View from Rambara bridge

केदारनाथ यात्रा सोनप्रयाग से केदारनाथ Kedarnath Trip Sonprayag to Kedarnath

केदारनाथ यात्रा Kedarnath yatra आरम्भ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। यात्रा पर निकलने से पहले सोचा था की सोनप्रयाग से स्नान करके ही आगे की यात्रा आरम्भ करेंगे लेकिन अब हम बॉलीवुड के भाई तो हैं नहीं की अपनी कमिटमेंट को अनदेखा न करें। एक तो हमारे पास कपड़े कम थे और ऊपर से मौसम बारिश वाला ही था, इसलिये जोखिम नहीं उठाया जा सकता था। सुबह रजाई से बाहर निकलते – निकलते 6 बज गए थे। मैंने बाहर जाकर देखा तो पता लगा की होटल के सामने ही केदारनाथ यात्रियों का पंजीकरण हो रहा है।

Sonprayag
Sonprayag

पंजीकरण के लिये समूह के सभी यात्रियों का होना अनिवार्य है और इधर हमें तैयार होकर बाहर निकलते – निकलते ही 7:30 बज चुके थे और तब तक य्ये लम्बी लाइन लग चुकी थी और बरसात भी शुरू हो चुकी थी। यहाँ सोनप्रयाग Sonprayag में एक बड़ा डिस्प्ले लगाया गया है जिस पर केदारनाथ धाम से सीधा प्रसारण होता रहता है। पंक्ति में लगे हुए कई बार सोचा की या पंजीकरण अनिवार्य है भी ? खैर… सुबह 9 बजे तक हमारा पंजीकरण हो चुका था और 200 रुपये वाला रेन कोट (बरसाती) खरीद कर हम सोन प्रयाग से गौरी कुण्ड के लिये निकल पड़े थे।

जागेश्वर से वृद्ध जागेश्वर की यात्रा पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

सोनप्रयाग से गौरीकुण्ड Gauri Kund की दूरी 5 किलोमीटर है और शेयर्ड टैक्सी यह सफ़र करवाती है। हम भी शेयर्ड टैक्सी द्वारा गौरीकुण्ड पहुंचे और यहीं एक ढाबे में पराठों का नाश्ता किया। गौरीकुण्ड बहुत ही छोटा बाजार है लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। यहाँ छोटे होटल भी स्थित हैं लेकिन सलाह यही दी जाती है की आप अपना ठिकाना सोन प्रयाग को बनायें। गौरीकुण्ड में गर्म पानी का कुण्ड है और मान्यता यह है की गौरी माता यहीं स्नान करके भोलेनाथ की तपस्या किया करती थी। बहुत से लोग इस कुण्ड में स्नान करते हैं। हम भी करते लेकिन शायद स्नान और हमारी यात्राओं का रिश्ता बहुत अच्छा नहीं है।

यात्रा आरम्भ

गौरी कुण्ड से ही केदारनाथ की पैदल यात्रा आरम्भ होती है और इस यात्रा आरम्भ करने में हमें दिन के 10 बज गए। आखिर यहाँ से सहारे के लिये डंडा खरीद कर भोलेनाथ का जयकारा लगाते हुए पैदल यात्रा आरम्भ कर दी। ढाबे वाले ने बताया था की लिखित रूप में यह यात्रा 16 किलोमीटर की है किन्तु वास्तव में कुल पैदल दूरी 19 किलोमीटर है और केदारनाथ पहुँचने ऐसा लगा भी की ढाबे वाले ने सही ही कहा था।

Debasis
Debasis
From left: Alok, Gauri, Vivek
From left: Alok, Gauri, Vivek

केदारनाथ यात्रा मुश्किल है और गौरी कुण्ड से बाहर निकलते ही रास्ते की चढ़ाई देख कर इस बात पर विश्वास और पक्का हो चला था। यदि आप वैष्णो देवी तीर्थ गयें हों और भैरो नाथ तक पूरी यात्रा की हो तो आपको कटरा से वैष्णों देवी तक की यात्रा और वैष्णों देवी से भैरो नाथ तक की यात्रा में अंतर पता होगा ही की भैरो नाथ जी की यात्रा बहुत कठिन है… गौरी कुण्ड से रास्ता उतना ही कठिन है। वैसा रास्ता खड़ी चढ़ाई वाला होना स्वाभाविक भी था क्योंकि गौरी कुण्ड 6502 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है और केदारनाथ 11755 फ़ीट की ऊंचाई पर। अथार्त बीच की 5253 फ़ीट की ऊंचाई हमें 19 किलोमीटर में ही नापनी थी।

देबासीस मेरे साथ पहले भी यात्राओं पर जा चुके हैं, इसलिये उनको पता है की मैं कितना धीरे चलता हूँ, लेकिन बाकियों को नहीं पता था। बाकी साथी तेज़ चल रहे थे और इसी कारण वे मेरे लिये एक स्थान पर रुक कर प्रतीक्षा करने लगे, मैंने उन्हें कह दिया की कोई भी मेरी प्रतीक्षा नहीं करेगा, सब अपनी गति से चलेंगे और अब केदारनाथ में ही मिलेंगे… और इसी के साथ गौरी कुण्ड से केदारनाथ के सफ़र में यह हमारी अंतिम भेंट थी। वे सभी आगे निकल पड़े और मैं धीरे – धीरे चल रहा था।

गौरी कुण्ड से केदारनाथ की यात्रा में कई पड़ाव आते हैं जैसे की चीरबासा हैलीपैड, जंगल चट्टी, भीमबली, भीमबली पुल / रामबाड़ा पुल, छोटा लिंचोली, लिंचोली (बड़ा लिंचोली), RK कैंप छानी, भैरो गदेरा (ग्लेशियर), केदारनाथ बेस कैंप, और फिर आता है केदारनाथ धाम।

बरसात तो सुबह सोनप्रयाग में ही शुरू हो चुकी थी जो की अभी भी जारी थी और आगे भी जारी रहने वाली थी… बीच – बीच में तेज़ हो जाती थी। चलते हुए पहला पड़ाव आया चीरबासा हैलीपैड। हैलीपैड तो यह है और इसमें कोई शक नहीं लेकिन इसकी स्थित देख कर समझ नहीं आता की क्या कोई हेलीकॉप्टर यहाँ उतर भी पायेगा। घने जंगल के किनारे पर स्थित है यह हैलीपैड। यहाँ मैं रुका नहीं और आगे बढ़ चला।

यात्रा में तीखी चढ़ाई के कारण थकान तो बहुत हो रही थी लेकिन मैंने स्वयं के लिए नियम बना लिया था की प्रति चार किलोमीटर के बाद ही बैठना है, इस बीच जहाँ भी थकान अधिक हो जाये, केवल रुक कर खड़े – खड़े सुस्ता लेना है। यह सीख मैं बाकी नए ट्रेकर्स को भी देता हूँ। वैसे यह मार्ग अप्रतिम ख़ूबसूरती से भरा हुआ है। घने जंगल के बीच ऊपर की और जाता रास्ता और अगल – बगल के पहाड़ों से गिरते छोटे – बड़े झरने, कई झरने तो इतने बड़े की रास्तों पर पानी भरा हुआ था। पहाड़ों की ऊंचाई पर घिरे हुए बादल संकेत दे रहे थे की आगे रास्ता सरल नहीं है।

धीरे – धीरे आगे बढ़ता जा रहा था। जंगल चट्टी से पहले एक छोटा सा भैरो मंदिर है, वहां ऊपर से आते 2 लोग मिले…अक्सर पहाड़ी रास्तों पर ऊपर से आते लोगों से हम पूछ लिया करते हैं की अभी कितना रास्ता बाकी है, चाहे स्वयं को भी उत्तर पता हो लेकिन मानव स्वाभाव ही कुछ ऐसा है… लेकिन यहाँ तो ये दोनों मुझसे पूछने लगे की अभी गौरी कुण्ड कितने घंटे का रास्ता है, मैंने बता दिया 2 घंटे। अब इनसे क्या पूछता 🙂

जंगल चट्टी 6-7 दुकानों का एक छोटा पड़ाव है और यह गौरी कुण्ड से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ मैंने पहला ठहराव लिया और बारिश में भीगते हुए एक बेंच पर आसान जमा लिया। रेन कोट तो था लेकिन वो भी केवल शो -पीस ही था… केदारनाथ की बारिश के सामने वह बेअसर और ऊपर से कंधे पर 10 किलो का बैग भीग कर अब अपना वजन बढ़ाने लगा था। यहाँ जंगल चट्टी में 5 मिनट बैठ कर फिर चल पड़ा अपनी मंज़िल की ओर।

Way beyond Gauri Kund
Way beyond Gauri Kund
Waterfall on the way
Waterfall on the way
Rain shed on Kedarnath trekking route
Rain shed on Kedarnath trekking route

Spot the monkey
Spot the monkey

अब पेड़ कम होने लगे थे और रास्ता एक चौड़ी और ऊँची घाटी में परिवर्तित होता जा रहा था। शायद इसीलिये इसका नाम जंगल चट्टी हो क्योंकि यहाँ से पेड़ कम हो जाते हैं। जंगल चट्टी से 2 किलोमीटर दूर है भीमबली।

साल 2013 में आयी आपदा से पहले रामबाड़ा इस मार्ग का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। जो स्थिति वैष्णों देवी की यात्रा में अर्द्धकुंआरी की है वही स्थित यहाँ रामबाड़ा की थी किन्तु उस आपदा में यह क़स्बा पूरी तरह से बर्बाद हो गया या ऐसा कहें की इसके नामों – निशान तक भी मिट गये। पहले राम बड़ा से सीधा ही रास्ता केदारनाथ तक जाता था लेकिन उस आपदा के बाद मार्ग परिवर्तित कर दिया गया है।

अब रामबाड़ा के पास बने पुल से होते हुए रास्ते को सामने वाले पहाड़ पर डायवर्ट कर दिया गया है और इसी कारण यात्रा की दूरी 14 किलोमीटर से बढ़ कर 19 किलोमीटर हो गयी है। अब यात्री उस पुल से मन्दाकिनी को पार कर सामने वाले पहाड़ पर छोटा लिंचोली और लिंचोली होते हुए केदारनाथ तक पहुँचते हैं।

2 वर्ष पहले रामबाड़ा पुल से लगभग आधा किलोमीटर पहले भीमबली में एक और पुल का निर्माण कर रास्ता सामने वाले पहाड़ पर डॉयवर्ट कर दिया गया है… वो रास्ता भी आगे जाकर रामबाड़ा पुल से आने वाले रास्ते में ही मिलता है। इसे वैकल्पिक मार्ग के रूप में निर्मित किया गया है।

भीमबली पहुँच कर मैंने भीमबली पुल और दूर दिख रहे रामबाड़ा पुल का ज़याज़ा लिया और फिर रामबाड़ा पुल से ही मन्दाकिनी नदी को पार करना उचित समझा। इसके पीछे मेरा यह तर्क था की यदि मैं भीमबली पुल से नदी पार करता हूँ तो भी मुझे फिर से एक कठिन चढ़ाई चढ़ के ऊपर तक जाना ही है और अगर रामबाड़ा पुल नदी पर करता हूँ तो भी कठिन चढ़ाई चढ़नी ही है लेकिन रामबाड़ा पुल का चुनाव करने में राहत की बात यह थी की भीमबली से रामबाड़ा पुल तक का आधा किलोमीटर रास्ता ढलान वाला है और इस ढलान के कारण थकान भी कुछ कम हो जायेगी। क्या करें दिमाग के सारे लॉजिक ऐसे ही रास्तों पर ही काम आते हैं।

भीमबली Bheembali में भी एक छोटा सा बाजार है। यहाँ से होते हुए रामबाड़ा पुल Rambara तक पहुंचा। यहां भी दो पुल हैं, एक पूल जीर्ण – शीर्ण अवस्था मैं जो की पिछले साल आयी बाढ़ के कारण नष्ट हो गया था और दूसरे पुल से आवागमन होता है… लेकिन हिलता बहुत है। इस पुल से मन्दाकिनी घाटी का जो विहंगम दृश्य दिखाई देता है उसका वर्णन करना बहुत मुश्किल है। एक ओर तो ऊंचाई से आती मन्दाकिनी… जिसका ओर – छोर ही नहीं दीखता और ऊपर से कोहरा और दूसरी ओर तेज़ी से नीचे की ओर जाती वही नदी और दोनों ओर हरे भरे पहाड़।

Rambara bridge
Rambara bridge
Old Rambara bridge
Old Rambara bridge

वैसे इस पुल को अब इस यात्रा का सबसे अहम् मोड़ माना जा सकता है क्योंकि अब तक 6 किलोमीटर की यात्रा फिर भी ठीक – ठाक थी किन्तु पुल पार करते ही सामने जो रास्ता था उसकी ऊंचाई तो गजब ही थी। ज़िग-ज़ैग मोड में तेज़ी से ऊपर की ओर जाता रास्ता जिसमें लगभग 8 मोड़ तो यहीं नीचे से ही दिख रहते थे और बाकी बादलों में छिपे हुए थे। अब पूरा रास्ता ऐसा ही मिलने वाला था… इसे तो रास्ता भी नहीं कहा जा सकता, बड़े फुट-स्टेप वाली सीढ़ियां कहना अधिक उचित रहेगा और ऊपर से तेज़ बारिश और उसमें भीगा हुआ मेरा भारी – बैग।

खैर…. जाना तो था ही.. सो चल पड़ा धीरे – धीरे। थकान तो थी इस रास्ते में किन्तु उसका एहसास नहीं था… हमारी मंज़िल तो केदारनाथ बाबा का मंदिर था लेकिन यहाँ तो ऐसा लग रहा था की हर पत्थर, हर पेड़ और हवाओं में शिव का वास है। पूरा क्षेत्र ही शिवमय है। खच्चरों के गले में बंधी घंटी की आवाज़ भी मानों केदारनाथ मंदिर की घंटियों के समान प्रतीत हो रही थी। ऐसी बारिश में यदि हमें शहर में इतनी लम्बी पैदल यात्रा करनी हो तो बुखार आना तय है और साथ – साथ कुछ अन्य बीमारियां भी बोनस में मिल सकती हैं किन्तु यहाँ तो बारिश मानों शरीर में ऊर्जा का संचार कर रही थी…. वैसे शायद भोले बाबा को पता था की मेरे जैसे बहुत से यात्री नहीं नहाने वाले इसीलिये पहले ही उन्होंने प्रकृति स्नान अच्छे से करवा दिया था।

यह रास्ता भीमबली से पहले वाले रस्ते की अपेक्षा संकरा, टूटा – फूटा और तीखी चढ़ाई वाला है और खच्चर भी इसी रास्ते से चलते हैं…अतः संभल कर चलना बहुत आवश्यक है अन्यथा खच्चर का एक धक्का आपको मन्दाकिनी से होते हुए रुद्रप्रयाग तक पहुंचा सकता है।

संगीत में बहुत शक्ति है, यह थकान भुलाने के साथ – साथ पुरे माहौल को बदलने की क्षमता रखता है। केदारनाथ फिल्म से ‘नमो – नमो’ और हंसराज रघुवंशी का भजन ‘मेरा भोला है भंडारी’ ने पूरे रास्ते में साथ दिया। आते – जाते किसी न किसी भक्त के मोबाइल या पोर्टेबल स्पीकर में ये गाने बजते सुनाई दे ही जाते थे। अच्छा ही तो है… ये गाने ही हैं जो हमारे हर पल के साथी होते हैं।

लगभग 8-10 मोड़ों की तीखी चढ़ाई के बाद मैं उस मोड़ तक पहुंचा जहाँ भीमबली Bheembali वाले पुल से आने वाला वैकल्पिक मार्ग मिल रहा था। यहाँ लगा था की चलो अब शायद रास्ता आसान मिलेगा और 100 मीटर तक यह बात सच भी थी किन्तु केवल 100 मीटर तक ही उसके बाद फिर से वैसा ही रास्ता था। बारिश और उसके कारण हर ओर इतना घाना कोहरा और बादल थे की 50 फ़ीट से आगे भी देख पाना मुश्किल था, ऐसा लग रहा था की एक अंतहीन रास्ते की ओर हम बढ़ रहे हैं। इस कोहरे में थोड़ी – थोड़ी दूरी पर दिखती स्ट्रीट लाइट्स और कहीं – कहीं दिखने वाले दूरी बताते साइनबोर्ड ही सहारा थे।

Alternative route coming from Bhimbali bridge
Alternative route coming from Bhimbali bridge

अब तक मेरे कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे और 10 किलो वाला बैग 14 किलो का हो गया था। कुछ दूर चलने के बाद छोटा लिंचोली पहुंचा और फिर वहां से लगभग 3 किलोमीटर चल कर लिंचोली (बड़ा लिंचोली) पहुंचा। लिंचोली को रामबाड़ा का विकल्प भी कहा जा सकता है। यहाँ लगभग सभी आधारभूत सुविधायें हैं जैसे की गढवाल मंडल विकास निगम (GMVN) के रेस्ट हाउस, कुछ अन्य रेस्ट हाउस, मेडिकल यूनिट, पुलिस पोस्ट, ढाबे आदि।

केदारनाथ Kedarnath में आयी आपदा के बाद सरकार ने इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया है। पूरे मार्ग पर लाइट की व्यवस्था, प्रति 3-4 किलोमीटर पर मेडिकल यूनिट, ठीक – ठाक पक्के रास्ते और उनके किनारे पर मजबूत रेलिंग, पीने के पानी की भरपूर व्यवस्था, खच्चरों के लिये पीने के पानी की व्यवस्था, वार्निंग सिस्टम, जगह – जगह लगी बेंच, जगह – जगह रेन शेड, छोटा – लिंचोली और लिंचोली में वाई – फाई जोन, और पुलिस पोस्ट यह बताने के लिये पर्याप्त है की प्रशाशन कितना गंभीर है इस क्षेत्र को लेकर।

लिंचोली में 10 मिनट विश्राम करने के बाद मैं आगे बढ़ चला। अब तक भूख भी लग चुकी थी और शाम के 5:30 भी बज चुके थे। अतः एक सुनसान से ढाबे पर पराठों का भोग लगाया और फिर आगे बढ़ा। अब वैसे बारिश तो हल्की हो चली थी लेकिन थोड़ा – थोड़ा अँधेरा भी होने लगा था। पहाड़ों का अँधेरा मुझे थोड़ा डराता है और ऊपर से मेरे साथी मुझसे काफी आगे निकल चुके थे। देखते ही देखते पूरी तरह से अँधेरा छा गया और अब केवल रास्तों पर लगी लाइट्स ही सहारा थी। रास्तों पर आवाजाही बहुत कम हो गयी थी।

खैर… मैं बढ़ता जा रहा था। अँधेरे में कुछ दूरी पर दाहिनी ओर सफ़ेद सा पहाड़ दिखा, मैं समझ गया की ये भैरो गदेरा ग्लेशियर ही होगा और था भी वही। यह एक विशाल ग्लेशियर है जो की दायीं ओर ऊपर से आ रहा है। ग्लेशियर में एक गुफा दिख रही थी जो की दिखने में ही काफी भयानक लग रही थी। उस गुफा से आने वाला पानी नीचे मन्दाकिनी में मिल रहा था।

यहाँ एक बार तो विचार किया की खच्चर का सहारा अब ले ही लिया जाये किन्तु फिर सोचा की अब मंदिर मात्र 4 किलोमीटर दूर रह गया है और उसमें भी अंतिम के 2 किलोमीटर आसान है तो खच्चर का सहारा क्यों लेना और यदि अँधेरे में उसने कहीं पटक दिया तो ? 😀

कुछ आगे बढ़ते ही पीछे से एक आवाज़ आयी। यह महाराष्ट्र से आया एक हमउम्र लड़का था। चलो.. कोई तो मिला रास्ते पर साथ देने के लिये। इन्होने बताया की ये पहली बार उत्तर भारत में आये हैं… महाराष्ट्र के पहाड़ी किलो पर खूब ट्रैकिंग की है लेकिन ट्रैकिंग क्या होती है यह केदारनाथ में ही आकर पता चला। ये शिरडी से ही चले थे लेकिन हरिद्वार में एक स्थानीय लड़का इन्हे मिल गया जो की गौरी कुण्ड तक साथ आया था और फिरहाल अब वो इनसे आगे निकल चुका है।

थोड़ा आगे बढ़ने पर एक और ग्लेशियर दिखा और यह पहले वाले से दोगुना बड़ा और भव्य था और यहीं दिखा वो नज़ारा जो अब तक केवल TV और इंटरनेट पर ही देखा था। पहली बार आकाश में गैलेक्सी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। आसमान में एक लम्बा और कुछ काम चौड़ा सा तारों का झुण्ड या कहें की तारों का बादल देख आकर अंदाज़ा लगाते देर नहीं लगी की यह गैलेक्सी है जो की इतने ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों से दिख जाती है। यहाँ DSLR कैमरा की कमी समझ आ रही थी।

यहाँ से आगे बढ़ते ही वह मोड़ नज़र आया जहाँ से रास्ता सरल होना था। अथार्त अब अंतिम के 2 किलोमीटर ही शेष थे और अब यह सीधा और कम ऊंचाई वाला रास्ता था। यह राहत की बात थी। अब हम पूरे जोश से चल पड़े। एक किलोमीटर पार करते ही केदारनाथ बेस कैंप आ गया जो की इस यात्रा का अंतिम पड़ाव था। यहां बहुत से अस्थाई टेंट और ढांचे बने हुए थे। इनको देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है की मई – जून में यहाँ कितनी भीड़ हो जाती होगी।

यहीं से केदारनाथ मंदिर Kedarnath temple की पहली झलक दिखाई दी। मंदिर पर जलती लाइट और लाउडस्पीकर से आती आवाज़ का स्पष्ट संकेत था की हम मंदिर के समीप हैं। यहाँ मोबाइल सिग्नल आने लगे थे। देबासीस जो की अन्य साथियों सहित धाम पर पहुँच चुके थे, उनकी 2 मिस्ड कॉल दिखी। उनको कॉल करके सूचित किया की मैं पहुँचने वाला हूँ। केदारनाथ धाम से ठीक पहले एक हैलीपैड है जहाँ एक क्रैश हेलीकॉप्टर पड़ा हुआ था।

यहाँ से सरस्वती नदी को पार करके केदारनाथ धाम के गोल चबूतरे पर पहुंचा जहाँ देबासीस मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। यहाँ उन्होंने पहले से ही तिवारी होटल में कमरा बुक कर लिया था। पहुँचते ही उन्होंने कहा की आप कमरे में पहुचों, हम सभी ने खा लिया है… आपका खाना वहीं भिजवा रहें हैं। देबासीस भाई की यही बात सबसे अच्छी लगती है की एक सगे भाई की तरह केयर करते हैं। चबूतरे से ही बाबा केदारनाथ के मंदिर की ओर देख कर प्रणाम किया और कहा की कल सुबह भेंट होगी।

Night view of Kedarnath temple
Night view of Kedarnath temple

कमरे में पहुँचते ही कुछ ही देर में खाना आ गया था। वैसे पहाड़ी यात्राओं में खाने का मन कम ही करता है लेकिन यहाँ खाना मजबूरी भी थी। कुछ ही देर में बाकी साथी जो की बाहर घूम रहे थे वे भी आ चुके थे। भोजन करके रजाई की शरण ली, वैसे भी अगले दिन सुबह जल्दी उठना था।

इस भाग में इतना ही, अगले भाग में आपको करवायेंगे बाबा केदारनाथ के दर्शन। तब तक के लिये हर हर महादेव।

अगले भाग के लिये यहाँ क्लिक करें।

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अति सुंदर वर्णन 👌