गंगोत्री यात्रा से जुड़ी आवश्यक जानकारियाँ (Important information related with Gangotri trip)

पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष यात्रायें तो अधिक हुई लेकिन लेखन कार्य कम ही हुआ, पिछले एक महीने में तो बिलकुल भी नहीं। कभी समय की कमी तो कभी इच्छा की। अप्रैल में सांकरी यात्रा के बाद लगभग खाली सा ही बैठा हुआ था और नयी राहें भी नहीं सूझ रही थी, लेकिन दिल में तो एक छोटा सा घुमक्कड़ हमेशा ही रहता है और मानसून आते ही उसने उछलना शुरू कर दिया।

तो इस बार जो यात्रा हुई वह थी एक परिवार की दिल्ली से गंगोत्री तक की यात्रा । वैसे में पिछले वर्ष भी गंगोत्री यात्रा पर गया था। इस यात्रा पर मैंने दो पोस्ट लिखने का निर्णय लिया है। पहली पोस्ट में गंगोत्री धाम के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ जैसे की कैसे पहुंचे, कहाँ ठहरें, किस मौसम में जायें, आवश्यक सावधानियाँ आदि।

दूसरी पोस्ट में मेरा निजी अनुभव होगा जिसमें मैं आपको बताऊंगा मानसून के मौसम में हमारे परिवार द्वारा गंगोत्री तक की मानसून में की गयी यात्रा का अनुभव। इस परिवार में 3 वर्षीय बच्चे से लेकर 68 वर्षीय वृद्ध तक के लोग शामिल हैं। जब हर ओर से बाढ़ की ख़बरें आ रही हों, पहाड़ों से बादल फटने और भूस्खलन की डरावनी ख़बरें न्यूज़ एंकर चीख – चीख कर सुना रहे हों, ऐसे मौसम में पहाड़ों की ख़ूबसूरती का आनंद लेने हम कैसे पहुँचे ? यह सब आपको दूसरी पोस्ट में पढ़ने को मिलेगा।

इस पोस्ट में आपको तस्वीरों की कमीं विशेष रूप से खलेगी, लेकिन आगे की पोस्ट भरपूर तस्वीरों के साथ प्रकाशित की जायेगी।

अधिक समय न लेते हुए शुरू करते हैं गंगोत्री धाम पर लेखा – जोखा।

 

गंगोत्री धाम की महिमा और पौराणिक महात्मय

पुराणों में गंगा से जुड़ी दो कहानियाँ मुख्य रूप से वर्णित हैं। पहली कहानी के अनुसार नारायण के वामन अवतार द्वारा महाराज बलि के बंधन से संसार को मुक्त करने के उपरांत ब्रह्म देव ने नारायण के चरणों को धोया और उसके बाद उस जल को कमंडल में भर लिया। दूसरी कहानी के अनुसार महादेव ने ब्रह्म देव और नारायण के समक्ष जब राग ‘रागिनी’ गाया तो राग के प्रभाव से नारायण को पसीना आने लगा जिसे ब्रह्म देव ने अपने कमंडल में धारण कर लिया। इसी कमंडल के जल से गंगा की उत्त्पत्ति हुई और वे स्वर्ग में रहने लगी।

पृथ्वी पर गंगा का अवतरण राजा भागीरथ के प्रयासों द्वारा संभव हुआ। सूर्यवंश में एक प्रतापी राजा सगर हुए जिन्होंने विश्व विजय के लिए अश्वमेघ यज्ञ किया (जिसमें यज्ञ करने वाले राजा द्वारा छोड़ा गया घोड़ा यदि निर्बाध वापस आ जाता है तो वह सारा क्षेत्र यज्ञ करने वाले का हो जाता है)। इस कारण देवराज इंद्र को अपनी सत्ता पर संकट का अनुभव होने लगा और उन्होंने उस घोड़े को कपिल ऋषि के आश्रम बांध दिया। जब राजा सगर के 60000 पुत्र घोड़े को ढूंढते हुए पहुंचे तो उसे कपिल ऋषि के आश्रम में बंधा देख कर उन्होंने ऋषि के साथ दुर्वव्यवहार किया। जिससे कुपित होकर उन्होंने श्राप द्वारा सभी पुत्रों भस्म दिया। क्षमा याचना करने पर उन्होंने राजा सगर को बताया की इन सभी को मुक्ति तभी मिलेगी जब गंगा जल में अस्थियों की राख विसर्जित की जायेगी। सगर के कई वंशजों द्वारा आराधना करने पर भी गंगा ने अवतरित होना अस्वीकार कर दिया।

अंत में राजा सगर के वंशज राजा भागीरथ ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये 5500 वर्षों तक घोर तप किया। उनकी भक्ति से खुश होकर देवी गंगा ने पृथ्वी पर आकर उनके शापित पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति देना स्वीकार कर लिया। देवी गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के वेग से भारी विनाश की संभावना थी और इसलिये भगवान शिव को राजी किया गया कि वे गंगा को अपनी जटाओं में बांध लें। गंगोत्री ही वह स्थान है जहाँ महादेव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया था। (गंगोत्री का अर्थ होता है गंगा उतरी अर्थात गंगा नीचे उतर आई इसलिये यह स्थान का नाम गंगोत्री पड़ा)।

भागीरथ ने तब गंगा को उस जगह जाने का रास्ता बताया जहां उनके पूर्वजों की राख पड़ी थी और इस प्रकार उनकी आत्मा को मुक्ति मिली।इसके पश्चात् राजा भागीरथ गंगा जी का पथ प्रदर्शन करते हुए कलकत्ता तक चले और उनके पीछे पीछे गंगा जी भी गयी। इस प्रकार गंगोत्री से गंगा सागर (कलकत्ता) तक के क्षेत्र को गंगा नदी का आशीवार्द मिला।

बर्फीली नदी गंगोत्री के मुहाने पर, शिवलिंग चोटी के आधार स्थल पर गंगा पृथ्वी पर उतरी जहां से उसने 2,480 किलोमीटर गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक की यात्रा शुरू की। इस विशाल नदी के उद्गम स्थल पर इसका नाम भागीरथी है जो उस महान तपस्वी भागीरथ के नाम पर है । देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलने पर इसका नाम गंगा हो गया।

तो यह तो था गंगोत्री धाम से जुड़ा पौराणिक महात्मय। अब आगे बढ़ते हैं।

गंगोत्री धाम उत्तराखण्ड राज्य के उत्तरकाशी जिले में स्थित है। ज्ञात हो की उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। इसलिये गंगोत्री धाम को उत्तरकाशी शहर में स्थित न समझें। उत्तरकाशी शहर से गंगोत्री धाम की दूरी 100 किलोमीटर है। गंगा का उद्गम स्थल गोमुख है जिसकी दूरी गंगोत्री से 18 किलोमीटर है। किंतु हमेशा से ऐसा नहीं था, पहले गोमुख गंगोत्री धाम के पास ही था लेकिन पर्यावरण में बदलाव के कारण गोमुख खिसकते हुए 18 किलोमीटर पीछे चला गया और आज भी इसका खिसकना जारी है।

गंगोत्री मंदिर का इतिहास वैसे तो लगभग 700 वर्ष पुराना है किन्तु वर्तमान मंदिर का निर्माण गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं सदी में करवाया और 20 सदी में जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने इसका जीर्णोंद्वार करवाया। अमर सिंह थापा ने ही यहाँ मुखबा गाँव के पुजारियों को पंडों के रूप में यहाँ नियुक्त किया। इससे पूर्व टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे।

वर्ष 1980 तक मोटर न होने के कारण तीर्थ यात्री उत्तरकाशी से ही 100 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके गंगोत्री तक पहुँचते थे। 1980 में मोटर मार्ग का निर्माण होते ही गंगोत्री और उसके आस – पासके क्षेत्रों में  आबादी का विकास तेज़ी से हुआ।

 

कब जायें ?

गंगोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतिया (अप्रैल अंत / मई आरंभ) को खुलते हैं और दिवाली के बाद भैया दूज को बंद हो जाते हैं। अत्यधिक बर्फ़बारी के कारण मंदिर भैया दूज से अक्षय तृतिया तक बंद रहता है। यद्धपि कपाट मई में खुल जाते हैं लेकिन मई और जून में स्कूल आदि बंद होने के कारण धाम में अत्यधिक भीड़ बढ़ जाती है जिसका परिणाम होता है – दर्शन के लिये लम्बी पंक्ति, धक्का – मुक्की, महंगे होटल और धर्मशालायें आदि। इसलिये यदि आप भीड़ – भाड़ से बचना चाहते हैं तो सितम्बर से दिवाली के बीच जायें।

लेकिन…

यदि आप पहाड़ों की चरम सुंदरता को देखना चाहते हैं तो जुलाई और अगस्त से बेहतर कुछ नहीं। आप भी सोच रहे होंगे की मैं कैसी बचकानी बातें कर रहा हूँ। अक्सर जब आप गूगल पर हिमाचल और उत्तराखण्ड के पहाड़ों की तस्वीरें सर्च करते हैं तो जो हरे – भरे और बादलों से ढके पहाड़ों की तस्वीरें आपके मोबाइल स्क्रीन पर दिखायी देती हैं, वे मानसून की ही होती हैं। मानसून में भयंकर बारिश, बाढ़ और बादल फ़टने के समाचार न्यूज़ चैनलों पर देख – देख कर आधे से अधिक पर्यटक पहाड़ों में जाते ही नहीं जिसका लाभ आप उठा सकते हैं। स्वर्ग समान बादलों से ढके पहाड़ों को देखने के लुत्फ़ के साथ सस्ते होटल और शून्य भीड़ आपकी यात्रा को बेहतरीन बना देगी। हाँ, कुछ सावधानियाँ बरतनी आवश्यक हैं और वे क्या हैं आप इस लेख में पढ़ेंगे।

 

कैसे पहुँचे ?

(यहाँ मैं आरंभ बिंदु दिल्ली को मान कर चल रहा हूँ और दिल्ली से दिल्ली यह यात्रा 4 दिनों में भली – भांति पूरी की जा सकती है )

गंगोत्री यात्रा को कुछ चरणों में पूरा करना सही रहता है। ये चरण और मार्ग हैं –
1. दिल्ली – देहरादून – उत्तरकाशी – गंगोत्री
2. दिल्ली – हरिद्वार/ ऋषिकेश – उत्तरकाशी – गंगोत्री

बेहतर होगा की आप एक मार्ग जायें और दूसरे से वापसी करें।

गंगोत्री पहुँचने के लिये सबसे पहले आपको देहरादून या ऋषिकेश / हरिद्वार पहुंचना होगा। इन शहरों से आपको उत्तरकाशी के लिये बसें/ टैक्सियां मिल जायेंगी।

पहला मार्ग

दिल्ली से देहरादून के लिये पर्याप्त मात्रा में बसें और रेलें उपलब्ध हैं लेकिन ध्यान रहे की उत्तराखण्ड में रात में बसें नहीं चलती देहरादून बस अड्डे से एक ही सरकारी बस सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर चलती है। इसलिये बेहतर होगा की आप पहले से ही उत्तरकाशी के लिये ऑनलाइन टिकट बुक करवा लें। टिकट बुक करवाने के लिये वर्तमान लिंक है https://utconline.uk.gov.in/ । निजी बस सेवायें देहरादून के परेड ग्राउंड से उपलब्ध हैं।

यदि आप देहरादून पहुँच कर रात में आराम करना चाहते हैं तो उसके लिये रेलवे स्टेशन स्थित रिटायरिंग रूम से बेहतर विकल्प कुछ और नहीं है। रिटायरिंग रूम के लिये आपका रेल द्वारा देहरादून पहुंचना आवश्यक है। बुकिंग के लिये वर्तमान लिंक है https://www.rr.irctctourism.com/#/accommodation/in/ACBooklogin । इसके अतिरिक्त होटल आदि भी उपलब्ध हैं।

यदि आपके पास समय की कमी है और आप रातों – रात उत्तरकाशी पहुंचना चाहते हैं तो इसका भी उपाय है। देहरादून बस अड्डे से तीन किलोमीटर दूर दैनिक जागरण की प्रेस स्थित है जहाँ से रात 10 बजे छोटे वाहन अखबार लेकर तमाम पहाड़ी शहरों की ओर जाते हैं। वे भी सवारियाँ बैठा लेते हैं। आप इनसे भी उत्तरकाशी पहुँच सकते हैं। यद्धपि यह तरीका उचित नहीं लेकिन एक विकल्प तो है ही।

देहरादून से उत्तरकाशी पहुँचने में 6 घंटे लगते हैं। यदि आप सुबह वाली बस पकड़ते हैं तो आप दोपहर बारह बजे तक उत्तरकाशी पहुँच जायेंगे। उस दिन आप उत्तरकाशी में ही आराम करें और अगली सुबह गंगोत्री के लिये उत्तरकाशी बस अड्डे से बस या टैक्सी स्टैंड से टैक्सी पकड़ लें। उत्तरकाशी से गंगोत्री पहुँचने में 4 घंटे लगते हैं। यदि आप गंगोत्री में रुकना चाहते हैं तो वहां बहुत से होटल और धर्मशालायें उपलब्ध हैं। अन्यथा जो बस / टैक्सी आपको गंगोत्री पहुंचायेगी वही आपको उत्तरकाशी वापस लेकर भी आयेगी।

यदि आप प्रेस वाली गाड़ी से जाते हैं तो भी ऊपर लिखा उत्तरकाशी से गंगोत्री तक का सफ़रनामा फॉलो करना होगा।

दूसरा मार्ग

दिल्ली से हरिद्वार के लिये बहुत सी रेलें और बसें उपलब्ध हैं। ऋषिकेश के लिये भी बहुत सी बसें उपलब्ध हैं लेकिन रेल केवल एक ही है। इसलिये यदि आप रेल द्वारा जा रहें हैं तो हरिद्वार ही परफ़ेक्ट है। देहरादून की तुलना में हरिद्वार और ऋषिकेश से उत्तरकाशी के लिये अधिक बसें और टैक्सियाँ उपलब्ध हैं। ध्यान दें की रात में बसें यहाँ भी नहीं चलती और प्रेस की गाड़ी भी नहीं मिलती। हरिद्वार स्टेशन पर भी रिटायरिंग रूम की सुविधा मिल जाती है। उत्तरकाशी पहुँच कर आप ऊपर दी गयी जानकारी के अनुसार गंगोत्री पहुँच सकते हैं।

इन सबके अतिरिक्त एक बस दिल्ली से भी है उत्तरकाशी के लिये जो की रात 9 बजे जाती है।

हवाई यात्रियों के लिये नज़दीकी हवाई अड्डा देहरादून में स्थित है।

 

कहाँ ठहरें ?

देहरादून और हरिद्वार रेलवे स्टेशनों पर रिटायरिंग रूम की सुविधा उपलब्ध है जिसे आप नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करके बुक कर सकते हैं।
https://www.rr.irctctourism.com/#/accommodation/in/ACBooklogin
रिटायरिंग रूम केवल रेलवे यात्रियों को ही दिया जाता है। इसके अतिरक्त बहुत से होटल और धर्मशालायें हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, उत्तरकाशी और गंगोत्री में उपलब्ध हैं।

 

यात्रा पूर्व तैयारी और यात्रा के दौरान सावधानियाँ

  1. पहाड़ों में AMS (Acute Mountain Sickness) की समस्या होना आम बात है। इसके लक्षण हैं बुखार, तेज़ बदन दर्द, खांसी, सर दर्द, उल्टी आदि। इसके लिये यात्रा आरंभ करने से कुछ दिन पहले शारीरिक गतिविधियों को बढ़ा दें जैसे की सुबह की सैर और कुछ व्यायाम और योग आदि।
  2. यदि आप दिल्ली से जा रहें हैं तो इस यात्रा में कुल 4 दिन लगते हैं। इसलिये अपने शहर से दूरी के हिसाब छुट्टियां निर्धारित करें और यदि संभव हो तो एक – दो दिन अतिरिक्त लेकर चलें।
  3. प्राइवेट मीडिया चैनल की भड़काऊ न्यूज़ पर अधिक विश्वास न करें। डीडी न्यूज़ विश्वशनीय समाचारों के लिए एक अच्छा विकल्प है।
  4. यदि पहाड़ों से अच्छी ख़बरें नहीं आ रही हैं तो यात्रा पर निकलने से पहले सम्बंधित लोकल बॉडी, सरकारी एजेंसी या वहां के किसी होटल आदि से संपर्क कर के स्थिति के बारे में जानकारी ले लेना सही रहेगा। आज कल सभी सरकारी एजेंसियों और होटल आदि के संपर्क सूत्र गूगल पर उपलब्ध हैं।
  5. यात्रा के दौरान अपना पहचान पत्र और पर्याप्त मात्रा में कैश रखें। हमेशा कैशलेस ट्रांसेक्शन और ए.टी.एम. के भरोसे रहना सही नहीं रहता। मोबाइल चार्ज करने के लिए पॉवर बैंक, और मोबाइल में पर्याप्त बैलेंस भी रखें। साथ ही आवश्यक कांटेक्ट नंबर्स किसी डायरी में लिख कर रखें।
  6. यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों के संपर्क में रहें और आगे की स्थिती की जानकारी लेते रहें। किसी भी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा की स्थिती में पुलिस का आदेश माने।
  7. पानी और हल्का – फुल्का खाने का सामान जैसे की बिस्किट, चिप्स, नमकीन आदि अपने पास अवश्य रखें। यात्रा में यदि छोटे बच्चें साथ हों तो दूध की समस्या होना स्वभाविक है। ऐसी स्थित में यदि किसी दुकान पर दूध मिल जाये तो बहुत अच्छा अन्यथा फ़्लेवर्ड मिल्क (अमूल, आनंदा आदि) भी सहायक है। इसे बच्चे पी भी लेते हैं, स्वाथ्य के लिये भी ठीक – ठाक हैं और यह लगभग सभी दुकानों पर उपलब्ध भी है। बेहतर होगा की आप 2 वर्ष से छोटे बच्चों को न ले जायें।
  8. यात्रा में तबियत बिगड़ना स्वाभाविक है। इसलिये कुछ आवश्यक दवायें अवश्य साथ रखें। जिन लोगों को बस में उलटी की समस्या है उनके लिये Avomine बहुत अच्छी टेबलेट है लेकिन विशेष बीमारी की स्थिति में पहले अपने डॉक्टर से सलाह कर लें।
  9. छाता/ रेनकोट, टॉर्च को अपने बैग में अवश्य स्थान दें।
  10. यदि आप मई / जून के अतिरिक्त किसी और महीनें में जा रहें हैं तो उत्तरकाशी या गंगोत्री के होटल ऑनलाइन न बुक करें। ऑनलाइन की अपेक्षा रियल टाइम बुकिंग सबसे बेहतरीन विकल्प है और यह सस्ता भी पड़ता है। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है।
  11. यद्धपि गंगोत्री में रात में रूकने की बहुत से लोगों की इच्छा होती है किन्तु रुकने के लिए उत्तरकाशी ही अच्छा विकल्प है। विशेष तौर पर यदि आप परिवार के साथ हैं और मानसून में जा रहें हैं तो उत्तरकाशी में ही रूकें। गंगोत्री में मौसम कभी भी ख़राब और बहुत ख़राब हो जाता है। यदि आप परिवार के साथ हैं और आपका बजट कम है तो होटल की अपेक्षा किसी धर्मशाला में रुकें ! काली कमली धर्मशाला (उत्तरकाशी) एक बहुत अच्छा विकल्प है। यह सस्ता और सुरक्षित है। साथ ही इसके कमरे और साफ़ – सफाई किसी अच्छे होटल से कम नहीं।
  12. लगातार यात्रा सहीं नहीं है। इसलिये एक दिन उत्तरकाशी में रुकने के बाद अगले दिन ही गंगोत्री की ओर प्रस्थान करें। इससे आपका शरीर भी पहाड़ी मौसम के कुछ अनुकूल हो जायेगा।
  13. गंगोत्री धाम में पूजा घाट पर ही होती है, मंदिर में नहीं। मंदिर में केवल दर्शन किये जाते हैं।
  14. गंगोत्री मंदिर और साथ ही स्थित शिव मंदिर में फोटो लेना मना है। इस नियम का पालन करें और मंदिर की गरिमा बनाये रखें।
  15. पहाड़ों में कहीं भी आने – जाने के लिये गाड़ी सुबह ही मिलती है। इसलिये रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें।
  16. उत्तराखण्ड में पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लग चुका है। यद्धपि दुकान वाले रीसाइकल्ड थैलियां देते हैं किंतु उसके भरोसे अधिक न रहें।

गंगोत्री और उत्तरकाशी के आस – पास घूमने के लिये अन्य स्थल

वैसे तो गंगोत्री और उत्तरकाशी के आस – पास प्राकृतिक स्थलों की भरमार है जिनमे से प्रमुख है गोमुख (गंगा का उद्गम स्थल), केदार ताल, नेलांग घाटी, भैरो घाटी, नंदन वन, तपोवन, दयारा बुग्याल, लेकिन यहाँ उन्हीं स्थलों का वर्णन किया जा रहा है जिन्हे आप अपनी 4-5 दिन की गंगोत्री यात्रा में कवर कर सकते हैं। इनमें से प्रमुख हैं :-

हर्षिल और मुखबा

जब आप पहली बार हर्सिल देखेंगे तो आपके दिमाग में जो पहला शब्द आयेगा वह है ‘आश्चर्यजनक’। विश्व की सबसे सुन्दर घाटियों में से एक हर्षिल किसी स्वर्ग से कम नहीं। यह गंगोत्री से 20 किलोमीटर पहले स्थित है। इसकी सुंदरता की एक झलक ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म में ‘गंगा’ के गाँव के रूप में दिखाई देती है। यह हिमाचल प्रदेश के बस्पा घाटी के ऊपर स्थित एक बड़े पर्वत की छाया में और भागीरथी नदी के किनारे एक घाटी में स्थित है। बस्पा घाटी से हर्षिल लमखागा दर्रे जैसे कई रास्तों से जुड़ा है। यह गाँव अपने प्राकृतिक सौंदर्य एवं मीठे सेब के लिये मशहूर है। हर्षिल के आकर्षण छाया युक्त सड़क, लंबे कगार, ऊंचे पर्वत, कोलाहली भागीरथी, सेबों के बागान, झरनें, सुनहले तथा हरे चारागाह आदि शामिल हैं। मुखबा भी हर्षिल के पास ही स्थित है। इसी गाँव के पुजारी गंगोत्री में पंडा हैं और शीतकाल में यहीं गंगा माँ की पूजा की जाती है।

किन्तु ध्यान रहे की हर्षिल और मुखबा घूमने के लिये आपका टैक्सी बुक करना आवश्यक है। गंगोत्री जाने वाली बस यहीं से होकर जाती है लेकिन वापसी में आपको परेशानी हो सकती है। इसलिये टैक्सी बुक कर लेना अच्छा रहता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर, उत्तरकाशी

उत्तरकाशी की एक प्रमुख पहचान यह मंदिर उत्तरकाशी बस अड्डे के पास ही स्थित है। पहाड़ी शैली में बना यह मंदिर बरबस ही ध्यान खींचता है।

मणिकर्णिका घाट

यह उत्तरकाशी का एक प्रमुख घाट है और प्रति शाम यहाँ गंगा आरती होती है।

इसके अतिरिक्त आप स्वयं एक्सप्लोर करें तो ज़्यादा अच्छा है।

इस लेख में गंगोत्री यात्रा से जुड़ी लगभग सभी जानकारियां देने का प्रयास किया गया है। यदि आपके मन में कोई प्रश्न है तो कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें या हमारे सोशल मीडिया पेज पर मैसेज कर सकते हैं। इसके अतरिक्त आप हमारे फेसबुक ग्रुप का भी हिस्सा बन सकते हैं।

यात्रा का अनुभव आप नीचे दिये गये लिंक्स पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
दिल्ली से उत्तरकाशी
उत्तरकाशी से गंगोत्री
गंगोत्री से हरिद्वार

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rajeev sharma
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rajeev sharma

me pahli bar gomukh ja reha hu kya cycle se kawar lekar aa sakta hu

Parvesh kumar
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Parvesh kumar

Gomukh phle gangotri ke pas tha ab gangotri se 18 kilomitar dur chla gya h is hisab se to ek din ganga ndi khtm hi ho jaegi ya nhi ap apne sujav de