Gangotri temple

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दूसरा दिन

सुबह आंख खुली तो देखा बाहर बारिश हो रही है। मौसम बहुत अच्छा हो चला था। धान के खेतों पर पड़ती बारिश की बूंदे ऐसी लग रही थी मानों हरे मखमल पर मोती। हम चिन्यालीसौड़ पहुँच चुके थे। अब उत्तरकाशी अधिक दूर नहीं था। रास्ते में जगह – जगह गाड़ी रोक कर गाड़ी वाला अखबार के बण्डल फेक रहा था। लोगो की दिनचर्या शुरू हो गयी थी। कोई दूध दूह रहा था, कोई दुकान का शटर उठा रहा था। पास ही एक औरत अपने बच्चे की पिटाई कर रही थी और उसका पति (शायद पति ही हो) उसकी।

हम बादलों से घिरे पहाड़ों को पीछे छोड़ आगे बढ़ते जा रहे थे। गंगा एक चौड़ी घाटी में पूरे वेग से बह रही थी। नदी के दोनो ओर धान के खेत इसकी खूबसूरती को बढ़ा रहे थे। पहाड़ो पर भूस्खलन के निशान स्पष्ट देखे जा सकते थे। मै अपने मोबाइल से वीडियो बनाने का प्रयास कर रहा था। समझ नहीं आ रहा था की वीडियो बनाऊं, या इस खूबसूरती को यूँ ही निहारता रहूँ। मन पूरी तरह वादियों में खो चुका था। तभी अचानक हुए अँधेरे से ध्यान टूटा। यह एक लम्बी सुरंग थी।

उत्तरकाशी समीप ही है

सुरंग पार हुई और हम एक अलग ही दुनिया में प्रवेश कर चुके थे। उत्तरकाशी आ चुका था। वार्णाव्रत पर्वत की गोद बसे इस छोटे से शहर को सपनो का शहर ही कहना ही उचित होगा, क्योंकि वास्तविकता में ऐसी खूबसूरती इस धरती पर तो संभव नहीं थी। जो मैंने देखा उसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। उत्तरकाशी के बारे में बाद में बात होगी, पहले चलते हैं अपनी यात्रा पर।

गाड़ी बस स्टैंड पर रुकी और अख़बारों के बण्डल के साथ – साथ मैं भी वहीं उतर गया। अब जब यहाँ आ ही गया हूँ तो गंगोत्री न जाना ठीक नहीं होगा। गंगोत्री और उत्तरकाशी के बीच की दूरी 100 किलोमीटर है जिसे पार करने में लगभग 4 घंटे लग जाते हैं। गंगोत्री की बस भी खड़ी थी। सोच लिया की पहले गंगोत्री में माँ गंगा के दर्शन किये जाए। वापसी में उत्तरकाशी में रुकना तय किया। वैसे इस लम्बे सफर में मैं बुरी तरह थक गया था और आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन रुकना भी कोई समाधान नहीं था। 140 रुपये का टिकट लेकर बस में बैठ गया। पास ही घोड़ों का एक झुण्ड जा रहा था। उनके गले में लटकी घंटियों की आवाज़ भी नारायण के मंदिर की घंटियों के समान लग रही थी! फर्क भी क्या था दोनों घंटियों की आवाज़ों में.. कुछ नहीं। नारायण ने गीता में कर्मयोग का सन्देश दिया। घोड़े और उनके मालिक भी तो अपना – अपना कर्म ही कर रहे थे। कुछ फोटो लेने शुरू किये और बस पड़ी।

उत्तरकाशी बस स्टैंड
Uttarkashi bus stand
उत्तरकाशी बस स्टैंड

यहाँ से चलते ही जो पहला गाँव आता है, वह है नेताला। नेताला से आगे भटवारी और भटवारी से आगे गंगनानी। गंगनानी इस मार्ग का प्रमुख पड़ाव है। उत्तरकाशी से 46 किलोमीटर की दूरी स्थित यह गांव अपार प्राकृतिक सुंदरता से संपन्न है। इसके यह चारो ओर फैली शांति ध्यान और साधना के लिए इसे उपयुक्त स्थान बनाती है। अपने वाहन से जाने वाले यात्री कुछ देर यहाँ रुक कर यहाँ स्थित गर्म पानी के झरने में स्नान का आनंद भी लेते हैं। मैं तो था बस में और मेरे पास ज्यादा कपड़े भी नहीं थे। इसलिए बस की खिड़की से ही गंगनानी को देखा और आगे बढ़ चला। भटवारी और गंगनानी के बीच से एक मार्ग बरसु गांव की ओर जाता है। जहाँ से दयारा बुग्याल की चढ़ाई शुरू होती है। अगर आप उत्तरकाशी और गंगोत्री की यात्रा पर हैं और आपके पास अतिरिक्त समय है तो दयारा भी जा सकते हैं। वैसे दयारा के लिए आपके पास टैंट आदि का बंदोबस्त होना चाहिए।

यहाँ से आगे बढ़ने पर अगला खूबसूरत पड़ाव था हर्सिल। उत्तरकाशी से गंगनानी तक गंगा एक तंग घाटी में बहती है, लेकिन हर्सिल एक चौड़ी घाटी है। हर्सिल हिमालय की सुन्दरतम घाटियों में से एक है। जब सर्दियों में बर्फ पड़ जाती है तो इसका सौंदर्य देखते ही बनता है। बहुत से ट्रैकर हर्सिल को ही अपना ठिकाना बनाते है। शायद मेरा भी अगला सफर हर्सिल का ही हो ?? माँ गंगा का मायका भी हरसिल के मुखबा गांव में ही है, जिसे मुखीमठ के नाम से जाना जाता है। शीतकाल में माँ गंगा की पूजा यहीं होती है। हर्सिल में भोटिया जनजाती की लोगो की बहुलता है। एक बात और बता दूँ की ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म की शूटिंग यहीं हुई थी।

हर्सिल के बारे में एक कहानी और प्रसिद्ध है। कहा जाता है की यहाँ एक ब्रिटिश अफसर राजा विल्सन रहते थे। इनका पूरा नाम था फ्रेडरिक ई विल्सन जो बहुत साहसी थे। उन्होंने वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सेना की नौकरी छोड़ दी और टिहरी के राजा के पास शरण ली किन्तु राजा अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। इसलिए उन्होंने शरण देने से इंकार कर दिया।

विल्सन उत्तरकाशी के हर्सिल चले गए जहाँ उन्होंने गुलाबी नाम की एक पहाड़ी लड़की से शादी की। रोजगार के लिए विल्सन ने लंदन स्थित एक कंपनी के साथ एक अनुबंध किया और जानवरों की खाल, फर और कस्तूरी आदि का व्यापर करने लगे। उस समय ब्रिटिश सरकार भारत में रेलवे लाइनों का निर्माण करवा रही थी जिसके जिसके उन्हें अच्छी गुणवक्ता वाली लकड़ियों की आवश्यकता थी। विल्सन ने इस अवसर का इस्तेमाल किया और देवदार के पेड़ काट – काट कर बेचने लगे। इस व्यापार के कारण उनकी हैसियत एक राजा जैसी हो गयी। हर्सिल में ही उनके द्वारा बनवाई गयी विशाल हवेली आज भी है।

जैसे – जैसे आगे बढ़ता जा रहा था पहाड़ों की ऊंचाई बढ़ती जा रही थी। इस समय बस समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर चल रही थी। कुछ आगे बढ़ने पर भैरो घाटी में प्रवेश किया। यहाँ से एक मार्ग नेलांग घाटी की ओर जाता है। नेलांग को उत्तराखंड का लद्दाख भी कहा जा सकता है। 1962 के भारत – चीन युद्ध से वर्ष 2015 तक इस घाटी में नागरिकों का प्रवेश प्रतिबंधित था। कभी ऐसा भी वक्त था जब तिब्बत के व्यापारी इसी घाटी से होते हुए व्यापार करने आते थे।

अब गंगोत्री नज़दीक ही था। गंगा की धारा बहुत तेज़ थी, लेकिन जैसी तबाही हमारे तथाकथित सबसे तेज़ ख़बरें पहुंचाने वाला चैनल दिखा रहे थे वैसा यहाँ कुछ नहीं था। इसलिए मेरा सभी घुमक्कड़ों से अनुरोध है की मिडिया की बातों में आने से पहले स्वयं भी जानकारी प्राप्त कर लें। पहाड़ों के बारे में एक बात बता दूँ की पहाड़ों की असली खूबसूरती बरसात के मौसम में ही निखर कर आती है। हरे – भरे पहाड़, चारो ओर बादल, झरने आदि बरसात के मौसम में ही देखने को मिलते हैं। गूगल पर भी जो आप हरे-भरे पहाड़ों की तस्वीरें देखते हैं वे बरसात के मौसम की ही होती हैं। इसलिए थोड़ी सी सावधानी रखिये, स्थानीय निवासियों के संपर्क में रहिये और घुमक्कड़ी का आनंद लीजिये। कुछ दूर और, और आस – पास दुकाने दिखनी शुरू हो गयी। हम गंगोत्री पहुँच चुके थे।

भोटिया कुत्ता

गंगोत्री धाम

एक मुख्य द्वार से गंगोत्री बाज़ार में प्रवेश किया। जैसा की बाकी तीर्थ स्थलों पर होता है वैसा ही बाज़ार था यह। गंगा घाट पर पहुँचते ही एक पंडित जी मिल गए। पूजा पाठ करवाने को लेकर बात की। गंगा में स्नान कर के घाट पर पूजा करवाई और उसके बाद मंदिर में दर्शन किये।

एक बड़ा सा मुख्य द्वार है प्रवेश के लिए। इससे आगे वाहनों का जाना मना है। आगे बढ़ने पर दोनों ओर पूजा – पाठ की सामग्री बेचने वाली दुकाने हैं। हर ओर चुनरी, नारियल आदि से दुकाने भरी पड़ी हैं। कुछ ढाबे भी हैं। गंगा घाट पर पहुँच कर पंडित जी से पूजा करवाने को लेकर बात की। गंगा का बहाव यहाँ बहुत तेज़ होता है।

Gangotri bus stand
गंगोत्री बस स्टैंड
Gangotri market
गंगोत्री बाज़ार

बरसात का मौसम होने के कारण गंगा का जल स्तर काफी बढ़ा हुआ था। यह बढ़ती हुई ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रभाव है की गंगा में ग्लेशियर से छोटे – छोटे बर्फ के टुकड़े गंगा में बह कर आ रहे थे। पानी अत्यधिक ठंडा होने के कारण नहाने की हिम्मत तो थी नहीं लेकिन जैसे तैसे स्नान पूरा कर ही लिया। पूजा संपन्न करा कर मंदिर में माँ गंगा के दर्शन किये।

माँ गंगा के धरती पर अवतरण की पौराणिक कहानी तो आप सभी को पता ही होगी की राजा भागीरथ के कठोर तप के कारण भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और फिर धरती पर कई धाराओं के रूप में प्रवाहित किया।

गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री से 18 किलोमीटर आगे स्थित गोमुख में है। 18 किलोमीटर की यह यात्रा बेहद कठिन है। मार्ग में कई पड़ाव जैसे भोजवासा, चीड़वासा आदि आते हैं और वहां पहुँचने के लिए उत्तरकाशी से अनुमति पत्र लेना पड़ता है। गंगा को यहाँ भागीरथी के नाम से जाना जाता है। जो गंगा निकलती है वह भागीरथी ही है जो की देवप्रयाग में अलखनंदा से संगम करके आगे गंगा के नाम से जानी जाती है। अलखनंदा का उद्गम स्थल बद्रीनाथ से आगे सतोपंथ में है। देवप्रयाग में भागीरथी से संगम पूर्व चार और नदियों का संगम अलखनंदा में होता है। यह चार नदियां हैं धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिण्डर और मन्दाकिनी। अब कुछ जानकारी गंगोत्री के बारे में ले लीजिये।

गंगोत्री धाम उत्तरकाशी जिले का ही भाग है जो की समुद्रतल से 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अक्षय तृतीया (अप्रैल/ मई) को मंदिर के कपाट खुलते हैं और दिवाली के बाद भैया दूज को बंद हो जाते हैं। सर्दियों में यहाँ भारी बर्फ़बारी होती है। बहुत से लोग यहाँ छोटे – छोटे बच्चों को भी ले आते हैं, लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है 12-13 वर्ष से छोटे बच्चों को यहाँ नहीं लाना चाहिए। इसका कारण है लम्बी पहाड़ी यात्रा और दुर्घटना की स्थिति में होने वाली समस्या।

हर हर गंगे

मैं
Gangotri temple
जय गंगा मैया
gangotri temple
गंगोत्री मंदिर

वैसे यदि मौसम साफ़ हो तो गोमुख वाले पर्वत के दर्शन गंगोत्री से भी हो जाते हैं, लेकिन आज हर ओर घने बादल थे तो कुछ ख़ास नहीं दिखा। बैठे – बैठे कब एक घंटा बीत गया पता ही नही लगा। मन तो नही हो रहा था जाने का लेकिन समय कह रहा था ‘उठो अब चलना भी है’। वैसे यहाँ भी धर्मशालाएं और होटल आदि बने हुए हैं लेकिन वे उत्तरकाशी की अपेक्षा महंगे हैं। इसलिए वहां से वापसी कर ली। ढाबे से खाना खाया, कुछ खरीदारी की और उसी बस में जाकर बैठ गया जो उत्तरकाशी से यहाँ लेकर आयी थी।

ढाबे में एक बुजुर्ग मजदूर भी खाना खा रहे थे। ढाबे वाला उन्हें जानता था। ढाबा मालिक ने कहा ‘दो महीने से खाली बैठा है, मेरी दुकान पर क्यों नहीं आ जाता ? पूरे 3000 रुपये दूंगा ! अब तो टूरिस्ट सीसन भी ख़तम हो रहा है। क्या करेगा ?’ मजदूर ने कहा ‘4000 रुपये दे दो तो घर का खर्चा चल जाएगा।’ लेकिन ढाबा मालिक 3000 रुपये से ऊपर देने को तैयार नहीं था। अंततः बात ख़तम हुई और मज़दूर लौट गया। मजदूर और ढाबे वाले की बाते सुन कर लगा की हमसे तो बहुत अच्छे ये मज़दूर हैं जो की ऐसी स्थिति में भी संघर्ष करते हैं। केवल 4000 रुपयों में वह घर चला सकता था लेकिन वह भी उसे मयस्सर नहीं थे। एक हम हैं दिल्ली वाले, 30000 रुपये भी कम पड़ते हैं।

थोड़ी ही देर में बस चल दी। बस में एक पंडित महोदय भगवान से जुडी हुई विभिन्न कहानियाँ सुना रहे थे। जैसे – जैसे बस की स्पीड बढ़ रही थी, वैसे – वैसे कहानियाँ बढ़ रही थी। चार आदमी गांजा भी फूंक कर बैठे थे, दुर्गन्ध से पता चल रहा था। वे तपोवन से आ रहे थे। तपोवन गोमुख से भी आगे है। एक नया शादी-शुदा जोड़ा भी बैठा था ! दुल्हन की हालत उल्टियां कर – कर के खराब हो चुकी थी और इतना होने के बावजूद भी मुँह धोकर फिर से पकोड़ियां खाने लगी। पीछे बैठी एक अम्मा अपने पोते (शायद पोता ही हो) पर बार – बार भड़क रही थी। पंडित जी की कहानियां सुनते – सुनते कब उत्तरकाशी आ गया, पता ही नहीं लगा।

 

गंगोत्री से वापसी

शेष अगले भाग में….

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Achha likhte hain. Images bhi kaafi achhi hain.