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तीसरा दिन

सोचा था की जल्दी उठ कर गंगा स्नान करके देवप्रयाग की ओर निकल जायेंगे, पर नींद ही 7:30 बजे खुली। फटाफट हम लोग त्रिवेणी घाट पर नहाने पहुंचे। वैसे अगर किसी को हरिद्वार होते हुए ऋषिकेश आना है तो मेरा सुझाव है की स्नान त्रिवेणी पर ही करे। यहाँ नहाने का अलग ही आनंद है। नदी में पत्थर नहीं हैं और धारा का वेग भी काम है।

आरती करने के लिए पूरी एक माचिस ज्योत जलाने में फूंक दी तब जाकर ज्योत जली ! हवा काफी तेज़ थी न। त्रिवेणी घाट पर बने शिव मंदिर में शिव लिंग का जल अभिषेक करने के बाद सुबह की चाय पी और देव प्रयाग जाने के लिए ऋषिकेश बस अड्डे पर पहुंचे।

Our stay in Parmarth Niketan
परमार्थ में हमारा कमरा
Parmarth Niketan Rishikesh
सु:प्रभात परमार्थ निकेतन

अब तक बस अड्डे पर भीड़ काफी बढ़ चुकी थी। श्री केदारनाथ और श्री बद्रीनाथ जाने वाली बसें देव प्रयाग होते हुए ही जाती हैं, इसलिए सभी बसें पहले ही बुक हो चुकी थी। काफी प्रयास करने के बाद भी देव प्रयाग की बस में सीट नहीं मिली। अब शायद देव प्रयाग जाना असंभव लग रहा था। तभी चम्बा जाने वाली बस दिखी। यह हिमाचल वाला चम्बा नहीं, उत्तराखंड वाला चम्बा है। सोचा की घूमना ही तो है, देवप्रयाग नहीं तो चम्बा ही सही। मैंने सनी को चम्बा चलने के लिए राजी कर लिया। चम्बा की टिकट लेकर हम सबसे पीछे वाली सीट पर जाकर बैठ गए। लगभग 8:30 बजे बस चल पड़ी।

बस गंगोत्री – यमुनोत्री मार्ग पर बढ़ चली। पहाड़ो से ऋषिकेश शहर का शानदार दृश्य दिखाई दे रहा था। मार्च और अप्रैल में उत्तराखंड के जंगलो में भयंकर आग लगी थी जिसे काफी मशक्कत के बाद एक महीने में बुझाया जा सका। इस आग के निशान अभी भी स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

 

नरेंद्र नगर

लगभग 13 की दूरी तय करके हम लोग नरेंद्र नगर पहुंचे। यह ऋषिकेश से चम्बा के बीच अहम पड़ाव है। नरेंद्र नगर की स्थापना टिहरी गढ़वाल के महाराज श्री नरेंद्र शाह ने वर्ष 1919 में अपनी राजधानी के रूप में की थी। उन्होंने समुद्रतल से 1326 मीटर की ऊंचाई पर शिवालिक पर्वत पर स्थित ओडाथलि नामक स्थान को नरेंद्र नगर के रूप में स्थापित किया। अगर मौसम साफ हो तो यहाँ से हरिद्वार तक देखा जा सकता है। नरेंद्र नगर का ऐतिहासिक महत्व होने के साथ – साथ पौराणिक महत्व भी है। ऋषि उद्धव ने कई वर्षों तक यहाँ तपस्या की थी। ज्योतिष शास्त्र के रचियता महर्षि पराशर ने ग्रहों और तारों की स्थिति के बारें में कयी प्रयोग यहीं किये थे।

महाराज नरेंद्र शाह एक अच्छे प्रशाशक थे। इसके प्रमाण नरेंद्र नगर में सुन्दर सरकारी इमारतें हैं । उनके द्वारा बनवायी गयी कयी इमारतें जैसे हस्पताल और सचिवालय आज भी प्रयोग में हैं। यहाँ के बाजार के दोनों ओर बसी इमारतें लगभग 100 वर्ष पुरानी हैं। श्री नरेंद्र शाह के शाही निवास ‘नरेंद्रनगर पैलेस’ को आज ‘Aananda – In the Himalaya’ होटल के नाम से जाना जाता है। ‘City of Romance’ नाम का एक छोटा सा शहर भी पास ही बसाया गया है।

 

चम्बा

नरेंद्र नगर के बाजार में करीब 10 रुकने के बाद हम चल पड़े चम्बा की और। मनमोहक वादियों से होते हुए लगभग 11 बजे हम चम्बा पहुंचे। चम्बा समुद्रतल से 1600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चम्बा से ऋषिकेश की दूरी 59 किलोमीटर और मसूरी से 67 किलोमीटर है। प्रसिद्ध पर्यटक स्थल धनोल्टी की दूरी चम्बा से मात्र 42 किलोमीटर है। इस बीच सुरकंडा देवी, रानीचौरी और कानातल जैसे सुन्दर स्थानों को भी एक नज़र तो देखा ही जा सकता है। सर्दियों में बर्फ भी पड़ जाती है।

चम्बा ने प्रथम विश्व युद्ध में बहुत बलिदान दिया है। यहाँ स्थित एक गांव मंजूड़ के 480 लोग प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना के ओर से लड़े थे । प्रसिद्ध विक्टोरिया क्रॉस धारी राइफल मैन गब्बर सिंह नेगी भी चम्बा के ही रहने वाले थे। इनके सम्मान यहाँ प्रति वर्ष मेला लगता है।

चम्बा एक बेहद खूबसूरत जगह है। ऋषिकेश और चम्बा के मौसम में काफी अंतर था। मई के महीने में भी यहाँ कुछ ठण्ड थी। हमारी बस यहीं तक थी। जहाँ हम उतरे वहां से कई मार्ग अलग – अलग दिशाओं में जाते हैं। एक मार्ग मसूरी होते हुए देहरादून, दूसरा मार्ग नयी टिहरी, तीसरा मार्ग ऋषिकेश और चौथा मार्ग टिहरी झील होते हुए घनसाली जाता है। कुछ छोटे बड़े होटल और एक बड़ा सा बाजार है यहाँ। पास ही एक काफल बेचने वाली दिखी तो एक पाव काफल भी ले लिए, वो अलग बात है की बस यात्रा होने की कारण वो हमसे वो खाये नहीं गए और एक कुत्ते को खिलाने पड़े। काफल वाली से ही पता लगा की टिहरी झील यहाँ से मात्र 18 किलोमीटर दूर है। अब यहाँ तक आ गए थे तो टिहरी झील जाये बिना कैसे रह सकते थे। अभी टिहरी झील जाने वाली बस के आने में लगभग आधा घंटा था। भूख भी लग चुकी थी। इसलिए पास वाले ढाबे में जाकर थोड़ी सी पेट पूजा की।

Chamba Uttrakhand
एक नज़र चम्बा से

बहुत से लोग बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी ही देर में बस आ गयी। ढेर सारे लोगों ने हल्ला बोल दिया। धक्का – मुक्की करते हुए जैसे तैसे हम बस में घुसे। भाग्य ने साथ दिया और सबसे पीछे दो सीट भी मिल गयी। मेरे साथ ही एक अंकल जी बैठे थे। जैसे आम तौर पर हर यात्रा में होता है, अंकल जी ने हमसे हमारे बारे में, यात्रा के बारे में पुछा। हमने बताया ‘टिहरी बांध जा रहे हैं, आ जाये तो बता देना’। उन्होंने कहा ‘बांध तक तो कोई जाने भी नहीं देगा, कोटी पर उतर जाना। वहीं से झील दिखने लग जाती है, देख लेना।’ बात-चीत बढ़ी तो पता लगा की वो भी 15 साल पहले तक मेरे घर के पास ही रहते थे। ये तो पड़ोसी ही निकले, जानकर अच्छा लगा। यह बस उत्तरकाशी तक जा रही थी। उन्हें घनसाली से उतर कर अपने गांव घुत्तू तक जाना था। दिल्ली से अपना सब कुछ बेचकर गांव में ही आ बसे और एक ऑटो खरीद कर चलाने लगे। ऐसे दौर में जब पहाड़ के हर गाँव से सिर्फ पलायन हो रहा हो, एक इंसान वापस गांव में आ बसे यह कोई आम बात नहीं।

लगभग एक घंटे बाद हम लोग कोटी नाम के स्थान पर पहुँच चुके थे। कोटी एक सरकारी कॉलोनी है, लेकिन किस तरफ है यह नहीं पता लगा। यह काफी ऊंचाई पर स्थित स्थान है। इसलिए हवा में कुछ दबाव का अनुभव हुआ। मुख्य मार्ग से काफी नीचे एक छोटा सा गांव दिखा। रोड के आस पास आबादी के नाम पर केवल एक छोटा सा ढाबा और एक साइकिल पंचर बनाने वाले की दुकान थी। दूर – दूर तक कोई नहीं। चाय पीने का मन हुआ तो ढाबे पार जा बैठे। ढाबे के मालिक को हिंदी कम समझ आती थी और एक नौकर था जिसे सुनाई नहीं देता था। भूख भी लग गयी थी। दो हाफ़ प्लेट दाल चावल, आलू की पकौड़ी, तीन कप चाय और बिल मात्र 50 रुपये। मैं स्वयं हैरान था इतना सस्ता खाना देख कर। खाना भी घर जैसा ही था।

यहाँ से झील तो सामने ही दिख रही थी पर मुख्य मार्ग से काफी नीचे थी। वहां तक जाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। एक पूर्व नियोजित यात्रा ना होने के कारण, जैसे तैसे चलते जा रहे थे। जो भी नयी जगह देखी उसी ओर दौड़ पड़े। लेकिन ऐसी यात्रा का भी अलग ही आनंद है। ढाबे वाले ने ही बताया की आगे कोई गाड़ी नहीं जाती। झील के किनारे जाने के लिए एक ही रास्ता जाता था जो की लगभग 3 किलोमीटर आगे था और वहां तक पैदल ही जाना था। अब चल पड़े पैदल ही। टिहरी बांध से जुड़े हुए कुछ प्रोजेक्ट ऑफिस आस पास बने थे पर सब खाली ही थे।

 

टिहरी शहर और टिहरी झील का इतिहास

टिहरी बांध भारत में सबसे ऊँचा (260.5 मीटर) और विश्व के सबसे ऊँचे बांधो में से एक है। इसे भागीरथी नदी पर बनाया गया है। भागीरथी ही आगे चल कर देवप्रयाग में अलखनंदा से संगम करके गंगा का रूप धारण करती है। यहाँ 1000 मेगा वॉट बिजली का उत्पादन होता है। यह एक विशाल बांध है जिसके निर्माण का बहुत विरोध हुआ। विरोध का एक प्रमुख कारण था, बांध बनने के कारण होने वाला विस्थापन।

जहाँ आज 40 किलोमीटर एक दायरे में फैली हुई टिहरी झील है, वहां कभी पुराना टिहरी शहर हुआ करता था। भागीरथी और भीलांगना के संगम पर स्थित यह नगर कभी गढ़वाल राजशाही की राजधानी हुआ करता था। बांध बनने के कारण जो झील बनी उसमे यह पूरा शहर समा गया और यहाँ की लगभग दो लाख आबादी को विस्थापित होना पड़ा। विस्थापित लोगो के लिए पहाड़ की ऊंचाई पर नयी टिहरी को बसाया गया। नयी टिहरी उत्तराखंड का पहला नियोजित शहर होने के साथ साथ एक बेहद खूबसूरत शहर भी है।

लगभग 3 किलोमीटर चलने के बाद एक लाल झंडा दिखाई दिया। यहीं से एक छोटा सा रास्ता झील की ओर जा रहा था। जहाँ से रास्ता आरम्भ हो रहा था, वहीं एक होटल निर्माणाधीन था। देखने में यह किसी राजा के महल से कम नहीं था। अब तक तो बन भी गया होगा। अब उसे रास्ता कहें या एक पगडण्डी, वहीं से नीचे उतर कर हम झील की ओर चल पड़े। दूर – दूर तक कोई बसावट नहीं थी। लगभग एक किलोमीटर या उससे भी ज्यादा चलने के बाद हम झील के किनारे पहुंचे।

एक बेहद शानदार और विशाल झील है यह। किसी सागर से कम नहीं थी। उत्तराखंड सरकार ने यहाँ पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कुछ प्रयास अवश्य किये हैं, पर जितने होने चाहिए उतने नहीं। वहां पहुंचे तो देखा एक कच्चा रास्ता कहीं से आ रहा था, पर पता नहीं कहाँ से। कुछ लोग उसी और से कुछ लोग गाड़ियां लेकर आये थे। कई प्रकार के वाटर स्पोर्ट भी यहाँ आयोजित किये जाते हैं। कुछ लोग दल में और कुछ लोग अकेले ही नौकायन कर रहे थे रहे थे। कुछ लोग वाटर स्कूटर पर भी हाँथ आजमा रहे थे। गहरी और विशाल झील होने के कारण हमारी हिम्मत तो वाटर स्कूटर के लिए नहीं हुई, और बोटिंग का रेट पूछा तो रेट सुनकर हम पीछे हट गए। रेट था 900 रुपये प्रति व्यक्ति। इतना हमारा बजट नहीं था। सोचा, कभी और आएंगे। झील के ही आस पास थोड़ी चहल कदमी की।

इस झील को देख कर कोई सोच भी नहीं सकता की इस विशाल सागर के नीचे कभी गढ़वाल की शान रहा टिहरी शहर समाया हुआ है। झील में इस समय पानी अपेक्षाकृत कम था, जिसके कारण टिहरी नरेश के किले पर लगा घंटा घर और किले की कुछ ऊपरी दीवारें दिखने लगी थी। दुःख होता है ऐसा विनाश देख कर, पर किया भी क्या जा सकता है क्योंकि सभ्यता के विकास के लिए बिजली भी आवश्यक है जिसके लिए इस बांध का बनना भी आवश्यक था। बांध बनने से पहले कई वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया था की इतना विशाल बांध बनाने की बजाय छोटे – छोटे कई बांध बनाये जायें क्योंकि अगर किसी कारणवश यह बांध टूटा तो भयानक विनाश होगा। मात्र कुछ ही घंटो में ऋषिकेश और हरिद्वार शहर पूरी तरह पानी में समा जायेंगे, गंगा में भयानक बाढ़ आ जाएगी। वैसे भी चीन यहाँ से नज़दीक ही है। युद्ध काल में ऐसे बांधो को निशाना बनाया जा सकता है। दूसरे विश्व युद्ध में चीन में ऐसा हो भी चुका है। खैर… अब तो बाँध बन चुका है।

Tehri lake
टिहरी झील का पहला नज़ारा
टिहरी झील को जाने वाली पगडण्डी पास बन रहा होटल
टिहरी झील के किनारे से

हमारी मंज़िल यहीं तक थी। अब वापस जाना था। हलकी बारिश शुरू हो चुकी थी। जब वापस मुख्य मार्ग पर आये तो बस की प्रतीक्षा करने लगे। काफी देर प्रतीक्षा करने के बाद भी बस नहीं आयी तो होटल में काम कर रहे मज़दूर से पूछा। उसने बताया की यहाँ से चम्बा के लिए कोई गाड़ी नहीं मिलेगी। गाड़ी पकड़ने के लिए कंडीखाल (शायद खंडखाल) जाना पड़ेगा। वहां से गाड़ी मिलेगी जो नयी टिहरी से होते हुए चम्बा जाएगी। कंडीखाल यहाँ से चार किलोमीटर दूर था। हम पहले ही पांच किलोमीटर चल कर बुरी तरह थक चुके थे और अभी चार किलोमीटर और चलना था। अब चलने की अतिरिक्त कोई और उपाय भी तो नहीं था। इसलिए चल पड़े।

रास्ते में एक ट्रक वाले से लिफ्ट मांगी पर वो कहीं और जा रहा था। थके हारे कंडीखाल पहुंचे तो देखा की कुछ और लोग गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। टिहरी बांध तक जाने का मुख्य द्वार भी यहीं है। पास ही एक शिव मंदिर में जाकर पानी पीया। तभी एक दूध सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गयी। अब किसी और गाड़ी की प्रतीक्षा करने से बेहतर था की इसी गाड़ी में सवार हो लिया जाये। यह गाड़ी चम्बा तक जा रही थी। शाम चार बजे तक हम चम्बा पहुंचे और वहां से ऋषिकेश जाने वाली शेयर्ड टैक्सी में बैठ गये। ऋषिकेश पहुंचे तो शाम के छः बज चुके थे। आज ही दिल्ली के लिए वापसी करनी थी। इसीलिए शीघ्र ही सामान समेट कर चल पड़े अपनी प्यारी दिल्ली की ओर……

Towards Kandikhal
कंडीखाल की ओर

बस यहीं तक थी यह यात्रा। जहाँ जाना था वहां तो नहीं जा पाये, पर जहाँ गए वह भी किसी से कम नहीं। आप अपने विचार और सुझाव नीचे दिए कमेंट बॉक्स में साझा कर सकते हैं।

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