यात्रा मोड

‘उत्तरकाशी और गंगोत्री की यात्रा’.. जो लोग गंगोत्री गए होंगे वे जानते ही होंगे की उत्तरकाशी तो महज़ एक पड़ाव है इस यात्रा का, तो फिर इस यात्रा का नाम केवल गंगोत्री यात्रा ही क्यों नहीं रखा ? आप का सोचना भी ठीक है, लेकिन इस यात्रा में उत्तरकाशी ने मेरे मन जो जगह बनायी है शायद गंगोत्री भी उससे थोड़ा पीछे रह गया। कृपया गंगोत्री वाले बुरा ना माने।

पिछले कुछ समय से बहुत ज्यादा खर्चा हो रहा था और मई में ही मिर्ज़ापुर भी गया था, इसलिए यात्राओं को कुछ समय के लिए टाल देना चाहता था। लेकिन क्या करें ? जिसका मन घुमक्कड़ी में लग जाता है, वह ज्यादा समय तक घर में नहीं रह सकता। बहुत से लोग पर्यटक और घुमक्कड़ को एक ही समझते है, किन्तु ये हैं एक – दूसरे से भिन्न। एक पर्यटक जब कहीं जाता है तो वह एक पूर्व नियोजित योजना के साथ जाता है ! जैसे की कौन से मार्ग से जाना है ? कौन से होटल में ठहरना है ? कितने दिन के लिए जाना है ? यहाँ तक की वो एक शहरी क्षेत्र में घूमने के लिए भी गाइड की सहायता लेता है और इसके साथ होती है। इन सबके साथ होती है सुविधाओं की एक लम्बी – चौड़ी फेहरिस्त। इन सबके विपरीत हम जैसो की कोई योजना नही होती। जब मन करता है कुछ जरुरी सामान पैक करके अपने ख्वाब पूरे करने निकल पड़ते हैं। हम घुमक्कड़ों को नही पता होता की कहाँ जाना है, कहाँ रुकना है ? जहाँ मन किया चल पड़े और जहाँ मन किया घर वापसी।

हम में से बहुत से लोगों का मन करता है की काश पहाड़ों में छोटा सा घर होता और सारी जिंदगी वही गुज़ार दें। हम अपनी ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने पहाड़ों में जाते भी हैं, 3-4 दिन रुकते हैं और फिर वापस लौट पड़ते हैं उसी ढर्रे की ओर। क्या करें ? बहुत सी जिम्मेदारियां होती हैं। नौकरी, पैसा, घर, बच्चों की पढ़ाई, बच्चों की नौकरी, बच्चों के बच्चों की पढ़ाई और उनकी नौकरी। इन सबके बीच कहीं अपने आज की मौत और आखिरकार अपनी भी…. एक अनंत यात्रा जो जिम्मेदारियों के बोझ तले दब कर ख़त्म हो जाती है और जिसे दुनिया के ज्यादातर लोग अंतिम सत्य मानकर अपनाते रहें हैं, अपनाते रहेंगे।

मेरे प्रिय लेखक श्री उमेश पंत जी की किताब इनरलाइन पास से एक अंश है –

‘पहाड़ वालो का दिल्ली जाना, बिहार वालों का दिल्ली जाना, यूपी वालों का दिल्ली जाना…… ये सब उसी ढर्रे की तरफ मजबूरन ही सही बढ़ जाने की एक अदृश्य प्रक्रिया है और सबको दिल्ली जाने को मजबूर कर दिया जाना एक बड़ी पूँजीवादी व्यवस्था को अबूझे – अनजाने आत्मसात कर लिए जाने की एक अदृश्य प्रक्रिया है। एक ऐसी प्रक्रिया जिसके तहत आप अपनी जिंदगी किसी कम्पनी, किसी फर्म, किसी सरकार, या किसी व्यक्ति का नौकर बनकर बिता देंगे। यह करना ही सर्वमान्य होगा। नौकर बन जाना ही सफल जो जाना होगा। आप एक इंसानी उत्पाद भर बना दिए जायेंगे जिन्हे मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया जायेगा। आप अपने कमाए पैसे अपने या अपने जैसी ही किसी इंसानी उत्पाद के बनाये उत्पादों पर खर्च कर देंगे। एक ऐसी जीवनशैली आप खुद पर लाद लेंगे जहाँ आप अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करके ही फिट हो पाएंगे। आप पर बड़े – बड़े बैंकों के कर्जे चढ़ते रहेंगे और आप पूरी जिंदगी उन कर्ज़ों को चुकाने में बिता देंगे। ख़ुशी – ख़ुशी या मजबूरन। किसे फर्क पड़ता है। माने यह की आप पूरी जिंदगी को ऑफिस मोड में डालने को मज़बूर हैं। मेरा यात्री मोड शायद इन तमाम लोगों के ऑफिस मोड से उकताया हुआ एक शांत विद्रोह ही था।’

तो आते हैं अपने मुद्दे पर। जून 2017 के अंतिम दिन थे और दिल्ली में मानसून ने भी दस्तक दे दी थी। ऑफिस जाने के लिए बस में बैठा हुआ था। मेरे साथ मेरे सहकर्मी रोहित जी भी थे। वही रोहित जी, जो पिछली बार चोपता – तुंगनाथ यात्रा पर नहीं जा पाए थे और उनकी यात्रा की इच्छा चौथे साल भी अधूरी रह गयी थी। रोहित ने कहा की मानसून आ गया है, कहीं चलने का प्लान बनाओ। वैसे विचार तो अच्छा था लेकिन अभी कुछ दिन पहले ही काफी खर्चा हो गया था, इसलिए अभी तो कहीं जाने का मन नही था। एक दूसरा कारण और था इस असहमति का और वह यह था की मेरे मन में सितम्बर में स्पीति जाने की योजना बन रही थी। मैने रोहित से कहा की तुम चले जाओ, मुझे नहीं जाना और इसके साथ ही कुछ स्थानों के नाम सुझा दिए। लेकिन मेरे मना करने से रोहित ने भी कहा की ‘मै भी आपके साथ ही बाद में जाऊँगा’।

धीरे – धीरे दिन बीतते रहे और ऐसे ही यात्राओं के ख़याली पुलाव पकते रहे। इस बीच ऑफिस में कुछ और मित्रों की डलहौज़ी जाने की योजना बन गयी। अब भला मेरा मन कैसे शांत रह सकता था। मैने भी रोहित से कह दिया चलो, जुलाई में ही चलते हैं। तीन दिन की छुट्टी भी मिल गयी थी।

इंटरनेट पर कई स्थानों के बारे में जानकारी लेना शुरू कर दिया। पहले निश्चित किया की मुनस्यारी चलते हैं!
‘नहीं – नहीं वहां तो ज्यादा दिन लग जायेंगे।
खरसाली ? ठीक है, चलते हैं…., हम्म्म..नहीं जाना खरसाली।

जो स्थान रोहित ने सुझाये उसे मैंने मना कर दिया और जो मैंने सुझाये उस पर रोहित ने आना-कानी की।
इसी उहा-पोह में यात्रा के दिन नज़दीक आ गए। अब तो रोहित ने भी कह दिया की तुम ही सोचो कहाँ जाना है। अब दो ही दिन रह गए थे। मैंने निश्चित कर लिया की बद्रीनाथ चलते हैं और रोहित को भी इस बारे में बता दिया। देबाशीष को भी चलने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया, लेकिन वो अभी ओडिशा से लौटे थे। इसलिए उनके लिए जाना संभव नहीं था।

इस बीच हमारे तथाकथित प्रतिष्ठित मीडिया चैनलों ने देश के तमाम हिस्सों में बाढ़ की खबरें दिखानी करनी शुरू कर दी।
‘देखिये असम जलमग्न हो चुका है…. राजस्थान डूब चूका है….. गुजरात में सड़कों पर मगरमच्छ घूम रहे हैं….. उत्तराखंड में बादल फट गए…. अगले तीन दिनों में उत्तराखंड में भारी बारिश की सम्भावना…… सबसे तेज़ ख़बरें केवल हमारे चैनल पर……।’
दिमाग ख़राब हो चुका था ऐसे समाचार देख – देख कर। मैं इन प्राइवेट मिडिया चैनलों पर ज्यादा विश्वाश नहीं करता। केवल टी.आर.पी. के लिए एक साधारण सी घटना को भी नमक मिर्च लगा कर परोसना इन चैनलों का प्रिय खेल है।

यही ख़बरें देख – देख कर रोहित भी परेशान हो रहे थे। उन्होंने और तेज़ी से बारिश की ख़बरें जुटानी शुरू कर दी और मुझे इन ख़बरों के लिंक भेजने लगे। मै जानता था की जितना टी.वी. पर दिखाया जा रहा है, स्थिति उतनी गंभीर नहीं है। लेकिन उन्हें कौन समझाए? मैंने उन्हें कहा की पहाड़ों में बारिश होना एक आम बात है। भूस्खलन भी होता है लेकिन मलबे को कुछ ही देर में हटा भी लिया जाता है। सरकार सतर्क रहती ही है। उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की ‘कोई समस्या नहीं आने वाली यात्रा में।’ उन्होंने अनमने मन से हाँ तो कह दिया लेकिन उनकी हाँ में भी ना प्रत्यक्ष दिखाई दे रही थी।

आज यात्रा का दिन था और रोहित जी भी बैग लेकर ऑफिस आ गए, लेकिन उनके दिमाग में तो उत्तराखंड वाले बादल फट रहे थे। उनके परिजन इस यात्रा को लेकर चिंतित थे और ऐसा होना स्वाभाविक भी है। इन्ही सब बातों को देखते हुए अंततः रोहित ने यात्रा से मना कर दिया। एक और मित्र तैयार थे जाने के लिए, लेकीन वो भी नही जा रहे थे। अब केवल मै बचा था। नाराज़गी तो बहुत थी रोहित को लेकर लेकिन कर भी क्या सकता था। मैंने अकेले ही यात्रा का निश्चय कर लिया और बैग लेक रात में 10 बजे ऑफिस से निकल पड़ा। इफको चौक से मेट्रो में बैठा। मेट्रो तो आगे बढ़ती जा रही थी लेकिन मन कहीं रुका हुआ सा था। मन नहीं लग रहा था अकेले जाने में। मेट्रो राजीव चौक पहुँचने वाली थी। मन उत्तराखंड की और भाग रहा था और दिमाग कहीं और।

‘नहीं जाना कहीं……’ मैंने यात्रा निरस्त कर घर जाने का फैसला कर लिया और राजीव चौक से द्वारका की मेट्रो में बैठ गया। घर पर आकर बैग पटका और सो गया। अगले दिन जब मन शांत हुआ तो फिर वही घुमक्क्ड़ी के विचार आने लगे। इन तीन दिन की छुट्टियों में घर पर क्या करूँगा ???

कुर्सी पर वैसे ही बैग पड़ा था। मानो कह रहा हो की मुझे इसीलिए पैक किया था ? यह सब देखता रहा, टी.वी. पर न्यूज़ आती रही। तभी सोच लिया की जाना है। माँ से अनुमति लेकर निकल पड़ा कश्मीरी गेट बस अड्डे की ओर।

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