्थापित है। इन्हें नंदी व स्कंदी कहा जाता है। मंदिर के भीतर, एक मंडप से होते हुए आप गर्भगृह पहुंचते हैं। मार्ग में गणेश, पार्वती जैसे शिव परिवार के सदस्यों की कई मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहाँ एक बड़ा शिवलिंग देखा जा सकता है। मंदिर के पुजारी से आप असली शिवलिंग के दर्शन कराने का अनुरोध कर सकतें हैं। असली शिवलिंग दो पत्थरों की जोड़ी है, एक शिव व दूसरा शक्ति।

मान्यतानुसार शिवलिंग स्वयंभू है। इस शिवलिंग के नीचे कदाचित पानी का कोई स्त्रोत स्थित है क्योंकि यहाँ से पानी के बुलबुले निकलते दिखाई पड़ते हैं।

पुष्टि देवी मंदिर

यह मंदिर परिसर के दाहिनी ओर अंतिम छोर पर, महामृत्युंजय महादेव मंदिर के पीछे स्थित है। इसमें एक छोटा गलियारा है। इस मंदिर के भीतर पुष्टि भगवती माँ की मूर्ति स्थापित है।

दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर

इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति है। मूर्ति अपेक्षाकृत नवीन लगती है क्योंकि यह मूर्ति बाकि मंदिर परिसर की शिल्पकला से मेल नहीं खाती है।

नवग्रह मंदिर

यह 9 मंदिरों का एक समूह है जो समर्पित है 9 ग्रहों को। इस मंदिर समूह में सूर्य, शनि आदि के मंदिर शामिल हैं।

केदारेश्वर मंदिर

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृति और शिवलिंग जागेश्वर धाम में भी है।

लकुलीश मंदिर

लकुलीश भगवान् शिव के 28 वें अवतार माने जाते हैं। इस अवतार में भगवान् शिव के हाथ में एक छड़ी दिखाई देती है। जागेश्वर धाम में भगवान शिव के इस अवतार को दर्शाते शिलाखंड कई मंदिरों के दीवारों पर लगे हैं।

तान्डेश्वर मंदिर

लकुलीश मंदिर के बगल में एक और छोटा मंदिर है जिसके भीतर भी शिवलिंग स्थापित है। इसके शिलाखंडों पर तांडव नृत्य करते शिव की प्रतिमाएं हैं।

बटुक भैरव मंदिर

यह मंदिर परिसर के बांयी ओर स्थित पहला मंदिर है। मंदिर के प्रवेशद्वार से भीतर जाने से पहले, जहां जूता घर है, ठीक उसी के पास यह मंदिर स्थित है।

कुबेर मंदिर

कुबेर मंदिर एक पहाड़ी के ऊपर जटा गंगा के पार स्थित है। यहाँ से जागेश्वर मंदिर परिसर का शीर्ष दृश्य दिखाई पड़ता है। अन्य मंदिरों की तरह, कुबेर मंदिर के भीतर भी मुख्य देव के रूप में शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगे शिलाखण्ड पर कुबेर की प्रतिमा गड़ी हुई है। कुबेर मंदिर के पास एक छोटा सा चंडिका मंदिर है जिसके भीतर भी मुख्य देवता के रूप में शिवलिंग ही स्थापित है।

दंडेश्वर मंदिर समूह

दंडेश्वर मंदिर परिसर मुख्य जागेश्वर मंदिर से करीब 1 किलोमीटर पहले है। यहाँ एक बड़ा मंदिर व 14 अधीनस्थ मंदिर हैं। यह इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और विशालतम मंदिर है। भगवान् शिव यहाँ लिंग रुपी ना होते हुए, शिला के रूप में हैं।

एक दंतकथा के अनुसार भगवान शिव यहाँ वन में समाधिस्थ थे। उनके रूप को देख इन वनों में रहने वाले ऋषियों की पत्नियां उन पर मोहित हो गयीं। इस पर क्रोधित हो कर ऋषियों ने शिव को शिला में परिवर्तित कर दिया। इसलिए शिव यहाँ शिला रूप में स्थापित हैं। कहा जाता है मंदिर का नाम दंडेश्वर दण्ड शब्द से लिया गया है।

जागेश्वर मंदिर के पास स्थित पुरातत्व सर्वेक्षण भवन में रखी गयी पौन राजा की धातु की मूर्ति कभी इस मंदिर का भाग हुआ करती थी।

दिल्ली – लेह बस यात्रा
आदि कैलाश यात्रा पढ़ें

कब जायें ?

जागेश्वर धाम के कपाट पुरे वर्ष खुले रहते हैं। इसलिये आप यहाँ कभी भी जा सकते हैं। यदि आप परिवार के साथ छुट्टियों में जाना चाहते हैं तो मई – जून का समय उपयुक्त रहेगा किन्तु ध्यान रहे की मई – जून में यात्रा मौसम और छुट्टियाँ होने के कारण यहाँ भीड़ बहुत हो जाती है और मार्ग में गर्मी तो होती ही है। श्रावण में यहाँ श्रावणी मेला लगता है।

अतः आप भगवान शिव के प्रिय माह में यहाँ की यात्रा कर सकते हैं। बाबा के दर्शन के साथ ही बर्फ़बारी देखने के इच्छुक जनवरी से फ़रवरी के बीच जा सकते हैं। और यदि आप बाबा के दर्शनों के साथ – साथ शांति से कुछ समय यहाँ बिताना चाहते हैं तो सितम्बर से दिसंबर का माह सर्वोत्तम रहेगा।

कैसे पहुंचें ?

जागेश्वर धाम उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊ मंडल के अल्मोड़ा जिले में स्थित हैं। यह मुख्य अल्मोड़ा शहर से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जागेश्वर धाम पहुँचने के लिये हम आधार दिल्ली को मान कर चल रहे हैं।

रेल द्वारा

नज़दीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है जहाँ के लिये भारत के सभी बड़े शहरों से रेल सेवा उपलब्ध है। दिल्ली से काठगोदाम पहुँचने में लगभग 7 घंटे लगते हैं।
काठगोदाम पहुँच कर आप पांच किलोमीटर पहले हल्द्वानी आ जायें। हल्द्वानी से अल्मोड़ा के लिये बहुत सी टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं। यहाँ से आप अल्मोड़ा 4 घंटे में पहुँच सकते हैं। टैक्सी और बस वाले अल्मोड़ा के रोडवेज वाले स्टैंड पर उतारते हैं।

स्टैंड से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर धारानौला से जागेश्वर धाम के लिये टैक्सी (शेयर्ड भी) मिल जाती है। ज़्यादातर शेयर्ड टैक्सियां जागेश्वर मंदिर तक नहीं जाती हैं, वे आपको मंदिर से 3 किलोमीटर पहले आरतोला मोड़ पर उतार देंगी। आरतोला मोड़ से आपको जागेश्वर मंदिर के लिये शेयर्ड और बुकिंग वाली टैक्सी मिल जायेगी। वैसे इस 3 किलोमीटर के मार्ग पर गाड़ियां कम ही चलती हैं। इसलिये यदि आप परिवार के साथ नहीं हैं तो पैदल ही चल दें।

सड़क मार्ग

यदि आप अपने वाहन से जा रहे हैं तो दिल्ली – हापुड़ – मुरादाबाद – रामपुर – रुद्रपुर – हल्द्वानी – काठगोदाम – भीमताल – भोवाली – सुयालबारी होते हुए अल्मोड़ा पहुँच सकते हैं। दिल्ली से अल्मोड़ा पहुँचने में 11 से 12 घंटे लगते हैं। अल्मोड़ा पहुंचकर वहां से अल्मोड़ा – पिथौरागढ़ मार्ग पर गाड़ी दौड़ा दें। पनुआनौला से अगला छोटा से क़स्बा है आरतोला जहाँ से एक रास्ता बायीं ओर (नीचे की ओर) जा रहा है। वही मार्ग धाम तक ले जायेगा।

यदि आप सार्वजानिक परिवहन द्वारा जा रहे हैं तो दिल्ली से अल्मोड़ा की सीधी बस पकड़ सकते हैं। दिल्ली (आनंद विहार) से अल्मोड़ा के लिये दो बसे हैं जो की रात में 8 बजे और 9 बजे चलती हैं। ये आप को 11 घंटे में अल्मोड़ा पहुंचा देंगी। अल्मोड़ा बस स्टैंड से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर धारानौला से जागेश्वर धाम के लिये टैक्सी (शेयर्ड भी) मिल जाती है।

ज़्यादातर शेयर्ड टैक्सियां जागेश्वर मंदिर तक नहीं जाती हैं, वे आपको मंदिर से 3 किलोमीटर पहले आरतोला मोड़ पर उतार देंगी। आरतोला मोड़ से आपको जागेश्वर मंदिर के लिये शेयर्ड और बुकिंग वाली टैक्सी मिल जायेगी। वैसे इस 3 किलोमीटर के मार्ग पर गाड़ियां कम ही चलती हैं। इसलिये यदि आप परिवार के साथ नहीं हैं तो पैदल ही चल दें।

वायु मार्ग

नज़दीकी हवाई अड्डा पंत नगर में है जो की यहाँ से 116 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पंत नगर पहुँच कर वहां से जागेश्वर के लिये टैक्सी बुक कर लें यह फिर ऊपर दिये हुए सुझावों को अपनायें।

Kuber devta temple
Kuber devta temple

यात्रा पूर्व तैयारी और यात्रा के दौरान कुछ सुझाव

  • यदि आप बस द्वारा जा रहे हैं तो दिल्ली से अल्मोड़ा के जाने और आने की टिकट पहले ही ऑनलाइन बुक करवा लें अन्यथा समस्या होना पक्का है। ऑनलाइन टिकट https://utconline.uk.gov.in/ पर बुक करवाई जा सकती हैं।
  • यदि आप अपने वाहन से जा रहे हैं तो तो पहाड़ी मार्गों पर विशेष ध्यान रखें और यदि आप पहाड़ी मार्गों पर गाड़ी चलाने के अभ्यस्त नहीं तो बेहतर होगा की एक किसी स्थानीय ड्राइवर को किराये पर ले लें।
  • दिल्ली से जागेश्वर धाम की यात्रा 3 – 4 दिनों की होती है। इसलिये अपने ऑफिस में छुट्टियों के लिये अप्लाई इसी अनुसार करें।
  • पहाड़ों में AMS (Acute Mountain Sickness) की समस्या होना आम बात है। इसके लक्षण हैं बुखार, तेज़ बदन दर्द, खांसी, सर दर्द, उल्टी आदि। इसके लिये यात्रा आरंभ करने से कुछ दिन पहले शारीरिक गतिविधियों को बढ़ा दें जैसे की सुबह की सैर और कुछ व्यायाम और योग आदि।
  • यात्रा के दौरान अपना पहचान पत्र और पर्याप्त मात्रा में कैश रखें। हमेशा कैशलेस ट्रांसेक्शन और ए.टी.एम. के भरोसे रहना सही नहीं रहता। मोबाइल चार्ज करने के लिए पॉवर बैंक, और मोबाइल में पर्याप्त बैलेंस भी रखें। साथ ही आवश्यक कांटेक्ट नंबर्स किसी डायरी में लिख कर रखें।
  • जागेश्वर धाम में मोबाइल नेटवर्क नहीं आता। केवल बीएसएनएल और आईडिया का ही थोड़ा – बहुत नेटवर्क बहुत मुश्किल से आता है।
  • यदि आप मई – जून के अतिरिक्त किसी और मौसम में जा रहे हैं तो जागेश्वर धाम में रुकने के लिये ऑनलाइन होटल न बुक करें। ऑनलाइन की अपेक्षा रियल टाइम बुकिंग सबसे बेहतरीन विकल्प है और यह सस्ता भी पड़ता है।
  • मंदिर के गर्भ गृह में रुकने के लिये आपको अधिक समय नहीं मिलेगा, इसलिये जितना भी समय मिले आप अपना ध्यान शिवलिंग पर केंद्रित करें। मंदिर का प्रांगण भगवान की शरण में कुछ समय बिताने के लिये सर्वश्रेष्ठ स्थान है। एक बात और, वैसे तो मंदिर में आपको कैमरा और मोबाइल ले जाने से कोई मना नहीं करेगा लेकिन मंदिर में फ़ोन और कैमरा का इस्तेमाल न कर मंदिर की गरिमा बनाये रखें।
  • जागेश्वर धाम और उसके आस – पास बहुत से तीर्थ और दर्शनीय स्थान हैं। इसलिये क्षेत्र में कम से कम एक दिन तो रुकने का कार्यक्रम बना कर जायें। उत्तराखण्ड में पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लग चुका है। यद्धपि दुकान वाले रीसाइकल्ड थैलियां देते हैं किंतु उसके भरोसे अधिक न रहें।
  • मंदिर के विभिन्न अनुष्ठानों व धार्मिक कृत्यों के निर्धारित शुल्क बाहर सूचना पट्टिका पर लिखे हुए हैं।
  • पुरातत्व सर्वेक्षण संग्रहालय शुक्रवार को छोड़कर हर दिन प्रातः 10 बजे से संध्या 5 बजे तक खुला रहता है। प्रवेश निशुल्क है।
  • नदी के किनारे टहलते हुए घने देवदार के जंगल का आनंद लिया जा सकता है जो इस मंदिर के चारों ओर फैले हुए हैं।
  • यहाँ आये हैं तो वृद्ध जागेश्वर अवश्य जायें। सड़क मार्ग लगभग 14 किलोमीटर लम्बा है। यदि पैदल जाने की इच्छा है तो जागेश्वर मंदिर के पास से ही 4.5 किलोमीटर का पैदल रास्ता है। चढ़ाई थोड़ी कठिन है।
  • मंदिर के समीप ही नैनी रोड पर कुमांऊ मंडल विकास निगम का विश्रामगृह है जहां से मंदिर का सुन्दर दृश्य दिखाई पड़ता है।
    अधिकाँश दुकानें रात 8 बजे ही बंद हो जाती हैं।

तो यह थी जागेश्वर धाम यात्रा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां जो की आपकी यात्रा को सुगम बना देंगी।

जय जागेश्वर।

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